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अध्याय ६६ — देवताओं पर राक्षस का प्रहार, मैत्रेय बुद्ध ने दुष्ट को बाँधा

सुन वुकोंग वुडांग पर्वत और फिर स्वेशिया नगर सहायता माँगता है; अन्त में मैत्रेय बुद्ध प्रकट होकर पीत-भ्रू राक्षस को — जो उनका भगोड़ा पृष्ठ-सेवक था — अपने मानव-बीज-थैले में बन्दी बनाते हैं।

पश्चिम यात्रा अध्याय 66 मैत्रेय बुद्ध पीत-भ्रू राक्षस सुन वुकोंग वुडांग पर्वत मानव-बीज-थैला

सुन वुकोंग एक ही छलाँग में दक्षिण की ओर उड़ा और वुडांग पर्वत पहुँचा। वहाँ शुभ प्रकाश का विस्तार था, पाँच सौ दिव्य रक्षक प्रवेश-द्वार पर थे।

विशाल पहाड़ियों पर ऊँचे मंडप, तालाब में छिपा अजगर, शैल-गुहा में बाघ। सफ़ेद बगुला बूढ़े देवदार पर बसेरा करता, नील-मयूर सूर्यमुखी चट्टान पर बोलता। यहाँ तक सत्य-वीर की यह पवित्र भूमि है।

सत्य-वीर प्रभु ने स्वयं नीचे आकर उसका स्वागत किया। सुन वुकोंग ने सारी विपत्ति सुनाई।

प्रभु ने कहा — मेरा कार्यक्षेत्र उत्तर दिशा है। आज मैं यहाँ शान्ति में हूँ। स्वर्ग से कोई आदेश नहीं है, इसलिए मैं स्वयं नहीं जा सकता। परन्तु मैं तुम्हें पाँच दिव्य अजगर और कछुआ-साँप की जोड़ी के साथ सहायता भेजता हूँ। जाओ।

सुन वुकोंग ने प्रणाम किया और उन दिव्य योद्धाओं के साथ लघु-गर्जन-ध्वनि मंदिर वापस आया। द्वार के बाहर से ललकारा। पीत-भ्रू राक्षस ने अपने सैनिकों के साथ बाहर आकर मुक़ाबला किया। पाँच अजगरों ने बादल-वर्षा की, कछुआ-साँप ने धूल उड़ाई। आधे घड़ी के बाद राक्षस ने फिर वही सफ़ेद बोरा निकाला। सुन वुकोंग चिल्लाया — सावधान! पर अजगर और कछुआ-साँप नहीं समझे। एक झटके में वे भी बोरे में खिंच गए। सुन वुकोंग अकेला बच निकला।

वह पश्चिमी पर्वत-शिखर पर उदास बैठ गया। आँखें मुँद गईं और उनींदापन आने लगा।

तभी दिन के रक्षक देवता ने आकर जगाया — महाशक्तिशाली! जल्दी करो! गुरुदेव का जीवन संकट में है!

सुन वुकोंग ने झिड़का — तुम किधर थे? और अब आए सलाह देने?

रक्षक देवता ने विनम्रता से कहा — हम गुरुदेव की छाया की तरह साथ हैं। अभी ज्ञात हुआ कि दिव्य-अजगर और कछुआ-साँप भी क़ैद हो गए। स्वर्ग में एक और बड़ी शक्ति है — श्रीमान राष्ट्र-आचार्य राजा बोधिसत्त्व, जो स्वेशिया पर्वत की मोती-नगरी में निवास करते हैं। उनके पास जल-माता को वश करने की शक्ति है। उनके शिष्य लघु-ज़ांग राजकुमार और चार दिव्य योद्धा हैं। वे अवश्य सहायता करेंगे।

बुर्ज की तरह शिखर ऊपर उठी, सोने के कलश में आकाश झाँकता। हर ओर से तेज़ प्रकाश फैलता, पूर्व-पश्चिम में परछाईं नहीं पड़ती। हवा में झरती मणि-छड़ी की ध्वनि, बर्फ़ जैसे स्तम्भों पर अलौकिक महल।

राष्ट्र-आचार्य ने सुन वुकोंग को देखते ही समझ लिया। उन्होंने कहा — यहाँ अभी नई जल-दैत्य को वश किया है, वह किसी भी क्षण उछाल मार सकती है। मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता, परन्तु मेरे शिष्य लघु-ज़ांग राजकुमार को भेजता हूँ।

लघु-ज़ांग राजकुमार ने आगे बढ़कर अपनी वीरता का परिचय दिया —

पश्चिम देश के रेत-वंश में मेरा जन्म, बचपन में रोगों का कष्ट था असीम। गुरु ने अमृत की एक बूँद दी, मैंने साधना की और राज छोड़ दिया। अजगर को पकड़ा, व्याघ्र को दबाया, जल-दानव को बाँधा, पाताल को शान्त किया। अब स्वेशिया में नगर की रक्षा करता हूँ, यही मेरी पहचान है — लघु-ज़ांग!

पीत-भ्रू राक्षस ने लघु-ज़ांग की बातें सुनकर मुस्कुराया और लड़ाई शुरू की। काफ़ी देर तक युद्ध चला। राक्षस ने फिर बोरा निकाला। सुन वुकोंग ने चेताया — सावधान!

परन्तु लघु-ज़ांग और चार योद्धा नहीं समझे। वे भी बोरे में समा गए। केवल सुन वुकोंग बच निकला।

सुन वुकोंग फिर निराश होकर बैठ गया। आँसू बह चले।

— गुरुदेव, मैं स्वर्ग में मुँह दिखाने योग्य नहीं रहा, — समुद्र-देव के सामने सिर उठाने में लज्जा आती है, — बोधिसत्त्व से क्या कहूँ, तथागत के सम्मुख कैसे जाऊँ?

तभी दक्षिण-पश्चिम से एक इन्द्रधनुषी बादल उतरा, झमाझम वर्षा हुई और किसी ने पुकारा — वुकोंग! क्या मुझे पहचानते हो?

सुन वुकोंग ने देखा — बड़े कान, गोल मुँह, पेट फूला हुआ, आँखों में शरद की सी कोमलता, फटे हुए कपड़े, पैरों में धूल-सने सैंडल —

मैत्रेय बुद्ध! परम आनन्दमय मुस्कुराते हुए बुद्ध!

सुन वुकोंग ने तुरन्त झुककर प्रणाम किया — पूर्व से पधारे बुद्धदेव! आप यहाँ कैसे?

मैत्रेय बोले — मैं यहाँ इसीलिए आया हूँ। वह राक्षस मेरी ही सेवा में था।

सुन वुकोंग ने पूछा — वह कौन है, देव?

मैत्रेय बोले — वह मेरे सामने घंटी-ढोलक बजाने वाला पीत-भ्रू सेवक है। तीसरे महीने के तीसरे दिन मैं प्रथम-तत्त्व-सम्मेलन में गया था। उसे महल की रखवाली सौंपी थी। उसने मेरी कुछ वस्तुएँ चुरा लीं और स्वयं बुद्ध बन बैठा। वह सफ़ेद बोरा "मानव-बीज-थैला" है — मेरी ही पुरानी सम्पत्ति। वह छोटी लचीली छड़ी घंटा-मुगदर है।

सुन वुकोंग झल्लाया — हँसोड़ बुद्ध! अपने सेवक पर नज़र नहीं रखते और हमें संकट में डलवा देते हो!

मैत्रेय हँसते हुए बोले — एक तो मेरी लापरवाही, दूसरे, तुम्हारे गुरु-शिष्यों की परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। चलो, मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ।

मैत्रेय ने उस पर्वत के ढाल पर एक झोपड़ी बनाई, बाहर तरबूज़ की बेलें लगाईं — और सुन वुकोंग को उन्हीं में एक बड़े पके तरबूज़ में बदलकर छिपा दिया।

— अब जाओ, राक्षस को यहाँ तक लुभाओ। जीत की नहीं, हार की लड़ाई लड़ो।

सुन वुकोंग ने बाँया हाथ मुट्ठी की तरह भींचा। मैत्रेय ने उसकी हथेली पर रहस्यमय "निषेध" अक्षर लिखा था।

सुन वुकोंग मंदिर के द्वार पर पहुँचा और ललकारा। पीत-भ्रू राक्षस बाहर आया और हँसा — अरे, अब अकेला आया है!

दोनों ने युद्ध किया। सुन वुकोंग ने एक हाथ छिपाए रखा। जब राक्षस ने बोरा निकाला, सुन वुकोंग ने मुट्ठी खोली — और वह "निषेध" अक्षर का जादू काम कर गया। राक्षस बोरा भूल गया और पीछे हटने लगा।

सुन वुकोंग हारने का नाटक करते हुए भागा। राक्षस उसके पीछे दौड़ा। मैत्रेय की झोपड़ी के पास आते ही सुन वुकोंग एक बड़े पके तरबूज़ में बदल गया।

राक्षस ने एक बूढ़े किसान को देखा — मैत्रेय रूप में — जो तरबूज़ों की देखरेख कर रहे थे।

— कोई पका तरबूज़ है?

— हाँ, यह सबसे बड़ा पका हुआ है।

राक्षस ने वह तरबूज़ उठाया और एक बड़ा काटकर मुँह में डाला।

सुन वुकोंग के लिए यही अवसर था। वह पेट के भीतर उतर गया और धमाल मचाने लगा — उल्टे-पुल्टे हो गया, करवटें बदलीं, मुक्के मारे, लौह-छड़ी अजमाई।

राक्षस दर्द से तड़प उठा। ज़मीन पर लोटने लगा।

मैत्रेय ने अपना असली रूप प्रकट किया — ओ नालायक! मुझे पहचानते हो?

राक्षस ने देखा और माथा टेक दिया — स्वामी! माफ़ करो! माफ़ करो! अब कभी नहीं!

मैत्रेय ने आगे बढ़कर उसे खींचा, मानव-बीज-थैला उससे छीना, घंटा-मुगदर वापस लिया और बोले — वुकोंग! मेरे लिए उसे माफ़ करो।

— ठीक है। पर पहले बाहर तो आने दो।

सुन वुकोंग ने भीतर से आवाज़ दी — मुँह खोलो।

राक्षस ने दर्द सहते हुए मुँह बड़ा खोला। सुन वुकोंग बाहर आया और छड़ी उठाई।

मैत्रेय ने राक्षस को थैले में बन्द कर लिया और कमर में लटका लिया। उन्होंने घंटा-मुगदर लहराते हुए पूछा — वह सोने का घंटा (स्वर्णिम घंटा) कहाँ है?

थैले से आवाज़ आई — वुकोंग ने तोड़ दिया।

— टुकड़े वापस लाओ।

राक्षस ने बताया कि वे मन्दिर की वेदी पर हैं।

मैत्रेय और सुन वुकोंग मन्दिर लौटे। मैत्रेय ने एक पड़से से द्वार खोला। छोटे-छोटे राक्षस भाग रहे थे। सुन वुकोंग ने एक-एक को मार डाला। वे सब वास्तव में वन-जन्तु और पशु-दैत्य थे।

मैत्रेय ने सोने के टुकड़े एकत्र करके फूँक मारी और मंत्र पढ़ा — वे टुकड़े फिर से जुड़कर पूर्ण स्वर्णिम घंटा बन गया।

मैत्रेय ने सुन वुकोंग से विदा ली और परम-आनन्द लोक की ओर चले गए।

सुन वुकोंग ने तांग सान्ज़ांग, झू बाजिए और शा सोंग को बन्धन से मुक्त किया। झू बाजिए कई दिन के भूखे थे — वह धन्यवाद देने से पहले रसोई में दौड़ा और आधा पतीला खाना चट कर गया।

बाद में सुन वुकोंग ने सारा वृत्तान्त सुनाया। सभी ने देवताओं का आभार माना।

फिर सुन वुकोंग ने पाँच अजगर और कछुआ-साँप को वुडांग पर्वत वापस भेजा, लघु-ज़ांग और चार योद्धाओं को स्वेशिया नगरी भेजा, नक्षत्र-देवताओं को स्वर्ग और अन्य सब देवताओं को उनके स्थान पर विदा किया।

चारों यात्री उस मन्दिर में आधा दिन विश्राम करके घोड़े को चारा खिलाकर अगले दिन प्रातः काल चल पड़े। जाते-जाते सुन वुकोंग ने उस मन्दिर को अग्नि दे दी — सारा नकली महल जलकर राख हो गया।

बाधाओं से मुक्त होकर आगे बढ़े, विपत्ति से मुक्त मन से पथ चले।

अभी कितनी दूर है महा-गर्जन-ध्वनि — यह किसी को नहीं पता।