अध्याय 74 — लांग-स्टार ने भीषण राक्षसों की खबर दी और यात्री ने चतुराई से परिवर्तन किए
सिंह-वाहन पर्वत पर तीन महाराक्षसों की सूचना मिलती है। सुन वुकोंग छोटा-बवंडर बनकर जासूसी करता है और राक्षसों की शक्ति जानता है।
इच्छाएँ और कामनाएँ सब एक समान हैं, जीवित प्राणी में भावना स्वाभाविक। बौद्ध साधक भी अनगिनत हैं — इच्छा को काटो, भावना को मिटाओ — यही ध्यान।
मन दृढ़ चाहिए, अटूट लगन — एक कण भी मैल न रहे मन में। साधना पथ पर ग़लती मत करना, पूर्ण होने पर महाज्ञान मिलता है।
येलो-फ्लावर मंदिर को पीछे छोड़कर चारों पश्चिम की ओर बढ़े। ग्रीष्म की विदाई, शरद का आगमन। ठंडी हवा शरीर को भेदती —
बारिश रुकी, गर्मी गई, मेपल के पत्ते चौंके। जुगनू उड़े घास-पगडंडी पर, झींगुर बोले चाँदनी में। पीली अलसी के फूल ओस में, लाल जलकुंभी किनारों पर। मेपल-विलो झरते पहले, ठंडी झींगुर बजाती राग।
अचानक सामने विशाल पर्वत — बादलों को छूते शिखर।
— "अगे रास्ता है?" तांग सान्ज़ांग ने घबराकर पूछा।
— "गुरुदेव, पहाड़ रास्ता नहीं रोकते," सुन ने हँसकर कहा।
घोड़ा आगे बढ़ा। तभी एक बूढ़ा आदमी दिखा — सफेद बाल, सफेद दाढ़ी, हाथ में लाठी:
— "पश्चिम जाने वालो, रुको! इस पर्वत पर राक्षस हैं जो लोगों को खा जाते हैं!"
तांग सान्ज़ांग घबराकर घोड़े से गिर गए।
सुन आगे गए — "मैं पूछता हूँ।"
पर तांग सान्ज़ांग ने रोका — "तुम्हारी शक्ल डरावनी है। बदलकर जाओ।"
सुन ने एक मंत्र पढ़ा — बदल गए एक सुंदर छोटे भिक्षु में।
— "अच्छे लगे?" तांग सान्ज़ांग खुश हुए।
झू बाजिए बोला — "हम सब पीछे रह जाएँगे।"
सुन ने बुजुर्ग से पूछा — "किस राक्षस की बात है?"
बुजुर्ग बोला — "यह राक्षस इतना शक्तिशाली है कि उसकी एक चिट्ठी पर पाँच सौ अर्हत आते हैं, एक पत्र पर ग्यारह महाग्रह उसका सम्मान करते हैं। चार समुद्रों के ड्रैगन उसके मित्र हैं, आठ गुफाओं के देवता उसके संगी।"
सुन हँसा — "वह मेरा छोटा भाई है।"
बुजुर्ग ने आश्चर्य से देखा।
सुन ने असली रूप दिखाया। बुजुर्ग डर गए। सुन ने उन्हें शांत किया — "डरो मत, विस्तार से बताओ।"
बुजुर्ग बोलने से कतराया। सुन लौटे।
— "क्या हुआ?" तांग सान्ज़ांग ने पूछा।
— "कुछ नहीं, थोड़े राक्षस होंगे।"
झू बाजिए बोला — "मैंने जो सुना उसमें सच होगा। मुझे जाने दो।"
बुजुर्ग ने झू बाजिए को देखा तो और घबराए। झू बाजिए ने पूछा तो बोले:
— "यह सिंह-वाहन पर्वत है — बीच में सिंह-वाहन गुफा। तीन राक्षस हैं।"
— "बस तीन?" झू बाजिए ने हँसकर कहा।
— "तीन बड़े, और चालीस-सात हज़ार से ज़्यादा छोटे।"
झू बाजिए दौड़ता हुआ वापस आया। सीधा शौच करने बैठ गया।
— "डर गए?" सुन ने पूछा।
— "डर से बिगड़ गया।"
झू बाजिए ने बताया — "चालीस-आठ हज़ार राक्षस। रास्ता बंद।"
तांग सान्ज़ांग घबराए।
— "गुरुदेव, डरो मत। ये लोग अतिशयोक्ति करते हैं। मैं आगे जाता हूँ।"
सुन ने कहा — "आगे का हाल जानकर वापस आता हूँ। आप यहाँ रहें।"
उड़कर चोटी पर पहुँचे। नीचे — शांत जंगल। पर फिर घंटे-नगाड़ों की आवाज़! एक छोटा राक्षस आ रहा था — पीठ पर "आदेश" का झंडा, कमर पर घंटी, हाथ में ढोल।
सुन मक्खी बनकर उसकी टोपी पर बैठ गए।
वह बड़बड़ाता था — "हम सब गश्त लगाने वाले सावधान रहें — सुन वुकोंग से। वह मक्खी बन सकता है।"
सुन चौंके — "इसने देखा? या अनुमान?"
वास्तव में राक्षस ने देखा नहीं था — यह उनके मालिक का निर्देश था।
सुन ने सोचा — "पकड़ने से पहले जासूसी करते हैं।"
वे उसकी टोपी से उतरे, थोड़ा आगे जाकर एक छोटे राक्षस का रूप बन गए — वैसे ही ढोल और झंडा।
— "रुको भाई!"
— "तुम कौन?"
— "हम एक ही परिवार के, पहचाना नहीं?"
— "नहीं।"
— "मैं रसोइया था, कम मिलते थे।"
— "पर तुम्हारी नाक नुकीली है।"
सुन ने हाथ से नाक दबाई — बिल्कुल सामान्य हो गई।
— "बड़े राजा ने मुझे भी गश्त दल में डाला है।"
— "अच्छा। हमारे दल में चालीस हैं, हर किसी के पास पहचान-पट्टी है।"
— "मेरे पास भी है।"
सुन ने पूँछ से एक बाल निकाला — "बदलो!" — एक सुनहरी पट्टी बनी — "मुख्य-बवंडर।"
छोटे राक्षस ने हैरानी से देखा — "हम सब 'छोटे-बवंडर', तुम 'मुख्य-बवंडर'?"
— "बड़े राजा ने मुझे तुम सबका मुखिया बनाया। हर से पाँच-पाँच तोले लो।"
— "आगे जाकर सब इकट्ठे देंगे।"
दोनों साथ चले। एक पत्थरी चोटी के पास पहुँचे — कलम की तरह खड़ी। सुन उस पर बैठ गए।
— "सब आओ।"
चालीस छोटे-बवंडर नीचे झुके।
— "क्या बड़े राजा का काम जानते हो? उन्होंने मुझे भेजा कि देखूँ कहीं सुन वुकोंग तुम्हें धोखा देने तो नहीं आया।"
— "हम सब असली हैं।"
— "तो बड़े राजा की शक्ति बताओ।"
— "बड़े राजा ने एक बार दस लाख दिव्य सैनिकों को निगल लिया था।"
सुन हँसे — "झूठे!"
— "नहीं, उन्होंने शरीर बड़ा किया — मुँह शहर-द्वार जैसा — और सब निगल लिए।"
— "दूसरे राजा की शक्ति?"
— "दूसरे राजा तीन गज ऊँचे, लंबी नाक। नाक से आदमी उठा लेते हैं।"
— "तीसरे राजा?"
— "तीसरे राजा — 'दस हज़ार मील का पतंग' — के पास एक यिन-यांग बोतल है। उसमें रखा व्यक्ति तीन क्षण में पिघल जाता है।"
सुन मन में डरे — "बोतल का ध्यान रखना होगा।"
— "तीनों में तांग भिक्षु किसे चाहिए?"
— "तीन राजा एक साथ रहते हैं — पर तीसरे राजा की अपनी नगरी है — सिंह-वाहन नगरी — चार सौ मील पश्चिम। पाँच सौ साल पहले उसने उस नगरी के राजा-मंत्री और सब नागरिकों को खा लिया।"
सुन ने एक विचार किया — "यह बहुत बड़ी बात है।"
और फिर सोचे — "मेरे पास एक नाम-का दाँव है — उससे ही सब भगा दूँगा।"
उन्होंने सोचा: "अगर सब लोगों के भाग्य में पश्चिम का मार्ग है, तो कुछ वीर शब्दों से ही सेना भाग जाएगी।"
ऐसा सोचकर ढोल बजाते, झंडा लहराते सिंह-वाहन गुफा के द्वार पर पहुँचे।
पहली पंक्ति के सेंटिनल ने पूछा — "छोटे-बवंडर?"
सुन ने अनसुना किया, सिर झुकाए चलते रहे।
दूसरे पड़ाव पर — "छोटे-बवंडर, क्या सुन वुकोंग दिखा?"
— "दिखा। वह पत्थर को घिसकर छड़ी तेज कर रहा था।"
— "कैसा दिखता है?"
— "वहाँ नाले के पास बैठा था। जैसे कोई रास्ता-खोदने वाला देव। खड़ा हो तो दस गज ऊँचा। कह रहा था — यह छड़ी अभी तक निकाली नहीं, आज दस लाख राक्षसों को मारूँगा।"
राक्षस-दल थर-थर काँपा।
— "साथियो, तांग भिक्षु का माँस कितना ही हो — हमें क्या मिलेगा? बेहतर है अपनी जान बचाएँ।"
— "बिल्कुल सही!"
— भेड़िए, बाघ, पक्षी — सब भाग गए। एक पुकार में सेना इधर-उधर।
सुन ने सोचा — "अच्छा हुआ। अब अंदर जाना है।"
भीतर — लाखों हथियारों की कतार। पर सुन ने मन में गणना की — "मुझे भीतर के तीन बड़े राक्षसों की असली शक्ति देखनी है।"
वे और आगे चले। आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।