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अध्याय ९: चेन गुआंगरुई की आपदा — नदी-भिक्षु का बदला

तांग सान्ज़ांग के पिता चेन गुआंगरुई की हत्या होती है, माँ बेटे को नदी में छोड़ती है, और बड़े होकर वुकोंग अपने पिता का बदला लेता है

तांग सान्ज़ांग तांग भिक्षु चेन गुआंगरुई जेड सम्राट पूर्वी सागर के नाग-राजा गुआनयिन बोधिसत्त्व

शाानशी प्रांत की राजधानी चांगआन — यह राजाओं का नगर था।

महाराज ताइज़ोंग का शासन। युग का नाम — "झेनगुआन।" राज्य शांत, आठों दिशाओं से भेंट आती।

एक दिन मंत्री वेई झेंग बोले: — प्रभु, राज्य शांत है। समय है कि हम योग्य विद्वानों को बुलाएं।

महाराज ने आदेश दिया: — घोषणापत्र भेजो।


समुद्र-तट के प्रांत में एक विद्वान था — चेन ए, उपनाम गुआंगरुई

उसने घोषणापत्र देखा। माँ से कहा: — मैं जाऊंगा। अगर पद मिला — माँ का नाम ऊँचा होगा।

माँ ने आशीर्वाद दिया।

गुआंगरुई चांगआन गया। परीक्षा दी। प्रथम उत्तीर्ण। सम्राट ने स्वयं उसे उत्तीर्ण किया।

घोड़े पर जुलूस। तीन दिन।

एक मंत्री की बेटी वेन जियाओ — "मनमोहक सुंदरी" — ऊपर से सुई-धागे का गोला फेंकती थी — जो भी लड़के पर गिरे, वो वर।

गोला गुआंगरुई पर गिरा।

विवाह हुआ।

सम्राट ने उसे जियांगझोउ का राज्यपाल बनाया।


घर लौटा। माँ से मिलाया। फिर पत्नी के साथ जियांगझोउ की ओर।

रास्ते में माँ बीमार पड़ीं। एक सराय में रुके।

गुआंगरुई ने बाज़ार में एक मछुआरे से सुनहरी मछली खरीदी। तालाब में छोड़ दी।

आगे बढ़े।

नदी का घाट। नाव-मालिक — लिउ होंग और ली बियाओ।

नाव पर सवार हुए।

लिउ होंग ने पत्नी को देखा — रात को धोखे से।

रात के अंधेरे में — पहले नौकरों को मार डाला। फिर गुआंगरुई को। लाशें नदी में फेंकी।

पत्नी ने नदी में कूदने की कोशिश की। लिउ होंग ने रोका।

— मेरे साथ रहो — या मर जाओ।

बेचारी पत्नी को — पेट में बच्चा था — रहना पड़ा।

लिउ होंग पति के कपड़े पहनकर जियांगझोउ पहुँचा। राज्यपाल बन गया।


पूर्वी सागर के नाग-राजा ने सोची-समझी बात की:

— यह विद्वान — वही है जिसने कभी मेरी जान बचाई थी! उसे बचाना होगा।

चेन गुआंगरुई की लाश समुद्र-तल में थी। नाग-राजा ने उसकी आत्मा बुलाई।

— तुम्हें याद है? तुमने एक सुनहरी मछली छोड़ी थी — वो मैं था।

— मैं तुम्हारी सहायता करूंगा। शरीर यहाँ सुरक्षित रखूंगा।

गुआंगरुई की आत्मा जल-महल में रही।


पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया।

रात में सपने में एक देव ने कहा: — यह बच्चा महान होगा। इसे बचाओ।

लिउ होंग वापस आया। बच्चे को देखकर नदी में फेंकने की बात की।

रात में पत्नी ने बच्चे को एक लकड़ी के तख्ते पर बाँधा। अपनी उंगली काटी। खून से पत्र लिखा — माता-पिता का नाम, कहानी। बच्चे की बाईं पाँव की छोटी उंगली काटकर निशान बनाया।

और रोते-रोते — नदी में बहा दिया।


सोने का पर्वत मंदिर।

बूढ़े भिक्षु फामिंग ध्यान में थे।

अचानक एक बच्चे के रोने की आवाज़।

नदी किनारे गए। तख्ते पर बच्चा।

बच्चे की छाती पर खून-भरा पत्र।

भिक्षु ने बच्चे को उठाया। एक दाई से दूध पिलवाया।

नाम दिया: नदी-प्रवाह।


अठारह साल।

नदी-प्रवाह बड़ा हुआ। सिर मुंडवाया। नाम मिला: ज़्युानज़ांग। साधना में लग गया।

एक दिन एक दूसरे भिक्षु ने उसे गाली दी: — तुझे अपने माता-पिता का नाम भी नहीं पता!

ज़्युानज़ांग रोते हुए गुरु के पास आया।

गुरु ने एक छोटा संदूक निकाला। खोला — खून का पत्र।

ज़्युानज़ांग ने पढ़ा। सब समझा।

रोते हुए बोला: — पिता को बदमाशों ने मारा। माँ अभी भी वहाँ है। मैं जाऊंगा — बदला लूंगा। फिर लौटकर मंदिर बनाऊंगा।


भिक्षु के वेश में जियांगझोउ पहुँचा।

लिउ होंग बाहर था।

दरवाज़े पर भिक्षा माँगी। माँ ने देखा।

— तुम कौन हो?

— मैं सोने के पर्वत मंदिर से हूँ।

माँ ने अंदर बुलाया। खाना दिया।

ज़्युानज़ांग ने धीरे-धीरे बात की — जब अकेले हुए:

— माँ — मैं वो बच्चा हूँ जिसे आपने नदी में छोड़ा था।

माँ ने देखा — चेहरा वही था जो पति का था।

दोनों रोए।

माँ ने कहा: — जल्दी जाओ। जब लिउ होंग आए तो खतरा है।

— माँ, मैं नाना के पास जाऊंगा। फौज लाऊंगा।

माँ ने एक अंगूठी दी। एक पत्र।

ज़्युानज़ांग ने नाना के घर पत्र पहुँचाया।

नाना — मंत्री यिन — सब जाना। सम्राट से फौज माँगी।

फौज आई। जियांगझोउ घेरा।

लिउ होंग और ली बियाओ पकड़े गए।

घाट पर ले जाया गया — जहाँ पहले गुआंगरुई को मारा था।

माँ, ज़्युानज़ांग, और नाना — तीनों नदी किनारे।

देव-दूत नदी में गया — गुआंगरुई को बुलाया।

और नदी से उठकर — चेन गुआंगरुई आया।

परिवार मिला। आँसू, हर्ष।

लिउ होंग का सीना चीरकर उसका हृदय निकाला — बलि दी।

ली बियाओ — भीड़ में कटा।


परिवार सम्राट के पास लौटा।

सम्राट ने गुआंगरुई को उच्च पद दिया।

ज़्युानज़ांग साधना में लौटा। भ्रम-नाश मंदिर में।

माँ ने — सब कुछ पाने के बाद — शांति से जीवन समाप्त किया।

ज़्युानज़ांग ने सोने के पर्वत जाकर गुरु फामिंग को धन्यवाद दिया।

वो संत — चेन का वंश — आगे बढ़ेगा। उसकी राह पर ही धर्म का प्रकाश जलेगा।

अगले अध्याय में — महाराज ताइज़ोंग का सपना, और यात्रा की तैयारी।