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अध्याय 96 - कौ-परिवार का भिक्षु-भोज, तांग सान्ज़ांग धन-वैभव को ठुकराते हैं

तांग सान्ज़ांग और उनके शिष्य धनी परोपकारी कौ-परिवार के यहाँ ठहरते हैं। कौ-परिवार ने दस हज़ार भिक्षुओं को भोज देने की प्रतिज्ञा की थी जो पूरी होती है। तांग सान्ज़ांग जल्दी निकलते हैं।

कौ-परिवार भिक्षु-भोज ताँबा-मंच नगर धन-त्याग तांग सान्ज़ांग झू बाजिए

रंग-रूप — मूलतः बिना रंग। शून्य-शून्य — फिर भी शून्य नहीं। शांत और मुखर, मूक और सक्रिय — मूलतः एक। सपने में सपने की बात क्यों करें?

उपयोग में उपयोग-विहीन। निष्क्रिय-से कार्य में कार्य। जैसे फल पककर स्वाभाविक लाल होता है। मत पूछो — कैसे बोया, कैसे उगाया।

तांग सान्ज़ांग के चारों ने जादुई हवा से भिक्षुओं को विदा किया और पश्चिम की ओर चले।

वसंत का अंत, ग्रीष्म की शुरुआत:

शांत और सुखद मौसम। तालाब में कमल उगे। बेर वर्षा से पके। गेहूँ हवा में लहराए। घास-सुगंध, फूल-झड़ना। कोकिला बूढ़ी — विलो शाखाएँ हल्की। नदी-अबाबील बच्चों को उड़ना सिखाती। पहाड़-मोर चूज़ों को पालती। दक्षिण तारे के नीचे — दिन लंबे। हर वस्तु प्रकाश में चमकती।

पंद्रह दिन बाद एक नगर दिखा।

तांग सान्ज़ांग ने पूछा — यह कौन-सा नगर है?

सुन वुकोंग — नहीं जानता।

झू बाजिए हँसे — यह रास्ता पहले भी चले हो, फिर नहीं जानते? कुछ छिपा रहे हो।

सुन वुकोंग — अरे, उस समय आकाश में बादलों पर उड़ते थे। धरती पर कदम नहीं पड़ा था। इसलिए नहीं जानता।

बातें करते-करते नगर-द्वार पर आए। तांग सान्ज़ांग घोड़े से उतरे। पुल पार कर अंदर गए। एक ओर दो बुज़ुर्ग बैठे बातें कर रहे थे।

तांग सान्ज़ांग बोले — शिष्यो, बीच सड़क में खड़े रहो, सिर नीचे रखो। मैं उन बुज़ुर्गों से पूछता हूँ।

भिक्षुओं ने अभिवादन किया — महाशय, एक सवाल।

बुज़ुर्ग बोले — क्या चाहिए?

— यह कौन-सी जगह है? कहाँ भिक्षा मिलेगी?

— यह "ताँबा-मंच नगर" है, पीछे "दिव्य-भूमि ज़िला" है। भिक्षा के लिए — उस पट्टिका के पास दक्षिण-उत्तर सड़क पर, पूर्व की ओर मुँह करके, बाघ-मुखी द्वार वाला — वह "कौ-बुज़ुर्ग" का घर है। द्वार पर लिखा है "दस हज़ार भिक्षुओं को रोक नहीं"। दूर से आए सब भिक्षु वहाँ जाते हैं।

तांग सान्ज़ांग ने शिष्यों को बताया। सबने मिलकर वह घर खोजा।

धीरे-धीरे सड़क पर चले — लोग डरते हुए देखते थे। तांग सान्ज़ांग ने कहा — चुप रहो, शांत रहो।

मुड़ने पर एक बड़ा उत्तर-दक्षिण सड़क मिली। बाघ-मुखी द्वार पर पट्टिका — "दस हज़ार भिक्षुओं को रोक नहीं।"

तांग सान्ज़ांग बोले — पश्चिम-भूमि बौद्ध-भूमि है, कोई छल नहीं।

झू बाजिए अंदर घुसने लगे।

सुन वुकोंग ने रोका — ठहरो। कोई बाहर आए तो पूछेंगे।

एक नौकर बाहर आया — तराज़ू और टोकरी लिए। अचानक इन चारों को देखा तो टोकरी फेंककर भाग गया — मालिक, चार अजीब भिक्षु आए हैं!

बुज़ुर्ग कौ-परिवार का मुखिया — लाठी टेककर आँगन में टहल रहा था, बुद्ध-नाम जपते हुए। खबर सुनकर लाठी छोड़ आगे दौड़ा — आइए, आइए!

चारों अंदर गए। एक गली पार कर एक कमरे में पहुँचे। बुज़ुर्ग ने कहा — यह बुद्ध-कक्ष, धर्म-सूत्र-कक्ष, भोजन-कक्ष है। नीचे हमारे परिजन रहते हैं।

तांग सान्ज़ांग ने कमरे में प्रवेश किया:

सुगंधित बादल, मोमबत्ती की रोशनी। हर ओर रेशमी फूल और रत्नों से सजे। लाल लकड़ी का ऊँचा घंटा, रंगीन तबला। चाँद की रोशनी जैसी सुंदरता, प्रत्येक बुद्ध-प्रतिमा सोने की। प्राचीन ताँबे का धूपदान, फूलदान। नक्काशीदार मेज, जड़ाऊ डिब्बे। निरंतर चंदन की सुगंध। स्फटिक का पात्र — साफ पानी। काँच का दीपक — खुशबूदार तेल।

बुज़ुर्ग ने मिलाया। बोले — मेरा नाम कौ हांग है, आयु चौंसठ वर्ष। चालीस वर्ष की आयु में मैंने प्रतिज्ञा की — दस हज़ार भिक्षुओं को भोज दूँगा। चौबीस वर्ष में नौ हज़ार नौ सौ छियानवे भिक्षु हो गए। आज आप चार आए — दस हज़ार पूरे। कृपया एक महीना रुकिए। मैं पालकी से आत्मा पर्वत तक छोड़ूँगा। वहाँ से केवल आठ सौ ली है।

तांग सान्ज़ांग बहुत प्रसन्न हुए।

घर के नौकर व्यस्त हो गए। तभी बुज़ुर्ग की पत्नी ने पूछा — कौन आए हैं?

नौकर ने बताया।

बुज़ुर्गानी प्रसन्न हुईं — मैं भी देखूँगी।

नौकर ने कहा — बेगम जी, एक देखने योग्य हैं, तीन बहुत विकट हैं।

बुज़ुर्गानी — जो विकट हैं, वे स्वर्ग-शक्ति वाले होते हैं। जाओ, पहले मालिक को बताओ।

धर्म-कक्ष में आईं। तांग सान्ज़ांग को देखा — सुंदर, ओजस्वी। फिर सुन वुकोंग तीनों को देखा — विकट, पर स्वर्ग-देव जैसे।

घुटने टेककर प्रणाम किया।

तांग सान्ज़ांग — बहुत कृपा है।

झू बाजिए ने मुँह खोला — हम तो शिष्य हैं।

उनकी आवाज़ पर्वत के बाघ जैसी — बुज़ुर्गानी और डरीं।

तभी दो नौजवान आए — "दोनों चाचा भी आए।"

दो युवा उम्मीदवार (शिक्षार्थी) थे — कौ-परिवार के दो बेटे। उन्होंने तांग सान्ज़ांग को प्रणाम किया।

मुखिया ने बताया — ये मेरे बेटे कौ-लियांग और कौ-डोंग हैं।

तांग सान्ज़ांग बोले — "उत्तम परिवार के लिए — सदाचार, शिक्षा।"

बेटों ने पूछा — आप कहाँ से आए? "दुनिया में चार महाद्वीप" हमारे "पश्चिमी गोरक्षक महाद्वीप" में पूर्वी महाद्वीप से दक्षिण तक — न जाने कितने वर्ष?

तांग सान्ज़ांग — चौदह वर्ष चला, अनगिनत कठिनाइयाँ आईं। तीन शिष्यों ने रक्षा की।

दोनों ने प्रशंसा की — सच्चे दिव्य भिक्षु!

भोजन के लिए बुलाया। भोजन-कक्ष में:

सोने की मेज, काली कुर्सियाँ। पाँच रंगों के फल — कारीगर के हाथ के। छोटी-छोटी सब्ज़ियाँ, जल-फल। मिठाई। चावल, भाप-रोटी — गर्म और स्वादिष्ट।

झू बाजिए — एक कटोरी खाकर एक और माँगा।

खाने के बाद तांग सान्ज़ांग चलने लगे।

मुखिया ने रोका — रुकिए। प्रतिज्ञा पूरी होने के बाद ही।

तांग सान्ज़ांग मजबूरन रुके।

पाँच-सात दिन बाद — मुखिया ने चौबीस भिक्षु बुलाए, दस हज़ार भिक्षुओं का आयोजन मनाने के लिए।

तीन दिन का धार्मिक अनुष्ठान हुआ:

मोर-सूत्र पढ़ा। औषधि-बुद्ध का दीप जलाया। जल-पश्चाताप, शत्रुता-मुक्ति। हुआयेन-सूत्र, निंदा-मोचन।

अनुष्ठान के बाद तांग सान्ज़ांग चलने लगे।

मुखिया — इतनी जल्दी क्यों? कल सवेरे विदाई दूँगा।

तांग सान्ज़ांग — गुरुजी ने पूछा था — "कितने दिन में लौटोगे?" मैंने ग़लती से कहा था — "तीन साल।" पर चौदह वर्ष बीत गए। सूत्र अभी मिले नहीं। लौटते में और बारह-तेरह वर्ष। यह सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन है।

झू बाजिए बोले — गुरुजी, यहाँ क्यों नहीं रुकते? इतने घर हैं, इतना स्वादिष्ट भोजन! सब छोड़कर माँगने क्यों जाएँ?

तांग सान्ज़ांग ने डाँटा — जानवर! खाने के अलावा कुछ नहीं।

सुन वुकोंग ने झू बाजिए को मुक्का मारा।

मुखिया ने देखा — भिक्षुओं में नाराज़गी। मजबूरी में बोले — ठीक है, कल भेजूँगा।

बुज़ुर्गानी निकलीं — मैं भी आधे महीने का भोज देना चाहती हूँ।

दोनों बेटे आए — हम भी आधे महीने का भोजन देंगे।

तांग सान्ज़ांग — आप सबकी कृपा, पर हम कल ज़रूर जाएँगे।

बुज़ुर्गानी और बेटों को बुरा लगा — "अच्छे से रोका, वे नहीं माने।"

झू बाजिए — गुरुजी, थोड़ा और ठहरते तो क्या हुआ?

तांग सान्ज़ांग ने फिर डाँटा। झू बाजिए ने खुद को थप्पड़ मारा — बोलने की मनाही है, फिर बोल दिया।

सुन वुकोंग और शा वुजिंग हँसे।

तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग को भी डाँटा — हँसते हो? जाप पढ़ूँ?

सुन वुकोंग घुटने टेककर बोला — मैं नहीं हँसा।

मुखिया ने समझा — रात हो गई। सुबह विदाई।

रात को उन्होंने सौ से अधिक निमंत्रण-पत्र लिखे। रसोइए को विदाई-भोज का आदेश, बीस जोड़ी रंगीन झंडे मँगवाए, भिक्षु-दल और ताओ-दल बुलाए।

रात बीती। सबेरे सब तैयार:

कुछ बिंदु उड़ते काग दूसरे गाँव की ओर। मीनार पर घंटे-नगाड़े दूर से सुनाई। छः सड़कों, तीन बाज़ारों में चुप्पी। हज़ार घरों के दीप मंद। उजली चाँदनी, हल्की हवा — फूलों की परछाईं। आकाश-गंगा धुंधली — तारों पर। कोयल का रुदन — रात गहरी। प्रकृति की निःशब्दता — धरती शांत।

आधी रात को नौकर उठे, सामान जुटाने लगे।

भोर होते-होते सब तैयार।

तांग सान्ज़ांग ने सामान बँधवाया।

झू बाजिए ने फिर मुँह बनाया — चलने की तैयारी, बड़बड़ाते हुए।

मुखिया ने पिछले बड़े कक्ष में भोज सजाया — और शानदार:

पर्दे ऊँचे, चारों ओर परदे। बीच में दीर्घायु-समुद्र-खुशी का चित्र। दोनों ओर चार ऋतुओं के दृश्य। नक्काशी वाले पात्र में सुगंध। देखने की थाली रत्नों से भरी। मेज पर सिंह-मिठाई। नीचे नाच-संगीत। ऊपर फल-सब्ज़ी। शाकाहारी सूप, मिठाई। सुगंधित शराब, चाय। यह आम आदमी का घर, पर राजघराने से कम नहीं।

पड़ोसी, रिश्तेदार, मित्र — सब आए। सबने प्रणाम किया।

झू बाजिए ने शा वुजिंग से कहा — भाई, खूब खाओ। कौ-परिवार के बाद ऐसा भोजन नहीं मिलेगा।

शा वुजिंग — भाई, "सौ स्वाद — एक ही पेट।" पेट का कोई आकार नहीं।

झू बाजिए — मेरे बारे में मत बोलो। मैं एक भरपूर भोजन खाता हूँ तो तीन दिन नहीं भूखा।

भोजन अच्छा था। आखिर में झू बाजिए ने दो आस्तीनें भर ली — रोटियाँ, मिठाई, पापड़, फल।

तांग सान्ज़ांग उठे, मुखिया को धन्यवाद दिया।

बाहर — झंडे, पालकियाँ, भिक्षु-दल, ताओ-दल।

मुखिया — आप जल्दी गए, दल देर से आए — उन्हें अगली बार सम्मानित करूँगा।

दस ली की दूरी तक विदाई हुई। वहाँ भी भोजन-पेय रखा था। सब पीकर विदा हुए।

मुखिया रोते हुए बोले — वापसी में ज़रूर आना।

तांग सान्ज़ांग — आत्मा पर्वत पहुँचने पर बुद्धजी को आपकी महान उदारता बताऊँगा।

धीरे-धीरे बातें करते और दो-तीन ली निकल गए। तांग सान्ज़ांग ने आग्रह से विदा ली। मुखिया रोते हुए वापस गए।

जो भिक्षुओं को भोज देता है, उसे परम ज्ञान का फल मिलता है। जो बुद्ध-दर्शन करने का सौभाग्य नहीं पा सका, वह पछताता है।

चालीस-पचास ली चलने के बाद शाम होने लगी।

तांग सान्ज़ांग — कहाँ रात गुज़ारेंगे?

झू बाजिए — उस अच्छे घर में क्यों नहीं रहे? अब यदि वर्षा हो तो?

तांग सान्ज़ांग — लंबान भले अच्छी, पर लंबे समय का घर नहीं। बुद्ध-दर्शन के बाद वापस तांग देश जाओ, राजा से मिलो।

झू बाजिए ने चुपके हँसा।

सुन वुकोंग ने आगे देखा — एक जगह कुछ घर दिखे।

वहाँ एक टूटा-फूटा पट्टिका-द्वार था — "हुआगुआंग आश्रम"।

तांग सान्ज़ांग — हुआगुआंग देवता अग्नि-बुद्ध के शिष्य हैं। यहाँ पुजारी होंगे।

भीतर गए — बरामदे टूटे, कोई नहीं।

आकाश पर काले बादल छाए, तेज़ बारिश आई।

मजबूरी में टूटे छत के नीचे — जहाँ थोड़ी छाँव मिली — छिप गए। चुप रहे, ऊँची आवाज़ नहीं की।

पूरी रात बैठे-खड़े रहे। सो न सके।

सुख-सुख बाद दुख आता है। आनंद के बाद विपत्ति।