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अध्याय 88 - जेड-पुष्प राज्य में ध्यान-शिक्षा; मन-वानर और काष्ठ-माता शिष्य स्वीकारते हैं

जेड-पुष्प राज्य में तीनों शिष्य राजकुमारों को अपनी शक्ति और शस्त्र दिखाते हैं। राजकुमार उन्हें गुरु मानते हैं और उनके जैसे शस्त्र बनवाते हैं, किंतु रात को एक सिंह-राक्षस वे दिव्य शस्त्र चुरा ले जाता है।

सुन वुकोंग तांग सान्ज़ांग झू बाजिए शा वुजिंग जेड-पुष्प राज्य राजकुमार शिष्य इच्छानुसार स्वर्णदंड सिंह राक्षस शस्त्र चोरी पश्चिम यात्रा

फ़ेंगशियन नगर को विदाई देकर चारों आगे बढ़े। गहरी शरद ऋतु थी:

जल-चिह्न सिमटे, पर्वत की हड्डी उघड़ी, लाल पत्ते उड़े, सुनहले फूल खिले। ठंडी रात लंबी, चाँदनी खिड़की से आई, सफेद सिंघारे, लाल लेमन-घास — हर ओर। बाँझ गाँव में बगुले उड़े, जंगली दुकान में मुर्गे बोले।

एक दिन फिर शहर दिखा। मार्ग में एक वृद्ध व्यक्ति मिला।

—नमस्कार। यह कौन-सा नगर है?

—यह स्वर्गिक-देश का जेड-पुष्प नगर है। यहाँ के राजकुमार बहुत धर्मनिष्ठ और विद्वान हैं।

—अच्छा।

झू बाजिए ने ऊँचे मुँह के साथ बाज़ार में प्रवेश किया। लोग देखकर चिल्लाए:

—अरे सूअर को कोई साधु के साथ ले जा रहा है!

झू बाजिए ने ठुड्डी हिलाई। सड़क खाली हो गई।

राजमहल के सामने अतिथि-भवन था। तांग सान्ज़ांग ने शिष्यों को वहाँ बैठने को कहा और स्वयं प्रवेश-पत्र लेकर अंदर गए।

राजकुमार ने प्रसन्नता से स्वागत किया। प्रवेश-पत्र पर मोहर लगाई। पूछा:

—गुरुजी, चौदह वर्ष में आए हो?

—हाँ, बहुत कठिनाइयाँ आईं — पर धन्यवाद।

शिष्यों को भी बुलाया गया। जब झू बाजिए ने झुककर प्रणाम किया, राजकुमार घबरा गए। शा वुजिंग और सुन वुकोंग को देखकर और भी भय।

तांग सान्ज़ांग ने कहा:

—महाराज, इनका रूप अजीब है, पर हृदय निर्मल है।

भोजन का आयोजन हुआ। तीन राजकुमार थे — तीनों युद्ध-प्रेमी और साहसी। उन्होंने अपने शस्त्र लेकर आए:

  • बड़े राजकुमार के पास: भौंह-समतुल्य-डंडा
  • दूसरे के पास: नौ-दाँती काँच-पंजी
  • तीसरे के पास: काला-तेल डंडा

उन्होंने पूछा:

—क्या आप सच्चे देवता हो या राक्षस?

झू बाजिए ने अपनी काँच-पंजी निकाली — सुनहरी चमक। दूसरे राजकुमार ने उठाने की कोशिश की — हिली नहीं।

सुन वुकोंग ने कान से सुई निकाली, एक झोंका दिया — एक कटोरे जैसी मोटी डंडी, डेढ़ झाँझर लंबी। उसे ज़मीन में गाड़ दिया।

—यह तुम्हें देता हूँ।

बड़े राजकुमार ने उठाने की कोशिश की — जड़ जमी जैसे।

—यहाँ संकरी जगह है। मैं ऊपर उड़कर दिखाता हूँ।

वुकोंग एक सीटी देकर उड़ा। पाँच रंगों के बादलों में शस्त्र घुमाया:

पहले मनुष्य और शस्त्र — जैसे फूलों पर फूल; फिर केवल एक आकाश में शस्त्र।

झू बाजिए ने कहा:

—मुझे भी दिखाने दो।

वह भी उड़ा। काँच-पंजी ऊपर-नीचे, बाएँ-दाएँ।

शा वुजिंग ने भी उड़कर रक्त-लाल बाज़ उड़ान और भूखे बाघ का छलाँग दिखाया।

नगर में सब घुटनों पर बैठ गए — माना जैसे देवता उतरे हों।

राजकुमार ने राजा को बताया। राजा स्वयं आया, माथा टेका:

—मेरे तीन पुत्र आपको गुरु मानते हैं। क्या आप उन्हें शस्त्र-विद्या सिखाएँगे?

वुकोंग हँसा:

—हम साधु हैं — शिष्य बनाना हमारी ख़ुशी है। धन की ज़रूरत नहीं — प्रेम काफ़ी है।

भव्य भोज हुआ। सभी एक साथ खाए और गाने-बजाने का आनंद लिया।

अगले दिन तीनों राजकुमारों ने घुटने टेके:

—गुरुजी, शस्त्र दिखाइए।

झू बाजिए ने काँच-पंजी ज़मीन पर रखी। शा वुजिंग ने डंडा दीवार पर टिकाया। दोनों राजकुमार उठाने में लाल हो गए।

—ये शस्त्र कितने भारी हैं?

झू बाजिए ने बताया:

—मेरी काँच-पंजी — एक पूर्ण ग्रंथालय के बराबर — पाँच हज़ार अड़तालीस किलो।

शा वुजिंग ने बताया:

—मेरी डंडी भी उतनी ही।

बड़े राजकुमार ने वुकोंग का दंड माँगा। वुकोंग ने कान से सुई निकाली, हवा में घुमाया — तुरंत कटोरे जितना मोटा।

—यह कहाँ से आया?

वुकोंग ने बताया:

सृष्टि के प्रारंभ में ढाला गया लोहा, महाब्राह्मण ने जड़ें खींचकर बनाया। झीलों-नदियों की गहराई नापी इससे, पूर्वी सागर की गहराई मापी। युगों तक रंगीन प्रकाश छोड़ता रहा, बढ़ता-घटता, चमकता रहा। स्वर्ण-मंदिर-मास्टर कहलाया इसे, स्वर्ग और धरती में अतुलनीय। तेरह हज़ार पाँच सौ किलो, मोटा-पतला होता रहता है। स्वर्ग में उत्पात किया इससे, धरती पर राक्षस मारे। एक इशारे से सूर्य अंधकारित, देवता-राक्षस सब काँपते। मूल से — यह साधारण धातु नहीं।

राजकुमारों ने फिर से प्रणाम किया।

वुकोंग ने गुरु से अनुमति माँगी:

—गुरुजी, ये राजकुमार हमारे शिष्य हैं। इनके शिष्य आपके नाती होंगे।

तांग सान्ज़ांग ने खुशी से अनुमति दी। झू बाजिए और शा वुजिंग ने भी गुरु को प्रणाम किया।

वुकोंग ने तीनों को शक्ति-मंत्र दिया — उनके भीतर शक्ति डाली। अब वे दिव्य शस्त्र उठाने लायक हो गए।

शस्त्र बनाने के लिए लोहार बुलाए गए — हज़ारों किलो लोहा और इस्पात मँगाया।

तीनों दिव्य शस्त्र उस निर्माण-स्थान पर रखे गए — उनका प्रकाश आकाश तक जाता था।

एक रात, नगर से सत्तर कोस दूर, तेंदुआ-शिखर पर्वत, बाघ-मुँह गुफा में एक सिंह-राक्षस था। उसने प्रकाश देखा और उड़कर आया।

देखा — तीन दिव्य शस्त्र थे।

—ये किसके हैं? मेरा भाग्य अच्छा है!

उसने हवा का झोंका बनाकर तीनों शस्त्र एक ही साँस में उड़ा लिए और अपनी गुफा में ले गया।

इस प्रकार — जो मार्ग से एक पल भी अलग नहीं होना चाहिए, वह क्षण-भर के लिए चूक गया।