अध्याय 98 - वानर और अश्व परिपक्व — खोल छूटा, कर्म पूर्ण — तथागत के दर्शन
तांग सान्ज़ांग और शिष्य आत्मा पर्वत पर पहुँचते हैं। बुद्ध से मिलते हैं। अनंदा और काश्यप से सूत्र-ग्रंथ प्राप्त करते हैं। लौटते हुए श्वेत-वीर अधीश्वर उन्हें रोकता है।
मुखिया को फिर जीवन मिला। फिर से झंडे-नगाड़ों के साथ विदाई हुई।
तांग सान्ज़ांग के चारों पश्चिम में आगे बढ़े। सच में यह बौद्ध-भूमि थी — यहाँ और जगह से अलग। जड़ी-बूटी और फूल अलग थे, पुराने देवदार और ऊँचे बाँज-वृक्ष। हर घर बौद्ध-उपासक, हर ओर भिक्षुओं को भोजन। जंगल में भी तपस्वी दिखे, सूत्र पढ़ते।
छः-सात दिन बाद एक ऊँचा महल दिखा:
सौ कदम ऊँचे, आकाश छूते। सिर झुकाओ तो सूर्यास्त दिखता। हाथ बढ़ाओ तो तारे पकड़ सकते। खुली खिड़कियाँ ब्रह्मांड को निगलती। ऊँची छत बादल-परदे को छूती। पीली बगुला संदेश लाई — शरद के पेड़ बूढ़े हुए। रंगीन पक्षी पत्र लाई — शाम की हवा शुद्ध।
तांग सान्ज़ांग ने दूर से हाथ उठाकर कहा — वुकोंग, यह कितना सुंदर स्थान है।
सुन वुकोंग — गुरुजी, उन झूठे स्थानों में तो आप साष्टांग दंडवत करते थे। अब सच्चे स्थान पर घोड़े से उतरे नहीं?
तांग सान्ज़ांग सुनते ही घोड़े से कूदे। महल के द्वार पर पहुँचे।
एक देव-बालक तिरछा खड़ा था — आवाज़ लगाई — पूर्वी तांग से सूत्र लेने आए हो?
तांग सान्ज़ांग ने जल्दी से वेश ठीक किया। देखा:
सोने का वस्त्र, हाथ में जड़-पंख। सोने का वस्त्र — रत्न-महल और यादव-सरोवर में सदा। जड़-पंख — लाल मंच और बैंगनी कक्ष में फहराता। बाँह में स्वर्गीय पंजिका, पाँव में पुआल-चप्पल। उड़ता-उड़ता असली तपस्वी। सुंदरता में अद्भुत। दीर्घायु-साधना में रहते शुभ-भूमि। अनंत-जीवन की सिद्धि — देह-बंधन से मुक्त। दिव्य भिक्षु ने आत्मा पर्वत का अतिथि नहीं पहचाना। यह वर्षों पहले का "स्वर्ण-शिखर महादेव" है।
सुन वुकोंग ने पहचाना — गुरुजी, यह आत्मा पर्वत के जड़ का महादेव है, हमें लेने आया है।
तांग सान्ज़ांग ने आगे बढ़कर प्रणाम किया।
महादेव हँसा — दिव्य भिक्षु, आज आए। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने मुझे धोखा दिया। दस वर्ष पहले वे बुद्ध की आज्ञा लेकर पूर्व में सूत्र-लेने वाले को ढूँढने गई थीं। कहा था — दो-तीन साल में आएंगे। मैं वर्षों से इंतज़ार कर रहा था।
तांग सान्ज़ांग — महादेव, क्षमा और कृपा।
सब भीतर गए। महादेव ने चाय और भोजन मँगवाया। स्नान का जल भी।
कर्म पूर्ण, साधना पूर्ण — अब स्नान। स्वभाव को माँजो, आकाश-तत्त्व से मिलो। हज़ार कष्ट, दस हज़ार संघर्ष — आज समाप्त। नौ नियम, तीन शरण — नया आरंभ। राक्षस समाप्त — बुद्ध-भूमि पर। आपदा गई — संत-मार्ग दिखा। धूल-मिट्टी धुली, निर्मल हुई। मूल रूप लौटा, देह अटूट।
स्नान के बाद रात आ गई। जड़-महल में विश्राम।
अगले दिन तांग सान्ज़ांग ने नए वस्त्र पहने। रेशमी चोला पहना, जड़ाऊ टोपी लगाई, हाथ में लाठी। उठकर महादेव को प्रणाम किया।
महादेव हँसा — कल जीर्ण-शीर्ण थे, आज भव्य। सच्चे बुद्ध-पुत्र।
तांग सान्ज़ांग ने प्रणाम किया और चलने लगे।
महादेव — रुकिए, मैं भी छोड़ता हूँ।
सुन वुकोंग — ज़रूरी नहीं। मुझे रास्ता पता है।
महादेव — तुम्हें आकाश का रास्ता पता है। दिव्य भिक्षु अभी बादल पर नहीं जा सकते। ज़मीन पर चलना है।
सुन वुकोंग — ठीक कहा। गुरुजी की बुद्ध-भक्ति गहरी है, कृपया साथ चलिए।
महादेव हँसते हुए तांग सान्ज़ांग का हाथ थामे बढ़े।
यह रास्ता महल से ही शुरू था — बीच के आँगन से पिछले द्वार की ओर। बाहर आत्मा पर्वत था।
महादेव ने इशारा किया — वह बीच आकाश में पाँच रंगों की शुभ-आभा और हज़ार गुनी शुभ-धुंध — वही है आत्मा पर्वत का ऊँचा शिखर, बुद्धजी का पवित्र स्थान।
तांग सान्ज़ांग देखकर तुरंत साष्टांग दंडवत करने लगे।
सुन वुकोंग हँसा — गुरुजी, अभी दंडवत नहीं। दूर से दिखने वाले पर्वत तक पहुँचने में लंबा वक्त लगता है। यदि शिखर तक दंडवत करते गए तो कितने माथे लगेंगे?
महादेव — दिव्य भिक्षु, आप चारों अब दिव्य-भूमि पर हैं। आत्मा पर्वत दिख रहा है। मैं वापस जाता हूँ।
तांग सान्ज़ांग ने प्रणाम करके विदा किया।
सुन वुकोंग ने रास्ता दिखाया। धीरे-धीरे, शांत-शांत। कुछ पाँच-छः ली चले कि एक तेज़ जल-धारा दिखी — गर्जना करती, लहरें उठाती। पाँच-आठ ली चौड़ी, चारों ओर लोग नहीं।
तांग सान्ज़ांग घबराए — वुकोंग, रास्ता गलत हो गया? या महादेव ने ग़लत बताया? यह नदी इतनी चौड़ी, इतनी उग्र। नाव कहाँ?
सुन वुकोंग — रास्ता सही है। वह किनारे पर एक पुल दिखता है — उस पर से पार होना होगा। तभी सिद्धि होगी।
तांग सान्ज़ांग और आगे गए। एक पट्टिका — "मेघ-पार-घाट"। एक एकल काष्ठ-पुल था।
दूर से देखो तो आकाश पर पड़ी जड़ जैसा। पास जाओ तो टूटी नदी पर एक सूखी शाखा। वज्र-नदी, समुद्र पर पुल — उससे आसान। अकेली एक लकड़ी — मनुष्य कैसे पार करे? दस हज़ार कदम इंद्रधनुष की परछाईं। हज़ार खोज सफेद धागा आकाश तक। बहुत चिकनी, बहुत फिसलन — पार करना मुश्किल। देव ही मेघ-पथ पर चल सकते हैं।
तांग सान्ज़ांग — वुकोंग, यह पुल तो मनुष्यों के चलने का नहीं। कोई और रास्ता?
सुन वुकोंग — यही रास्ता है।
झू बाजिए — यह रास्ता? इस पर कौन जाएगा? नदी चौड़ी, लहरें उग्र, एक पतली लकड़ी — पाँव रखूँ तो डूबूँगा।
सुन वुकोंग — सब रुको, मैं पहले चलता हूँ।
सुन वुकोंग बड़े कदमों से उस पर चढ़ा। हिलता-डुलता, तेज़ दौड़ा। उस किनारे से हाथ हिलाया — आओ, आओ।
तांग सान्ज़ांग ने सिर हिलाया। झू बाजिए और शा वुजिंग ने उँगली काटी — मुश्किल है।
सुन वुकोंग वापस आया, झू बाजिए का हाथ पकड़ा — मेरे साथ चलो।
झू बाजिए ज़मीन पर लेट गए — फिसलन है! मुझे छोड़ दो, मैं हवा-बादल से जाता हूँ।
सुन वुकोंग ने रोका — यह किस तरह की जगह है? यहाँ हवा-बादल नहीं। इस पुल से ही जाना होगा।
झू बाजिए — भाई, बुद्ध न बनूँ तो भी ठीक है, सच में नहीं चल सकता।
दोनों खींचा-खाँची करने लगे। शा वुजिंग बीच में समझाने आए।
तभी तांग सान्ज़ांग ने मुड़कर देखा — नीचे की ओर एक व्यक्ति नाव खेकर आ रहा है। आवाज़ लगाई — "उतरो, उतरो।"
सुन वुकोंग ने देखा — अपनी स्वर्ण-आँखों से — यह "स्वागत-बुद्ध" था — "नमो रत्न-ध्वज-प्रकाश-राजा बुद्ध"। पर कहा नहीं।
वह नाव के पास आई — बिना पेंदी की!
तांग सान्ज़ांग — यह टूटी, पेंदी-रहित नाव लोगों को कैसे पार करेगी?
बुद्ध — मेरी यह नाव:
"सृष्टि के आरंभ से नाम है मेरा। मैं चलाता हूँ, बदलती नहीं। लहरें हों, तूफान हो — अपने-आप स्थिर। आदि-अंत नहीं — शांति में आनंद। छः धूल से अछूती — एक में मिल जाती। हज़ार विपत्ति में — स्वतंत्र रहती। पेंदी-रहित नाव समुद्र पार करना कठिन। पर आज-कल से — जन-जन को पार करती।"
सुन वुकोंग ने हाथ जोड़कर कहा — कृपा करके हमारे गुरुजी को पार करो।
तांग सान्ज़ांग — पेंदी नहीं है।
सुन वुकोंग ने बाँहें चढ़ाईं और तांग सान्ज़ांग को ऊपर धकेला। वे लड़खड़ाकर नदी में गिरे।
नाव वाले बुद्ध ने एक हाथ से उठाया — नाव पर खड़े।
तांग सान्ज़ांग कपड़े झाड़ते, जूते थपथपाते, सुन वुकोंग को कोसते।
सुन वुकोंग, शा वुजिंग, झू बाजिए, घोड़ा, बोझ — सब नाव पर। नाव वाले ने हल्के हाथ से खेया।
नदी में — एक मृत देह बहती दिखी।
तांग सान्ज़ांग चौंके।
सुन वुकोंग हँसा — गुरुजी, डरो मत। वह आप ही हो।
झू बाजिए — हाँ, आप ही हो!
शा वुजिंग ने ताली बजाई — आप ही हो!
नाव वाले ने भी मल्लाही गीत गाया — "वह तुम हो! बधाई!"
तीनों ने एक साथ गाया।
नाव चलती रही — थोड़ी देर में दूसरे किनारे पर।
तांग सान्ज़ांग हल्के से कूदे — दूसरे किनारे पर।
कोख का बंधन — माँस-हड्डी का शरीर — गया। मूल आत्मा के साथ प्रेम-बंधन। आज कर्म पूर्ण — बुद्धत्व आया। वर्षों की छः-छः धूल — धुली।
किनारे पर आकर मुड़े — नाव भी नहीं, नाव वाले भी नहीं।
सुन वुकोंग ने बताया — वे "स्वागत-बुद्ध" थे।
तांग सान्ज़ांग सचेत हुए। जल्दी से मुड़कर तीनों शिष्यों को प्रणाम किया।
सुन वुकोंग — प्रणाम की ज़रूरत नहीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को सहारा दिया। हमने गुरुजी के बहाने कर्म-मुक्ति पाई; आपने हमारी सहायता से, ज्ञान के मार्ग पर चलते हुए, साधारण देह से मुक्ति पाई।
तांग सान्ज़ांग — यह स्थान कितना सुंदर है — फूल, घास, बाँस, फीनिक्स-पक्षी। उन राक्षसों के स्थान से कितना अलग।
सब देह-हल्के, चाल-फुर्तीले। आत्मा पर्वत पर चढ़े।
दूर से गर्जन-मंदिर:
शिखर ब्रह्मांड तक, जड़ें सुमेरु-नाड़ी से। कुशल-शिखर कतारबद्ध, विचित्र पत्थर। लटकी हुई चट्टान के नीचे जड़ी-बूटी, टेढ़े रास्ते पर बैंगनी मशरूम। स्वर्गीय बंदर फल लेकर आड़ू-वन में — जैसे आग से सोना जला। सफेद सारस देवदार पर — धुएँ में जड़ जैसा। दो-दो रंगीन फीनिक्स, जोड़े-जोड़े नीली चिड़ियाँ। सोने की छत सारस की जोड़ी जैसी, स्पष्ट टाइलें पन्ने जैसी। पूर्व में, पश्चिम में — सब रत्न-महल और मोती-भवन। दक्षिण में, उत्तर में — अनगिनत रत्न-मंडप। स्वर्ग-राजा के कक्ष में प्रकाश, धर्म-रक्षक कक्ष में बैंगनी लौ। स्तूप ऊँचा, उदुंबर-फूल सुगंधित। यह भूमि स्वर्ग से भी उत्तम, बादल में भी दिन लंबा। लाल धूल नहीं पहुँचती, सब बंधन मिटे। लाखों-करोड़ों कल्पों में भी महान धर्म-कक्ष अटूट।
तांग सान्ज़ांग आनंदित — हाथ उठाकर, पाँव थिरकाते। सुन वुकोंग के साथ आत्मा पर्वत के शिखर पर। गर्जन-मंदिर के प्रवेश-द्वार पर।
चार महान वज्र-पहलवान मिले — दिव्य भिक्षु आ गए?
तांग सान्ज़ांग — हाँ, शिष्य शुआन्ज़ांग आया।
वज्र-पहलवान ने एक को भीतर संदेश दिया। आगे के द्वार पर फिर, और आगे भी। मुख्य कक्ष में — संदेश: दिव्य भिक्षु आए।
तथागत बुद्ध ने सुनकर आनंद जताया। आठ बोधिसत्त्व, चार वज्र, पाँच सौ अर्हत, तीन हज़ार उपदेशक, ग्यारह महानक्षत्र, अठारह देवालय-रक्षक — दो कतारें। स्वर्णिम आदेश — दिव्य भिक्षु को बुलाओ।
तांग सान्ज़ांग, सुन वुकोंग, झू बाजिए, शा वुजिंग — घोड़ा, बोझ — सब भीतर।
वर्षों पहले राज-इच्छा से गए थे। राज-पत्र लेकर महल-सीढ़ी उतरे। ओस-कोहरे में सुबह पर्वत चढ़े। पत्थर पर रात को लेटे — बादल-आच्छादित। ध्यान-लाठी लेकर तीन हज़ार ली नदी पार की। चक्र-उड़ान — दस हज़ार ली पर्वत-किनारे। मन में सदा सिद्धि की कामना। आज अंततः तथागत के दर्शन।
चारों महान कक्ष के सामने — तथागत को साष्टांग प्रणाम। बाएँ-दाएँ को भी। तीन परिक्रमा। घुटने टेककर — मुहर-पत्र प्रस्तुत किया।
तथागत ने देखा, वापस दिया। तांग सान्ज़ांग ने और झुककर कहा — शिष्य शुआन्ज़ांग पूर्वी तांग सम्राट की आज्ञा से यहाँ आया। महान सूत्र माँगता है — संसार के प्राणियों के उद्धार के लिए।
तथागत ने दया से उत्तर दिया — पूर्वी महाद्वीप के लोग लालच में हैं, हत्या में, वासना में। वे बुद्ध-मार्ग नहीं मानते। इसीलिए नरक में गिरते हैं, पशु-योनि मिलती है। मेरे पास तीन संग्रह हैं — एक धर्म की बात करता है, एक तर्क की, एक आत्मा की। कुल पैंतीस खंड, पंद्रह हज़ार एक सौ चौवालीस ग्रंथ।
— अनंदा, काश्यप — इन्हें रत्न-महल में ले जाओ, भोजन करवाओ। फिर भंडार खोलो, हमारे संग्रह में से पैंतीस खंडों में से कुछ-कुछ चुनकर दो।
दोनों स्थविर तांग सान्ज़ांग को रत्न-महल के नीचे ले गए। वहाँ अलौकिक भोज था:
रत्न-अग्नि सोने का प्रकाश — आँखें चमकीं। अनोखी सुगंध, अद्भुत भोजन — अत्यंत उत्तम। हज़ार स्तरीय सोने का महल — अपरिमित। एक तरफ स्वर्गीय संगीत — कानों में शुद्ध। सादा भोजन, स्वर्गीय फल — साधारण मनुष्यों ने कम देखा। सुगंधित चाय, अनोखा आहार — दीर्घायु दे। जो कष्ट सहे हज़ारों — आज श्रेष्ठ सुख। आज भव्यता — मार्ग की सिद्धि।
झू बाजिए और शा वुजिंग के लिए यह विशेष था। तांग सान्ज़ांग ने भी पाया।
भोजन के बाद — रत्न-भंडार खुला। दरवाज़ा खुला। प्रकाश और धुंध।
ग्रंथ-पेटियों पर लाल पट्टिकाएँ:
(यहाँ सभी ग्रंथों की सूची थी — निर्वाण-सूत्र, बोधिसत्त्व-सूत्र, हुआयेन-सूत्र, प्रज्ञापारमिता और कई अन्य)
अनंदा और काश्यप — ग्रंथ दिखाकर कहा — पूर्व से आए हो, हमें कुछ उपहार दो। शीघ्र दो, तभी ग्रंथ मिलेंगे।
तांग सान्ज़ांग — रास्ता बहुत दूर, कुछ नहीं लाया।
दोनों स्थविर हँसे — खाली हाथ सूत्र देना — भविष्य में लोग भूखे मरेंगे।
सुन वुकोंग क्रोधित — मैं तथागत के पास जाता हूँ।
अनंदा — शोर मत करो, यह कौन-सी जगह है? यहाँ आओ, ग्रंथ लो।
झू बाजिए और शा वुजिंग ने सुन वुकोंग को रोका। ग्रंथ एक-एक करके बोझ में बाँधे, घोड़े पर लादे।
बुद्ध-सिंहासन के सामने झुककर प्रणाम किया। बाहर निकले। हर बुद्ध-प्रतिमा को दो-दो दंडवत। बाहर भिक्षु-भिक्षुणी-उपासक-उपासिकाओं को भी। नीचे पर्वत की ओर।
रत्न-महल पर "दीपंकर प्राचीन बुद्ध" थे। उन्होंने देखा — अनंदा और काश्यप ने बिना अक्षर वाले ग्रंथ दिए हैं।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा — पूर्व के भिक्षु मूर्ख हैं — "बिना-अक्षर-ग्रंथ" को नहीं समझेंगे। दिव्य भिक्षु की इतनी यात्रा व्यर्थ।
पास में "श्वेत-वीर अधीश्वर" थे।
दीपंकर बुद्ध ने कहा — तुम जाओ, हवा चलाकर ग्रंथ छीनो और उन्हें वापस भेजो — असली ग्रंथ माँगने।
श्वेत-वीर अधीश्वर ने उड़कर — एक भयंकर तूफान:
बुद्ध का साहसी सेवक — हवा-देव से आगे। स्वर्गीय उग्र आवाज़ — कानों को बहरा करती। यह तूफान — मछलियाँ बिल से निकलीं। नदी-समुद्र लहरों से उलटे। काली बंदर फल लेकर आना मुश्किल। पीली बगुला बादल लौटा — पुराना घर। लाल फीनिक्स संगीत नहीं गाती। रंगीन मुर्गा कर्कश आवाज़ में बोला। हरा देवदार टूटा, उदुंबर-फूल उड़े। बाँस सीधे गिरे, सोने का कमल हिला। घंटे की आवाज़ तीन हज़ार ली दूर गई। ग्रंथ-धुन हल्की उड़कर हज़ार घाटी ऊँची। चट्टान के नीचे अनोखे फूल — रंग गए। रास्ते की जड़ी-बूटी — ताज़े पौधे झुके। रंगीन पक्षी पंख नहीं फैला पाते। सफेद हिरण पर्वत में छिपा। दूर-दूर अनोखी सुगंध ब्रह्मांड में फैली। शुद्ध वायु बादलों तक पहुँची।
तांग सान्ज़ांग चल रहे थे — सुगंधित हवा आई। सोचे — यह तो बुद्धजी का शुभ-संकेत होगा। सावधान नहीं हुए।
एक आवाज़ — आधे आकाश से एक हाथ उतरा और घोड़े का बोझ उठाकर उड़ गया।
तांग सान्ज़ांग ने सीना पीटा। झू बाजिए ज़मीन पर लोटकर पीछे दौड़े। शा वुजिंग ने बचा ग्रंथ सँभाला। सुन वुकोंग ने उड़कर पीछा किया।
श्वेत-वीर अधीश्वर ने देखा — सुन वुकोंग पास आ रहा है। उसकी लाठी बेतरह है। ग्रंथ-बोझ नीचे फेंका।
सुन वुकोंग ने पीछा छोड़ा — ग्रंथ बिखरे, हवा में उड़े।
झू बाजिए ने उठाकर सुन वुकोंग के साथ एकत्र किए। तांग सान्ज़ांग के पास लाए।
तांग सान्ज़ांग — यह स्वर्ग में भी राक्षस हैं!
शा वुजिंग ने एक खोला — सफेद कागज़! अक्षर नहीं।
सुन वुकोंग ने एक और खोला — वही।
झू बाजिए ने एक और खोला — वही।
सब खोले — सब खाली।
तांग सान्ज़ांग — पूर्वी देश के लोगों का भाग्य नहीं। बिना अक्षर वाले ग्रंथ किस काम के? सम्राट को क्या बताऊँगा?
सुन वुकोंग — वही हुआ — अनंदा और काश्यप ने उपहार नहीं मिला, इसलिए खाली कागज़ दे दिए। चलो, तथागत से शिकायत करते हैं।
झू बाजिए — बिल्कुल।
फिर से आत्मा पर्वत पर चढ़े।
द्वार पर सबने स्वागत किया — सूत्र बदलने आए?
तांग सान्ज़ांग ने सिर हिलाया।
वज्र-पहलवान ने रोका नहीं — भीतर जाने दिया।
सुन वुकोंग — तथागत! हमने पूर्व से लाखों कष्ट सहे। आपने आदेश दिया — सूत्र दो। पर अनंदा और काश्यप ने उपहार नहीं मिला, बिना अक्षर वाले कागज़ दे दिए। यह किस काम के?
तथागत हँसे — रुको, शांत हो। ये दोनों जानते थे। पर सूत्र हल्के नहीं दिए जाते, खाली भी नहीं। एक बार इन सूत्रों को — शैवत-नगर के एक श्रेष्ठी के घर पढ़ा था, उसके परिवार की रक्षा के लिए, मृतकों के उद्धार के लिए। उसने केवल तीन मन तीन सेर मोती के दाने दिए। मुझे अभी भी लगता है कि वे बहुत सस्ते में बेचे गए थे। तुमने खाली हाथ माँगे — इसीलिए खाली मिले। "बिना-अक्षर वाले सूत्र" भी असल में अच्छे हैं। पर पूर्व के लोग समझेंगे नहीं।
— अनंदा, काश्यप — जाओ, असली सूत्र निकालो। हर खंड में से कुछ-कुछ दो।
दोनों स्थविर फिर रत्न-महल ले गए — फिर उपहार माँगा।
तांग सान्ज़ांग के पास कुछ नहीं। शा वुजिंग ने बैंगनी-सोने का कमंडल निकाला — तांग सम्राट ने दिया था।
— यही लो।
अनंदा ने लिया — मुस्कुराया।
आसपास के देवता हँसे — शर्म नहीं आती?
अनंदा का चेहरा लाल हो गया। पर कमंडल पकड़े रहे।
काश्यप ने ग्रंथ निकाले — एक-एक तांग सान्ज़ांग को दिए।
तांग सान्ज़ांग ने शिष्यों से कहा — इस बार ध्यान से देखो।
एक-एक करके देखा — सब अक्षरों वाले।
पाँच हज़ार अड़तालीस ग्रंथ — एक पूर्ण संग्रह। घोड़े पर लादे, दो बोझ बाँधे।
महान सूत्र का रस मधुर। तथागत ने बड़ी कुशलता से रचे। शुआन्ज़ांग की पर्वत-यात्रा का कष्ट जानो। अनंदा का धन-लोभ हास्यास्पद। पहले प्राचीन बुद्ध ने सँभाला। बाद में असलियत — शांति मिली। आज पूर्वी देश में पहुँचेंगे। सबको वर्षा और ओस की कृपा।
अनंदा और काश्यप तांग सान्ज़ांग को तथागत के पास लाए।
तथागत ने घोषणा की — सभी को बुलाओ। सब बुद्ध, बोधिसत्त्व, अर्हत — सब उपस्थित। तथागत ने तांग सान्ज़ांग से कहा — यह सूत्र का महत्त्व अपरिमित है। यह हमारे मार्ग का दर्पण, तीनों धर्मों का मूल। इसे कभी हल्का मत समझो। स्नान-उपवास बिना नहीं खोलना। रक्षा करो।
तांग सान्ज़ांग ने साष्टांग प्रणाम किया। ग्रंथ लेकर वापस। तीन परिक्रमा।
बाहर तीन द्वारों पर भी प्रणाम।
तथागत ने तांग सान्ज़ांग को विदा किया। बाद में — गुआनयिन बोधिसत्त्व ने हाथ जोड़कर कहा — शिष्या ने तथागत की आज्ञा से पूर्व में सूत्र-लेने वाले को ढूँढा। आज सफलता मिली। कुल चौदह वर्ष — पाँच हज़ार चालीस दिन। पर आठ दिन कम है — एक संग्रह के अंकों में।
तथागत प्रसन्न — ठीक कहा। आठ महावज्र को आदेश — शीघ्र दिव्य भिक्षु को पूर्व में ले जाओ, असली ग्रंथ सौंपो, शीघ्र वापस आओ — आठ दिन में एक संग्रह का अंक पूरा होगा।
महावज्र दौड़े — तांग सान्ज़ांग को ललकारा — सूत्र-लेने वाले, हमारे साथ चलो।
तांग सान्ज़ांग हल्के-तेज़। हवा पर उड़ने लगे।
स्वभाव दिखा, मन शुद्ध — बुद्ध के दर्शन। कर्म पूर्ण, साधना पूर्ण — उड़ान।