अध्याय ६० — वृषभ-राक्षस राजा युद्ध रोककर भोज में गया, सुन वुकोंग ने दूसरी बार केले-पत्र पंखा माँगा
सुन वुकोंग वृषभ-राक्षस राजा से पंखा माँगता है; दोनों में युद्ध होता है; सुन वुकोंग राजा का रूप धरकर राजकुमारी से असली पंखा ले लेता है।
भूमि-देवता ने कहा—
—महाशक्तिशाली राजा अर्थात् वृषभ-राक्षस राजा।
—तो यह पर्वत उसी राजा की आग का है?
—नहीं, नहीं। सुनो — पाँच सौ साल पहले जब महासंत ने स्वर्ग में उत्पात मचाया था और परम वृद्ध देव की भट्टी में पड़े थे, तब भट्टी पलटी — कुछ जलती हुई ईंटें यहाँ गिरीं और अग्नि पर्वत बन गया। मैं वही भट्टी का रक्षक था, परम वृद्ध देव ने मुझे यहाँ भेज दिया।
झू बाजिए ने हँसकर कहा— तो आप भी डाओ-तपस्वी से भूमि-देवता बने!
—वृषभ-राक्षस राजा अभी उस जगह नहीं है। वह अर्जित-पत्थर पर्वत के मेघ-गुफा में है। एक लोमड़ी-राजा की बेटी — जेड-मुख राजकुमारी — उसे पाँच करोड़ की सम्पत्ति देकर पति के रूप में ले गई। दो साल से लोह-पंखा राजकुमारी को छोड़ा है। यदि आप वृषभ-राक्षस राजा को मना सकें, तो असली पंखा मिलेगा।
—कहाँ है वह पर्वत?
—दक्षिण में। तीन हज़ार ली।
सुन वुकोंग ने शा वुजिंग और झू बाजिए को गुरुजी की रक्षा का आदेश दिया और उड़ा।
आधे घण्टे में अर्जित-पत्थर पर्वत।
पर्वत की चोटी पर खड़े होकर देखा:
ऊँचा नहीं, पर चोटी नीले आसमान को छूती। बड़ा नहीं, पर जड़ें पाताल में उतरती। रंग-बिरंगे फूल, सुगन्धित फल। लाल लताएँ, बैंगनी बाँस। चारों ऋतुओं में रूप अटल, हज़ारों साल एक जैसी हरियाली।
तलाशते हुए जा रहे थे कि एक युवती हाथ में सुगन्धी-फूल लिये आई।
सुन वुकोंग एक पत्थर के पीछे छिप गया। उस युवती का रूप:
देश-विजयिनी सुन्दरता, कमल-क़दम। राजमहल की सुन्दरी जैसा मुख। ऊँची जूड़ी में नीलम की पिनें। रेशमी स्कर्ट, नाजुक हाथ।
—और युवती! कहाँ जा रही हो?
वह चौंकी — एक भयंकर मुँह वाला भिक्षु।
—तुम कहाँ से आये?
सुन वुकोंग ने सोचा — यदि सच्ची बात बताई तो वह राजा को बचाने दौड़ेगी।
—मैं पन्ना-बादल पर्वत से आया हूँ। लोह-पंखा राजकुमारी ने भेजा है — वृषभ-राक्षस राजा को बुलाने।
युवती के कान गर्म हो गये—
—वह बेशर्म! तुम्हें भी अतिक्रमण का साहस हुआ? मेरे पिता की सम्पत्ति पर वह घर कर बैठी — और अब बुलाने भेजा? रुको!
वह दौड़ी। सुन वुकोंग ने दंड निकाला और चिल्लाया—
—रुको तुम! बाप के पैसे पर पति खरीदने में शर्म नहीं?
युवती डरकर भाग गई और मेघ-गुफा में घुस गई।
सुन वुकोंग रुककर देखा — यही मेघ-गुफा है:
घने जंगल, नुकीली चट्टानें। लताओं की छाँव, गिरते फूल। बहता झरना बाँस में बोलता। फीनिक्स और सारस की आवाज़। स्वर्ग-देश जैसी सुन्दरता।
भीतर युवती रोते हुए वृषभ-राक्षस राजा की गोद में गई—
—कौन है वह उद्दंड भिक्षु? मेरी माँ ने उसे भेजा और उसने मुझे धमकाया।
राजा ने उसे शान्त किया और बाहर आया।
पाँच सौ साल में राजा का रूप बदल गया था:
सिर पर चाँदी-जैसा लोहे का शिरस्त्राण। देह पर रेशम-कढ़ाई का सुनहरा कवच। आँखें चमकती दर्पण जैसी, भौंहें लाल इन्द्रधनुष जैसी। मुख जैसे रक्त का पात्र, दाँत ताँबे की पट्टियाँ। गर्जना से पर्वत-देवता काँपे। चार सागरों में प्रसिद्ध — मिश्रित-जगत महाशक्ति।
—तुम वही सुन वुकोंग हो?
—हाँ, बड़े भाई! बहुत दिन हुए।
—मैंने सुना था — स्वर्ग में उत्पात किया, फिर तांग के भिक्षु की रक्षा करने लगे। पर मेरे बेटे को क्या किया?
—भाई! उसे मैंने नहीं हराया। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने। अब वह सुवर्ण-बालक है — तुम्हारे से ऊँचे पद पर, शाश्वत सुख में।
—और मेरी पत्नी पर धोखा दिया? और यहाँ आकर मेरी प्रिया को डराया?
—मैं बस रास्ता पूछ रहा था। वह जेड-मुख राजकुमारी को नहीं जानता था। जब पता चला — गलती हो गई।
—ठीक है, पुरानी मित्रता के नाते छोड़ता हूँ।
—भाई! एक और बात — अग्नि पर्वत पर गुरुजी नहीं पार कर पा रहे। भाभी के पास केले-पत्र पंखा है। बस एक बार उधार दे दो।
वृषभ-राक्षस राजा ने क्रोध से दाँत पीसे—
—तूने मेरी पत्नी को धोखा दिया। मेरी प्रिया को डराया। अब यहाँ आकर पंखा माँग रहा है? ऊपर आ, ले मेरा प्रहार।
दोनों में जोरदार युद्ध:
लाठी और लाठी, बात मित्रता की — पर व्यवहार शत्रुता का। एक कहता — बेटे का दोष मत मानो। दूसरा कहता — पत्नी और प्रिया दोनों से अन्याय किया। आकाश में उड़कर, पाँच रंगों की रोशनी में। सौ से अधिक दौर — कोई हार-जीत नहीं।
तभी पर्वत के ऊपर से आवाज़ आई—
—राजा साहब! जल्दी आइये — भोज तैयार है!
वृषभ-राक्षस राजा ने लाठी से सुन वुकोंग की लाठी को थामकर कहा—
—रुक! मैं एक मित्र के यहाँ जाकर आता हूँ।
वह गुफा में घुसा, जेड-मुख राजकुमारी से मिला और निकला। एक काले रंग के बैल-नेत्र वाले जानवर — जल-भेदन स्वर्ण-नेत्र जानवर — पर सवार हुआ और उत्तर-पश्चिम की ओर उड़ा।
सुन वुकोंग ने उसे देखा — "यह किसके यहाँ भोज में जा रहा है? पीछे चलता हूँ।"
उसने एक हवा का रूप धारण किया और राजा के पीछे उड़ा।
एक पर्वत में राजा गायब हो गया। सुन वुकोंग ने असली रूप धरकर पर्वत में देखा — एक साफ गहरा तालाब। किनारे पर पत्थर की तख्ती पर लिखा था — "अव्यवस्थित-पत्थर पर्वत, नीली-लहर तालाब।"
सुन वुकोंग ने सोचा — वृषभ-राक्षस राजा पानी में गया है। मैं भी जाता हूँ।
उसने एक केकड़े का रूप धारण किया — छत्तीस किलो वजन का। तालाब में कूदा और नीचे गया। वहाँ एक रत्न-महल था। बाहर जल-भेदन स्वर्ण-नेत्र जानवर बँधा था।
भीतर कोई पानी नहीं था। सुन वुकोंग घुसा। संगीत की आवाज़ें। वहाँ एक भव्य दरबार था:
लाल महल, सीपी के थम्बे। सोने की छत, सफेद जेड के द्वार। मूँगे और मोतियों की सज्जा। छोटी मछली, बड़ी मछलियाँ — सब सेवा में। कुम्भीर ढोल बजाता, कछुआ बाँसुरी। ड्रैगन-पुत्र, ड्रैगन-पुत्री, ड्रैगन-वधू — सब।
ऊपर वृषभ-राक्षस राजा बैठा था। एक बूढ़ा ड्रैगन-राजा मेज़बान था।
सुन वुकोंग का प्रवेश देखकर वृद्ध ड्रैगन ने कहा—
—उस जंगली केकड़े को पकड़ो!
पकड़ा गया।
—कहाँ से आये हो?
सुन वुकोंग ने एक नकली परिचय दिया — झील में रहने वाला सरल केकड़ा।
सभी ने हँसकर कहा— उसे छोड़ दो, वह बेचारा है।
सुन वुकोंग को बाहर जाने को कहा गया।
पालकी के बगल में वृषभ-राक्षस राजा का जल-नेत्र जानवर था। सुन वुकोंग ने सोचा — राजा यहाँ देर तक रहेगा। यदि जानवर चुराऊँ, वृषभ-राक्षस राजा का रूप धरूँ और भाभी से पंखा माँगूँ — तो काम बन जाएगा।
असली रूप धरा, रस्सी खोली, जानवर पर सवार हुआ। बाहर निकलकर वृषभ-राक्षस राजा का रूप धारण किया और पन्ना-बादल पर्वत की ओर उड़ा।
गुफा के बाहर आकर बोला—
—दरवाज़ा खोलो।
बालिकाओं ने पहचाना — राजा आये!
—राजकुमारी! राजा आये।
लोह-पंखा राजकुमारी अपने बालों को व्यवस्थित करते हुए दौड़कर आईं—
—राजा! कहाँ रहे इतने दिन?
—काम में व्यस्त था। वापस आ गया।
—और नई दुल्हन?
—घर-गृहस्थी के काम के लिए थी।
—हाँ हाँ। बहुत दिनों से सुन वुकोंग का डर था — वह फिर न आये।
सुन वुकोंग ने कहा— सुन वुकोंग? वह मुझसे डरता है!
राजकुमारी ने आँखें पोंछते हुए बताया — कैसे सुन वुकोंग आया, कैसे तलवार चलाई, कैसे पेट में घुस गया और कैसे पंखा माँगा।
—और पंखा दे दिया?
—नहीं! झूठा पंखा दिया।
—असली कहाँ है?
—मेरे पास है।
राजकुमारी ने शराब का प्याला लिया—
—राजा! बहुत दिन हुए। यह घर का जल पियो।
सुन वुकोंग ने हाथ मिलाया। राजकुमारी ने प्याला बढ़ाया। दोनों बातें करते रहे, शराब पीते रहे।
थोड़ी देर में राजकुमारी नशे में आई। उसने सुन वुकोंग के साथ सटकर बैठना शुरू किया:
मुख लाल आड़ू जैसा, देह नाजुक विलो जैसी। बातें बहुती-सी, नाजुक-नाजुक। प्याला तुमने एक घूँट, मैंने एक घूँट।
सुन वुकोंग ने उस पल का फायदा उठाया—
—भाभी! असली पंखा कहाँ रखा है? कहीं सुन वुकोंग फिर न आये!
राजकुमारी ने हँसकर मुँह से एक आम के पत्ते जितनी छोटी चीज़ थूकी—
—यह देखो।
—इतने छोटे से आठ सौ ली की आग बुझेगी?
—अरे! तुम्हें तरीका भूल गया? बाएँ हाथ के अँगूठे से सातवीं लाल धागे की लकीर दबाओ और कहो — "श्वास-भीतर, श्वास-बाहर" — एक हाथ बीस इंच लम्बा हो जाएगा। बड़ी आग भी एक बार में बुझ जाएगी।
सुन वुकोंग ने मन में याद किया। अपना चेहरा साफ किया और असली रूप आया।
—राजकुमारी! देखो — मैं तुम्हारा असली पति हूँ या नहीं?
राजकुमारी देखकर चौंकी — वह सुन वुकोंग था! मेज़-कुर्सी उलट गई।
—मेरी जान गई! मेरी जान गई!
सुन वुकोंग बाहर निकला, एक पन्ने का पत्ता मुँह से निकाला, बाएँ अँगूठे से सातवीं धागे की लकीर दबाई और कहा—
—श्वास-भीतर, श्वास-बाहर।
एक हाथ बीस इंच। उसने ध्यान से देखा — यह असली था। तीस-छह लाल धागे, ऊपर-नीचे गुँथे हुए।
लेकिन उसे केवल बड़ा करने का तरीका पता था, छोटा करने का नहीं। वह कंधे पर डालकर पुराने रास्ते से लौटा।
इधर तालाब में वृषभ-राक्षस राजा को पता चला — जल-नेत्र जानवर गायब है। अनुमान लगाया — सुन वुकोंग ही था।
वह तालाब से निकला, उड़कर पन्ना-बादल पर्वत पहुँचा। लोह-पंखा राजकुमारी रो रही थी।
—सुन वुकोंग किस ओर गया?
—उसने तुम्हारा रूप धरा और असली पंखा ले गया।
वृषभ-राक्षस राजा ने तलवारें उठाईं और अग्नि पर्वत की ओर दौड़ा।
जिस स्त्री को प्रेम से ठगा गया उसका बदला लेने वाला आया। अब असली युद्ध की शुरुआत होगी। आगे क्या होगा? अगले अध्याय में जानें।