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अध्याय 73 — पुराने वैर से उठा ज़हर और प्रकाश से टूटा मायाजाल

येलो-फ्लावर पुजारी मकड़ी-आत्माओं के साथ मिलकर तांग सान्ज़ांग को ज़हर देता है, और सुन वुकोंग बिलान बोधिसत्त्व की सहायता से सबको बचाता है।

येलो-फ्लावर मंदिर सौ-आँखों वाला राक्षस बिलान बोधिसत्त्व सुन वुकोंग माओ-री तारा-अधिकारी ज़हरीली चाय

सुन महासंत तांग सान्ज़ांग को सहारा देते हुए झू बाजिए और शा वुजिंग के साथ पश्चिम की ओर बढ़े। थोड़ी दूर पर एक भव्य इमारत दिखी।

तांग सान्ज़ांग ने रोककर पूछा — "यह कहाँ है?"

सुन ने देखा:

पहाड़ियों में महल, नालों में आँगन। द्वार के सामने घने-मिश्रित पेड़, बाहर जंगली फूल महकते हैं। दो-दो हिरण शांति से हरी घास चरते, जोड़े-जोड़े पक्षी ऊँचे पेड़ों पर गाते। नदी और आसमान को जोड़ता यह स्थान, लगता है यह देव-उद्यान का घर।

— "गुरुदेव, यह कोई राज-महल नहीं, धनी का घर नहीं — लगता है मंदिर है।"

तांग सान्ज़ांग ने घोड़ा बढ़ाया। द्वार पर पत्थर की पट्टी — "येलो-फ्लावर मंदिर"।

झू बाजिए बोला — "ताओ-पंथी मंदिर है, देखकर आते हैं।"

अंदर एक द्वार पर लिखा था:

"पीली कली, सफेद हिम — देव का घर, दिव्य जड़ी-बूटियाँ — योगी का आश्रम।"

सुन हँसे — "यह आग-तपाने वाले, रसायन बनाने वाले पुजारी का घर है।"

तांग सान्ज़ांग ने दबाया — "चुप।"

पूर्वी बरामदे में एक पुजारी बैठा था — गोलियाँ बना रहा था। रूप-रंग:

लाल-चमकदार मुकुट, काला रेशमी चोगा। हरे जूते, पीला कमरबंद। चेहरा लोहे की कढ़ाई-सा, आँखें तारों जैसी। नाक ऊँची, होंठ बड़े।

तांग सान्ज़ांग ने आवाज़ दी। पुजारी चौंका, दवाइयाँ छोड़ीं, स्वागत किया।

प्रांगण में तीन क्लार्क देवताओं की मूर्तियाँ थीं। तांग सान्ज़ांग ने धूप जलाई, प्रणाम किया।

बैठकर चाय का आदेश हुआ। दो बालक-शिष्य दौड़े — पर उनकी आवाज़ ने पीछे किसी को जगा दिया।

वहाँ छुपी थीं — वे सातों मकड़ी-आत्माएँ। पुराने कपड़े पहनकर आ गई थीं।

एक बालक अंदर आया — "माँ, चार भिक्षु आए हैं।"

एक मकड़ी-आत्मा ने पूछा — "क्या एक मोटा सफेद भिक्षु है?"

— "हाँ।"

— "लंबे मुँह-कान वाला?"

— "हाँ।"

— "भाई को बुलाओ, हमारी बात करनी है।"

बालक ने चाय दी। पुजारी ने एक-एक कप अतिथियों को दिए। तभी बालक ने संकेत किया — पुजारी उठकर भीतर गया।

सातों मकड़ियाँ घुटनों पर झुकीं — "भाई! सुनो हमारी बात।"

पुजारी ने कहा — "मैं दवाई बना रहा था, बाहर मेहमान हैं — बाद में बताओ।"

— "यही मेहमान तो कारण हैं।"

उन्होंने सारी बात बताई — कैसे तांग सान्ज़ांग आए, झू बाजिए ने धोने के कुंड में प्रवेश किया, शरारत की। सुन ने कपड़े छीने।

पुजारी क्रोधित हुआ — "ठहरो, मैं इनसे निपटूँगा।"

वह एक छोटी सी चमड़े की पेटी लेकर आया। उसमें से एक पुड़िया निकाली।

इस दवा का वर्णन:

सौ पक्षियों की बीट से बना — ताँबे की कढ़ाई में उबाला। हज़ार सेर में एक चम्मच — एक चम्मच से तीन भाग। बार-बार तपाया, बार-बार भुना — यह विष-दवा अनमोल है। एक कण किसी मनुष्य को दो — पेट में जाते ही यम-द्वार।

पुजारी ने कहा — "एक-एक कण चार भागों में चाय में मिलाओ। मैं पता करता हूँ कि ये तांग सान्ज़ांग के शिष्य हैं।"

बाहर आकर उसने स्वाभाविक रूप से पूछा — "आप तांग राज्य से आए हैं?"

— "हाँ।"

— "चाय लाओ!"

लाल खजूर वाली चाय के चार कप आए। सुन ने चाय उठाई — पर झाँका बिल्कुल अलग कप था पुजारी का।

सुन ने कहा — "बदल लेते हैं।"

पुजारी ने समझाया — "मैं ग़रीब साधु हूँ। सिर्फ बारह खजूर थे। तुम्हें लाल दिए, मुझे काले।"

तांग सान्ज़ांग ने कहा — "सुन, बदलो मत।"

सुन ने चाय उठाई — बाईं हाथ में लेकर दाईं से ढकी, और देखा। दूसरों ने पी ली।

झू बाजिए और शा वुजिंग लड़खड़ाने लगे। तांग सान्ज़ांग के मुँह से झाग आया। तीनों ज़मीन पर गिरे।

सुन ने जान लिया — ज़हर! उठकर पुजारी के मुँह पर कप फेंका। पुजारी ने आस्तीन से रोका — कप टूटा।

— "तुमने मेरे कप तोड़े!" पुजारी ने चिल्लाया।

— "तुमने ज़हर दिया!"

— "क्या तुमने धोने के कुंड में नहाया?"

— "तो तुम उनके भाई हो! राक्षस!"

सुन ने स्वर्णदंड निकाला। पुजारी ने तलवार उठाई। मकड़ियाँ फिर निकलीं।

सुन के आसपास रेशमी धागे फेंके गए। पर सुन ने पलटी मारी, जाल तोड़ा, हवा में उड़ गए।

नीचे देखा — पूरे मंदिर को रेशम ने ढक लिया था।

— "खतरनाक है। भूमि-देवता से पूछता हूँ।"

फिर भूमि-देवता बुलाए — "वे सात मकड़ी-आत्माएँ हैं।"

— "अच्छा! जाओ।"

सुन ने बाल से सत्तर छोटे सुन बनाए — सत्तर डबल-छड़ियाँ। सबने मिलकर रेशम तोड़े। सात मकड़ियाँ बाहर खींची — तरबूज़ जितनी बड़ी।

— "गुरुदेव को वापस दो!"

— "भाई! तांग भिक्षु को वापस दो, हमें बचाओ।"

पुजारी ने कहा — "तांग भिक्षु को खाऊँगा, नहीं छोड़ूँगा।"

सुन ने कहा — "अच्छा। तो देखो बहनों का क्या होता है।"

सातों को मार दिया।

पुजारी क्रोधित होकर आया। फिर युद्ध। साठ चक्कर — पुजारी थका। उसने कपड़े उतारे — दोनों तरफ एक हज़ार आँखें!

सुनहरी रोशनी ने सुन को घेर लिया।

सुन पंगोलिन बनकर ज़मीन में घुसे। बीस मील नीचे जाकर बाहर निकले।

थकान और दुख से रोए:

— "गुरुदेव! समुद्र पार किया, पर घर की नाली में फँस गया।"

फिर वह रोती महिला मिली। सुन ने सारी बात बताई। महिला ने दिशा दी:

— "दक्षिण में एक हज़ार मील दूर — पर्पल-क्लाउड पर्वत पर — थाउज़ेंड-फ्लावर गुफा — बिलान बोधिसत्त्व रहती हैं।"

महिला अदृश्य हो गई। सुन ने प्रणाम किया। आकाश से आवाज़ — "लिशान की वृद्ध माता हूँ। जल्दी जाओ।"

पर्पल-क्लाउड पर्वत:

नीली चीड़ें सुंदर स्थान को ढकती, हरी लताएँ आसन को लपेटती। हरे रंग की दीवारें, अजीब फूल — खुशबू में नालियाँ, पत्थरों पर शैवाल। पानी की धार नीली, बादल पुराने वृक्षों पर। वन-पशु धीरे-धीरे, हिरण मस्त। बाँस सुंदर, लाल मेपल — हर ऋतु में फूल, हर युग में आभा।

अंदर — एक महिला साधु। उन्होंने मिलकर — सुई फेंकी — सुनहरी रोशनी टूटी।

पुजारी की दृष्टि गई। सुन ने दंड उठाया — बिलान ने रोका।

— "पहले तुम्हारे गुरु-भाइयों को बचाते हैं।"

तीनों को लाल गोलियाँ दीं — ज़हर निकला।

— "यह राक्षस दिखाओ।"

बिलान ने उँगली उठाई — पुजारी धराशायी। असली रूप — सात फुट लंबा सेंटीपीड।

— "अच्छा! इसे ले जाओ।"

बिलान ने उठाया और उड़ गईं।

सुन ने कहा — "मकड़ी के भाई का कारण? उसके बेटे माओ-री — यानी मुर्गा — की आँख से बनी सुई। मुर्गा सेंटीपीड को खाता है।"

तांग सान्ज़ांग अपार कृतज्ञ हुए।

भोजन किया। मंदिर को आग लगाई। और यात्रा आगे बढ़ी।

तांग भिक्षु को जीवन मिला बिलान की कृपा से, सौ-आँखों वाले का अंत हुआ।

आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।