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अध्याय ७: अष्टकोण-भट्टी से भाग निकला — पंच-तत्व पर्वत के नीचे मन-वानर बंद

सुन वुकोंग परम वृद्ध देव की भट्टी में अजेय बनता है, स्वर्ग में फिर तांडव मचाता है, और अंत में तथागत बुद्ध उसे पंच-तत्व पर्वत के नीचे दबाते हैं

सुन वुकोंग तथागत बुद्ध परम वृद्ध देव पंच-तत्व पर्वत अग्नि-नेत्र स्वर्ण-दृष्टि जेड सम्राट

वुकोंग को वध-स्थल लाया गया।

तलवार चलाई — नहीं कटा।

कुल्हाड़ी मारी — एक खरोंच भी नहीं।

आग लगाई — नहीं जला।

बिजली गिराई — नहीं मरा।

परम वृद्ध देव बोले: — इसने मेरे अमर-दाने खाए थे। पाँचों लौकी के दाने। आग में पककर शरीर हीरे जैसा हो गया।

— इसे मेरे पास छोड़ो। अष्टकोण-भट्टी में रखूंगा। उनतालीस दिन में दाने गल जाएंगे — शरीर राख।

जेड सम्राट ने माना।

वुकोंग को भट्टी में डाला। आठ दिशाओं की शक्तिशाली आग।

लेकिन — वुकोंग चालाक था। "वायु" की दिशा में घुस गया। वहाँ आग नहीं होती।

धुआँ था — और उस धुएँ ने उसकी आँखें लाल कर दीं। सूज गईं। जल गईं।

यही बाद में प्रसिद्ध हुईं — "अग्नि-नेत्र स्वर्ण-दृष्टि"।


उनतालीस दिन पूरे हुए।

परम वृद्ध देव ने भट्टी खोली।

वुकोंग ने आँखें मलते हुए ऊपर देखा — रोशनी दिखी।

और वो उछल पड़ा।

एक लात में भट्टी पलट गई। परम वृद्ध देव उलटे गिरे।

वुकोंग ने छड़ी निकाली — और स्वर्ग में फिर तांडव।

नौ-ग्रह देव छुप गए। चारों राजाओं की परछाईं नहीं।

"आत्मा-रक्षक" वाङ लिंग-ग्वान ने रास्ता रोका। लड़े — बराबर।

और बत्तीस बिजली-देवता आ गए।

वुकोंग तीन सिर, छह हाथ बन गया। तीन छड़ियाँ। सबको रोका।

जेड सम्राट ने रुंगमिंग मंदिर को संदेश भेजा: — जाओ, तथागत बुद्ध को बुलाओ।


वज्र-ध्वनि मंदिर में तथागत बुद्ध थे।

दो दूत आए। सब बताया।

बुद्ध मुस्कुराए: — मैं देखने जाता हूँ।

दो शिष्यों के साथ — आनंद और काश्यप — वो आए।

बिजली-देवताओं से कहा: — रुको।

वुकोंग सामने आया।

— तुम कौन हो?

— मैं पश्चिम के स्वर्ग-सुख मंदिर का शाक्यमुनि हूँ।

वुकोंग ने झाँककर देखा: — ओह! तो तुम वो बुड्ढे हो।

— सुनो — तुम क्यों यह उपद्रव मचा रहे हो?

— क्योंकि स्वर्ग-महल मुझे मिलना चाहिए! जेड सम्राट को बाहर निकालो!

बुद्ध हँसे: — तुम कहते हो कि जेड सम्राट को हटाओ। पर तुम्हारी योग्यता है?

— मुझे बहत्तर रूपांतरण आते हैं। पलटी-बादल से एक बार में एक लाख आठ हज़ार मील जाता हूँ। यह काफी नहीं?

बुद्ध ने कहा: — चलो — एक दाँव लगाते हैं। अगर तुम एक पलटी में मेरी हथेली से बाहर जा सको — तो स्वर्ग तुम्हारा। नहीं गए — तो नीचे जाकर और साधना करो।

वुकोंग मन में हँसा: — यह बेवकूफ! हथेली तो एक बित्ते की होगी। मैं एक लाख मील जाता हूँ!

— ठीक है!

बुद्ध ने हाथ फैलाया — कमल के पत्ते जैसा।

वुकोंग छोटा हुआ। हाथ पर खड़ा हुआ। और एक पलटी।

उड़ा। उड़ता रहा। उड़ता रहा।

बहुत दूर — पाँच लाल खंभे दिखे। एक नीली धुंध उठ रही थी।

— यह तो दुनिया का आखिरी छोर है!

— अब लौट जाएंगे तो बुद्ध गवाह देगा — और स्वर्ग मेरा।

रुको — एक निशान छोड़ता हूँ।

एक बाल से कलम बनाई। बीच के खंभे पर लिखा:

"स्वर्ग-तुल्य महासंत — यहाँ आया।"

और पहले खंभे के नीचे — एक बार पेशाब भी किया।

फिर पलटी मारी — और वापस।

— बुद्ध, मैं गया। अब स्वर्ग दो।

बुद्ध ने कहा: — तुम मेरी हथेली से निकले ही नहीं।

— झूठ! मैं दुनिया के आखिरी खंभे तक गया। निशान छोड़ा।

— देखो नीचे।

वुकोंग ने झाँका।

बुद्ध की बीच की उंगली पर लिखा था:

"स्वर्ग-तुल्य महासंत — यहाँ आया।"

और उंगली के जोड़ पर — एक सड़ांध की महक।

वुकोंग चौंका: — कैसे...?

— तुम उड़ते रहे — लेकिन मेरी हथेली के अंदर। जो खंभे दिखे — वो मेरी पाँच उंगलियाँ थीं।

वुकोंग — पहली बार — घबराया।

— नहीं! मैं मानता नहीं!

उसने फिर उछलने की कोशिश की।

बुद्ध ने हाथ पलटा। और पाँच उंगलियाँ — पाँच पर्वत बन गईं। एक-एक — सोना, लकड़ी, जल, अग्नि, मिट्टी।

पंच-तत्व पर्वत।

वुकोंग — नीचे। दबा। पकड़ा।


देवताओं ने हर्ष मनाया।

जेड सम्राट ने भोज रखा।

बुद्ध ने आनंद को एक कागज़ दिया — "ओम् मणि पद्मे हुम्" — और कहा: — पर्वत की चोटी पर चिपका दो।

तुरंत पर्वत की जड़ें जम गईं।

वुकोंग — हाथ बाहर निकाल सकता था, थोड़ा हिल सकता था। बस।

बुद्ध ने एक भूमि-देवता को वहाँ रखा। कहा:

— यह जब तक यहाँ है — भूखा हो तो लोहे की गेंद खाओ, प्यासा हो तो पिघला तांबा पिलाओ। जब इसके पाप पूर्ण होंगे — कोई आएगा इसे मुक्त करने।

वानर ने हिम्मत से स्वर्ग में तांडव किया, पर तथागत बुद्ध ने हाथ से दबा दिया। प्यास लगे तो पिघला तांबा, भूख लगे तो लोहा, जब दिन पूरे होंगे — बुद्ध का पथिक आएगा।

वानर की महिमा, वानर की भक्ति, पर्वत के नीचे अब शांत प्रतीक्षा। जब सच्चा साधु पश्चिम से निकलेगा, तब यह वानर फिर से जागेगा।

अगले अध्याय में — हमारी कथा पश्चिम की यात्रा की ओर मुड़ती है। तथागत बुद्ध धर्म-ग्रंथ भेजना चाहते हैं — पूर्व की ओर।