अध्याय ५६ — क्रोधित देव ने डाकुओं को मारा, भटके हुए मार्ग पर मन-वानर को निष्कासित किया
सुन वुकोंग डाकुओं को मारता है; तांग सान्ज़ांग उसे फिर निष्कासित करते हैं; सुन वुकोंग गुआनयिन बोधिसत्त्व के पास जाता है।
दिव्य-भूमि शून्य हो तो शुद्धि होती है, चुप्पी में एक भी विचार न उठे। वानर और घोड़े को बाँधो, भटकने मत दो। छह चोरों को निकालो, तीन यानों को जानो। सब इच्छाएँ छोड़ो — तब पश्चिम की मंज़िल स्पष्ट होगी।
तांग सान्ज़ांग ने अपनी अखण्ड देह की रक्षा बिच्छू राक्षसी से की। सुन वुकोंग ने उसे मारकर वीणा-गुफा से गुरुजी को बाहर निकाला। अब जेठ का महीना था:
गर्म हवाएँ जंगली लिली की सुगन्ध लाती हैं, नई बाँस की ठण्डक बरखा बाद महकती है। पहाड़ी जड़ी-बूटियाँ बिना तोड़े सूख रहीं, झरने के किनारे फूल खुद ही खिल रहे।
चलते-चलते एक ऊँचा पर्वत आया। तांग सान्ज़ांग ने कहा—
—सुन वुकोंग! सामने पर्वत है। सँभलकर चलो।
—गुरुजी चिन्ता मत करो।
पर्वत पार किया। नीचे समतल भूमि थी। झू बाजिए आगे-आगे चला — वह घोड़े को हाँक रहा था। घोड़ा उससे नहीं डरता था। सुन वुकोंग ने दंड हिलाया और एक आवाज़ लगाई — घोड़ा उड़ने लगा। घोड़ा बन्दर से क्यों डरता है? क्योंकि पाँच सौ साल पहले सुन वुकोंग जेड सम्राट के घुड़साल का अधिकारी था।
बीस ली बाद घोड़ा रुका। तभी एक लकड़ी के डण्डे की आवाज़ आई — तीस से अधिक डाकू आ गये—
—और! कहाँ जा रहे हो?
तांग सान्ज़ांग घबराकर घोड़े से गिर पड़े—
—महाराज! दया करो! हम भिक्षु हैं।
दो सरदार आगे आये:
एक का नीला चेहरा और नुकीले दाँत, दूसरे की उभरी आँखें और पीली दाढ़ी। दोनों के सिर पर बाघ-चर्म की टोपी, एक के हाथ में काँटेदार डण्डा।
—भिक्षु! धन दो या घोड़ा और कपड़े — जो भी हो।
—मेरे पास धन नहीं। कपड़े अनगिनत घरों से भीख माँगकर बने हैं।
—तो जो भी है, जल्दी दो।
—मेरा एक शिष्य पीछे आ रहा है। उसके पास थोड़ा-सा है।
डाकुओं ने तांग सान्ज़ांग को पेड़ से बाँध दिया।
तीनों शिष्य पहुँचे। झू बाजिए ने देखा — गुरुजी पेड़ से लटक रहे हैं।
—वाह! गुरुजी पेड़ पर चढ़कर झूला झूल रहे हैं!
सुन वुकोंग ने देखा — डाकू। मन में प्रसन्न हुआ।
वह एक छोटे साफ बालक में बदल गया — काला वस्त्र, कंधे पर थैला, दो दर्जन साल की उम्र।
—गुरुजी! यह कौन लोग हैं?
—छुड़ाओ मुझे!
सुन वुकोंग ने डाकुओं को बुलाया—
—मेरे पास कुछ सोना है।
डाकुओं ने गुरुजी को उतारा। तांग सान्ज़ांग घोड़े पर चढ़े और आगे भागे।
सुन वुकोंग ने थैला खोला—
—यह सोने की सूई ले लो।
—इससे क्या करें?
सुन वुकोंग ने सूई को एक कटोरे जितनी मोटी लाठी बनाया और ज़मीन में गाड़ दिया—
—इसे उठा सको तो ले जाओ।
दो डाकू उठाने गये — पर वह तो पृथ्वी की जड़ में धँसी थी, एक इंच भी न हिली।
सुन वुकोंग ने उसे आसानी से उठाया—
—तुम्हारी किस्मत खराब है, आज मुझसे मिल गये।
डाकुओं ने पाँच-दस बार मारा। सुन वुकोंग ने पत्थर जैसा सिर आगे किया। फिर एक झटके से लाठी घुमाई — एक गिरा, फिर दूसरा। बाकी भाग गये।
झू बाजिए दौड़ा आया—
—भाई! गुरुजी ने कहा है — मत मारो!
—मैंने कहाँ मारा? वे दोनों सो रहे हैं।
तांग सान्ज़ांग ने मृत डाकुओं को देखा — क्रोध में जप करने लगे। झू बाजिए ने तीन हाथ गहरा गड्ढा खोदा और दोनों को दबाया।
तांग सान्ज़ांग ने प्रार्थना की—
मैं तांग का भिक्षु, पश्चिम को जाते। मैं विनती से माँगा, तुमने लूटा। सुन वुकोंग ने तुम्हें मारा। यदि यमलोक में मुकदमा करो — उसका नाम सुन, मेरा चेन। हम अलग-अलग हैं।
झू बाजिए हँसा— गुरुजी ने खुद को बचाया!
तांग सान्ज़ांग ने फिर कहा— तुम दोनों का भी नहीं।
सुन वुकोंग बोला—
—गुरुजी! मैं आपके लिए लड़ता हूँ। आप इन दो डाकुओं की मृत्यु पर मुझे यमराज के पास भेज रहे हैं। यमराज मुझे जानते हैं! स्वर्ग, पृथ्वी, नरक — सब मेरे मित्र हैं। मुझे किसी का डर नहीं।
तांग सान्ज़ांग को चिन्ता हुई। वे चुपचाप घोड़े पर बैठकर चले।
एक किसान के यहाँ रात गुज़ारी — बूढ़ा यांग और उनकी पत्नी। उन्होंने सात्त्विक भोजन दिया।
रात को बूढ़े ने बताया — उनका बेटा बदमाश है, घर नहीं आया।
सुन वुकोंग ने सोचा — जो दो डाकू मैंने मारे, उनमें से एक यांग का बेटा भी हो सकता है।
रात के चौथे पहर डाकू आ गये। बेटे को पता चला — वही संत जिसने सरदारों को मारा, यहाँ सोया है।
बूढ़े यांग ने चुपके से चारों को जगाया—
—मेरे घर में रहो मत, पीछे के द्वार से निकलो।
सब निकले।
सवेरे डाकू दौड़ते हुए पहुँचे। सुन वुकोंग ने लाठी से मारी — कुछ मरे, कुछ भागे। जो पीला कपड़ा पहने था — यांग का बेटा।
सुन वुकोंग ने उसका सिर काट लिया और लाकर तांग सान्ज़ांग के सामने रख दिया—
—गुरुजी, यह यांग का बदमाश बेटा।
तांग सान्ज़ांग घोड़े से गिरे—
—ले जाओ यह।
झू बाजिए ने रास्ते की मिट्टी से सिर ढक दिया।
तांग सान्ज़ांग ने तंग-मंत्र जपा। सुन वुकोंग के सिर पर पट्टा कसने लगा — वह तड़फड़ाया।
—मत पढ़ो, मत पढ़ो!
—मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं। वापस जाओ।
—गुरुजी! इतनी कड़ी सज़ा क्यों?
—तुमने कल पहाड़ पर दो डाकू मारे, यांग के घर पर और मारे, और बेटे का सिर काटकर मुझे दिखाया। यह हत्या है। बार-बार कहता हूँ — सँभलो। तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।
—ठीक है, जाता हूँ।
और एक पलटी-बादल में सुन वुकोंग अदृश्य हो गया।
मन में उग्रता — साधना नहीं पकती, आत्मा बेचैन — मार्ग नहीं मिलता। महासंत गया कहाँ? अगले अध्याय में जानें।