अध्याय 95 - झूठा रूप तोड़, जड़-खरगोश पकड़ा, सच्ची यिन शक्ति लौटी
सुन वुकोंग राजकुमारी को नकली पहचानता है। नकली राजकुमारी दरअसल चाँद का खरगोश है जो प्रतिशोध में उतरी थी। चंद्र-देवी उसे वापस ले जाती हैं और असली राजकुमारी मिलती है।
तांग सान्ज़ांग उदास मन से राजा के साथ पिछले महल में आए। चारों ओर संगीत था, सुगंध थी। वे सिर झुकाए, नज़र नहीं उठाते।
सुन वुकोंग टोपी पर बैठा, स्वर्ण-आँखें खोलकर देख रहा था। दो कतारों में सुंदरियाँ खड़ी थीं — मानो स्वर्ग-महल से उतरी हों:
नाज़ुक, लालित्यमयी, बर्फीला देह। एक-एक जोड़ी — चंपा-देश की सुंदरियों से आगे। बादल-जूड़े ऊँचे, रंगीन फीनिक्स-काँटे, भौंहें हल्की — दूर पर्वत जैसी। संगीत मधुर, संगीत ऊँचे। महल में धुन, आनंद अपरिमित।
सुन वुकोंग ने देखा — गुरुजी बिल्कुल स्थिर थे, मन एकाग्र।
उसने मन में सराहा — अच्छे भिक्षु! इस रत्न-जड़ित ऐश्वर्य में भी मन नहीं डगमगाया।
फिर रानी, रनिवास और राजकुमारी महल से निकलीं। सुन वुकोंग ने ध्यान से देखा — राजकुमारी के सिर पर हल्की-सी राक्षसी छाया।
वह जल्दी से कान के पास बोला — गुरुजी, राजकुमारी नकली है।
तांग सान्ज़ांग — नकली है? तो अभी ही पकड़ो।
सुन वुकोंग — राजा को डर लगेगा। उनके जाने के बाद करूँगा।
पर सुन वुकोंग की प्रकृति ही शीघ्र-स्वभाव की है। वह रुक न सका। एक दहाड़ लगाई, असली रूप में आया, आगे झपटा, राजकुमारी का हाथ पकड़ा और बोला — दुष्ट! तुमने यहाँ खूब ऐशो-आराम किया, पर अभी भी संतुष्ट नहीं? अब मेरे गुरुजी को भी चाहती हो? उनकी शक्ति चुरानी है?
महल में कोहराम — राजा अवाक, रानी-परियाँ इधर-उधर भागीं। मानो:
वसंत की हवा तेज़, शरद की ठंड पैनी। वसंत-हवा बगीचे में आई, हज़ार फूल हिले। शरद-वायु महल में आई, लाखों पत्ते उड़े। आड़ू टेढ़ा हो बाड़ के नीचे, गुलाब झुककर रेलिंग के पास। सरोवर-किनारे कमल हिला, मंच पर गुलदाउदी उड़ी। समुद्र-मेहँदी बेज़ोर जमीन पर, गुलाब सुगंध लिए खेत में। वसंत-हवा ने कमल-सरस तोड़ा, शीत-हिम ने नई मेहँदी झुकाई। अनार की पंखुड़ियाँ भीतर-बाहर बिखरीं। किनारे की विलो तिरछी — महल के उत्तर-दक्षिण। एक रात तूफान — अनगिनत लाल पंखुड़ियाँ जमीन पर।
तांग सान्ज़ांग घबरा गए, राजा का हाथ थाम लिया — डरो मत, यह मेरे शिष्य का जादू है, सच-झूठ परखने के लिए।
राक्षसी ने हाथ छुड़ाया, कपड़े-गहने उतारे, सिर हिलाया और बगीचे के एक मंदिर की ओर दौड़ी। एक छोटी-सी मूसल-जैसी छड़ी उठाई और लौटकर सुन वुकोंग पर प्रहार किया।
सुन वुकोंग ने लोहदंड से रोका। दोनों आकाश में उड़े:
स्वर्ण-आवरण-लाठी प्रसिद्ध। औखल-मूसल छड़ी — कोई नहीं जानता। एक — सच्चे सूत्र लेने आया। दूसरी — फूलों के प्रेम में धरती पर उतरी। वह राक्षसी पहले से तांग भिक्षु को जानती थी। उनकी शक्ति चाहती थी। पिछले वर्ष असली राजकुमारी को उठाया। स्वयं राजकुमारी बनकर बैठी। आज महाधीर ने छाया पहचानी। प्राण बचाने के लिए लड़ रही है। छोटी छड़ी से ऊपर प्रहार। लोहदंड से नीचे वार। शोर-शोर, दोनों लड़े। बादल और धुंध से सूरज ढका।
आधी रात तक लड़ाई। पर राक्षसी ने हवा का झोंका बनकर उत्तर की ओर भागी।
सुन वुकोंग ने पीछा किया। स्वर्ग-द्वार के पास ललकारा — द्वार-रक्षको, उसे रोको!
स्वर्ग-राजाओं ने हथियार उठाए। राक्षसी आगे न बढ़ सकी। पलटकर सुन वुकोंग से फिर भिड़ी।
सुन वुकोंग ने छड़ी को ध्यान से देखा — एक सिरा मोटा, एक पतला। बोला — दुष्टा! यह क्या हथियार है?
राक्षसी बोली — सुनो:
"जड़ है एक खंड भेड़-वसा-जड़ की, बरसों तक माँजकर बनाई। जब ब्रह्मांड अव्यक्त था, मैं पा चुकी थी। जब सृष्टि विभाजित हुई, मैं आगे थी। स्रोत साधारण वस्तु नहीं, स्वभाव आकाश में ही बना। एक देह, स्वर्ण-प्रकाश और चार तत्व। पाँच-तत्व, शुभ-वायु, तीन अंकुर। मेरे साथ चंद्र-महल में रही। चाँदनी कक्ष में मेरी संगिनी। फूलों के प्रेम में पृथ्वी पर आई। तियानझू में सुंदरी बनी। तुमसे विवाह नहीं, केवल तांग भिक्षु से चाहिए था। पूर्व-जन्म का बंधन पूरा करना था। तुमने क्यों इच्छित-जोड़े को तोड़ा? मुझे क्रूर अश्व-पालक कहते हो? यह हथियार बड़ा नाम रखता है। तुम्हारे स्वर्ण-आवरण-दंड के सामने भी। चाँद-महल में औषधि कूटने की मूसल। एक वार में जीव का अंत।"
सुन वुकोंग ठंडी हँसी हँसा — दुष्टा! तू चंद्र-महल में रहती थी और मेरी शक्ति नहीं जानती? जल्दी आत्मसमर्पण कर।
राक्षसी — पाँच सौ साल पहले स्वर्ग में उपद्रव करने वाले "घोड़ा-पालक" को मैं जानती हूँ। पर तुमने शुभ-विवाह तोड़ा — माता-पिता के समान वैर।
— "घोड़ा-पालक" शब्द सुन वुकोंग को बहुत चुभता था। वह क्रोध में लोहदंड घुमाया।
स्वर्ग-द्वार के पास एक बार फिर लड़ाई:
स्वर्ण-आवरण-दंड, औषधि-मूसल — दोनों दिव्य। वह विवाह के लिए धरती पर आई। यह गुरु की रक्षा को यहाँ तक आया। मूल दोष राजा का — फूलों ने आकर्षित किया। इसीलिए आज कठिन संघर्ष। एक आगे, एक पीछे — जीत-हार के लिए। कटु-कटु वचन, दोनों मुँह से। मूसल वीरता — दुनिया में दुर्लभ। लोहदंड का पराक्रम और भी ऊँचा। स्वर्ण-प्रकाश स्वर्ग-द्वार को चमकाता। रंगीन कोहरा धरती तक फैला। दस-बारह दाँव — राक्षसी कमज़ोर पड़ी।
राक्षसी फिर हवा बनी — दक्षिण की ओर भागी। सुन वुकोंग ने पीछा किया। एक पर्वत पर राक्षसी एक गुफा में घुस गई।
सुन वुकोंग भटकता रहा। कहीं वह वापस जाकर गुरुजी को हानि न पहुँचाए। वापस महल आया।
राजा तांग सान्ज़ांग का हाथ थामे काँप रहे थे — बचाओ, बचाओ।
सुन वुकोंग नीचे आया — गुरुजी, मैं आ गया।
तांग सान्ज़ांग — नकली राजकुमारी का क्या हुआ?
सुन वुकोंग — राक्षसी है। पहले आधा दिन लड़ी, फिर हवा बनकर स्वर्ग-द्वार की ओर भागी। वहाँ रोका, दस दाँव और लड़ी। फिर सोने का प्रकाश बनकर दक्षिण की एक पर्वत-गुफा में घुस गई। मैं वहाँ ढूँढने गया पर नहीं मिली। आपकी रक्षा के लिए लौटा।
राजा ने पूछा — असली राजकुमारी कहाँ है?
— झूठी को पकड़ूँगा तो असली आएगी।
रानी ने आग्रह किया — कृपया हमारी पुत्री को खोजो।
सुन वुकोंग — अभी यहाँ नहीं। राजा और गुरुजी सिंहासन-कक्ष में जाएँ। मेरे भाई भी बुलाओ। मैं राक्षसी पकड़ने जाता हूँ।
राजा मान गए। झू बाजिए और शा वुजिंग आए।
सुन वुकोंग दक्षिण के पर्वत की ओर उड़ा।
राक्षसी पराजित होकर गुफा में छिपी थी। सुन वुकोंग ने पर्वत-देवता और भूमि-देवता को बुलाया।
— यह पर्वत क्या है? यहाँ कितने राक्षस हैं?
भूमि-देवता — यह "बाल-सिरे पर्वत" है। यहाँ तीन खरगोश-बिल हैं। पर कोई राक्षस नहीं है, यह तो स्वर्गीय-सुख-भूमि है।
सुन वुकोंग ने सब बताया।
— एक राक्षसी थी जो तियानझू की राजकुमारी को उठा लाई थी।
भूमि-देवता ने तीनों बिलों में ले जाया। पहले दो में साधारण खरगोश थे जो डरकर भाग गए। ऊपरी बिल के पास बड़े पत्थर थे।
भूमि-देवता — यहाँ ज़रूर वह है।
सुन वुकोंग ने लोहदंड से पत्थर हटाए। राक्षसी ने उछलकर मूसल से वार किया।
पर्वत-देवता पीछे हट गए। राक्षसी आगे बढ़ी — पर्वत-देवता को डाँटा। लड़ते-लड़ते आकाश में उड़ गई।
संकट में थी — तभी नौवें आकाश से आवाज़ आई — महाधीर, रुको! दया करो!
सुन वुकोंग ने मुड़कर देखा — चंद्र-देवी ताईयिन, उनके पीछे हेंगए-परियाँ, रंगीन बादल पर।
सुन वुकोंग ने लोहदंड रोका, झुककर कहा — आप कहाँ जा रही हैं?
चंद्र-देवी — तुम्हारे सामने जो है, यह मेरी चाँद-महल की "औषधि-कूटने-वाली जड़-खरगोश" है। उसने चोरी से महल का द्वार खोला और निकल गई — एक साल पहले। मैंने जाना कि इस समय उसे चोट लगने का योग है, इसलिए उसे बचाने आई। महाधीर, मेरी खातिर उसे माफ करो।
सुन वुकोंग बोला — पर उसने तियानझू की असली राजकुमारी को उठाया और स्वयं राजकुमारी बन गई। मेरे गुरुजी की शक्ति चाहती थी।
चंद्र-देवी — तुम नहीं जानते। उस देश की राजकुमारी भी साधारण नहीं थी — वह चंद्र-महल की "सू-ए" है, यानी हेंगए-देवी। अठारह वर्ष पहले, उसने इस खरगोश को एक थप्पड़ मारा था। खरगोश ने बदला लेने की ठानी और पृथ्वी पर आ गई। वह उस देश की रानी के गर्भ में समाई और राजकुमारी बनकर जन्मी।
खरगोश ने उसे उठाकर जंगल में फेंका और स्वयं राजकुमारी बन गई। पर उसे तांग भिक्षु से विवाह नहीं करना चाहिए था — यही उसका पाप है।
सुन वुकोंग ने कहा — ठीक है। पर राजा को विश्वास दिलाना होगा। क्या आप उसे सबके सामने लाएँगी?
चंद्र-देवी ने खरगोश को इशारा किया — आत्मसमर्पण करो।
खरगोश ने लोटकर असली रूप लिया:
कटे होंठ, नुकीले दाँत। लंबे कान, पतली मूँछें। गोल देह — ऊन बर्फ जैसी। फैले पैर — हज़ार पहाड़ों पर उड़ते। सीधी नाक मलाई जैसी। दोनों आँखें लाल — बर्फ पर सिंदूर की बूँद। ज़मीन पर बैठा — सफेद रेशमी गट्ठर। खिंचकर — चाँदी-तारों का ढाँचा। बार-बार ओस चूसी — चाँदनी-सुबह। औषधि कूटती — जड़-मूसल अदभुत।
सुन वुकोंग खुश हुआ और आगे बढ़ा। चंद्र-देवी परियों और खरगोश को लेकर तियानझू नगर की ओर उड़ी।
शाम थी — चाँद उगा।
नगर के ऊपर पहुँचकर सुन वुकोंग ने आवाज़ लगाई — तियानझू के राजा! अपनी रानी, रनिवास और सब देखें। यह रत्न-वाली छत्री के नीचे — चंद्र-देवी ताईयिन हैं। दोनों ओर हेंगए-परियाँ। यह खरगोश — आपकी नकली राजकुमारी थी।
राजा ने रानी-रनिवास-परियों को बुलाया। सब ऊपर देखने लगे, प्रणाम करने लगे।
झू बाजिए के मन में उछाह आया — एक परी को पकड़ लिया — दीदी, मैं तुम्हें जानता हूँ, चलो साथ खेलते हैं!
सुन वुकोंग ने दो थप्पड़ मारे — बेवकूफ! यह क्या जगह है? ऐसा सोचता है?
झू बाजिए — बस मज़ाक था।
चंद्र-देवी ने खरगोश को चंद्र-महल ले गईं।
सुन वुकोंग ने झू बाजिए को नीचे खींचा।
राजा ने धन्यवाद किया और पूछा — असली राजकुमारी कहाँ है?
सुन वुकोंग ने सब बताया — अठारह वर्ष पहले असली राजकुमारी स्वर्ग की "सू-ए" थी। उसने खरगोश को मारा था, इसलिए वह बदला लेने आई। असली राजकुमारी अभी "बुजुर्ग उद्यान मठ" में पागलों जैसा व्यवहार करके छिपी है। कल वहाँ चलिए।
राजा का मन भर आया — मेरी पुत्री, मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ?
एक अधिकारी ने कहा — राजन, शांत हों। ये दिव्य भिक्षु हैं। कल सुबह साथ चलेंगे।
राजा मान गए। सब सो गए।
रात के दो बजे:
ताँबे का घड़ा टपकता, चाँद शीतल। लोहे की घंटी बजती, हवा स्वर उठाती। कोयल बसंत के आधे जाने पर रोती। गिरते फूल — रात के तीसरे पहर तक। राजकीय उद्यान सुनसान — झूले की छाया। आकाश में रिक्त — आकाश-गंगा आड़ी। तीन बाज़ार, छः सड़कें — सुनसान। आकाश में तारे — रात की रोशनी शांत।
राजा भोर में दरबार किया। फिर तांग सान्ज़ांग से बोले — बुजुर्ग उद्यान साठ ली दूर है।
राजा ने पालकी सजाई। सुन वुकोंग आगे उड़ा और मठ में पहले पहुँचा।
भिक्षुओं ने पूछा — आप पैदल गए थे, आकाश से कैसे उतरे?
सुन वुकोंग हँसा — वृद्ध-आचार्य को बुलाओ, धूप-थाल सजाओ। राजा आ रहे हैं।
वृद्ध भिक्षु ने पूछा — राजकुमारी की बात क्या हुई?
सुन वुकोंग ने सब बताया। वृद्ध भिक्षु ने साष्टांग प्रणाम किया।
सुन वुकोंग ने उठाया — खरगोश वाली बात भी बताई।
भिक्षुओं ने सुना — पिछले कमरे में एक युवती बंद है! सब चकित-प्रसन्न। धूप-थाल सजाए, मठ-द्वार पर खड़े हुए।
राजा की पालकी आई:
रंगीन शुभ-आभा आकाश में फैली। एक वन-पर्वत अचानक शुभ-छाया में नहाया। इंद्रधनुष — हज़ार वर्ष, नदी-समुद्र शुद्ध। बिजली — वसंत-चिरस्थायी। वन-वनस्पति कृपा से हरी-भरी। जंगली फूल वर्षा से प्रसन्न। प्राचीन श्रेष्ठी के चिह्न यहाँ हैं। आज सुज्ञ राजा शुभ-द्वार पर।
द्वार पर भिक्षुओं ने साष्टांग प्रणाम किया। सुन वुकोंग बीच में खड़ा था।
राजा ने पूछा — दिव्य भिक्षु पहले कैसे पहुँचे?
सुन वुकोंग हँसा — मैंने कमर थोड़ी मोड़ी, और आ गया। आप इतनी देर में क्यों?
तांग सान्ज़ांग राजा को पीछे के कमरे तक लाए। राजकुमारी अभी भी पागलों जैसी बोल रही थी।
वृद्ध भिक्षु ने कहा — यही कमरा है।
राजा ने ताला खुलवाया।
राजा और रानी ने अपनी पुत्री देखी — गंदी, जर्जर, पर उनकी थी। आगे बढ़कर गले लगाया — मेरी बेटी! तुझे इतना कष्ट हुआ!
माँ-बाप और बेटी की भेंट — आँसू थमे नहीं। कहानी सुनाई, दुख बाँटे।
स्नान करवाया, नए कपड़े पहनाए, पालकी में बिठाकर राजधानी लौटे।
सुन वुकोंग ने राजा से कहा — एक और बात। यह पर्वत "सौ-पाँव पर्वत" है। यहाँ सेंटीपीड राक्षस हैं। सेंटीपीड को केवल मुर्गा वश में करता है। एक हज़ार बड़े मुर्गे इस पर्वत पर छोड़ दो। नाम भी बदल दो — "रत्न-पुष्प पर्वत"।
राजा ने स्वीकार किया। नाम बदला — "शाही-आज्ञित रत्न-पुष्प पर्वत, बुजुर्ग उद्यान मठ"। वृद्ध भिक्षु को "राष्ट्र-सेवी मठाधीश" की उपाधि मिली, छत्तीस मण वेतन।
भिक्षुओं ने धन्यवाद दिया।
अगले दिन राजा ने दरबार में तांग सान्ज़ांग का चित्र बनवाया।
राजकुमारी ने आभार जताया। तांग सान्ज़ांग ने विदा माँगी।
राजा ने रोका — पाँच-छः दिन और रहो।
झू बाजिए ने भरपूर खाया। राजा ने सोना-चाँदी और रत्न भेंट करना चाहा।
तांग सान्ज़ांग ने एक भी नहीं लिया।
राजा ने पालकी और अनुचर भेजे। जब विदाई करने वाले लौटने को तैयार न हुए, सुन वुकोंग ने एक जादुई हवा चलाई — सबकी आँखें बंद हो गईं। तांग सान्ज़ांग के चारों जा सके।
शुद्ध अनुग्रह में नहाकर स्वभाव लौटा, सोने के सागर से निकलकर सच्चे शून्य को पाया।