अध्याय 79 — गुफा खोजी, राक्षस पकड़ा, वृद्ध-जीवन से मिले और राजा ने बच्चों को बचाया
सुन वुकोंग भिक्षु-राज्य के जामाता-राक्षस को उसकी गुफा में खोजता है, दक्षिण-ध्रुव वृद्ध-तारा से मिलता है, जो सफेद हिरण को वापस ले जाते हैं।
नकली तांग सान्ज़ांग को सैनिकों ने घेरा, दरबार में ले जाया। राजा ने पूछा — "कौन सा हृदय चाहिए?"
राज-जामाता ने कहा — "काला।"
— "ठीक है, पेट चीरो।"
राजा ने तलवार दी। नकली भिक्षु ने पेट चीरा — अंदर से ढेर सारे हृदय निकले। सब रंग — लाल, सफेद, पीले — पर काला नहीं।
— "अरे! यह 'बहुत-हृदयी भिक्षु' है।"
असली सुन प्रकट हुए — "तुम्हारा काला हृदय चाहिए।"
राज-जामाता पहचान गया। भागा। सुन ने पीछा किया।
— "रुको! मेरी एक मार खाओ।"
जामाता ने अजगर-बेंत से वार किया। सुन ने स्वर्णदंड से रोका।
दोनों ऊपर-नीचे, बीस चक्कर। जामाता थका — नई चाल — एक ठंडी रोशनी बनकर उड़ा। रानी को लेकर गायब।
सुन लौटे। राजा को सारी बात बताई।
— "जामाता कहाँ से आया?"
— "सात दिन पहले उसने कहा था — दक्षिण में सत्तर मील, विलो-पहाड़ी, 'क्लियर-ब्लूम' पहाड़ी।"
झू बाजिए के साथ उड़े। सत्तर मील दक्षिण में —
— "विलो-वन दिखा, पर पहाड़ी नहीं।"
भूमि-देवता को बुलाया:
— "विलो-पहाड़ी का भूमि-देव प्रणाम।"
— "डरो मत। उस नौ-शाखा वाले विलो-वृक्ष के नीचे — बाईं ओर तीन बार, दाईं ओर तीन बार — दोनों हाथों से वृक्ष थपथपाओ, 'द्वार खोलो' — तीन बार कहो।"
— "जाओ।"
झू बाजिए को दूर रखा। सुन ने भूमि-देव के अनुसार किया:
बाईं ओर तीन बार, दाईं ओर तीन बार। थपथपाया।
— "द्वार खोलो! द्वार खोलो! द्वार खोलो!"
धाँय — दो दरवाज़े खुले। वृक्ष गायब। अंदर:
धुआँ और रोशनी चमकती, सूर्य-चंद्र भी छुपकर चमकते। एक पगडंडी — अजीब फूल, हर सीढ़ी पर दिव्य घास। चंदन की खुशबू, मखमल की शीतलता — मधुमक्खी लाल फूल से पत्थर-गुफा में। तितलियाँ उड़ीं, पत्थर-परदे को।
आगे — "क्लियर-ब्लूम दिव्य-निवास" — लिखा था।
अंदर — बूढ़ा राक्षस एक सुंदरी को गले लगाए। बातें कर रहे थे:
— "तीन साल की योजना आज सफल होती। उस बंदर ने सब बिगाड़ा।"
सुन झपट पड़े — "तुमने क्या अच्छे दिन जाने?"
राक्षस ने छोड़कर अजगर-बेंत उठाई।
भीतर युद्ध:
दंड उठा — सुनहरी रोशनी, बेंत उठी — भीषण हवा। राक्षस बोला — "तूने मेरे द्वार में घुसने की जुर्रत की।" सुन ने कहा — "बच्चों की जान के लिए।" शब्दों से, बलों से — फूल टूटे, काई फिसली। गुफा में रोशनी बुझी, पर्वत पर खुशबू छुपी। पक्षी डरे, सुंदरी भाग गई। सिर्फ राक्षस और वानर बचे, तूफानी हवा चली।
बाहर — झू बाजिए हथौड़ा लेकर। शोर सुना, आँखें जलीं।
वह विलो-वृक्ष को हथौड़े से मार रहा था — "यह पेड़ राक्षस है!"
पेड़ से खून बहा।
सुन राक्षस को खींचते हुए बाहर निकले। झू बाजिए ने हथौड़ा उठाया — राक्षस पहले से कमज़ोर। ठंडी रोशनी बनकर भागा।
दोनों पीछे दौड़े।
तभी — पक्षियों की आवाज़, शुभ रोशनी।
दक्षिण-ध्रुव वृद्ध-तारा!
— "महासंत! स्वर्ग-नदी-महामार्शल! ठहरो — मैं यहाँ हूँ।"
— "वृद्ध-तारा भाई, आप यहाँ?"
— "उस ठंडी रोशनी के अंदर — उसे माफ़ करो।"
— "राक्षस से क्या रिश्ता?"
— "यह मेरा सवारी-पशु था। एक बार पूर्व-आकाश-देव मेरे पास शतरंज खेलने आए। एक चाल में मैं मग्न — यह भाग गया। खोजते-खोजते आज पाया।"
— "असली रूप दिखाओ।"
— "पापी! असली रूप आ।"
ठंडी रोशनी खुली — एक सफेद हिरण।
वृद्ध-तारा ने बेंत उठाई — "यह बेंत भी इसी ने चुराई थी।"
सफेद हिरण ने सिर झुकाया, आँखें भरीं।
— "भाई, एक काम और।"
— "क्या?"
— "रानी अभी भी गुफा में है — और इसे राजा को दिखाना है।"
— "ठीक है।"
झू बाजिए गुफा में — "राक्षस पकड़ो!"
रानी भागने का रास्ता न मिला। ठंडी रोशनी बनकर उड़ी — सुन ने रोका।
एक दंड — रानी गिरी — सफेद लोमड़ी!
झू बाजिए ने हथौड़ा उठाया — "खूबसूरत लोमड़ी!"
— "पूरे शरीर को मत खराब करो।"
वृद्ध-तारा ने हिरण को देखा — "यह तुम्हारी बेटी है?"
हिरण ने सिर हिलाया, लोमड़ी को सूँघा — आँखें भर आईं।
— "पापी! बस हुआ।"
वृद्ध-तारा ने एक हाथ लगाया।
— "भाई, गुफा को साफ करो।"
झू बाजिए ने सारे विलो-वृक्ष काटे। भूमि-देव ने सूखी लकड़ियाँ लाई। आग लगाई — गुफा खाक।
लोमड़ी का शव लेकर, हिरण को साथ लेकर, भिक्षु-राज्य पहुँचे।
— "यह तुम्हारी सुंदर रानी है।"
राजा घबराया।
— "यह हिरण — तुम्हारा राज-जामाता।"
राजा को शर्म आई।
— "एक हज़ार बच्चों की जान बचाई।"
वृद्ध-तारा ने कहा — "मुझे माफ करना, दवाई नहीं लाई। पर यह तीन खजूर — पूर्व-आकाश-देव के लिए थे — ले लो।"
राजा ने खाए — शरीर हल्का, बीमारी गई।
झू बाजिए — "वृद्ध-तारा, कुछ मुझे भी?"
— "कुछ दिन में भेजूँगा।"
वृद्ध-तारा हिरण पर सवार, उड़ गए।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "बेटे, चलो।"
राजा ने कहा — "रंगीन सवारी पर बैठो।"
— "एक बात — रंग-रूप से दूर रहो, अच्छे काम करो — यही दीर्घायु का रास्ता है।"
सुन ने दो थाल सोना-चाँदी माँगा — तांग सान्ज़ांग ने मना किया।
राजा ने रथ-जुलूस निकाला। रानियाँ, मंत्री — सभी ने विदाई दी। छह गलियाँ, तीन बाज़ार — सब लोग आए।
अचानक — आकाश में हवा चली। सड़क पर — एक हज़ार एक सौ ग्यारह हंस-पिंजरे! अंदर बच्चे।
— "महासंत, काम हो गया, बच्चे वापस।"
राजा-रानियाँ, सब प्रणाम।
— "नगर-देव, भूमि-देव, रक्षकों — धन्यवाद। लोग तुम्हारी पूजा करें।"
लोग बच्चों को गले लगाए।
सुन वुकोंग को, झू बाजिए को, शा वुजिंग को, तांग सान्ज़ांग को — सबको उठाकर घरों में ले गए।
एक महीने तक रहे। फिर विदा।
अदृश्य पुण्य ऊँचे पहाड़ जैसा, जीवित किए हज़ारों-हज़ार।
आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।