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अध्याय 71 — यात्री ने कपट से राक्षस को वश किया और गुआनयिन ने राक्षस राजा को दबाया

सुन वुकोंग झू-ज़ी राज्य की रानी को बचाने के लिए गोल्डन बेल्स की चाल चलता है, और गुआनयिन बोधिसत्त्व राक्षस को वापस ले जाती हैं।

सुन वुकोंग झू-ज़ी राज्य स्वर्णिम घंटियाँ गुआनयिन बोधिसत्त्व सुवर्ण-पवित्र रानी राक्षस राजा

वसंत ऋतु उत्सव, आनंद का उत्स — शांत मन में जब सब शून्य होता। रंग-रूप माया, शून्य ही सत्य — जो इसे जाने, वह मुक्त होता।

कर्म और साधना कभी रुको मत, श्रम से ही परम शांति मिलती है। जब भव-भार उतरे पूर्णतः तब, अमर-यौवन की आभा खिलती है।

वह कथा जहाँ हमने छोड़ी थी — सुन वुकोंग महल की खोज में था और राक्षस राजा ने द्वार बंद कर दिए थे। जब रात हुई और कोई चिह्न न मिला, राक्षस राजा "छिलका-उतारने" वाले मंडप पर बैठ गया, समूह इकट्ठा किया, और आदेश दिया — हर द्वार पर पहरेदार, ढोल-नगाड़े और चाप-तीर तैयार, रात भर जागरण।

सुन महासंत ने अपने आप को मक्खी में बदल लिया था और दरवाज़े के किनारे से चिपक गए थे। आगे के पहरे को देखकर वे पंख फड़फड़ाकर पीछे के महल में उड़ गए। वहाँ उन्होंने सुवर्ण-पवित्र रानी को शाही मेज़ पर झुककर आँसू बहाते देखा। सुन उड़कर अंदर गए और उनके बालों की जूड़ी पर बैठ गए, सुनने के लिए।

क्षण भर बाद रानी ने आहत स्वर में कहा — "महाराज, हम दोनों ने पहले जन्म में जो धूप जलाई, उसी के कारण आज यह विछोह है। यह दुष्ट राक्षस तीन वर्षों से मुझे बंदी बनाए है। स्वर्णिम घंटियों का भेद न जानने से मेरा विलाप पुराने प्रेम से भी गहरा है।"

सुन वुकोंग ने उनके कान के पास आकर धीरे से कहा — "पवित्र रानी, भयभीत न हों। मैं वही राज्य का भिक्षु हूँ जो संदेश लेकर आया था। मैंने जब घंटियाँ चुराईं, राक्षस के साथ भोज में तुम थे, और मैं मंडप से बाहर निकल आया। संयोग से घंटी खुल गई और धुआँ-आग-रेत निकला। मैंने घंटियाँ फेंक दीं, मूल रूप में आया, अपना स्वर्णदंड चलाया — पर जीत न सका। अब मक्खी बनकर छुपा हूँ।

तुम राक्षस राजा को पत्नी का प्रेम दिखाकर अंदर बुलाओ ताकि मैं काम कर सकूँ और तुम्हें बचा सकूँ।"

रानी यह सुनकर काँप उठीं। उन्होंने पूछा — "तुम मनुष्य हो या भूत?"

— "मैं मक्खी के रूप में हूँ। डरो मत, राक्षस राजा को बुलाओ।"

रानी न माने। सुन ने कहा — "यदि विश्वास न हो, हाथ फैलाओ।"

रानी ने बायाँ हाथ फैलाया और सुन हथेली पर उतर गए — जैसे कमल की पंखुड़ी पर काला बिंदु, जैसे गुलाब पर भँवरा।

रानी बोलीं — "भिक्षु!" और सुन की भनभनाहट आई — "हाँ, मैं वही हूँ।"

तब रानी को विश्वास हुआ। उन्होंने पूछा — "जब मैं राक्षस को बुलाऊँगी, तुम क्या करोगे?"

सुन बोले — "शराब का उपयोग करो। एक सेविका को बुलाओ जो मेरे पास हो — मैं उसका रूप धारण करूँगा।"

रानी ने "चुन ज़ियाओ" को बुलाया — एक सफेद-मुँह वाली लोमड़ी आत्मा। रानी ने कहा — "जाओ और दीप जलवाओ, धूप जलाओ, मुझे मंडप में राक्षस राजा के पास ले चलो।"

सुन उड़ गए। उन्होंने चुन ज़ियाओ के सिर से एक बाल खींचा, उसमें फूँक मारी — "बदलो!" और एक नींद का कीड़ा बन गया जिसे उन्होंने उसके चेहरे पर रख दिया। कीड़ा नाक में घुसते ही चुन ज़ियाओ सो गई।

सुन ने तब चुन ज़ियाओ का रूप धारण किया और सेविकाओं में जा खड़े हुए।

राक्षस राजा मिलने को उत्साहित था। पेय और गाना-नाचना शुरू हुआ। भोज में रानी ने राक्षस राजा को मग्न रखा। नकली चुन ज़ियाओ ने शराब परोसी।

रानी ने पूछा — "महाराज, क्या बहुमूल्य घंटियाँ सुरक्षित हैं?"

राक्षस राजा ने कहा — "वे अनादि काल की धातु से बनी हैं, खराब नहीं हो सकतीं। पर उस चोर ने रुई खींच ली और मेरी थैली जला दी।"

— "उन्हें कहाँ रखा है?"

— "कमर से बाँधी हैं।"

नकली चुन ज़ियाओ ने सुना। उन्होंने अपने बालों से एक मुट्ठी खींची, चबाई, और राक्षस राजा के कपड़ों में छुपाते हुए फूँक मारी — "बदलो!" — जूँ, पिस्सू, खटमल! राक्षस राजा को जलन होने लगी। वह अपनी छाती खुजलाने लगा।

रानी ने हँसते हुए कहा — "महाराज, कहते हैं सम्राटों को भी तीन जूँ होती हैं। कपड़े उतारिए, मैं खोजती हूँ।"

राक्षस राजा ने कपड़े उतारे। परत दर परत खोलते हुए, तीसरी परत पर — तीनों घंटियाँ झाँकने लगीं।

नकली चुन ज़ियाओ बोले — "महाराज, घंटियाँ दीजिए, मैं भी जूँ देखती हूँ।"

राक्षस राजा ने सौंप दिया। सुन ने असली घंटियाँ छिपा लीं, एक बाल से नकली तीन घंटियाँ बना दीं और वापस कर दिए। राक्षस राजा ने रानी को सौंपते हुए कहा — "इन्हें सँभालकर रखो।"

रानी ने सोने की पेटी में बंद कर दीं — नकली।

रात गहरी होने पर सुन वुकोंग असली घंटियाँ लेकर, नींद के कीड़े वापस खींचकर, आगे बढ़े। छुपकर महल का द्वार खोला और पुकारा:

— "राक्षस राजा! मेरी सुवर्ण-पवित्र रानी को वापस दे!"

रात भर पुकारते रहे। सवेरे राक्षस राजा निकला — "तुम कौन हो?"

— "झू-ज़ी राज्य का 'ननिहाल-चाचा', रानी को वापस लेने आया हूँ।"

राक्षस राजा हँसा, फिर गुस्से में बोला — "तुम्हारी शक्ल बंदर जैसी है। नाम बताओ।"

सुन ने अपनी वीरगाथा कही — आकाश में बड़े संत के रूप में, पाँच सौ वर्षों की कैद, अब तांग सान्ज़ांग के साथ यात्रा —

"ब्रह्मांड की संतान हूँ मैं, सूर्य-चंद्र से जन्मा। पाषाण-गर्भ से प्रकट, दिव्य मूल से जन्म लिया। देवराज का न्योता था, बिल्मा-विन का पद मिला। पर स्वतंत्र मन ने विद्रोह किया, आकाश में खलबली मचाई। इंद्र-महेश भी झुके, तब राहु ने पकड़वाया। पाँच सौ वर्ष पहाड़ में था, मुक्त होकर आया। अब तांग भिक्षु का रक्षक हूँ — नाम सुन वुकोंग।"

राक्षस राजा ने कहा — "तुम महाकोलाहल वाले बंदर हो! रानी को क्यों माँगते हो?"

— "क्योंकि तुम्हें पत्र भेजकर मुझे बुलाया गया था। मेरे एक ही दंड खाओ!"

युद्ध हुआ — पचास चक्कर तक बराबर। राक्षस राजा ने विराम माँगा — "भोजन करने जाता हूँ, वापस आकर तय करते हैं।"

वह घंटियाँ लेने गया। रानी ने दिल थामकर नकली घंटियाँ दे दीं।

राक्षस राजा बाहर आया — "सुन वुकोंग, देखो मेरी घंटियाँ!"

— "तुम्हारे पास घंटियाँ हैं तो मेरे पास भी हैं!" सुन ने असली निकालीं।

राक्षस ने हिलाया — कोई धुआँ नहीं, कोई आग नहीं, कोई रेत नहीं। नकली घंटियाँ थीं!

सुन ने तीनों असली घंटियाँ एक साथ हिलाईं — लाल आग, काला धुआँ, पीली रेत सब एक साथ उठे! पूरब की हवा में आग भड़क उठी। राक्षस राजा घबरा गया, रास्ता न सूझा।

तभी आकाश से आवाज़ आई — "सुन वुकोंग, मैं आई हूँ!"

ऊपर देखा — गुआनयिन बोधिसत्त्व! बाएँ हाथ में पवित्र पात्र, दाएँ हाथ में विलो-शाखा — अमृत के छींटे मारते हुए, आग बुझाने।

सुन ने घंटियाँ छुपाईं, हाथ जोड़े — "बोधिसत्त्व, आप किसलिए पधारीं?"

— "इस राक्षस को वापस लेने।"

— "यह किसका राक्षस है?"

— "यह मेरा सुनहरे बालों वाला पहाड़ी कुत्ता है। चरवाहा सो गया था, यह बंधन तोड़कर भाग आया — झू-ज़ी के राजा की पुरानी प्रायश्चित्त के रूप में।"

सुन बोले — "पर इसने रानी को अपवित्र किया, नैतिकता नष्ट की — मृत्युदंड का पात्र है।"

गुआनयिन ने कहा — "यह तुम नहीं जानते। जब राजा राजकुमार था, उसने शिकार में एक नर मोर को घायल किया। बुद्ध-माता पक्षिणी ने शाप दिया — तीन वर्ष पत्नी-विछोह। मेरा यह कुत्ता वहाँ था, इसने सुना और रानी को ले आया ताकि राजा का शाप काटा जाए। तुमने उचित समय पर आकर शाप मुक्त करवाया।"

— "तो भी उसे दो ठोकर लगाने दो।"

— "नहीं।"

बोधिसत्त्व ने पुकारा — "पापी! वापस आ जा।"

राक्षस ने लोट खाई, असली रूप में आया — पहाड़ी कुत्ता। बोधिसत्त्व उस पर सवार हुईं।

— "रुकिए, मेरी घंटियाँ वापस दीजिए।"

— "तुमने ली थीं तो देते क्यों नहीं?"

— "नहीं ली।"

— "झूठ बोलते हो? मैं कसने का मंत्र पढ़ूँगी।"

— "मत पढ़िए! लो, ये रही।"

जो घंटी बाँधे, वही खोले।

बोधिसत्त्व ने घंटियाँ कुत्ते के गले में डालीं और उड़ गईं।

सुन महासंत ने वापस आकर सारे राक्षसों को मार डाला। रानी को महल से निकाला। उन्होंने कुछ सूखी घास की ड्रैगन बनाई, रानी को उस पर बैठाया, आँखें मूँदने कहा — और आधे पहर में ही झू-ज़ी नगरी में पहुँच गए।

रानी ने आँखें खोलीं — परिचित महल। राजा दौड़ा आया, रानी का हाथ पकड़ने को —

— "हाथ दर्द, हाथ दर्द!"

झू बाजिए हँसा — "भाग्य का खेल है।"

सुन ने बताया — "रानी के शरीर पर विष-काँटे हैं। जो छुए वह घायल हो।"

सब चिंतित हुए। तभी आकाश से आवाज़ आई — "महासंत, मैं आया हूँ।"

ऊपर एक सिद्ध पुरुष आ रहे थे — पुराने ताड़-कोट में, हाथ में फुंदेदार झाड़ू।

— "झांग ज़ियांग! कहाँ जा रहे हो?"

— "महासंत, मैं तीन वर्ष पहले एक बौद्ध सम्मेलन में था। मैंने रानी को एक नया वस्त्र दिलवाया था — ताड़-कोट जो नया दिखता था, पर उसमें काँटे थे। वे काँटे ही विष-सुरक्षा थे। अब तुम्हारे काम पूर्ण हुए — मैं वस्त्र हटाने आया हूँ।"

— "आभार, पर जल्दी हटाओ।"

सिद्ध पुरुष ने आगे बढ़कर वस्त्र हटाया। रानी का शरीर पहले जैसा हो गया।

राजा, रानी, सभी ने आकाश में प्रणाम किया। उत्सव की तैयारी हुई।

— "गुरुदेव, वह युद्ध-पत्र।"

तांग सान्ज़ांग ने आस्तीन से पत्र निकाला। सुन ने राजा को दिया — बताया सब कुछ — घंटियों की चाल, छद्म-वेश, रानी का साथ, गुआनयिन का आगमन।

तांग सान्ज़ांग बोले — "एक ओर राजा का सौभाग्य, दूसरी ओर शिष्य का पराक्रम। पर अब विदा लेते हैं।"

राजा ने आग्रह किया। अंततः रथ सजा, तांग सान्ज़ांग को आसन दिया, राजा और रानी ने स्वयं रथ खींचा। पश्चिम की ओर यात्रा फिर शुरू हुई।

जो भाग्यशाली हो वह भ्रम से छूटता है, शांत मन में ही नया प्रभात खिलता है।

आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।