अध्याय 72 — जाल-धागा गुफा में सात मोहिनियाँ और धोने के कुंड में झू बाजिए
मकड़ी-आत्माओं की जाल-धागा गुफा में तांग सान्ज़ांग को बंदी बनाया जाता है, और झू बाजिए अपनी मूर्खता के कारण फँस जाता है।
झू-ज़ी राज्य को विदा कहकर चारों यात्री पश्चिम चले। अनेक पर्वत-मैदान पार हुए, अनगिनत जलधाराएँ पार हुईं। शरद गया, शीत गया, फिर वसंत आ गया।
गुरु-शिष्य वसंत में पैदल चल रहे थे जब एक आश्रम दिखा।
तांग सान्ज़ांग घोड़े से उतरे — "मैं स्वयं भिक्षा माँगने जाऊँगा।"
सुन ने रोका — "गुरुदेव, हम शिष्य हैं। यह काम हमारा है।"
पर गुरु आज्ञाग्रह थे। झू बाजिए बोला — "बड़े लोग नहीं जाते, छोटे जाते हैं। मैं जाता हूँ।"
शा वुजिंग बोला — "भाइयो, गुरु की इच्छा है, मानो।"
झू बाजिए ने कटोरा दिया। तांग सान्ज़ांग पुल पर पहुँचे। सामने था:
पत्थर का पुल ऊँचा, प्राचीन वृक्ष घने — झरने बहते जहाँ, वन-पक्षी गुनगुनाते। कुछ झोपड़ियाँ आगे, स्वच्छ-शांत जैसे आश्रम — खिड़की से झाँकते चार रूपवान युवतियाँ।
मन दृढ़ पाषाण-सा, स्वभाव कमल-सा खिला। गुलाबी गाल, लाल होंठ, माथे पर चंद्र-चाप। भौंहें पतली चाँद-सी, अलकें बादल जैसी। फूलों के बीच खड़ी हों तो भँवरे भूल जाएँ।
कुछ देर में आँगन से हँसी — तीन और युवतियाँ गेंद खेल रहीं थीं।
तांग सान्ज़ांग ने संकोच से आवाज़ दी — "बहनों, एक भिक्षु के लिए भोजन...?"
युवतियाँ खुशी से बाहर आईं — "भिक्षु महोदय, अंदर पधारिए। हम ज़रूर कुछ देंगी।"
तांग सान्ज़ांग मन-ही-मन प्रसन्न हुए — "अच्छा है, पश्चिम में स्त्रियाँ भी भिक्षु की सेवा करती हैं।"
अंदर गए। पर वहाँ पत्थर के मेज़-कुर्सी थे, ठंडी हवा बहती थी। मन खटका।
कुछ युवतियाँ भोजन लेकर आईं — पर उसमें मानव-तेल से तली चीज़ें थीं।
तांग सान्ज़ांग ने सूँघकर मुँह फेर लिया — "मैं पूर्ण शाकाहारी हूँ।"
युवतियाँ हँसीं — "यह तो शाकाहारी है।"
— "नहीं, मुझसे नहीं खाया जाएगा। मुझे जाने दो।"
युवतियों ने रास्ता रोका। कुशल हाथों से तांग सान्ज़ांग को पकड़ा, बाँधा, और छत से उल्टा लटका दिया — एक हाथ आगे, एक कमर पर, दोनों पैर पीछे, तीन रस्सियों में — "देवदूत का इशारा" नाम की मुद्रा।
युवतियों ने कपड़े उतारे और अपने पेट के नाभि-केंद्र से — रेशमी धागे निकालने लगीं, अंडे जितने मोटे! देखते-देखते पूरा आश्रम रेशम की दीवारों से घिर गया।
इधर सुन, झू बाजिए और शा वुजिंग रास्ते पर इंतज़ार कर रहे थे। सुन पेड़ पर बैठे थे कि एकाएक रोशनी दिखी।
— "अच्छा नहीं! गुरुदेव परेशानी में हैं।"
शा वुजिंग ने देखा — बर्फ-सा सफेद, चाँदी-सा चमकीला। झू बाजिए बोला — "गुरुदेव को राक्षसों ने पकड़ा। जल्दी!"
सुन ने कहा — "चुप रहो। मैं देखकर आता हूँ।"
सुन ने भूमि-देवता को बुलाया। वृद्ध देवता प्रकट हुए:
— "यहाँ पास में 'धोने का कुंड' है — सातों युवतियाँ वहाँ नहाती हैं।"
— "ये कौन हैं?"
— "मकड़ी-आत्माएँ। मैं उनसे डरता हूँ।"
सुन को युक्ति सूझी। मक्खी बनकर सुन वुकोंग युवतियों के साथ कुंड की ओर उड़े। कुंड था प्राकृतिक — गर्म पानी, पाँच ज़ाह गहरा।
एक ही ताप सर्दी-गर्मी में — तीन ऋतुओं में वसंत बना रहे। उफनती लहरें जैसे खौलता दूध, झरझर धारा में मोती ढलते।
युवतियाँ नहाने को कपड़े उतारने लगीं।
बटन खुले, रेशम-डोर सुलझी। उजली छाती चाँदी जैसी, देह हिम जैसी। कोहनी बर्फ-सी, कंधे आटे जैसे — मध्य में जीवन की धारा बहती।
सुन ने सोचा — "मैं इन्हें मार सकता हूँ, पर महिलाओं पर प्रहार मेरी प्रतिष्ठा को धब्बा लगाएगा।" उन्होंने सोचा और भूखे बाज़ का रूप धारण किया। झपटे — सातों के कपड़े छीन लिए!
— "तुम कैसा करते हो, दुष्ट पक्षी!"
पर वे नाभि तक पानी में थीं, लज्जा से हिल न सकीं।
सुन वापस आए। झू बाजिए को बताया।
— "तुमने उन्हें मारा क्यों नहीं?" झू बाजिए ने कहा।
— "तुम्हें मारना हो तो जाओ।"
झू बाजिए हथौड़ा लेकर कुंड पहुँचा — "बहनो, नहाने दोगी मुझे भी?"
युवतियाँ क्रुद्ध हुईं — "पुरुष साथ नहाए? क्या बेशर्मी!"
— "गर्मी में क्या करूँ? जाने दो।"
झू बाजिए कूद पड़ा। बदल गया — मछली! युवतियाँ उसे पकड़ने दौड़ीं — पर कभी पूर्व में, कभी पश्चिम में, टाँगों के बीच फिसलते हुए। अंततः थककर बाहर निकलीं।
झू बाजिए प्रकट हुआ, हथौड़ा उठाया — "मैं स्वर्ग-नदी का महामार्शल हूँ! तुमने मेरे गुरु को बाँधा! सिर झुकाओ!"
युवतियाँ घबरा गईं, माफी माँगी — "हम भोजन देकर उन्हें जाने देंगी।"
झू बाजिए नहीं माना — हथौड़ा उठाया। तब सातों ने नाभि से रेशम निकाला — एक विशाल रेशमी छत बनाई। झू बाजिए उसमें फँस गया। जहाँ-जहाँ पैर रखा, रेशमी डोरी में — गिरा, उठा, गिरा।
लथपथ होकर झू बाजिए वापस आया।
सुन ने कहा — "जल्दी गुरुदेव को छुड़ाते हैं।"
झू बाजिए ने कहा — "पहले उन्हें खत्म करो, वर्ना वे वापस आएँगी।"
— "तुम चाहो तो जाओ, मैं नहीं जाऊँगा।"
झू बाजिए ने जाना नहीं माना। भूमि-देवता को फिर बुलाया। पूछा — सातों किसकी आत्माएँ हैं?
— "मकड़ी-आत्माएँ। तीन वर्ष यहाँ हैं।"
सुन ने बाल से सत्तर छोटे सुन बनाए, सत्तर दोमुँही छड़ियाँ बनाईं — सबने मिलकर रेशमी धागे तोड़े। सात मकड़ियाँ प्रकट हुईं।
— "गुरुदेव को वापस दो तो छोड़ेंगे।"
राक्षसियों ने चिल्लाया — "भाई, उन्हें वापस कर दे! हमें बचा!"
भाई — एक दुष्ट ताओ-पुजारी — बोला — "तांग भिक्षु को खाऊँगा, तुम्हें नहीं बचा सकता।"
सुन क्रोधित हुए — सातों को छड़ी से मार दिया।
अब वह पुजारी तलवार लेकर आया। युद्ध शुरू हुआ। साठ चक्कर बाद पुजारी ने कपड़े उतारे — और दोनों बगलों में एक हज़ार आँखें! सुनहरी रोशनी! सुन उसमें फँस गए।
वे घूमते रहे — आगे-पीछे कहीं न जा सके। जैसे एक पीपे में। ऊपर कूदे — सिर दीवार से टकराया। चमड़ी नरम पड़ गई।
— "यह तो मुश्किल है। नीचे जाऊँ।"
सुन ने पंगोलिन का रूप धारण किया — चार लोहे के पंजे, तराशते सींग — ज़मीन में घुस गए, बीस मील नीचे।
बाहर निकलकर थकान से रोने लगे:
— "गुरुदेव! अथाह समुद्र पार किया पर छोटी नाली में डूब गया।"
तभी एक शोक-वस्त्र पहनी महिला आई, हाथ में जल-भोग और कागज़-पैसे — रोते-रोते चलती।
सुन ने पूछा — "किसके लिए रो रही हो?"
— "मेरे पति को उस पुजारी ने ज़हरीली चाय से मार डाला।"
सुन ने रोते हुए अपना परिचय दिया। महिला ने बताया — "वह पुजारी 'सौ-आँखों वाला राक्षस' है। तुम अकेले नहीं जीत सकते। पास में बिलान बोधिसत्त्व हैं — वे उसे हरा सकती हैं।"
— "वे कहाँ हैं?"
— "दक्षिण में — पर्पल-क्लाउड पर्वत, थाउज़ेंड-फ्लावर गुफा।"
महिला अचानक अदृश्य हो गई। सुन ने प्रणाम किया — "आप कौन हैं?"
आकाश से आवाज़ — "मैं लिशान की वृद्ध माता हूँ। शीघ्र जाओ।"
सुन उड़े — पर्पल-क्लाउड पर्वत पर। वहाँ थाउज़ेंड-फ्लावर गुफा में एक महिला साधु बैठी थीं:
पाँच-रंगी साटन-टोपी, सोने की काढ़ी पोशाक। चेहरा शरद की धुंध जैसा, आवाज़ वसंत के पक्षी जैसी। पेट में तीनों मार्गों का ज्ञान, हृदय में चार सत्यों का प्रकाश। शून्यता को जानने वाली, यही हैं बिलान बोधिसत्त्व।
— "महासंत! कैसे आए?"
— "आप मुझे कैसे जानती हैं?"
— "महाकोलाहल से तुम्हारा चित्र सब जगह फैला था।"
सुन ने सारी बात बताई। बिलान बोधिसत्त्व बोलीं — "मेरे पास कढ़ाई-सुई है जो उसे हरा सकती है।"
— "सुई? मेरे पास भी बहुत सुइयाँ हैं!"
— "तुम्हारी धातु की सुइयाँ काम नहीं करेंगी। मेरी सुई मेरे बेटे की आँख में तपाई गई है।"
— "आपका बेटा कौन है?"
— "माओ-री तारा-अधिकारी।"
सुन चकित हुए। दोनों उड़े। सुनहरी रोशनी दिखी — वहाँ पुजारी था।
बिलान बोधिसत्त्व ने कपड़ों के कॉलर से एक सुई निकाली — भौंह जितनी मोटी, पाँच-छह अंगुल लंबी — और हवा में उछाल दी।
एक क्षण में — धड़ाम — सुनहरी रोशनी टूट गई!
— "सुई ढूँढ़ो!"
बोधिसत्त्व ने हथेली पर दिखाई।
दोनों नीचे आए। पुजारी की आँखें बंद थीं, हिल न सकता था।
सुन ने कहा — "गुरुदेव को पहले देखते हैं।"
तांग सान्ज़ांग और दोनों शिष्य ज़मीन पर पड़े थे, थूक-बलगम बहाते हुए। बिलान बोधिसत्त्व ने तीन लाल गोलियाँ दीं। दाँत खोलकर एक-एक गोली दी — थोड़ी देर में ज़हर उल्टी से निकल गया।
झू बाजिए उठा — "दम घुट रहा था।"
तांग सान्ज़ांग और शा वुजिंग भी जागे।
झू बाजिए ने पुजारी पर हमला करना चाहा — बिलान ने रोका।
— "मुझे उसे ले जाना है — मेरे घर का रखवाला बनाऊँगी।"
सुन ने कहा — "पहले उसका असली रूप दिखाओ।"
बिलान ने उँगली उठाई — पुजारी गिरा, असली रूप — सात फुट का सेंटीपीड!
बिलान ने छोटी उँगली से उठाया, बादल पर सवार हुईं, चली गईं।
झू बाजिए बोला — "यह बुढ़िया कितनी शक्तिशाली! सेंटीपीड को कैसे दबाया?"
— "मैंने पूछा था — उसका हथियार क्या है? सुई — जो उसके बेटे की आँख में बनी। उसका बेटा है माओ-री तारा-अधिकारी — यानी मुर्गा। मुर्गा सेंटीपीड को खा जाता है। इसीलिए जीत हुई।"
सबने बिलान बोधिसत्त्व को प्रणाम किया।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "चलो।"
रसोई में चावल मिले, भोजन पकाया, पेट भरा।
शा वुजिंग ने रसोई में आग लगाई। पूरा पुजारी का भवन जल गया।
तांग भिक्षु को जीवन मिला बिलान की कृपा से, सौ-आँखों वाले का अंत हुआ।
आगे की कथा — अगले अध्याय में।