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अध्याय 78 — भिक्षु-राज्य में बच्चों की जान बचाई और महल में राक्षस की पहचान

भिक्षु-राज्य में राजा बच्चों के हृदय को औषधि के रूप में प्रयोग करना चाहता है। सुन वुकोंग बच्चों को बचाता है और महल में राष्ट्र-जामाता के असली रूप को उजागर करता है।

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एक विचार से सौ विघ्न उठते हैं — साधना का मार्ग कठिन, फिर भी जाओ। जब मन निर्मल हो, मैल न हो — माया-रोक हटाओ, हज़ार भ्रम मिटाओ।

सुन वुकोंग ने बुद्ध की सहायता से सब राक्षस हटाए, तांग सान्ज़ांग की रक्षा की। सिंह-वाहन नगरी छोड़कर पश्चिम चले। कई महीने बीते। शीत ऋतु:

पहाड़ के मेपल टूटने को — तालाब का पानी बर्फ बना। लाल पत्ते सब झर गए, नीले चीड़ और नए हुए। हल्के बादल, बर्फ की इच्छा — सूखी घास पर्वत पर सपाट। हर दिशा में शीत की रोशनी — हड्डी तक ठंडक।

ठंड में यात्रा करते हुए — एक नगरी।

— "यह कहाँ है?" तांग सान्ज़ांग ने पूछा।

— "जाकर देखते हैं। राजधानी हो तो यात्रा-पत्र दिखाना होगा।"

नगरी के चंद्र-द्वार पर एक बूढ़ा सैनिक धूप में सोया था।

सुन ने जगाया — "महोदय!"

बूढ़े ने चौंककर देखा — "बाबा! माफ़ करना।"

— "बाबा? मैं राक्षस नहीं, पूर्व से पश्चिम जाने वाला भिक्षु। यह कहाँ है?"

— "यह 'भिक्षु-राज्य' था — अब 'बच्चों का शहर' है।"

— "राजा है?"

— "हाँ।"

झू बाजिए बोला — "राजा का बेटा राजा बना — इसलिए 'बच्चों का शहर'।"

तांग सान्ज़ांग ने कहा — "नहीं, चलकर देखते हैं।"

नगरी के बाज़ार में:

शराब की दुकानें, कपड़े की दुकानें, चाय की दुकानें — हर घर पर एक हंस-पिंजरा।

— "इन पिंजरों में क्या है?"

सुन मधुमक्खी बनकर देखने गए — हर पिंजरे में एक छोटा बच्चा। लड़के। पाँच से सात साल के।

— "गुरुदेव, हर घर में एक-एक छोटा बच्चा है।"

तांग सान्ज़ांग उलझे।

एक डाक-विश्रामालय में ठहरे। अधिकारी ने स्वागत किया।

— "यात्रा-पत्र जाँच कल होगी।"

रात को तांग सान्ज़ांग ने पूछा — "पिंजरों का अर्थ?"

अधिकारी ने धीरे-धीरे बताया — "राजा बहुत बीमार है। तीन साल पहले एक बूढ़ा ताओ-पुजारी एक सोलह साल की लड़की लेकर आया — 'रानी-माँ' बनी। राजा उसका दीवाना। तीन रानियाँ और छह सौ दासियाँ — अनदेखी। राजा की सेहत ख़राब।

वैद्य हार गए। पुजारी — जो अब 'राज-जामाता' है — ने एक नुस्खा बताया। एक हज़ार एक सौ ग्यारह बच्चों का हृदय चाहिए। उसी से दवाई बनेगी — हज़ार साल जिएगा राजा। यही हंस-पिंजरे के बच्चे हैं।"

तांग सान्ज़ांग का चेहरा पीला पड़ा। रोए:

— "अंधा राजा! सुंदरी के लिए हज़ारों बच्चे?"

झू बाजिए ने कहा — "शासक का काम है, हम क्या करें।"

— "तुम बिल्कुल निर्दयी हो। हम साधु — करुणा हमारी पहली शर्त।"

शा वुजिंग ने कहा — "कल राजा से मिलते हैं। अगर राज-जामाता राक्षस हो तो पकड़ते हैं।"

सुन ने कहा — "बिल्कुल सही। गुरुदेव, आज सो जाओ। मैं अभी बच्चों को किसी जंगल में छुपा देता हूँ।"

तांग सान्ज़ांग ने कहा — "सच में?"

— "हाँ। झू बाजिए, शा वुजिंग — यहाँ रहो। जब ठंडी हवा चले, मान लो बच्चे निकल गए।"

— "नमो औषधि-बुद्ध! नमो औषधि-बुद्ध!"

सुन बाहर गए। नगर-देव, भूमि-देव, समाज-देव, पाँच दिशाओं के रक्षक — सब बुलाए।

— "आज रात नगर के सब हंस-पिंजरे उठाओ। बच्चों को जंगल-पहाड़ में ले जाओ। फल खिलाओ, रोने मत दो। जब मेरा काम हो जाए — वापस भेजना।"

रात के तीन पहर — ठंडी हवा, और बच्चे गायब।

सुन वापस — "गुरुदेव, काम हो गया।"

सो गए।

सुबह — तांग सान्ज़ांग चले राजा के दरबार।

सुन मधुमक्खी बनकर टोपी पर बैठे।

दरबार में:

राजा दुबला-पतला, आँखें धुँधली, हाथ काँपते।

यात्रा-पत्र जाँचे। मुहर लगाई।

तभी — "राज-जामाता पधारे।"

राजा खड़े हुए। भव्य वृद्ध ताओ-पुजारी आया —

पीला साटन-मुकुट, चंदन की पोशाक, नौ गाँठ वाली बेंत। सुनहरी आँखें, लंबी दाढ़ी, भौंहें लंबी। पाँव के साथ बादल, सुगंध का कुहरा।

तांग सान्ज़ांग ने प्रणाम किया।

— "यह भिक्षु कहाँ से?"

— "पूर्व से पश्चिम।"

— "पश्चिम में क्या है? वहाँ अच्छाई क्या?"

तांग सान्ज़ांग ने उत्तर दिया:

— "मन शांत हो, इच्छाएँ न हों — यही मोक्ष। बाहरी चीज़ें माया हैं। सच्चा प्रकाश हृदय में।"

राज-जामाता ने हँसकर कहा — "यह भिक्षु की बकवास है। ध्यान से कुछ नहीं मिलता।"

राजा ने पूछा — "क्या भिक्षु अमर हो सकते हैं?"

तांग सान्ज़ांग ने उत्तर दिया:

— "यिन-यांग दंड, अग्नि-जल का संतुलन — इससे दान बनती है। पर भोग से नाश होता। सरल जीवन, इच्छा-त्याग — यही दीर्घायु।"

राज-जामाता हँसा — "मेरा मार्ग अलग है। मैं जड़ी-बूटी और दान की शक्ति से जीता हूँ।"

राजा ने भोजन का आदेश दिया।

तांग सान्ज़ांग चले।

सुन ने कान में कहा — "राज-जामाता राक्षस है। खाने में देरी करो — मैं यहाँ रहकर सुनता हूँ।"

तांग सान्ज़ांग चले गए।

सुन ने देखा — एक अधिकारी आया: "महाराज, आज रात ठंडी हवा से सारे हंस-पिंजरे उड़ गए।"

राजा घबराया। राज-जामाता मुस्कुराया — "यह तो शुभ है।"

— "शुभ कैसे?"

— "वह भिक्षु — दस जन्मों का तपस्वी, शुद्ध यौवन — उसका हृदय हज़ार बच्चों से भी बेहतर। एक हृदय, दस हज़ार साल।"

राजा ने तुरंत आदेश दिया — "सब दरवाज़े बंद करो। डाक-विश्रामालय घेरो।"

सुन एक पंख में उड़कर विश्रामालय पहुँचे।

— "गुरुदेव! आफत आई।"

तांग सान्ज़ांग भोजन में थे — "क्या?"

— "वे तुम्हारा हृदय चाहते हैं।"

तांग सान्ज़ांग बेहोश होने लगे।

— "शांत रहो। मेरे जैसे बनो, तुम मेरे जैसे।"

झू बाजिए ने मिट्टी-पानी मिलाई — गंदी मिट्टी।

— "और?"

— "पेशाब।"

मजबूरी। सुन ने मिट्टी अपने मुँह पर लगाई — एक बंदर-मुखौटा। तांग सान्ज़ांग के चेहरे पर लगाया — "बदलो!"

तांग सान्ज़ांग सुन वुकोंग जैसे दिखने लगे। सुन ने गुरु के कपड़े पहने, खुद तांग सान्ज़ांग बन गए।

झू बाजिए और शा वुजिंग भी पहचान नहीं पाए।

सैनिकों ने घेरा। एक अधिकारी बोला — "तांग सान्ज़ांग को चलो।"

नकली तांग सान्ज़ांग निकले — "क्या काम है?"

— "राजा ने बुलाया है।"

दरबार में — "कौन सा हृदय चाहिए?"

राज-जामाता ने कहा — "तुम्हारा काला हृदय।"

— "ले लो, पर तलवार दो।"

राजा खुश। तांग सान्ज़ांग ने तलवार उठाई, पेट चीरा — अंदर से ढेर सारे हृदय निकले!

लाल, सफेद, पीले — लालची, कामुक, ईर्ष्यालु, घमंडी — हर किस्म। पर कोई काला नहीं।

— "देखो — कोई काला नहीं।"

राज-जामाता चौंका — "यह तो बहुत हृदयों वाला भिक्षु है।"

असली सुन ने असली रूप दिखाया — "तुम्हारा काला हृदय है — उसे निकालता हूँ।"

राज-जामाता उड़ा। सुन ने पीछा किया:

रूपांतरण-दंड, अजगर-बेंत — शून्य में एक क्षेत्र बना। देश-जामाता था एक राक्षस, सुंदर लड़की उसका जाल। राजा बीमार, बच्चे संकट में — महासंत आए शक्ति लेकर। दंड उठा, बेंत उठी — शहर पर अंधेरा छाया। मंत्री-सेना भयभीत, महल में दुःख। राजा ने खुद पर धब्बा लगाया। यात्री की शक्ति से आमना-सामना — बुराई-सत्य एक-दूसरे के सामने।

बीस चक्कर — राज-जामाता भागा। रानी को लेकर — दोनों गायब।

सुन लौटे। राजा ने पूछा — "तुम कौन?"

— "तांग सान्ज़ांग का शिष्य सुन वुकोंग। हम दोनों ने वेश बदला था।"

राजा ने विश्रामालय से सबको बुलाया।

तांग सान्ज़ांग के मुँह की मिट्टी हटाई — असली चेहरा।

सबने महासंत को प्रणाम किया।

— "जामाता कहाँ से आया?"

— "दक्षिण में सत्तर मील — विलो-वन में — 'क्लियर-ब्लूम' पहाड़ी।"

— "झू बाजिए, चलो।"

— "पेट भरा नहीं।"

— "भोजन करो।"

झू बाजिए खाकर तैयार। दोनों उड़े।

आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।