अध्याय ६८ — लाल-बैंगनी राज्य में तांग सान्ज़ांग ने पूर्व-जन्म की चर्चा की, सुन वुकोंग ने धागे से नाड़ी परखी
चारों यात्री लाल-बैंगनी राज्य पहुँचते हैं जहाँ राजा तीन वर्षों से बीमार है; सुन वुकोंग चिकित्सा-घोषणापत्र उठाता है और 'निलम्बित-धागे-नाड़ी-निदान' से राजा का रोग पहचानता है।
गन्दी-अमरूद-गली पार करके चारों यात्री स्वच्छ मार्ग पर उतर आए। समय उड़ता रहा और ग्रीष्म का मौसम आ गया।
समुद्री अनार के फूल खिले, कमल-पत्र हरे थाल-सा फैला। दोनों ओर हरे पत्तों में बाबुल के घोंसले, राहगीर पंखे से धूप भगाते।
आगे एक नगर दिखा। तांग सान्ज़ांग ने लगाम थामी — यह कौन-सा स्थान है?
सुन वुकोंग ने दूर से देखा — वह पीले झंडे पर "लाल-बैंगनी राज्य" लिखा है।
तांग सान्ज़ांग — तो यहाँ प्रवेश-पत्र पर मुहर लगवानी होगी।
सुन वुकोंग — बिल्कुल।
नगर में प्रवेश करते ही लोग चौंककर रुक गए। सुन वुकोंग का चेहरा अजीब था, झू बाजिए की लम्बी थूथन थी, शा सोंग लम्बा-काला था। खरीद-बिक्री रुक गई, लोग देखने लगे।
तांग सान्ज़ांग ने शिष्यों को आँखें नीची रखने को कहा। झू बाजिए ने थूथन छिपा ली। शा सोंग आगे नहीं देखा। सुन वुकोंग ने इधर-उधर देखते हुए तांग सान्ज़ांग के पास रहा।
कुछ बच्चों ने झू बाजिए पर पत्थर और टीले फेंके।
तभी एक कोने में "राज-अतिथि-गृह" का भव्य द्वार दिखा। तांग सान्ज़ांग ने कहा — चलो, यहाँ विश्राम करते हैं। मैं राजदरबार में जाकर प्रवेश-पत्र पर मुहर लगवा आता हूँ।
झू बाजिए ने थूथन बाहर निकाली और कई लोगों को डरा दिया।
अतिथि-गृह के दो अधिकारी थे — वे अन्दर आए। तांग सान्ज़ांग ने अपना परिचय दिया। वे चकित हुए। उन्होंने तांग सान्ज़ांग के लिए कमरे की व्यवस्था की और सब्ज़ियाँ भिजवाईं।
सुन वुकोंग ने झल्लाया — हम यात्री हैं, मुख्य कक्ष में जगह मिलनी चाहिए।
तांग सान्ज़ांग ने समझाया — वे हमारे देश के अधीन नहीं हैं। हम यात्री हैं।
सुन वुकोंग ने तो ठीक कर दिया।
अधिकारी ने कहा — राजा आज दरबार में है — शुभ दिन है। वह चिकित्सा-घोषणापत्र लिखवा रहा है। यदि मुहर चाहिए तो अभी जाओ।
तांग सान्ज़ांग ने शिष्यों को अनुशासन में रहने को कहा और स्वयं राजदरबार चले गए।
इधर सुन वुकोंग ने शा सोंग को खाना बनाने को कहा। शा सोंग ने बताया — तेल, नमक, मसाले नहीं हैं।
सुन वुकोंग ने झू बाजिए को बाज़ार से लाने को कहा। झू बाजिए ने मना किया — इस मुँह से बाज़ार जाऊँ तो लोग डरेंगे।
सुन वुकोंग ने खुद जाने का फ़ैसला किया। झू बाजिए को भी ले चला।
सुन वुकोंग ने रास्ते में हर जगह लोगों का ध्यान खींचा — मिठाइयाँ, नमकीन, चाय, रोटियाँ, चावल, आटा-चक्की — सब वर्णन करता रहा। झू बाजिए के मुँह में पानी आने लगा।
ढोल-मंडप के पास पहुँचे तो भीड़ थी। झू बाजिए ने घुसने से मना किया।
सुन वुकोंग ने कहा — रुको यहाँ, मैं जाकर दुकान से लेकर आता हूँ।
झू बाजिए दीवार से थूथन लगाकर खड़ा हो गया — और नींद आ गई।
सुन वुकोंग ने उस राजकीय घोषणापत्र को भीड़ में जाकर देखा। वहाँ लिखा था —
पश्चिम-गोचर-भूखण्ड का लाल-बैंगनी राज्य का राजा — राज-स्थापना के बाद से चारों दिशाओं में शान्ति थी। परन्तु हाल में दीर्घकालिक रोग ने राज-शरीर को जकड़ लिया है। राजकीय वैद्यों के प्रयास विफल रहे। अतः यह घोषणा है — जो भी कुशल चिकित्सक रोग ठीक करेगा, उसे आधा राज्य दिया जाएगा।
सुन वुकोंग पढ़कर मुस्कुराया — प्राचीन काल में कहा गया: "चलते रहने में तीन हिस्से भाग्य होता है।" आज चिकित्सक बनकर काम करूँगा।
उसने अदृश्य होकर घोषणापत्र उठाया, एक भँवर-हवा चलाई, भीड़ को तितर-बितर किया और वापस आकर वह पत्र चुपचाप झू बाजिए की जेब में डाल दिया।
झू बाजिए अचानक चौंका। उसकी जेब से एक काग़ज़ झाँक रहा था।
लोगों ने देखा — इसने राजकीय घोषणापत्र उठाया है!
झू बाजिए ने काग़ज़ देखा और दाँत पीसकर बोला — उस बन्दर ने मुझे फँसाया!
राज-दूतों ने उसे घेरा। झू बाजिए ने पाँव जमाए — दस आदमी मिलकर भी हिला न सके।
झू बाजिए बोला — यह मैंने नहीं उठाया। मेरे भाई सुन वुकोंग ने उठाया और मुझ पर डाल दिया।
बुज़ुर्ग राज-दूतों ने समझाया — सब अतिथि-गृह चलते हैं।
अतिथि-गृह में सुन वुकोंग हँस रहा था। झू बाजिए ने आकर उसे पकड़ लिया।
राज-दूतों ने प्रणाम किया — पूजनीय वुकोंग महाशय! आपने घोषणापत्र उठाया? हमारे राजा आपकी प्रतीक्षा करते हैं।
सुन वुकोंग बोला — दवाई माँगने नहीं जाते, रोगी को चिकित्सक बुलाना पड़ता है। राजा स्वयं आकर बुलाएँगे तो चलूँगा।
राज-दूत हैरान होकर दरबार वापस गए। इधर तांग सान्ज़ांग भी राजदरबार में थे। राजा ने उनसे पूर्व के इतिहास पर चर्चा की — तीन राजाओं, पाँच राजाओं, ययाति-शुनक-युग से लेकर महा-तांग वंश तक।
तीन सम्राट, पाँच वंश, शान्ति से राज्य-रचना। मज़बूत ने कमज़ोर को दबाया, देश टूटे और जुड़े। हान के बाद जिन, दक्षिण-उत्तर, सुई-वंश आया और टूटा। हमारे राजा ली-परिवार ने महा-तांग की स्थापना की, जेड-सम्राट तांग-तैज़ोंग की पुनर्जीवन-कथा से शुरू हुई हमारी यात्रा।
राजा की आँखें भर आईं — हमारे राज्य में भी कोई मंत्री नहीं जो रोग ठीक कर दे।
तांग सान्ज़ांग ने देखा — राजा का चेहरा पीला, शरीर दुबला, आँखें मलिन।
तभी राज-दूत ने घोषणापत्र की सूचना दी। राजा ने तांग सान्ज़ांग से पूछा — आपके कितने शिष्य हैं?
— तीन।
— कौन-सा चिकित्सक है?
— सब पहाड़ी लड़के हैं। दानव पकड़ते हैं, अजगर झुकाते हैं। पर चिकित्सा की जानकारी नहीं।
राजा ने कहा — वही घोषणापत्र उठाने का साहस कर सकता है जिसे विश्वास है। जाओ, दूत भेजो।
राज-दूत अतिथि-गृह आए। सब दरबारी झुककर प्रणाम करने लगे।
झू बाजिए पर्दे के पीछे छिप गया।
शा सोंग दीवार के पास खड़ा हो गया।
सुन वुकोंग बीच में बैठा रहा, टस से मस न हुआ।
झू बाजिए मन में बड़बड़ाया — यह बन्दर बाकियों को झुकते देख भी नहीं हिला — शर्म नहीं आती?
दरबारियों ने प्रणाम किया — राजा ने स्वयं न आकर हमें "राजा के प्रतिनिधि" के रूप में भेजा है।
सुन वुकोंग उठा और बोला — ठीक है, चलते हैं।
झू बाजिए ने धीरे से कहा — भाई, हम दोनों का नाम मत लेना।
— ठीक है। पर दवाइयाँ आएँगी, उन्हें संभालना।
शा सोंग — कैसी दवाइयाँ?
— जो भी दवा आए, लेकर रख लो।
दोनों ने सहमति दी।
राजदरबार में सुन वुकोंग सीधे आगे बढ़ा। राजा ने ऊपर से देखा और कड़कदार आवाज़ में पूछा — कौन हैं ये महाशय?
सुन वुकोंग ने रौबदार आवाज़ में कहा — मैं ही हूँ।
राजा डर गया और पलंग पर गिर पड़ा!
महिला-सेवक दौड़ीं। सब दरबारी सुन वुकोंग पर नाराज़ हुए — इतना उद्दंड कैसे हो सकता है?
सुन वुकोंग ने शान्ति से कहा — ग़लत समझे। यदि ऐसा ही रहे तो हज़ार साल में भी राजा ठीक नहीं होंगे।
दरबारियों ने पूछा — क्या मतलब?
सुन वुकोंग बोला —
वैद्य-शास्त्र की गहराई बेहद सूक्ष्म है, हृदय में लचक ज़रूरी है। देखना, सुनना, पूछना, स्पर्श करना — चार काम, एक भी छूटे तो निदान अधूरा। पहला — रंग-रूप-नींद-जागरण देखो, दूसरा — आवाज़ साफ़ है या धुंधली, शब्द सच्चे हैं या भटके। तीसरा — रोग कब से है, खाना-पानी कैसा। चौथा — नाड़ी परखो — ऊपरी, गहरी, भीतरी। बिना इन चारों के, इस जीवन में स्वास्थ्य नहीं मिलेगा।
राजकीय वैद्यों ने माना — यह सही बात कह रहे हैं।
परन्तु राजा ने कहा — मैं अजनबियों को नहीं देख सकता।
सुन वुकोंग ने कहा — मैं "निलम्बित-धागे-नाड़ी-निदान" करूँगा।
दरबारी खुश हुए — ऐसी बात सुनी थी, देखी नहीं। ज़रूर करें।
राजा मान गया।
सुन वुकोंग भीतर गया। उसने अपने शरीर से तीन बाल खींचे। फूँक मारी — तीन रेशम-धागे बन गए, प्रत्येक बाईस-बाईस फ़ीट लम्बा। रेशम-धागे राज-परिचर के माध्यम से राजा की कलाइयों से बाँधे गए और खिड़की के बाहर लटकाए गए।
सुन वुकोंग ने धागे का एक सिरा थामा। पहले दाईं हाथ की अँगुलियों से — तर्जनी से कलाई की नाड़ी, मध्यमा से मध्य-नाड़ी, अनामिका से भीतरी नाड़ी — एक-एक करके महसूस की। फिर बाईं हाथ से वैसे ही।
जब वह बाहर आया तो उसने ऊँचे स्वर में कहा —
— राजा के बाईं ओर — कलाई-नाड़ी कठोर-तीव्र, मध्य-नाड़ी रुक्ष-धीमी, भीतरी नाड़ी खोखली-गहरी। दाईं ओर — कलाई-नाड़ी तैरती-फिसलती, मध्य-नाड़ी धीमी-जड़ी, भीतरी नाड़ी उथल-पुथल।
— यह है भय, चिन्ता और आघात का रोग। इसे कहते हैं — "दोहरे-पंछी-खोए-झुंड" का रोग।
भीतर से राजा की आवाज़ आई — बिल्कुल सही। यही रोग है।
दरबारी ने पूछा — "दोहरे-पंछी-खोए-झुंड" का क्या अर्थ है?
सुन वुकोंग ने समझाया — नर और मादा पंछी साथ उड़ते थे। एक दिन तूफ़ान में बिछड़ गए। नर मादा को ढूँढता है, मादा नर को। यही "दोहरे-पंछी-खोए-झुंड।"
दरबारियों ने एकमत होकर कहा — सच्चे देव-वैद्य!
राजकीय मुख्य वैद्य ने भी सहमति दी।
उन्होंने पूछा — कौन-सी औषधि देंगे?
सुन वुकोंग ने कहा — कोई भी दवा लाओ।
वैद्य ने आपत्ति की — शास्त्र कहते हैं: आठ सौ आठ रोगों के लिए आठ सौ आठ औषधियाँ हैं। सब एक साथ?
सुन वुकोंग बोला — प्राचीन काल में कहा गया है: औषधि बँधी नहीं होती, जो उचित हो वह उपयोगी है। इसीलिए सब मँगाता हूँ।
वैद्य मान गए। नगर की हर दवा-दुकान से आठ सौ आठ प्रकार की दवाएँ — प्रत्येक तीन सेर — अतिथि-गृह पहुँचाई गईं। साथ में औषधि-पीसने की घंटी, चक्की, छलनी और मूसल भी।
सुन वुकोंग तांग सान्ज़ांग को लेने दरबार लौटा। परन्तु रानी-महल से संदेश आया — राजा चाहते हैं कि तांग सान्ज़ांग यहीं रहें। जब दवा काम करे तो एक साथ विदाई।
तांग सान्ज़ांग घबराए — यह मुझे गिरवी रखा! यदि दवा काम न करे तो?
सुन वुकोंग ने धीरे से हँसते हुए कहा — गुरुदेव, निश्चिन्त रहें। पर मेरी दवा बनाने में मन लगाएँ।
वह अतिथि-गृह लौट आया।
झू बाजिए ने हँसते हुए स्वागत किया — भाई, मुझे पता चल गया तुम्हारा इरादा — दवा की दुकान खोलने की सोच रहे हो!
सुन वुकोंग ने झिड़का — यह क्या बकवास है! राजा को ठीक करेंगे, फिर आगे चलेंगे।
झू बाजिए ने हिसाब लगाया — आठ सौ आठ दवाएँ, हर एक तीन सेर — कुल चौबीस सौ चौबीस सेर। एक आदमी को इतनी दवा खाने में न जाने कितने साल लगेंगे!
सुन वुकोंग हँसा — बस तीन-चार दवाएँ काफ़ी हैं। बाकी सब इसलिए मँगाई ताकि राजकीय वैद्यों को पता न चले।
रात खाने पर दो अतिथि-गृह अधिकारी घुटने टेककर बोले — श्रीमान, आज सुबह आप आए तो हमने पहचाना नहीं। अब पता चला आप महान वैद्य हैं। हम क्षमा माँगते हैं।
सुन वुकोंग खुश होकर भोजन-कक्ष में बैठा। झू बाजिए और शा सोंग ने भी खाया।
रात हुई। अतिथि-गृह अधिकारी ने पूछा — दीपक कितने चाहिए?
सुन वुकोंग ने कहा — पर्याप्त मात्रा में रोशनी दो। आधी रात में दवा बनानी होगी।
अगले अध्याय में — रात भर दवा बनाना और राजा का उपचार।