अध्याय ६९ — मन-स्वामी ने रात में दवा बनाई, राजा ने भोज में राक्षस का रहस्य बताया
सुन वुकोंग रात को काजल, अरण्डी, सोंठ और घोड़े के मूत्र से 'कृष्ण-स्वर्ण-गोली' बनाता है; पूर्वी समुद्र के नाग-राजा वर्षा-जल लाते हैं; राजा ठीक होता है और बताता है कि तीन साल पहले 'आकाश-तुल्य-महाशक्ति' दैत्य ने पटरानी का अपहरण किया।
सुन वुकोंग आधी रात को अतिथि-गृह के कक्ष में बैठा था। बाहर नगर शान्त था, हर ओर मौन।
झू बाजिए ने उबासी ली — भाई, जल्दी करो। नींद आ रही है।
सुन वुकोंग ने कहा — पहले एक तोला दालचीनी-जड़ लाओ और बारीक पीसो।
शा सोंग बोला — दालचीनी-जड़ कड़वी होती है, ठण्डी, विष-रहित। इसकी प्रकृति डूबती है, तैरती नहीं। रोकती नहीं, बहाती है। रुके हुए को निकालती है, अशान्ति को शान्त करती है। इसे "सेनाध्यक्ष औषध" कहते हैं। परन्तु पुराने रोग में दुर्बल रोगी के लिए शायद उचित न हो।
सुन वुकोंग ने कहा — तुम नहीं जानते। यह बलगम-निवारक और वायु-नियंत्रक है। चुप रहो और दूसरा काम करो — एक तोला अरण्डी-बीज लो, छिलका उतारो, ज़हर हटाओ, बारीक पीसो।
झू बाजिए बोला — अरण्डी तीखी, गर्म, ज़हरीली होती है। कठोर गाँठ तोड़ती है, पेट की पुरानी ठण्ड हटाती है, बन्द मार्ग खोलती है, अन्न-जल का रास्ता साफ़ करती है। यह "दरवाज़ा-तोड़ने वाली, द्वार-छीनने वाली" औषध है — बहुत तेज़ है।
सुन वुकोंग ने हँसकर कहा — तुम भी नहीं जानते। यह हृदय-फुलाव और जल-सूजन ठीक करती है। बनाओ।
दोनों ने दवाएँ पीसीं और पूछा — अब और क्या?
सुन वुकोंग ने एक मिट्टी का कटोरा लिया — जाओ, रसोई के चूल्हे से आधा कटोरा राख खुरचकर लाओ।
झू बाजिए — राख से क्या होगा?
सुन वुकोंग — दवा में मिलाना है।
शा सोंग ने आपत्ति की — हमने कभी नहीं सुना कि राख दवाई में जाती है।
सुन वुकोंग ने समझाया — इस राख का नाम है "शत-जड़ी-ओस"। यह सब रोगों को साध सकती है।
झू बाजिए ने जाकर राख लाई और बारीक पीसी।
फिर सुन वुकोंग ने कटोरा आगे बढ़ाया — जाओ, हमारे घोड़े का आधा कटोरा मूत्र लेकर आओ।
झू बाजिए — यह किसलिए?
सुन वुकोंग — गोलियाँ बनाने के लिए।
शा सोंग ने हाथ जोड़े — भाई, यह मज़ाक नहीं है। घोड़े का मूत्र बदबूदार है। इससे तो कमज़ोर रोगी उल्टी करेगा। और ऊपर से अरण्डी और दालचीनी — ऊपर से नीचे तक सब निकल जाएगा।
सुन वुकोंग बोला — तुम नहीं जानते रहस्य। हमारा घोड़ा साधारण घोड़ा नहीं है। वह पश्चिमी समुद्र का नाग-पुत्र है। उसका मूत्र जो भी जलधारा में गिरे तो मछलियाँ अजगर बन जाएँ, जो पर्वत पर गिरे तो घास दिव्य-कमल बन जाए। यहाँ एक राज्य के राजा के लिए उपयोग करना अयोग्य कैसे?
झू बाजिए घोड़े के पास गया। घोड़ा एक करवट सोया था। झू बाजिए ने एक ठोकर मारी और खड़ा किया, पेट के नीचे कटोरा लगाया। काफ़ी देर तक इन्तज़ार किया — कुछ नहीं।
झू बाजिए दौड़कर आया — भाई, घोड़े को पहले ठीक करो। वह रुका हुआ है।
सुन वुकोंग हँसा — मैं भी आता हूँ।
तीनों घोड़े के पास गए। घोड़ा उठ खड़ा हुआ और मानव-भाषा में बोला —
— भाई, क्या तुम नहीं जानते? मैं पश्चिमी समुद्र का उड़ान-नाग हूँ। स्वर्ग-नियम तोड़ने पर बोधिसत्त्व ने मुझे बचाया, मेरे सींग काटे, शल्क उतारे और घोड़ा बनाकर गुरुदेव को पश्चिम यात्रा पर दिया ताकि मेरे पाप धुलें। यदि मैं नदी-जल में मूत्र करूँ, तो उसमें की मछलियाँ नाग बन जाएँ; पर्वत पर करूँ तो औषधि-पौधे दिव्य-जड़ी बन जाएँ। मैं यहाँ साधारण धूल में कैसे करूँ?
सुन वुकोंग ने समझाया — भाई, यहाँ पश्चिमी देश का राजा है, कोई धूल-मिट्टी नहीं। सब मिलकर एक राज्य का भला करें — तभी सबकी जीत होगी। नहीं तो हम यहाँ से निकल नहीं पाएँगे।
घोड़े ने कहा — ठीक है, रुको।
सभी देखते रहे। घोड़े ने आगे झुका, पीछे बैठा, दाँत भींचे — थोड़ा-थोड़ा निकला।
झू बाजिए ने झाँका — इतना ही! अरे, थोड़ा और तो हो सकता था।
सुन वुकोंग — आधे कटोरे से कम है, पर काम चलेगा।
तीनों भीतर आए। तीनों दवाइयाँ — दालचीनी, अरण्डी, राख — और घोड़े का मूत्र मिलाकर तीन बड़ी गोलियाँ बनाईं।
झू बाजिए ने देखा — बड़ी लग रही हैं।
सुन वुकोंग — इन्हें एक छोटे डब्बे में रखो।
तीनों वहीं सो गए।
सवेरे राजा ने भेजा — महान वैद्य से औषधि लेकर आओ।
दरबारी आए, झुके। सुन वुकोंग ने झू बाजिए से डब्बा निकलवाया।
दरबारी ने पूछा — इस दवा का नाम क्या है?
— इसका नाम है "कृष्ण-स्वर्ण-गोली।"
झू बाजिए और शा सोंग हँसे — राख से बनी, काली है — नाम भी काला-सोना!
दरबारी ने पूछा — किस चीज़ के साथ लें?
सुन वुकोंग ने कहा — दो तरह से ले सकते हैं। एक आसान और एक कठिन। आसान है — बिना-जड़ का जल।
दरबारी — बिना-जड़ का जल क्या होता है?
सुन वुकोंग — आकाश से गिरी वर्षा — जो ज़मीन को न छुए। वही "बिना-जड़ का जल।"
दरबारी — ओह, वह तो बादल बरसें तो मिल जाएगा।
सुन वुकोंग — और मुश्किल वाला? — छह असम्भव चीज़ें। जैसे बुढ़िया काग का पाद, जलमग्न मछली का मूत्र, राजमाता का श्रृंगार-चूर्ण, देव-भट्टी की राख, जेड-सम्राट का टूटा साफ़ा, और नींद में सोए नाग की मूँछ।
दरबारी हतप्रभ — ये तो कहीं नहीं मिलेंगे।
सुन वुकोंग — इसीलिए पहले वाला बेहतर है।
दरबारी प्रसन्न होकर औषधि लेकर चले गए।
राजा ने देखा — यह क्या गोलियाँ हैं?
दरबारी ने बताया — "कृष्ण-स्वर्ण-गोली" — बिना-जड़ के जल के साथ लेनी है।
राजा ने वर्षा-जल मँगाने का आदेश दिया।
सुन वुकोंग अतिथि-गृह में था। उसने झू बाजिए से कहा — हमने राजा को बिना-जड़ के जल का वचन दिया है, पर इस समय वर्षा कहाँ से आएगी? जाकर थोड़ी मदद करते हैं।
सुन वुकोंग ने पूर्व की ओर मुँह किया, मंत्र पढ़ा — पूर्वी आकाश में एक काला बादल उभरा।
— महाशक्तिशाली, पूर्वी समुद्र का नाग-राजा आओंग-गुआंग उपस्थित हूँ।
— मैंने तुम्हें कोई बड़ा काम के लिए नहीं बुलाया। बस राजा की दवाई के लिए थोड़ा जल चाहिए।
नाग-राजा ने कहा — मैं वर्षा-उपकरण नहीं लाया — न हवा, न बादल, न गड़गड़ाहट। कैसे बरसाऊँ?
— बस कुछ छींटे दो। अपनी लार ही काफ़ी।
नाग-राजा ने कहा — ठीक है।
उसने मुँह में जमा लार को एक छोटी-सी फुहार में बदल दिया — और दिव्य वर्षा होने लगी।
दरबार में हर कोई बोल उठा — हमारे राजा के लिए आकाश ने अमृत-वर्षा की!
राजा ने आदेश दिया — सब लोग जल एकत्र करें — बड़े से छोटे सब।
महल की रानियाँ, दासियाँ, तीन हज़ार सेविकाएँ — सभी ने थाल, कटोरे, प्याले उठाए। एक घड़ी भर में जितना जल मिला वह तीन पात्र भर था।
राजा ने पहले एक गोली निगली और एक पात्र जल पिया। फिर दूसरी गोली और दूसरा जल। फिर तीसरी और तीसरा।
थोड़ी देर बाद पेट में चक्की-सी आवाज़ आई। राजा को शौचालय ले जाया गया — तीन-पाँच बार जाना हुआ।
रानियों ने शौचालय जाँचा और बोलीं — रोग की जड़ निकल आई! अन्दर एक चावल-दाना-सा टुकड़ा भी था।
राजा को लगा — हृदय हल्का है, साँस साफ़, रक्त-प्रवाह सुचारु।
उन्होंने पलंग से उतरकर दरबारी वस्त्र पहने और दरबार में आए।
तांग सान्ज़ांग को देखते ही झुककर प्रणाम किया।
तांग सान्ज़ांग ने प्रणाम लौटाया।
राजा ने कहा — सब दरबारियों को, सभी शिष्यों को बुलाओ। भोज की तैयारी करो।
सुन वुकोंग, झू बाजिए और शा सोंग आए। चारों शिष्यों ने मिलकर गुरु को नमस्कार किया।
भोज में चार शाकाहारी मेज़ें थीं और एक माँसाहारी मेज़। पाँच सौ से अधिक अधिकारी थे।
मेवा, मिठाई, आसव, सुगन्ध-धूप — राजा ने स्वयं प्याला उठाया।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — भिक्षु मदिरा नहीं पीते।
राजा ने कहा — शाकाहारी मदिरा।
तांग सान्ज़ांग — "मदिरा" नाम से ही भिक्षुओं का संयम टूटता है।
राजा ने कहा — तो शिष्यों को भेजें।
राजा ने सुन वुकोंग को प्याला दिया। सुन वुकोंग ने हाथ जोड़े और एक साँस में पी लिया।
राजा ने दूसरा दिया — पी गया। तीसरा — "तीन-अमूल्य-प्याले।"
झू बाजिए प्रतीक्षा में बैठा था। उसके मुँह में पानी आ रहा था। उसने बोलना शुरू किया — महाराज, दवा में भी मेरा हाथ था, उस दवाई में घो...
सुन वुकोंग ने तुरन्त उसे रोका — लो, यह प्याला।
झू बाजिए ने प्याला लिया और मुँह बन्द कर लिया।
राजा ने पूछा — शिष्य कह रहे थे कि दवाई में घो... क्या था?
सुन वुकोंग ने उत्तर दिया — यह मेरा शिष्य ऐसी दवाइयाँ बताना चाहता था जो दूसरों को भी काम आए। दवाई में था — मा-दाउ-लिंग।
राजकीय वैद्य ने स्पष्ट किया — मा-दाउ-लिंग कड़वी-ठण्डी, निर्विष। श्वास-विकार दूर करती है, बलगम हटाती है, रक्त-शोधन में गुणकारी।
राजा ने प्रसन्न होकर झू बाजिए को भी तीन प्याले पिलाए। शा सोंग को भी।
भोज आगे बढ़ा। राजा ने सुन वुकोंग को एक बड़ा प्याला दिया —
— तुमसे एक बात कहनी है।
— कहिए।
राजा ने कहा — कहते हैं, "घर की बात घर में रहती है।" पर तुम मेरे उपकारी हो, इसलिए बताता हूँ। मेरे यहाँ तीन रानियाँ थीं — स्वर्ण-संत-रानी, मणि-संत-रानी, रजत-संत-रानी। तीन साल पहले आषाढ़ मास के पाँचवे दिन के उत्सव में, जब हम सब समुद्र-अनार-मण्डप में उत्सव मना रहे थे, एक झोंका आया। आकाश से एक राक्षस उतरा — उसने खुद को "आकाश-तुल्य-महाशक्ति" कहा और बताया कि वह एकशृंगी पर्वत के शिंगयी-गुफा में रहता है। उसने कहा — मेरे महल में एक स्त्री चाहिए। मुझे स्वर्ण-संत-रानी दो, नहीं तो पहले तुम्हें खाता हूँ, फिर मन्त्रियों को, फिर पूरी प्रजा को।
राजा का गला भर आया — मैं राज्य और प्रजा की चिन्ता से स्वर्ण-संत-रानी को उस मण्डप के बाहर ढकेल दिया। राक्षस ने एक ललकार के साथ उन्हें उठाकर ले गया। उस भय और क्षोभ से मुझे रोग लग गया। जो भोजन मैंने उस दिन किया था वह भी अन्दर जम गया।
आपकी दवाई से सब बाहर निकला। शरीर में प्राण आए।
राजा ने रोते हुए कहा — वह दैत्य हर छह महीने पर सेविकाएँ माँगता रहता है। अब तक आठ सेविकाएँ दे चुका हूँ। कहते हैं सब मर गईं।
सुन वुकोंग ने पूछा — और राज्य में कोई उस दैत्य को रोक नहीं सका?
राजा — कोई नहीं। मेरे डर से मैंने एक "दैत्य-शरण-महल" भी बनवाया — हवा की आवाज़ सुनते ही रानियों को लेकर उसमें छिप जाता हूँ।
सुन वुकोंग ने प्याला एक ही घूँट में खाली किया और कहा — राजा, क्या आप चाहते हैं कि रानी वापस आएँ?
राजा — दिन-रात यही सोचता हूँ, पर कौन लाएगा?
सुन वुकोंग — मैं जाऊँगा।
राजा घुटनों पर बैठ गया — यदि रानी वापस आई तो मैं राज्य आपको दे दूँगा।
झू बाजिए यह सुनकर खिलखिला उठा — राजा, पत्नी के लिए इतनी बड़ी क़ीमत?
भोज के बाद राजा ने "दैत्य-शरण-महल" दिखाया। वह एक भूमिगत कक्ष था — ऊपर से एक भारी पत्थर से ढका। तीन ज़रा नीचे में नौ कमरे, चार बड़े मिट्टी-के-घड़े जिनमें तेल-दीपक जलते थे।
बातें हो ही रही थीं कि दक्षिण से हवा का एक तेज़ झोंका आया।
सब दरबारी चिल्लाए — इस भिक्षु की बात में नमक-मिर्च है — राक्षस का नाम लिया और राक्षस आ गया!
राजा सब छोड़कर भूमिगत कक्ष में कूद गया। तांग सान्ज़ांग भी। दरबारी छिप गए।
झू बाजिए और शा सोंग भी छिपने लगे। सुन वुकोंग ने दोनों का हाथ पकड़ा — डरो मत। देखो कि यह कौन है।
झू बाजिए — क्यों देखें? राजा छिपे, गुरुदेव छिपे, दरबारी छिपे, हम क्यों खड़े रहें?
सुन वुकोंग ने ज़बरदस्ती दोनों को रोका।
आकाश से एक दैत्य उतरा।
नौ फ़ीट लम्बा, हिंसक चेहरा, आँखें — सोने के दीपक जैसी। दोनों कान बड़े — पंखे जैसे, चार स्टील-दाँत — ठोकी कील जैसे। कनपटी पर लाल-केश, भौंहें — लौ जैसी, नाक बड़ी, नथुने खुले। मूँछें — लाल रेशे जैसी, गालें उभरे, पूरा चेहरा नीला। भुजाएँ लाल, हाथ — नील-रंग, दस नुकीले नाखून — भाले जैसे। कमर पर चीते की खाल, नंगे पाँव, बिखरे बाल — भूत जैसे।
सुन वुकोंग ने शा सोंग से पूछा — पहचाना?
— नहीं।
— झू बाजिए, तुम?
— मैं उसके साथ चाय भी नहीं पिया, कैसे पहचानूँ?
सुन वुकोंग ने कहा — यह पूर्व-पर्वत के द्वार-रक्षक राक्षस जैसा लगता है।
झू बाजिए — नहीं। राक्षस-भूत रात को निकलते हैं। अभी दोपहर है।
सुन वुकोंग — ठीक है। तुम दोनों गुरुदेव की रक्षा करो। मैं जाकर पूछता हूँ।
सुन वुकोंग ने छलाँग लगाकर आकाश में ललकारा —
— कहाँ जाते हो? मैं यहाँ हूँ!
और अगले अध्याय में युद्ध शुरू होगा।