अध्याय 97 - स्वर्ण-उपकार बदले में विपत्ति, पवित्र प्रकट होकर आत्मा को बचाते हैं
कौ-परिवार पर डाकू हमला करते हैं। मुखिया मारा जाता है। तांग सान्ज़ांग पर झूठा आरोप लगता है और सबको जेल में डाला जाता है। सुन वुकोंग चमत्कार से न्याय दिलाता है।
ताँबा-मंच नगर में कुछ बदमाश थे — वेश्यागमन, शराब, जुए में सारा धन गँवाया। मिलकर चोरी करने की योजना बनाई।
एक बोला — आज सबसे अमीर घर है — कौ-परिवार। उन्होंने आज तांग भिक्षुओं को बड़े धूमधाम से विदा किया। रात में बारिश है, पहरेदार भी ढीले हैं — चलते हैं।
सब मान गए। छोटी तलवारें, काँटेदार हथियार, लाठियाँ, रस्सियाँ, मशालें लेकर निकले।
कौ-परिवार के द्वार तोड़े, भीतर घुसे।
परिवार के सब लोग — बेटे-बेटियाँ, बहू-नौकर — इधर-उधर भाग छिपे।
मुखिया जान देकर बाहर आए — महाशयों, जितना काम आए ले जाओ, पर थोड़ा मेरे पुत्रों के लिए भी छोड़ो।
डाकुओं ने उन्हें दुलत्ती मारी।
मुखिया जमीन पर गिरे — तीनों प्राण चले गए।
डाकू माल लेकर दीवार फाँदकर पश्चिम की ओर भाग गए।
नौकरों ने देखा — मुखिया मर गए। रोते हुए ढेर के ऊपर लोट गए।
रात के चौथे पहर में बुज़ुर्गानी को क्रोध आया — उस तांग भिक्षु की वजह से इतना धूमधाम हुआ, इसीलिए यह आपदा आई। झूठा आरोप लगाने की सोची।
पुत्र कौ-लियांग को बुलाया — उन्होंने जो देखा, वह बताया।
बुज़ुर्गानी — तांग सान्ज़ांग ने मशाल जलाई, झू बाजिए ने चाकू पकड़ा, शा वुजिंग ने सोना उठाया, सुन वुकोंग ने तुम्हारे पिता को मारा।
दोनों बेटों ने माँ पर विश्वास किया। उन्होंने यह लिखा:
तांग सान्ज़ांग ने मशाल जलाई। झू बाजिए ने "मारो" चिल्लाया। शा वुजिंग ने सोना-चाँदी उठाकर भागा। सुन वुकोंग ने हमारे पिता को मारा।
सुबह दरबार में दावा दर्ज हुआ।
नगर-अधिकारी सत्यनिष्ठ और दयालु थे। उन्होंने पढ़ा — कहा — आज तुम्हारे परिवार ने तांग भिक्षुओं को बड़े धूमधाम से विदा किया था। यह क्या मामला है?
कौ-लियांग ने सब कहा।
अधिकारी ने सौ-पचास सैनिक भेजे — पश्चिम की ओर तांग सान्ज़ांग को पकड़ने।
इधर तांग सान्ज़ांग का दल भोर होने पर हुआगुआंग आश्रम से निकला।
डाकू भी उसी रात माल लेकर पश्चिम की ओर भागे थे — बीस ली पर एक पहाड़ी की ओट में छिपकर माल बाँट रहे थे।
तभी तांग सान्ज़ांग का दल आता दिखा।
— वह नहीं है क्या — कल विदाई वाला भिक्षु?
डाकुओं ने रास्ता रोका — भिक्षु! रास्ते का शुल्क दो, नहीं तो एक-एक को काट देंगे!
तांग सान्ज़ांग घोड़े पर काँपे। झू बाजिए और शा वुजिंग घबराए। सुन वुकोंग मुस्कुराया — गुरुजी, मैं पूछता हूँ।
— आप क्या काम करते हैं?
— हम डाकू हैं, "रास्ता-कर" दो।
— तो तुम रास्ते के डाकू हो।
डाकू — मारो!
सुन वुकोंग मुस्कुराया — महाशयों, मैं देहात का भिक्षु हूँ, ग़लती से बोल दिया। रास्ते का शुल्क? मुझसे पूछो। वह घोड़े वाला हमारा गुरुजी है, वे सूत्र-पाठ करते हैं, धन नहीं रखते। काला मुँह वाला — हमारा नौकर, घोड़ा सँभालता है। लंबे थूथन वाला — हमारा मज़दूर, बोझ उठाता है। तुम तीनों को जाने दो, मैं सारा धन-माल तुम्हें दे देता हूँ।
डाकुओं ने कहा — ठीक है।
सुन वुकोंग ने इशारा किया। शा वुजिंग ने बोझ और घोड़ा छोड़ा, गुरुजी और झू बाजिए के साथ आगे बढ़ा।
सुन वुकोंग ने थैला खोलने का नाटक किया। मिट्टी उठाई, जादुई मंत्र पढ़ा — "रुको!"
तीस डाकू जड़ हो गए — दाँत भींचे, आँखें खुली, हाथ फैलाए।
— गुरुजी, वापस आओ।
झू बाजिए — यह क्या हुआ? भाई ने हमें फँसाया?
सुन वुकोंग — गुरुजी, बैठो। ये डाकू हैं। पहले बयान लो — कच्चे हैं या पुराने।
शा वुजिंग — रस्सी कहाँ है?
सुन वुकोंग ने बाल उखाड़े, जादू से तीस रस्सियाँ बनाईं। सबको उलटा लिटाया, हाथ-पाँव बाँध दिए।
जादू पढ़ा — डाकू होश में आए।
तांग सान्ज़ांग ऊपर बैठे। तीनों ने पूछा — तुम कितने हो? कितने साल से काम करते हो?
डाकू — माफ़ करो, हम गरीब घरों के हैं। जुए-शराब में सब गँवाया। आज कौ-परिवार को लूटा। माल बाँट रहे थे, तुम आ गए। हमने सोचा — तुम्हारे पास भी कुछ होगा। पर तुम्हारी शक्ति जानते नहीं थे।
तांग सान्ज़ांग — कौ-परिवार का माल?
सुन वुकोंग — गुरुजी, वे अच्छे थे, हमें महीना भर रखा। आज डाकुओं का माल मिला — वापस करना चाहिए।
तांग सान्ज़ांग — बिल्कुल सही।
सुन वुकोंग और भाइयों ने पहाड़ी में से माल उठाया। घोड़े पर लादा। झू बाजिए ने एक बोझ उठाया, शा वुजिंग ने सामान।
डाकुओं को मारना चाहा — पर गुरुजी के डर से छोड़ दिया। बाल वापस लिए, डाकू भाग गए।
तांग सान्ज़ांग कौ-परिवार की ओर वापस मुड़े।
पर अच्छे काम में भी परेशानी। एक कविता:
एहसान का बदला एहसान में — दुनिया में कम मिलता है। कभी-कभी उपकार ही आपदा बनता है। पानी में डूबते को बचाओ — भी जोखिम। तीन सोचकर काम करो — तो निश्चिंत।
आगे बढ़ते-बढ़ते भाले-तलवार दिखे।
तांग सान्ज़ांग — क्या हुआ?
झू बाजिए — अरे! डाकू लौट आए।
शा वुजिंग — भाई, वे नहीं हैं। भाई, ध्यान से देखो।
सुन वुकोंग ने धीरे से कहा — गुरुजी, आपकी मुसीबत का वक्त आया। सरकारी सिपाही हैं।
सिपाहियों ने घेरा — डाकुओं! माल लेकर घूम रहे हो?
तांग सान्ज़ांग घोड़े से उतारे गए, बाँधे गए।
झू बाजिए — "दुर्भाग्य अकेले नहीं आता।"
शा वुजिंग — भाई, चिंता मत करो। भाई ज़रूर कुछ करेंगे।
तांग सान्ज़ांग — वुकोंग, आगे क्यों नहीं आते?
सुन वुकोंग — माल मिला, क्या बोलूँ?
दरबार में ले जाए गए।
तांग सान्ज़ांग ने सब बताया। मुहर-पत्र दिखाया।
अधिकारी — रास्ते में डाकू मिले, पकड़ क्यों नहीं किया?
तांग सान्ज़ांग — गवाही माँगो, डाकू कहाँ हैं? हम तो माल लौटाने आ रहे थे।
अधिकारी — माल मौजूद है, क्या कहोगे? — "खोपड़ी-कस लाओ, इस भिक्षु के गंजे सिर को कसो।"
सुन वुकोंग घबराया — गुरुजी को ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देना चाहिए।
— मैं ही असली हूँ। मैंने मशाल जलाई, तलवार चलाई, माल लूटा, मुखिया को मारा। मुझे मारो, उन्हें छोड़ो।
अधिकारी ने कहा — तब इसे कसो।
कस लगाया — तो रस्सी टूटी। फिर — फिर टूटी।
तभी खबर — "ऊपर से बड़े अधिकारी आए।"
तांग सान्ज़ांग को जेल में डाला। झू बाजिए — आज और मार पड़ेगी।
सुन वुकोंग — एक भी नहीं पड़ेगी। मैंने सब इंतज़ाम किया है।
जेल में धकेल दिया गया। बिस्तर बँध गई।
— पैसे दो तो छोड़ेंगे।
सुन वुकोंग — गुरुजी, पैसे नहीं हैं? रेशमी चोला ही दे दो।
तांग सान्ज़ांग का दिल डूबा। बोले — वुकोंग, जो चाहो करो।
सुन वुकोंग ने कहा — पैकेटों में एक बहुमूल्य रेशमी चोला है — उसे खोलकर देखो।
जेलरों ने खोला। एक बहुमूल्य चीज़ —
बहुमूल्य मोती से सजा। दुर्लभ बुद्ध-रत्न जड़े। साँप-आभूषण बुने। उड़ते फीनिक्स के किनारे।
जेलर खुश हुए। जेल-प्रधान ने देखा — मुहर-पत्र देखा — समझ गया — ये डाकू नहीं हैं। चोला वापस किया। कहा — सुबह फिर देखेंगे।
रात गहरी हुई।
चार बजे रात — सब सो गए। सुन वुकोंग छोटा बना, जाली से उड़कर निकला।
तारों भरी रात। उड़कर कौ-परिवार के घर पहुँचा।
पड़ोस में एक घर जला — दो बुज़ुर्ग बातें करते थे — एक टोफू बनाने वाला:
— कौ-बुज़ुर्ग बड़े थे — धन था, पुत्र थे, पर उम्र नहीं। हम एक साथ पढ़े थे। वह मेरे से पाँच साल छोटे थे। उनके पिता कौ-मिंग के नाम पर परिवार चला। उनके बाद कौ-बुज़ुर्ग ने परिवार सँभाला — पत्नी से सौभाग्य मिला — खेत उगे, व्याज उगा। दस लाख की संपत्ति हो गई। चालीस की उम्र में भला बन गया। दस हज़ार भिक्षुओं को भोज की प्रतिज्ञा। काल-नियोग से डाकुओं ने मार दिया — चौंसठ वर्ष की उम्र में।
सुन वुकोंग ने सुना — कौ-परिवार की कमरे में उड़ा। ताबूत के सामने दीपक और फूल। बुज़ुर्गानी रो रही थीं। दोनों बेटे और बहुएँ भी।
सुन वुकोंग ताबूत के ऊपर बैठकर खाँसा।
बहुएँ डरकर बाहर भागीं। बेटे जमीन पर ही रहे। बुज़ुर्गानी ने ताबूत थपथपाया — "पतिदेव, जीवित हुए?"
सुन वुकोंग ने मुखिया की आवाज़ में बोला — नहीं जीया।
दोनों बेटे और घबराए।
बुज़ुर्गानी — "तो बोल कैसे रहे हो?"
— यमराज ने दूत भेजे, घर से बात करने आया हूँ। झांग-पत्नी (छेद-सुई-वाली) ने झूठ बोला, निर्दोषों को फँसाया।
बुज़ुर्गानी ने "छेद-सुई" शब्द सुना — घुटने टेककर बोली — "पतिदेव, इतनी उम्र में भी मेरा उपनाम याद है! मैंने क्या झूठ बोला?"
— "तांग भिक्षु ने मशाल जलाई, झू बाजिए ने मारो कहा, शा वुजिंग ने माल उठाया, सुन वुकोंग ने मुझे मारा" — यह झूठ बोला।
तांग सान्ज़ांग के चारों ने रास्ते में डाकुओं को पकड़ा, माल छुड़ाया और वापस करने आ रहे थे। तुमने झूठ बोलकर उन्हें जेल में डलवाया। जेल-देवता, नगर-देवता, शहर-देवता — सब परेशान हुए। यमराज ने मुझे भेजा — उन्हें छोड़ दो, नहीं तो पूरे परिवार का सफाया।
बेटों ने माफ़ी माँगी — कल सुबह दरबार में बयान बदलेंगे।
— ठीक है, कागज़ जलाओ, मैं जाता हूँ।
परिवार ने कागज़ जलाया।
सुन वुकोंग उड़कर अधिकारी के घर पहुँचा। वहाँ एक चित्र था — एक अधिकारी घोड़े पर, कुछ सेवक, नीली छतरी।
सुन वुकोंग उस चित्र पर बैठ गया।
अधिकारी बाहर आए — झुककर चित्र की ओर धूप-दीप जलाए।
— बड़े चाचा शुआंग-गोंग की देवता-छाया को नमन, आज तुमने आवाज़ क्यों दी?
सुन वुकोंग ने चाचा की आवाज़ में कहा — भतीजे, तूने आज निर्दोष भिक्षुओं को पकड़ा — जेल-देवता परेशान, यमराज क्रोधित। जल्दी छोड़ो।
— ठीक है, मैं सुबह दरबार में छोड़ूँगा।
— ठीक है, कागज़ जलाओ।
अधिकारी ने धूप-कागज़ जलाया।
सुन वुकोंग और उड़ा।
फिर आसमान में एक विशाल रूप लिया — एक पैर नगर के दरबार पर रखा।
— सुनो, मैं जेड सम्राट का दूत हूँ। निर्दोष भिक्षुओं को जल्दी छोड़ो। नहीं तो पाँव से कुचलूँगा।
सब अधिकारी घुटनों पर — "दया करो, हम अभी छोड़ते हैं।"
सुन वुकोंग वापस जेल में जाकर बिस्तर में लेट गया।
सुबह — दरबार खुला।
कौ-लियांग और कौ-डोंग ने बयान बदला।
अधिकारी — पहले दावा किया, अब वापस क्यों?
बेटों ने रात की बात बताई।
अधिकारी ने सोचा — उनके चाचा पाँच-छः साल पहले मरे थे। रात में उन्होंने आवाज़ दी। ज़रूर गड़बड़ है।
तभी नगर-ज़िले के अधिकारी भागकर आए — एक देवता ने धमकी दी।
अधिकारी ने जल्दी से आदेश दिया — जेल खोलो।
झू बाजिए — आज और पिटाई होगी।
सुन वुकोंग — एक भी नहीं, बैठने को कहेंगे।
सब ऊपर आए। अधिकारी और ज़िला-अधिकारी नीचे उतरे — "क्षमा करें, कल एक तो ऊपर के अधिकारी आए थे, दूसरे माल भी था — जल्दी में पूछताछ नहीं की।"
तांग सान्ज़ांग ने सब बताया।
सुन वुकोंग — मेरा घोड़ा कहाँ? सामान कहाँ?
अधिकारियों ने जल्दी लाया।
तांग सान्ज़ांग — कौ-परिवार में चलते हैं, मुखिया को जीवित करूँगा।
बड़े अधिकारी हैरान — ये चमत्कार कर सकते हैं?
तांग सान्ज़ांग — वुकोंग, क्या मुखिया को बुला सकते हो?
सुन वुकोंग — कर सकता हूँ।
— ठीक है, चलो।
कौ-परिवार के घर पहुँचे। कौ-लियांग ने घुटने टेककर माफ़ी माँगी।
अंत्येष्टि कक्ष में परिवार रो रहा था।
सुन वुकोंग — बुज़ुर्गानी, रोना बंद। मैं तुम्हारे पतिदेव को जगाऊँगा। पर किसने मारा — यह ज़रूर बताओ।
— वुकोंग — भाइयो, गुरुजी की रक्षा करो। मैं यमलोक जाता हूँ।
सुन वुकोंग कूदकर हवा में उड़ा।
यमलोक में दस यमराज खड़े होकर स्वागत किए।
— कौ-परिवार का मुखिया कौ-हांग — कहाँ है?
— वह यहाँ खुद आया था। उसे धरती-संग्रह बोधिसत्त्व के पास मिला।
बोधिसत्त्व के महल में गया।
बोधिसत्त्व ने बताया — कौ-हांग अच्छा भिक्षु-भोजक था। मैंने उसे "पुण्य-खाता" का प्रबंधक बनाया।
— महाधीर, यदि आप माँगते हैं, तो मैं उसे वापस भेजता हूँ। एक पूर्ण चक्र (बारह वर्ष) और आयु देता हूँ।
मुखिया प्रकट हुआ।
— गुरुजी, बचाओ!
सुन वुकोंग — तुम्हें डाकुओं ने मारा। यमराज के यहाँ हो। मैं तुम्हें वापस लाया। बोधिसत्त्व ने बारह साल और दिया।
मुखिया ने बार-बार प्रणाम किया।
सुन वुकोंग ने उन्हें हवा में विलीन किया, आस्तीन में लिया और वापस धरती पर आया।
— झू बाजिए, ताबूत का ढक्कन खोलो।
मुखिया की आत्मा को उनके शरीर में डाला।
थोड़ी देर में साँस आई। मुखिया उठे।
— गुरुजी! मुझे मृत्यु से बचाया — यह पुनर्जन्म का एहसान।
— ताबूत में था। गुरुजी ने यमलोक से बचाया।
अधिकारी चौंके।
मुखिया ने पूछा — अधिकारी कैसे आए?
अधिकारी ने सब बताया।
मुखिया ने पत्नी को बुलाया — किसने मारा, बताओ।
— तीस से अधिक डाकुओं ने। मैंने उनसे बात की — एक ने लात मारी।
बुज़ुर्गानी ने झुककर बोली — मैंने झूठ बोला था।
अधिकारी ने उन्हें माफ़ कर दिया।
मुखिया ने भोज का आयोजन किया। अधिकारियों को सम्मानित किया।
अगले दिन — फिर भिक्षु-भोज की पट्टिका लगाई। मेहमान और परिजन बुलाए।
तांग सान्ज़ांग ने फिर मना किया।
मुखिया ने विदाई-जुलूस सजाया।
धरती बुरा सहती है, अच्छा भी। आकाश उदार-हृदय की अनदेखी नहीं करता। शांत कदमों से तथागत के मार्ग पर चलो। वहीं पहुँचोगे — आत्मा पर्वत के सुख-द्वार पर।