अध्याय 94 - चार भिक्षु राजकीय उद्यान में उत्सव, एक राक्षसी की व्यर्थ कामना
तांग सान्ज़ांग तियानझू दरबार में फँसे हैं। शिष्य राजा के सामने अपना परिचय देते हैं। राजकीय उद्यान में भोज होता है। सुन वुकोंग छिपकर गुरु की रक्षा में तैनात रहता है।
सुन वुकोंग तीनों को लेकर दरबार में आए। द्वार-रक्षक ने कहा — रुको, नीचे से बोलो।
सुन वुकोंग हँसा — हम भिक्षु हैं, एक कदम बढ़ाओ तो बढ़ाते जाओ।
तीनों आगे बढ़ गए। तांग सान्ज़ांग घबराए — शिष्यो, राजा ने पूछा है, बताओ।
सुन वुकोंग ने देखा — गुरुजी खड़े हैं।
— महाराज, आपने गुरुजी को बिठाया नहीं? दामाद को तो सम्मान मिलना चाहिए।
राजा चौंके। सुन वुकोंग ने आगे कहा:
— मैं पूर्वी दिव्य महाद्वीप के ऐलाई देश के पुष्प-फल पर्वत जल-पर्दा गुफा से हूँ। पिता आकाश, माता धरती — पत्थर फटा और मेरा जन्म हुआ। मैंने श्रेष्ठ गुरु से दीक्षा ली और महान मार्ग सीखा। समुद्र में अजगर को झुकाया, पर्वत पर राक्षस पकड़ा। मृत्यु-पत्र मिटाया, जीवन-पंजी में नाम लिखा — पदवी मिली "स्वर्ग-समकक्ष महाधीर"। स्वर्ग-उद्यान में आनंद था, रोज़ बैठकें थीं। पर एक बार आड़ू-उत्सव उलट गया, स्वर्ग-युद्ध हुआ। बुद्धजी ने पकड़ा, पाँच-तत्व पर्वत में दबाया — पाँच सौ साल। भाग्यवश मेरे गुरुजी पूर्व से चले, गुआनयिन बोधिसत्त्व ने मुझे स्वतंत्र किया। अब योग-मार्ग का शिष्य हूँ। पुराना नाम "वुकोंग", अभी "भिक्षु सुन" कहलाता हूँ।
राजा घबराकर सिंहासन से उठा और तांग सान्ज़ांग का हाथ थाम लिया — दामाद, यह तो देवयोग है!
झू बाजिए ने मुँह बनाया और बोले:
— मैं पहले मनुष्य था — आलसी, भोगी। जीवन मोह-माया में बीता। एक बार एक सच्चे गुरु मिले, आधे वाक्य में पाप-जाल खुला। तपस्या की, स्वर्ग पहुँचा। जेड सम्राट की कृपा से "आकाश-रक्षक महासेनापति" पद मिला। पर आड़ू-उत्सव में शराब पीकर चंद्र-देवी से छेड़खानी की — पद गया, पाप-भूमि पर जन्म हुआ, सूअर का शरीर मिला। पर गुआनयिन से भेंट हुई, मार्ग-दर्शन मिला। अब बुद्ध-मार्ग पर हूँ, गुरुजी की रक्षा करता हूँ। नाम "वुनेंग", उपाधि "आठ-नियम" — झू बाजिए।
राजा काँपा। पर झू बाजिए और उत्साहित होकर सिर हिलाते, थूथन उठाते, कान खड़े करते हँसते रहे।
तांग सान्ज़ांग ने डाँटा — बाजिए, रुको!
फिर शा वुजिंग ने हाथ जोड़कर कहा:
— मैं पहले साधारण मनुष्य था, पुनर्जन्म के चक्र से डरता था। समुद्र तट से आकाश तक भटका। तपस्या से एक सिद्ध मिला। योग-साधना की। आकाश-सभा में गया, पद मिला "परदा-उठाने-वाला महासेनापति"। पर एक बार आड़ू-उत्सव में काँच का प्याला तोड़ दिया — बालू-नदी में फेंका, जीवन बुरा हो गया। गुआनयिन ने राह दिखाई, गुरुजी का इंतज़ार किया। नाम "वुजिंग", उपाधि "वालुका भिक्षु" — शा वुजिंग।
राजा को भय और प्रसन्नता साथ हुई — पुत्री ने बुद्ध-देवता से विवाह तय किया! पर तीनों राक्षस-देवता हैं।
ज्योतिषी ने कहा — विवाह का शुभ-मुहूर्त बारहवाँ दिन है।
राजा ने आदेश दिया — राजकीय उद्यान की हवेली में इन्हें ठहराओ।
शाम को उद्यान में शाकाहारी भोजन मिला। झू बाजिए ने खाकर-खाकर भरपेट किया।
रात को तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग को डाँटा — तुमने मुझे फिर फँसाया। मैंने कहा था — बस मुहर-पत्र दिखाना है, पर तुमने महल के पास ले गए।
सुन वुकोंग हँसा — गुरुजी, आपने खुद कहा था — "मेरी माँ ने भी गेंद फेंककर पति चुना।" तो मैंने सोचा, देखते हैं। वृद्ध भिक्षु की बात भी याद थी — सच-झूठ परखना था। राजा के चेहरे पर थोड़ी कालिमा दिखी। पर राजकुमारी अभी नहीं देखी।
तांग सान्ज़ांग — देखकर क्या करोगे?
सुन वुकोंग — मेरी स्वर्ण-आँखें हैं। एक बार देख लिया तो सच-झूठ, अच्छा-बुरा सब दिख जाता है।
शा वुजिंग और झू बाजिए हँसे — भाई, अब चेहरा भी पढ़ने लगे!
सुन वुकोंग — चेहरा पढ़ने वाले तो मेरे पास आएँ।
तांग सान्ज़ांग — बहस बंद। यदि वह सच में राजकुमारी को विवाह के लिए मजबूर करे, तो क्या होगा?
सुन वुकोंग — बारहवें दिन राजकुमारी माँ-बाप को प्रणाम करने आएगी। मैं देखूँगा। यदि असली स्त्री हुई, तो आप दामाद बनकर सुख भोगिए।
तांग सान्ज़ांग क्रोध में आए — बंदर! और फँसाएगा? अगर जाप पढ़ा तो?
सुन वुकोंग घुटने टेककर बोला — मत पढ़ो, मत पढ़ो। यदि असली है, तो विवाह-समारोह में मैं पूरा महल हिला दूँगा और आपको ले जाऊँगा।
रात गहरी हो गई:
महल की चुप्पी में फूलों की सुगंध भरी। कढ़ाई की खिड़की पर मोतियों का पर्दा लटका। झूले की रस्सी ठंडी है, छाया रह जाती है। बाँसुरी का सुर मंद पड़ा, चारों दिशाएँ शांत।
झू बाजिए — रात हो गई, सो जाओ।
सबने रात बिताई। भोर में राजा ने दरबार किया:
महल के दरवाज़े खुले, बैंगनी आभा ऊँची। हवा संगीत को आकाश में ले जाती है। बाघ-पूँछ के झंडे लहराते, ड्रैगन-सिर पर हीरे का आभूषण।
दरबार के बाद राजा ने दूत भेजे — दामाद को आज उद्यान में भोज।
झू बाजिए ने तुरंत कहा — महाराज, हम सब साथ रहते हैं, एक भी अलग नहीं। हमें भी ले चलिए।
राजा ने दो अलग कक्ष बनवाए — तांग सान्ज़ांग और राजा के लिए "हुआयी हवेली", और तीनों के लिए "वसंत-रक्षण अटारी"।
झू बाजिए ने प्रणाम किया — धन्यवाद!
भीतर महिलाओं के कक्ष में भी भोज की तैयारी थी — रानियाँ और राजकुमारी उत्सव मना रही थीं।
राजकीय उद्यान वास्तव में सुंदर था:
रंगीन पत्थरों की पगडंडी, नक्काशीदार रेलिंग। सुंदर फूल, रंग-बिरंगे पत्ते। आड़ू के वृक्ष में पन्ना-मैना, हरी विलो में सुनहरी बुलबुल। बाँस की अटारी में कविताएँ, देवदार की हवेली में ग्रंथ। पत्थरों का कृत्रिम पर्वत, गहरे नीले जल की धारा। अनगिनत फूल और रत्न-बिखरे उद्यान।
राजा ने तांग सान्ज़ांग के साथ बहुत देर तक घूमा। फिर:
भव्य महल में भोर का उजाला। फीनिक्स-महल में बादलों की छटा। वसंत की सुंदरता, फूल-घास का कढ़ाव। आकाश का प्रकाश सोने के चोगे पर चमका। संगीत जैसे देव-भोज में, प्याले लहरा रहे। राजा और दामाद आनंद में — शांति और समृद्धि।
तांग सान्ज़ांग बाहर प्रसन्न, भीतर व्यथित। दीवार पर चार सोने की पट्टिकाएँ थीं — चार ऋतुओं के चित्र और उन पर कविताएँ।
वसंत की कविता:
स्वर्ग की एक शक्ति धरती को जगाती है। धरती हर्षमय, सब कुछ नया। आड़ू-बेर प्रतिस्पर्धा में खिले, अबाबील आए, चित्रित छत पर सुगंधित धूल।
ग्रीष्म की कविता:
गर्म हवा धीरे-धीरे विचारों को बुलाती। महल के बगीचे में अनार-सूरजमुखी दिन की रोशनी में। बाँसुरी की धुन दोपहर के स्वप्न को तोड़ती। कमल की सुगंध आँगन तक फैली।
शरद की कविता:
एक पत्ता पीला — कुएँ के पास कदंब। पर्दा नहीं उठाया, रात की पाले के साथ। अबाबील जानती है — त्योहार आया, घोंसला छोड़ा। हंस टूटी हुई सरकंडे के फूल लेकर दूसरे देश गया।
शीत की कविता:
बादल-भरा आकाश, मंद-सी ठंड। उत्तर-हवा बर्फ उड़ाती, हज़ार पर्वत ढके। गहरे महल में लाल अँगीठी गर्म है। खिलती हुई बेर के फूल की सूचना — पाला-भरी रेलिंग पर।
राजा ने देखा — तांग सान्ज़ांग कविताओं में खोए हैं।
— दामाद, कविता-रस लेते हैं, तो लिखो भी।
तांग सान्ज़ांग को भी स्फूर्ति आई। उन्होंने लिखा:
वसंत:
बर्फ पिघलती, धरती जागती। राजकीय उद्यान फूल-वनस्पति से नया। शुभ वायु, वर्षा, प्रजा सुखी। समुद्र और नदियाँ शांत, धूल नहीं।
ग्रीष्म:
उत्तर तारा दक्षिण की ओर, दिन लंबे। बबूल की छाँव, अनार की आग, दिन की रोशनी। पीली बुलबुल, बैंगनी अबाबील — महल की विलो में। मधुर स्वरों में चहकते, लाल पर्दे के भीतर।
शरद:
नारंगी हरा, नारंगी पीला — सुगंध फैली। देवदार और बाँस हरे, पाले से प्रसन्न। कठघरे पर गुलदाउदी आधे खिले। संगीत का स्वर दूर, जल और बादल के बीच।
शीत:
बर्फ पिघली, तड़ के बाद ठंडक। अजीब शिखर, कुशल पत्थर — बर्फ का पर्वत। अँगीठी में जानवर का कोयला, मक्खन-पनीर गर्म। आस्तीन में हाथ डाले ऊँचे गाना गाते, पन्ने की रेलिंग से लगकर।
राजा बहुत प्रसन्न हुए — "आस्तीन में हाथ डाले ऊँचे गाना गाते" — वाह! संगीतकारों को बुलाया।
दूसरी ओर वसंत-अटारी में झू बाजिए भी खूब छके। कुछ पीने के बाद बोले — खाकर सो जाना चाहिए।
शा वुजिंग — भाई, बेढंगी बात।
झू बाजिए — तुम नहीं जानते — "खाकर न लेटो तो पेट में चर्बी नहीं जमती।"
तांग सान्ज़ांग ने झू बाजिए को डाँटा — शोर मत करो।
झू बाजिए — हम ससुर की जगह हैं, वे हमें बुरा नहीं मानेंगे। "मारकर भी रिश्ता टूटता नहीं।"
तांग सान्ज़ांग ने डंडा उठाया। झू बाजिए चिल्लाए — दामाद जी, माफ करो!
आसपास के अधिकारियों ने समझाया। झू बाजिए उठे और बड़बड़ाए — अच्छे दामाद हो! रिश्ता अभी हुआ नहीं, राजनियम चलाने लगे।
सुन वुकोंग ने उनका मुँह दबाया — चुप रहो।
वसंत-अटारी में एक रात और बीती।
बारहवें दिन — जिसे राजा ने शुभ बताया था — विवाह-भोज की तैयारी हो गई।
तभी भीतर से बुलावा — रानी ने बुलाया।
राजा भीतर गया। रानी, रनिवास की महिलाएँ और राजकुमारी — सब उपस्थित।
चार विवाह-गीत:
प्रसन्नता:
प्रसन्नता, प्रसन्नता! खुशी में आनंद। विवाह-बंधन, प्रेम सुंदर। कुशल वेशभूषा — चंद्र-देवी भी कम। ड्रैगन और फीनिक्स के काँटे, सोने के धागे उड़ते। चेरी के होंठ, हीरे के दाँत, गुलाबी चेहरा। नाज़ुक देह फूल जैसी।
मिलन:
भेंट, भेंट! आकर्षक, कोमल। माओछांग से आगे, चू देश की सुंदरी से भी। राष्ट्र को झुकाने वाली, फूल-जड़ के समान। श्रृंगार और ज़ेवर और चमकीले। आभा-भौंहें दूर पर्वत जैसी। सुंदर, सुकोमल, रंगीन कतार में।
शुभ:
शुभ, शुभ! जड़-देवी, स्वर्ग-बालिका। अत्यंत प्रिय, सचमुच प्रशंसनीय। अनोखी सुगंध, पाउडर और रंग मिले। दूर स्वर्ग-भूमि से राजकुल उत्तम। हँसी, मीठी बोली, देवी-भाव। संगीत में मंत्रमुग्ध, शोर से भरा उत्सव। फूल और रत्न — हज़ार सुंदरताएँ।
विवाह:
विवाह, विवाह! कस्तूरी-चंदन की सुगंध। देवी-पंक्ति, सुंदरियों का समूह। रनिवास की परियाँ, रानियाँ — सब रंग-बिरंगे। बादल-गुच्छे जूड़े, इंद्रधनुष की साड़ी। दिव्य संगीत ऊँचे स्वर में, दो कतारें रंगीन। एक बार ऊँचे लोक का वचन लिया था। आज शुभ विवाह का सुख।
राजा देखकर खुश। रानी ने राजकुमारी को साथ लाई।
राजकुमारी ने झुककर कहा — पिताजी, एक अनुरोध — दामाद के तीन शिष्य बड़े विकराल हैं, मैं डरती हूँ। कृपया उन्हें नगर से बाहर भेज दें।
राजा मान गए। तांग सान्ज़ांग को बुलाया, कहा — आपके शिष्यों का मुहर-पत्र देकर उन्हें भेजते हैं।
राजकुमारी खुश हुई।
इधर तांग सान्ज़ांग सुन वुकोंग को बुला चुके थे। बोले — बारहवाँ दिन आ गया, क्या करें?
सुन वुकोंग — राजा के चेहरे पर कालिमा है, अभी राजकुमारी नहीं आई। यदि आई, तो मैं देख लूँगा। आप घबराएँ नहीं।
बुलावा आया। सुन वुकोंग ने कहा — चलिए, विदाई मिल रही है।
झू बाजिए — सच में जाना है?
सुन वुकोंग चुप रहा।
राजा के सामने — मुहर-पत्र मिला, स्वर्ण-रजत मिला। झू बाजिए ने थैला पकड़ लिया।
सुन वुकोंग ने प्रणाम किया — धन्यवाद।
मुड़ने लगे। तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग का हाथ पकड़ा — तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो?
सुन वुकोंग ने आँख से इशारा किया — चिंता मत करो, हम शीघ्र लौटेंगे।
अधिकारी समझे — यह असली विदाई है।
राजा ने तांग सान्ज़ांग को ऊपर बुलाया। शिष्य बाहर गए।
राजदूत-निवास में सुन वुकोंग ने झू बाजिए और शा वुजिंग से कहा — तुम दोनों यहाँ रहो, बाहर मत जाओ। मैं गुरुजी के पास जाता हूँ।
उसने एक बाल उखाड़ा, जादू फूँका — "बदलो!" — एक और सुन वुकोंग प्रकट हुआ। यह नकली दोनों के साथ रहा।
असली सुन वुकोंग हवा में छलाँग लगाकर एक मधुमक्खी बन गया:
पीले पंख, मीठा मुँह, तीखी पूँछ। हवा में उड़ता, इधर-उधर डोलता। फूलों की मकरंद लेता, सुगंध चुराता। विलो पार कर, फूलों में घुसता। कितनी मेहनत, रंग-रंग में भीगा। उड़ता-उड़ता — पर क्या मिला? बस नाम।
वह हल्का-सा उड़ता हुआ महल में घुसा। तांग सान्ज़ांग सिंहासन के बाईं ओर एक पीठ पर बैठे थे — भौंहें तनी, मन बेचैन। सुन वुकोंग उड़कर उनकी टोपी पर बैठ गया और धीरे से कान के पास बोला — गुरुजी, मैं आ गया हूँ, चिंता मत करो।
यह केवल तांग सान्ज़ांग सुन सके।
थोड़ी देर बाद — महल का निमंत्रण आया। राजा और तांग सान्ज़ांग भीतरी महल की ओर बढ़े।
दुष्ट स्वामी फूल में मोहित — फूल आपदा बनाते हैं। ध्यान-मन में विचार उठा — विचार दुख जन्माता है।