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अध्याय ६२ — मन को शुद्ध कर मीनार साफ़ करना ही धर्म है, राक्षस को वश करना ही साधना है

तांग सान्ज़ांग एक बौद्ध मठ में पहुँचे जहाँ भिक्षुओं पर रत्न-चोरी का आरोप है; सुन वुकोंग रात को मीनार साफ़ करते हुए असली चोरों को पकड़ता है।

पश्चिम यात्रा अध्याय 62 सुन वुकोंग तांग सान्ज़ांग स्वर्णिम-प्रकाश मठ मीनार राक्षस

बारह प्रहर एक पल भी नहीं भूलो, सौ घड़ी की साधना पूर्ण करो। पाँच वर्ष में दस हज़ार आठ सौ चक्कर। जीवन-जल को सूखने मत दो, अग्नि की लपट को मत भड़कने दो। जल-अग्नि का संतुलन बना रहे — पाँच तत्त्वों की श्रृंखला कड़ी है। यिन-यांग के मेल से ऊपर चढ़ो। देव-वाहन पर बैठकर पवित्र लोक में, हंस पर सवार होकर अमर-द्वीप।

यह काव्य-रचना तांग सान्ज़ांग और उनके तीन शिष्यों के जल-अग्नि के संतुलन का गुणगान करती है। शीतल केले-पत्र पंखे से अग्नि को बुझाकर पर्वत पार किया।

कुछ दिनों में आठ सौ ली की दूरी तय हुई। शिष्य हँसते-खेलते पश्चिम की ओर बढ़ते रहे। शरद ऋतु के अंत और शीत के आरम्भ का समय था।

वे देख रहे थे:

खेतों के गेंदे मुरझाए, नई बाँस की कोपलें उगीं। गाँव-गाँव धान की फ़सल कट रही, हर घर में सुगन्धित भोजन। समतल जंगल में दूर पहाड़ दिखते, मुड़ी हुई घाटी में पाला जमता। पृथ्वी की साँस नीचे उतरती, आकाश की ऊपर। इन्द्रधनुष छिपा, तालाब में बर्फ़ जमने लगी। चट्टानों पर लताएँ मुरझाईं, देवदार और बाँस और भी हरे।

चारों बहुत दिनों से चल रहे थे। आगे एक नगर दिखा। तांग सान्ज़ांग ने घोड़ा रोककर कहा — वुकोंग, वह कौन सी जगह है?

सुन वुकोंग ने सिर उठाकर देखा — एक राजधानी। यह नगर:

पर्वत की गोद में, आसमान छूती ऊँचाई। चारों ओर साफ़ पानी, दक्षिण-उत्तर के पहाड़ आमने-सामने। पत्थर-पुल पर जानवरों की नक्काशी, सोने के मंच पर विद्वान और ज्ञानी। दस दिशाओं का केंद्र, देवताओं का नगर। दस हज़ार ली की सीमा, हज़ार साल का राज। दूर-दूर की जनजातियाँ राजा की आज्ञा मानतीं, समुद्र और पहाड़ राज-दरबार में झुकते। महलों में स्वच्छता, राजमार्गों पर शान्ति। शराबखाने में गाने, फूल-महल में उल्लास। राज-महल के बाहर सदाबहार पेड़, प्रातः के सूर्य पर रंगीन फ़ीनिक्स गाता।

सुन वुकोंग ने कहा — गुरुजी, यह किसी राजा का नगर है।

झू बाजिए ने हँसकर कहा — हर देश में नगर होता है, यह देखकर ही राजा का नगर कैसे पहचाना?

—तुम नहीं जानते। राजा का महल नगर से अलग होता है। देखो, चारों तरफ दस से अधिक दरवाज़े, परिधि में सैकड़ों ली। इतने ऊँचे महल-मीनार, बादल छूते हैं। सामान्य नगर नहीं, राजा का ही होगा।

शा वुजिंग ने कहा — भाई की आँखें तेज़ हैं, पर नाम क्या है यह नगर?

—कोई पट्टिका नहीं लगी, अंदर जाकर पूछना होगा।

तांग सान्ज़ांग ने घोड़ा बढ़ाया, थोड़ी देर में नगर-द्वार पर पहुँचे। घोड़े से उतरकर पुल पार किया, दरवाज़े के अंदर गए।

छः बाज़ार, तीन चौराहे — व्यापार की चहल-पहल; वस्त्र और आभूषण — वैभव और सजावट।

चलते-चलते अचानक एक दृश्य — दस-बारह भिक्षु, हर एक के गले में बेड़ियाँ, दरवाज़े-दरवाज़े भिक्षा माँगते, फटे-पुराने कपड़े।

तांग सान्ज़ांग ने देखकर आह भरी — खरगोश मरा तो लोमड़ी दुखी, एक जाति की पीड़ा।

बोले — वुकोंग, जाओ, पूछो — ये भिक्षु किस मठ के हैं, इन्हें क्यों इस तरह दण्ड दिया गया?

सुन वुकोंग आगे गए — भाइयो, तुम किस मठ के हो? बेड़ियाँ क्यों?

सब भिक्षु घुटने टेककर बोले — महासंत! हम स्वर्णिम-प्रकाश मठ के हैं, हम पर झूठा दोष है।

—स्वर्णिम-प्रकाश मठ कहाँ है?

—मोड़ मुड़ते ही दिखेगा।

सुन वुकोंग उन्हें तांग सान्ज़ांग के पास ले आए। भिक्षुओं ने बताया — मठ क्यों गए, पूछो।

भिक्षुओं ने कहा — हम वहाँ बात नहीं कर सकते, आप मठ चलें, वहाँ सब बताएँगे।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — चलो मठ में।

सब साथ मठ के सामने पहुँचे। द्वार पर सात बड़े अक्षरों में लिखा था: "राजाज्ञा-स्थापित राष्ट्र-रक्षक स्वर्णिम-प्रकाश मठ।"

सब अंदर गए:

पुराने मंदिर में दीपक-धूप ठंडी, खाली बरामदे में पत्ते उड़ रहे। ऊँची हज़ार फ़ुट की मीनार, कुछ देवदार पेड़। ज़मीन पर गिरे फूल, कोई आगंतुक नहीं। मकड़ी के जाले छत को ढके। खाली ढोल, बेकार घण्टा, चित्रों पर धूल, मूर्तियाँ धुँधली। व्याख्यान-आसन वीरान, भिक्षु नहीं, ध्यान-कक्ष शांत, बस पक्षी आते। दुख और एकाकीपन, अनंत पीड़ा। बुद्ध के सामने धूपदान है, पर राख ठंडी।

तांग सान्ज़ांग का हृदय भारी हो गया, आँखों में आँसू।

बेड़ियों वाले भिक्षुओं ने मुख्य मंदिर का द्वार खोला, तांग सान्ज़ांग को ऊपर जाने दिया। गुरुजी ने धूप चढ़ाई, तीन बार दाँत किटकिटाए।

पीछे जाकर देखा — अंदरूनी कक्ष के खम्बों पर और छः-सात छोटे भिक्षु बँधे थे। तांग सान्ज़ांग से देखा नहीं गया।

कक्ष में सब भिक्षु साष्टांग दण्डवत् करके बोले — आप पूर्वी महान तांग देश से आए हैं?

सुन वुकोंग ने हँसकर कहा — तुम लोगों के पास क्या भविष्य-ज्ञान है? हम वही हैं। पहचाना कैसे?

—महासंत, हमारे पास कोई ज्ञान नहीं। हम दुख में, कष्ट में बड़े परेशान थे, बस आसमान और ज़मीन को पुकारते थे। शायद देवताओं को जगाया। कल रात हम सबको सपना आया — पूर्वी तांग देश का एक पवित्र भिक्षु आएगा, हमारी जान बचाएगा, यह दुख दूर होगा। आज आप जैसे असाधारण लोग देखे, इसीलिए पहचान लिया।

तांग सान्ज़ांग ने सुनकर प्रसन्नता से पूछा — यह कौन सी जगह है? दुख क्या है?

भिक्षुओं ने घुटने टेककर बताया — यह नगर यज्ञ-राज्य कहलाता है, पश्चिम का बड़ा राज्य। चार पड़ोसी देश थे जो कर देते थे — दक्षिण में चन्द्रमा-देश, उत्तर में हाओ-चांग देश , पूर्व में पश्चिम-लिआंग देश , पश्चिम में बेन-बो देश । वे सुंदर मणि, मोती, रानियाँ, घोड़े भेंट करते — बिना युद्ध के वे यहाँ को श्रेष्ठ राज्य मानते थे।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — तो फिर यह दुख क्यों?

—तीन साल पहले भाद्रपद की पहली रात को रक्त-वर्षा हुई। सुबह हर घर में भय, हर घर में शोक। दरबारियों ने राजा को बताया। पता नहीं, स्वर्ग ने क्या अपराध देखा। पुजारी और भिक्षु बुलाए गए, यज्ञ और पाठ हुए। तब पता चला कि हमारे मठ की सोने की मीनार के रत्न चोरी हो गए। दो साल से पड़ोसी देशों ने कर देना बंद कर दिया।

राजा को लगा — मठ के भिक्षुओं ने मीनार के रत्न चुराए, इसीलिए प्रकाश नहीं। बिना जाँच के ही राजा ने हमें पकड़वाया। हम पर हज़ार तरह के अत्याचार हुए। हमने रत्न नहीं चुराए। पिछली दो पीढ़ी के भिक्षु पीटे जाते-जाते मर गए। अब हम तीसरी पीढ़ी हैं। हे महासंत! आप दयालु हैं, हमारी सहायता करें।

तांग सान्ज़ांग ने सुनकर सिर हिलाया — यह मामला अँधेरे में है। एक तो राजा की नीति गलत है, दूसरा तुम्हारी भी विपदा है। रक्त-वर्षा हुई, मीनार अपवित्र हुई — उस समय राजा को सूचित क्यों नहीं किया?

भिक्षुओं ने कहा — हम साधारण मनुष्य, स्वर्ग की इच्छा नहीं जानते। पहले की पीढ़ियाँ भी नहीं जान पाईं।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — वुकोंग, अभी कितना समय हुआ?

—लगभग शाम के चार बजे।

—मैं राजा के दरबार में जाना चाहता हूँ, पर इन भिक्षुओं का मामला अस्पष्ट है। मैं यात्रा से पहले शपथ लेकर आया था — जो भी मठ मिले, दीपक जलाऊँगा; बुद्ध मिले, झुकूँगा; मीनार मिले, साफ़ करूँगा। आज यहाँ पीड़ित भिक्षु मिले, मीनार के कारण ही यह संकट है। एक नई झाड़ू लाओ, मैं स्नान करके मीनार साफ़ करूँगा। इस अशुद्धि का कारण ढूँढूँगा, रोशनी क्यों बंद हुई — यह देखूँगा। फिर राजा के सामने सत्य बताऊँगा।

बेड़ियों वाले भिक्षुओं ने सुना। रसोई से चाकू लाकर झू बाजिए को दिया — खम्बों पर बँधे छोटे भिक्षुओं को मुक्त करो, वे भोजन बनाएँगे।

झू बाजिए ने हँसकर कहा — ताला खोलना कठिन नहीं, चाकू की ज़रूरत नहीं। वह मुँह वाले महासंत हैं, वे ताला खोलने में माहिर हैं।

सुन वुकोंग ने आगे जाकर ताला-खोलने का जादू किया, हाथ फेरा — सब ताले खुल गए। छोटे भिक्षु रसोई की ओर दौड़े, बर्तन साफ़ किए, भोजन बनाया।

तांग सान्ज़ांग और शिष्यों ने भोजन किया। धीरे-धीरे शाम हो गई।

बेड़ियों वाले भिक्षु दो झाड़ू लाए। तांग सान्ज़ांग प्रसन्न हुए।

एक छोटा भिक्षु दीपक लेकर आया — स्नान का निमंत्रण।

आसमान में तारे और चाँद चमके। मीनारों से घण्टों की आवाज़ें आईं।

तांग सान्ज़ांग ने स्नान के बाद छोटे वस्त्र पहने, कमर-बंध बाँधा, नरम जूते पहने, झाड़ू हाथ में ली। भिक्षुओं से कहा — तुम सो जाओ, मैं मीनार साफ़ करने जाता हूँ।

सुन वुकोंग ने कहा — मीनार पर रक्त-वर्षा की गंदगी है, लम्बे समय से रोशनी नहीं, हो सकता है कोई बुरी चीज़ हो। एक तो रात है और ठंड है, साथी भी नहीं। मैं आपके साथ चलता हूँ।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — बहुत अच्छा।

दोनों झाड़ू लेकर मुख्य मंदिर में पहुँचे, शीशे का दीपक जलाया, धूप चढ़ाई। बुद्ध को साष्टांग कर बोले — शिष्य चेन ह्वेनज़ांग पूर्वी तांग से बुद्ध के दर्शन के लिए पश्चिम जाता है। आज यज्ञ-राज्य के स्वर्णिम-प्रकाश मठ में पहुँचा। भिक्षुओं ने बताया — मीनार अपवित्र हुई, रत्न चोरी हुए, राजा ने भिक्षुओं पर दोष लगाया। शिष्य पूरी श्रद्धा से मीनार साफ़ करेगा, बुद्ध की शक्ति से शीघ्र सत्य प्रकट हो, भिक्षुओं पर से दोष हटे।

प्रार्थना के बाद सुन वुकोंग के साथ मीनार का द्वार खोला, नीचे से ऊपर की ओर साफ़ करने लगे।

यह मीनार:

पाँच रंगों की मीनार आकाश छूती, हज़ार सोने की शिखर। सीढ़ियाँ घुमावदार, जैसे सुरंग में; दरवाज़े खुलते, जैसे पिंजरे से बाहर। रत्न-कलश चाँद की छाया में, सोने की घण्टियाँ समुद्री हवा में गुनगुनाती। खाली मेहराबें, बंद मेहराबें; ऊँचे कोने में बादल। परत-दर-परत द्वार पर शीशे के दीपक — धूल में बुझे; पग-पग पर सफ़ेद पत्थर की रेलिंग — गंदगी और कीड़े। मीनार के बीच बुद्ध-आसन पर धूप बंद; खिड़की के बाहर, देवता के आगे मकड़ी का जाल। धूपदान में चूहे की बीट, दीपक में तेल नहीं। सिर्फ़ इसलिए कि बीच का रत्न खो गया, भिक्षुओं की जान गई। तांग सान्ज़ांग ने मन लगाकर मीनार साफ़ की, ताकि पुरानी रोशनी लौट सके।

तांग सान्ज़ांग ने एक परत साफ़ की, फिर अगली। इस तरह सातवीं परत पर आधी रात हो गई। गुरुजी थकने लगे।

सुन वुकोंग ने कहा — थक गए तो बैठो, मैं साफ़ करता हूँ।

—मीनार में कितनी परतें हैं?

—शायद तेरह।

तांग सान्ज़ांग ने थकान में भी कहा — ज़रूर साफ़ करूँगा, यह मेरी शपथ है। फिर तीन परतें साफ़ कीं। कमर-पीठ दर्द से दसवीं परत पर बैठ गए — वुकोंग, तुम बाकी तीन परतें साफ़ करो।

सुन वुकोंग ने उत्साह के साथ ऊपर चढ़े। ग्यारहवीं परत में प्रवेश किया, बारहवीं पर पहुँचे। साफ़ करते हुए — अचानक मीनार की चोटी से आवाज़ें सुनीं।

—अजीब! इस आधी रात में कोई ऊपर बात कर रहा है? ज़रूर कोई दुष्ट है। देखते हैं।

चालाक बन्दर ने हौले से झाड़ू बगल में दबाई, वस्त्र ठीक किए, आगे के दरवाज़े से बाहर निकले, बादल पर खड़े होकर देखा।

तेरहवीं परत के अंदर दो राक्षस बैठे थे। सामने एक थाली में व्यंजन, एक कटोरा, एक सुराही — पाँसे खेल रहे थे, शराब पी रहे थे।

सुन वुकोंग ने जादुई शक्ति का उपयोग किया, झाड़ू फेंकी, स्वर्णदण्ड निकाली, मीनार का द्वार रोककर चिल्लाए — राक्षसो! मीनार के रत्न चुराने वाले तुम्हीं हो!

दोनों राक्षस घबराए — उठकर सुराही-कटोरा फेंककर मारने लगे। सुन वुकोंग ने लोहे की छड़ी से रोककर कहा — यदि मार डाला, तो गवाह कौन देगा? हौले से दबाते हुए दोनों को दीवार से सटाया — हिल नहीं सकते। मुँह से बोले — जान चाहते हो तो सब सच बताओ!

सुन वुकोंग ने पकड़ने का जादू किया, एक हाथ से दोनों को दबोचकर दसवीं परत पर ले आए और बोले — गुरुजी, रत्न चुराने वाले मिल गए।

तांग सान्ज़ांग झपकी ले रहे थे, यह सुनकर खुश हुए — कहाँ से पकड़े?

सुन वुकोंग ने राक्षसों को सामने घुटने टिकवाए — वे मीनार की चोटी पर पाँसे खेल रहे, शराब पी रहे थे। आवाज़ सुनाई दी तो देखने गया। इन्हें मार नहीं सकता, नहीं तो गवाह नहीं। बस दबाकर ले आया। गुरुजी बयान लीजिए — ये कौन से राक्षस हैं, रत्न कहाँ रखे हैं।

वे राक्षस थर-थर काँपते, "जान बचाओ" पुकारते, सच बोले — हम दोनों अव्यवस्थित-पत्थर पर्वत की नीलकमल-झील के दस हज़ार पवित्र नाग-राजा के दूत हैं। नाग-राजा की एक बेटी है — दस हज़ार पवित्र राजकुमारी। उनका विवाह नौ-सिर वाले दामाद से हुआ जिसकी शक्ति असीम है। तीन साल पहले वे दोनों यहाँ आए, बड़ी शक्ति दिखाई, एक बार रक्त-वर्षा करके मीनार के रत्न चुरा लिए। राजकुमारी महल के ऊपर चली गई, स्वर्ग की देवी के नौ-पत्ती जीवन-शक्ति जड़ी-बूटी भी चुरा लाई। उसे झील के तल में रखकर रत्नों को गर्मजोशी दे रहे हैं — रात-दिन रोशनी बनी रहती है। हाल ही में सुना कि सुन वुकोंग पश्चिम ग्रन्थ लेने जा रहे हैं, राह में लोगों की गलतियाँ ढूँढते हैं, इसलिए हमें यहाँ खोज-खबर रखने के लिए भेजा गया था।

सुन वुकोंग यह सुनकर मुस्कुराए — वह दुष्ट! पिछली बार वृषभ राजा से भोज में मिला था, अब समझ आया — वह इन दुष्टों से मेल-मिलाप करता था।

बात अभी चल ही रही थी कि झू बाजिए और दो-तीन छोटे भिक्षु दीपक लेकर ऊपर आए — गुरुजी, मीनार साफ़ करने की बजाय यहाँ बात क्यों कर रहे हो?

सुन वुकोंग ने कहा — भाई, तुम ठीक समय पर आए। मीनार के रत्न इन्होंने ही चुराए। इन्हें खींचकर पकड़ लिया।

झू बाजिए ने पूछा — नाम क्या है? कौन से राक्षस?

—एक का नाम बेन-बो-ए-बा, दूसरे का बा-बो-ए-बेन। एक काँटा-मछली राक्षस, दूसरा काली मछली राक्षस।

झू बाजिए ने कुदाल उठाई — पकड़ा गया तो मारते क्यों नहीं?

—मारेंगे नहीं। ज़िंदा रखना है, राजा को सबूत देना है, असली चोर ढूँढने जाना है।

झू बाजिए ने कुदाल रोकी। एक-एक करके दोनों को नीचे ले आए।

एक छोटे भिक्षु ने भागकर सबको खुशखबरी दी — सब ठीक हो गया! रत्न चुराने वाले राक्षस महासंत ने पकड़ लिए।

सुन वुकोंग ने कहा — लोहे की ज़ंजीरें लाओ, इन्हें बाँधो। मेरे आने तक देखते रहो, मैं सोने जाता हूँ। कल सुबह और देखेंगे।

भिक्षु सब रात भर पहरा देते रहे। तांग सान्ज़ांग और शिष्य सो गए।

भोर हुई। तांग सान्ज़ांग ने कहा — वुकोंग, मैं चलता दरबार में, परमिट बदलवाने।

गुरुजी ने रेशमी बौद्ध-चादर पहनी, बौद्ध टोपी लगाई, सब कुछ ठीक से पहनकर आगे बढ़े। सुन वुकोंग ने भी बाघ-चर्म की पट्टी ठीक से बाँधी, वस्त्र-चादर ठीक किया, परमिट लेकर साथ चले।

झू बाजिए ने कहा — दोनों राक्षसों को भी क्यों नहीं ले चलते?

—हम पहले अर्ज़ी दे देते हैं, फिर सरकारी आदेश से इन्हें बुलाया जाएगा।

राजमहल के सामने पहुँचे। तांग सान्ज़ांग ने द्वार-रक्षक से कहा — कृपया सूचित करें: पूर्वी तांग देश से पश्चिम ग्रन्थ लेने जाने वाले यात्री-भिक्षु हैं, परमिट बदलवाना चाहते हैं।

रक्षक ने सूचना दी। राजा ने बुलावा भेजा।

दरबार में आते ही सब मंत्री और अधिकारी सुन वुकोंग को देखकर डर गए। कोई बोला — यह बन्दर भिक्षु है; कोई बोला — बिजली के मुँह वाला भिक्षु। सब सहमे हुए, नज़रें नहीं उठाते।

तांग सान्ज़ांग ने नृत्य-मुद्रा में प्रणाम किया।

महासंत ने हाथ जोड़कर तिरछे खड़े होकर बिल्कुल प्रणाम नहीं किया।

तांग सान्ज़ांग ने निवेदन किया — मैं दक्षिण-महादेश पूर्वी तांग राज्य का भिक्षु हूँ, पश्चिम के महाबोधि मठ में बुद्ध से ग्रन्थ लेने जा रहा हूँ। आपके राज्य से गुज़रने का परमिट निवेदन है।

राजा ने सुनकर प्रसन्नता से तांग सान्ज़ांग को सोने के आसन पर बैठाया। परमिट देखकर बोले — तांग राजा ने रोग में भी उच्च भिक्षु को इतनी दूर भेजा; हमारे यहाँ के भिक्षु बस चोरी करते हैं, देश का नाश करते हैं।

तांग सान्ज़ांग ने हाथ जोड़कर कहा — किस बात से नाश?

—हमारा यह राज्य पश्चिम का बड़ा देश है, चार पड़ोसी देश कर देते थे, क्योंकि स्वर्णिम-प्रकाश मठ की मीनार से रात को रोशनी उठती थी। तीन साल पहले मठ के भिक्षुओं ने मीनार के रत्न चुराए — रोशनी बंद, पड़ोसी देश कर देना बंद। मुझे बड़ा दुख है।

तांग सान्ज़ांग ने हँसकर कहा — महाराज, "एक पग का अंतर, हज़ार ली का भटकाव।" कल रात मठ पहुँचा, बेड़ियों में बंधे भिक्षु मिले। मठ में जाँच की — यह मठ के भिक्षुओं की गलती नहीं है। रात को मीनार साफ़ करते हुए असली चोर पकड़ लिए।

राजा बहुत खुश हुए — वे चोर कहाँ हैं?

—मेरे छोटे शिष्य ने उन्हें मठ में बाँध रखा है।

राजा ने तुरंत आदेश दिया — राजदूत जाएँ और मठ से चोरों को पकड़ लाएँ।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — महाराज, राजदूत भेजने से काम नहीं बनेगा, मेरे शिष्य को जाना होगा।

राजा ने देखा — वह पाषाण-मुख महासंत कौन है?

तांग सान्ज़ांग ने इशारा किया — वह जो सामने खड़ा है।

राजा डर गए — इतने सुन्दर गुरु, इतने विचित्र शिष्य!

सुन महासंत ने ज़ोर से कहा — महाराज! "मनुष्य को चेहरे से नहीं परखा जाता, समुद्र को करछुल से नहीं नापा जाता।" सुन्दर चेहरा चाहिए तो चोर कैसे पकड़ेंगे?

राजा ने मुस्कुराकर कहा — पवित्र भिक्षु सही कहते हैं। हमारे यहाँ रूप नहीं, काम की जरूरत है।

राजा ने सरकारी रथ, पीला छत्र और राजदूतों की टुकड़ी भेजकर सुन वुकोंग को आठ-आठ लोगों की पालकी में बैठाकर आगे-आगे बाजे बजाते हुए स्वर्णिम-प्रकाश मठ भेजा।

इस तरह पूरे नगर के लोग जागे — सभी पवित्र भिक्षु और उन राक्षसों को देखने आए।

झू बाजिए और शा वुजिंग ने बाजे और हाँक सुनी — राजा के अधिकारी हैं, जल्दी निकले। देखा — सुन वुकोंग पालकी में बैठे आए।

झू बाजिए ने हँसते हुए कहा — भाई, आप तो अपने असली पद पर आ गए।

सुन वुकोंग ने उतरकर झू बाजिए का हाथ थामा — कौन सा असली पद?

—आप पीला छत्र लेकर आठ लोगों की पालकी में — यह तो बन्दर-राजा के लायक ही था?

—मज़ाक बंद करो।

दोनों राक्षसों को खींचकर राजदरबार में पेश किया। शा वुजिंग ने कहा — भाई, मुझे भी साथ ले चलो।

—तुम यहाँ सामान और घोड़ा देखो।

बेड़ियों वाले भिक्षुओं ने कहा — हम देखेंगे, आप भी जाइए।

सुन वुकोंग ने मान लिया — ठीक है, चलो।

झू बाजिए एक राक्षस को खींचे, शा वुजिंग दूसरे को। सुन वुकोंग फिर पालकी में बैठ गए, बाजे बजे।

राजमहल के सामने पहुँचे — ये दोनों राक्षस लाए हैं।

राजा पाषाण-आसन से उतर आए, तांग सान्ज़ांग और सब मंत्रियों के साथ देखा।

एक का मुँह बाहर निकला हुआ, नुकीले दाँत, काला कवच; दूसरा चिकना, बड़ा पेट, चौड़ा मुँह, लम्बी मूँछें।

हालाँकि पैर हैं, पर वे मनुष्य रूप में बदले हुए थे।

राजा ने पूछा — तुम कहाँ के राक्षस हो? कितने साल से हमारे राज्य में घुसे हो? कितने साल पहले रत्न चुराए? कुल कितने साथी हैं? सब सच-सच बताओ।

दोनों राक्षस घुटनों पर — गरदन पर खून के निशान, पर दर्द नहीं।

बोले — तीन साल से अधिक पहले, सातवें महीने की पहली तारीख, हमारे दस हज़ार पवित्र नाग-राजा ने कई रिश्तेदारों के साथ इस राज्य के दक्षिण-पूर्व में, यहाँ से सौ ली दूर, रहते थे। झील का नाम नीलकमल, पहाड़ का नाम अव्यवस्थित-पत्थर। राजा की एक खूबसूरत बेटी — दस हज़ार पवित्र राजकुमारी। एक दामाद मिला — नौ-सिर दामाद, असीम शक्ति। वह नाग-राजा के साथ मिलकर चोरी करने आया। पहले रक्त-वर्षा की, फिर मौका देखकर मीनार के अवशेष-मणि चुरा लिए। राजकुमारी महल में घुसी, महारानी की नौ-पत्ती जीवन-शक्ति जड़ी-बूटी चुरा लाई। अब मणि को झील के तल में जड़ी-बूटी की शक्ति से पाल रहे हैं। रात में भी दिन जैसी रोशनी। हाल में सुना — सुन वुकोंग पश्चिम आ रहे हैं, इसलिए हमें खोजी के रूप में भेजा।

सुन वुकोंग ने यह सुनकर मन ही मन कहा — ओह! वृषभ राजा के साथ उस झील में मदिरापान करने वाले ये ही थे।

राजा ने पूछा — अपना नाम क्यों नहीं बताया?

—एक का नाम बेन-बो-ए-बा है, दूसरे का बा-बो-ए-बेन। एक काँटा-मछली राक्षस, दूसरा काली मछली राक्षस।

राजा ने आदेश दिया — जेल में बंद करो। तुरन्त भोज दो — स्वर्णिम-प्रकाश मठ के भिक्षुओं की बेड़ियाँ खोलो। शाही-भवन में पर्व मनाओ, भोज दो — इन पवित्र भिक्षुओं का धन्यवाद।

शाही भोज लगा। राजा ने तांग सान्ज़ांग का नाम पूछा।

—मेरा वास्तविक नाम चेन, धर्म-नाम ह्वेनज़ांग, तांग राजा ने तांग नाम दिया, उपाधि त्रिपिटक।

—शिष्यों के नाम?

—मेरे तीनों शिष्यों के उपनाम नहीं। पहले का नाम सुन वुकोंग, दूसरे का झू वुनेंग, तीसरे का शा वुजिंग — गुआनयिन बोधिसत्त्व ने ये नाम दिए। जब उन्होंने मुझे गुरु माना, तब मैंने वुकोंग को यात्री, वुनेंग को आठ-वर्जनाधारी (बाजिए), वुजिंग को भिक्षु पुकारा।

राजा ने सुनकर तांग सान्ज़ांग को ऊपर बैठाया। सुन वुकोंग बाईं तरफ, झू बाजिए और शा वुजिंग दाईं तरफ। सब शाकाहारी फल और सब्जी, चाय और भोजन। राजा के सामने एक मांसाहारी पंक्ति, नीचे सौ से अधिक मंत्रियों की पंक्तियाँ।

झू बाजिए ने मुँह खोला, खाना शुरू किया। सच में बाघ की तरह निगलता, भेड़िये की तरह भक्षण करता। एक पंक्ति का सब खाना खत्म। थोड़ी देर में और आया, वह भी साफ़। दूसरे दौर की शराब भी आई।

भोज दोपहर तक चला।

तांग सान्ज़ांग ने धन्यवाद किया। राजा ने रोककर कहा — यह भोज आपके राक्षस पकड़ने का पुरस्कार है। शीघ्र ही असली चोर पकड़ने और मीनार का रत्न वापस लाने की योजना बनाएँ।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — असली चोर पकड़ने के लिए अभी से जाएँगे।

राजा ने फिर भोज देने की कोशिश की। तांग सान्ज़ांग ने मना किया।

सुन वुकोंग ने राजा को प्रणाम किया। राजा ने शराब का प्याला उठाया — कौन से पवित्र भिक्षु जाएँगे?

तांग सान्ज़ांग ने कहा — बड़े शिष्य सुन वुकोंग।

झू बाजिए ने न रुककर जोर से कहा — इतना अच्छा खाना-पीना छोड़कर राक्षस पकड़ने जाएँगे, मैं भी साथ चलूँगा।

राजा ने कितनी सेना चाहिए, पूछा।

झू बाजिए ने हँसकर कहा — सेना की ज़रूरत नहीं, समय की भी ज़रूरत नहीं। अभी जाते हैं।

तांग सान्ज़ांग प्रसन्न हुए — बाजिए बड़ा मेहनती हो गया!

सुन वुकोंग ने कहा — शा वुजिंग गुरुजी के साथ रहे। हम दोनों जाते हैं।

राजा ने पूछा — बिना सेना के, बिना हथियार के?

झू बाजिए ने हँसकर कहा — हमारे अपने हथियार हैं।

राजा ने विदाई के लिए बड़ा प्याला उठाया।

सुन वुकोंग ने कहा — जेल में बंद दोनों छोटे राक्षसों को मेरे साथ लाओ, रास्ता दिखाने के काम आएँगे।

राजा ने आदेश दिया, दोनों राक्षस लाए गए। दोनों ने उन्हें पकड़कर हवा में उड़ लिए — सीधे दक्षिण-पूर्व दिशा में।

इस प्रकार: राजा-मंत्री एक ही नज़र में समझ गए — ये सचमुच पवित्र भिक्षु हैं। अगले अध्याय में आगे की कहानी।