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अध्याय 76 — मन-देव अपने घर में लौटा और लकड़ी-माता ने राक्षस का सच उजागर किया

सुन वुकोंग पेट से निकलने के लिए एक रस्सी बाँधता है, झू बाजिए दूसरे राक्षस से हारता है, और तीनों को कैद किया जाता है।

सिंह-वाहन गुफा सुन वुकोंग झू बाजिए शा वुजिंग हाथी राक्षस महापतंग कैद

सुन महासंत बड़े राक्षस के पेट में उत्पात मचाते रहे। राक्षस दर्द से धरती पर गिर पड़ा। चेतना लौटी तो बोला — "महाकृपालु, स्वर्ग-तुल्य महासंत बोधिसत्त्व!"

सुन ने अंदर से सुना — "बेटे, समय बचाओ। बस 'नाना-चाचा' बुलाओ।"

राक्षस ने दीन स्वर से पुकारा — "नाना-चाचा! गलती मेरी थी। तुम्हें निगला, पर तुमने उल्टे मुझे परेशान किया। माफ़ करो, तुम्हारे गुरु को जाने देता हूँ।"

— "कैसे जाने दोगे?"

— "हम तीनों मिलकर पालकी उठाकर ले जाएँगे।"

— "पालकी से बेहतर है। मुँह खोलो।"

राक्षस ने मुँह खोला। तीसरे राक्षस ने कान में कहा — "जब निकले, दाँत भींचो, चबा दो।"

सुन ने सुना। अंदर से स्वर्णदंड आगे किया — धाँय — राक्षस के सब दाँत टूट गए।

— "बाहर कान में फुसफुसाते हो? मैंने सुना। अब नहीं निकलूँगा।"

तीसरे ने कहा — "महासंत, बाहर आओ। हम से लड़ो। पेट में छुपकर काम करना महान नहीं।"

सुन ने सोचा — "सही है।"

— "खुले मैदान में आओ।"

पर एक उपाय पहले। एक बाल निकाला — रस्सी बनाई — बड़े राक्षस के दिल पर बाँध दी — सक्रिय गाँठ।

— "खींचूँगा नहीं तो दर्द नहीं, खींचा तो जैसे पेट में ही हूँ।"

फिर सोचा — "मुँह से निकलूँ तो दाँत काटेंगे। नाक से जाऊँ।"

उसने नाक के अंदर सुरसुराया — राक्षस को छींक आई — छी! — सुन बाहर निकले!

बड़े हुए — तीन गज। एक हाथ रस्सी, एक हाथ दंड।

राक्षस ने तलवार उठाई — हाथी ने भाला, पतंग ने त्रिशूल।

सुन ने रस्सी छोड़ी, दंड से लड़े — फिर उड़कर खुले मैदान में आए।

दूर पहाड़ी से पूरी ताकत से रस्सी खींची — बड़ा राक्षस दर्द से हवा में उठा, जैसे पतंग। धड़ाम — ज़मीन में दो फुट गड्ढा।

दोनों छोटे राक्षस दौड़े — "महासंत, क्षमा! हम गुरुदेव को पहुँचा देंगे।"

— "ठीक है, रस्सी कैसे काटें?"

— "काटने से बाहर की रस्सी कटेगी, पर अंदर दिल पर बँधी है — तड़पते रहेंगे।"

— "मुँह खोलो, मैं अंदर जाकर खोलता हूँ।"

— "फिर नहीं निकलोगे।"

— "मैं बाहर से भी खोल सकता हूँ।"

— "सच?"

— "गुरुदेव को पहुँचाओगे — सच?"

— "हाँ।"

सुन ने बाल खींचा — दर्द बंद।

तीनों राक्षस कृतज्ञ हुए — "वापस जाकर पालकी लेकर आते हैं।"

सुन वापस आए। दूर से देखा — तांग सान्ज़ांग धरती पर लोटते, झू बाजिए और शा वुजिंग सामान बाँट रहे थे।

— "यह क्या?"

— "झू बाजिए ने कहा गुरुदेव को राक्षस खा गया। सो विभाजन कर रहे हैं।"

— "गुरुदेव!"

शा वुजिंग ने झू बाजिए को डाँटा — "तुमने ये क्या किया?"

झू बाजिए ने कहा — "मैंने देखा था।"

सुन ने झू बाजिए का मुँह खींचा — एक थप्पड़।

— "भाई, तुम कैसे जीवित?"

— "मैंने उसके अंदर हलचल मचाई, बाल से दिल बाँधा, खींचकर बाहर आया। राक्षस अब पालकी लाने गया है।"

गुरुदेव उठे — "धन्यवाद बेटे।"

— "गुरु अब राक्षसों पर विश्वास न करें।"

झू बाजिए बोला — "भाई, वह रस्सी मुझे उधार दे।"

— "तुम पेट में घुसोगे नहीं, दिल पर बाँधोगे नहीं — रस्सी क्यों?"

— "कमर में बाँधो, तुम पकड़े रहो। मैं लड़ूँ, हारूँ — खींच लेना।"

— "ठीक है।"

रस्सी झू बाजिए की कमर में। झू बाजिए आगे बढ़ा। दूसरा राक्षस निकला — भाले से वार। झू बाजिए ने सात-आठ चक्कर लड़े — फिर पुकारा — "भाई, खींचो!"

सुन ने रस्सी ढीली छोड़ दी। झू बाजिए पीछे दौड़ा — रस्सी में उलझा, बार-बार गिरा।

दूसरे राक्षस ने नाक से झू बाजिए को लपेटा — "पकड़ा!"

महल में ले गया। "बड़े भाई, एक को लाया।"

— "किसे?"

— "झू बाजिए।"

— "बेकार है।"

— "तो भी — पानी में डुबोकर बालों को साफ करो, फिर नमक लगाकर सुखाओ — बरसात में शराब के साथ खाएँगे।"

झू बाजिए — "हाय! नमक-वाले राक्षस मिले।"

तालाब में फेंका — झू बाजिए उल्टा, आधा तैरता।

सुन मक्खी बनकर उनके कान के पास आए। नकली आवाज़ में — "झू उपदेश, मैं यमदूत हूँ।"

— "लंबे अधिकारी, कल आना।"

— "नहीं हो सकता। चलो।"

— "मेरे पास पैसे हैं।"

— "कितने?"

— "बाएँ कान में चार तोले चाँदी।"

— "निकालो।"

— "मैं बँधा हूँ।"

— "मैं खुद लेता हूँ।"

सुन ने असली रूप लिया। झू बाजिए का कान से चाँदी निकाला — हँसे।

— "बेईमान बंदर!"

— "तुम्हारा भाई बचाने आया हूँ।"

— "बचाओ तो सही।"

सुन ने रस्सी काटी, झू बाजिए को ऊपर खींचा। कपड़े सुखाए।

— "पिछले दरवाज़े से चलें।"

— "पिछले से निकले तो कायर कहलाएँगे। सामने से।"

दंड लहराते हुए तीन-चार परतों से निकले — अनगिनत छोटे राक्षस मारे।

बड़े राक्षस ने सुना — दूसरा राक्षस भाला लेकर निकला:

बड़ा हाथी बनके आया मानव-वेश — भाई की बात पर किया जादू बेश। साथ आया था पतंग-भाई — मिलकर तांग भिक्षु को खाने की सोच बनाई। महासंत ने दिखाया पराक्रम का रंग, झू बाजिए बचाया, निकले दोनों संग। भाला चला, दंड चला — जो चाहिए वही मिला।

दूसरे राक्षस ने नाक से सुन को पकड़ा। सुन ने दंड नाक में डाला।

राक्षस दर्द से छोड़ा। सुन ने नाक पकड़ी — खींचते हुए पहाड़ी तक ले आए।

गुरुदेव खड़े थे — "उसे माफ़ करो।"

रोते हुए राक्षस ने वादा किया — "पालकी लाता हूँ।"

तीनों वापस महल गए।

तीसरे राक्षस ने कहा — "अब बोतल नहीं, चाल चलेंगे।"

योजना बनाई — तीस रसोइए आगे भेजें, खाना पकाएँ। सोलह राक्षस पालकी उठाएँ। रास्ते में — सिंह-वाहन नगरी।

सौ मील पर — नगरी के करीब।

सुन ने नगरी को देखा — काला धुआँ। धरती पर गिरे।

नगरी में:

हर तरफ राक्षसों की भीड़ — चारों द्वारों पर भेड़िए-वेश। धारीदार बाघ प्रबंधक, सफेद चीता सेनापति। हिरण-सींग वाले पत्र-वाहक, चालाक लोमड़ी नगरपालक। हज़ार फुट के अजगर शहर के चक्कर काटते, दस हज़ार फुट के साँप मार्ग रोकते। लालटेन के नीचे भेड़िए — मंच पर चीता-आवाज़। हर जगह राक्षस पहरेदार। पहले यह था राजा का नगर — अब यह है बाघ-राक्षसों का घर।

तभी तीसरे राक्षस ने त्रिशूल से सुन पर वार किया।

युद्ध शुरू — बड़ा ने तलवार से झू बाजिए पर, दूसरे ने भाले से शा वुजिंग पर।

सोलह छोटे राक्षस — पालकी उठाकर नगरी में दौड़ गए। तांग सान्ज़ांग नगरी में — "महाराज, तांग भिक्षु आए।"

शोर हुआ — "बजाओ मत, डराओ मत। तांग भिक्षु एक बार डरे तो माँस कड़वा हो जाए।"

तांग सान्ज़ांग को महल में ले जाया गया। सिंहासन पर बैठाया। चाय, भोजन परोसा।

तांग सान्ज़ांग अकेले — आँखों के सामने अंधेरा।

आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।