अध्याय ५९ — तांग सान्ज़ांग का मार्ग अग्नि पर्वत पर रुका, सुन वुकोंग ने पहली बार केले-पत्र पंखा माँगा
अग्नि पर्वत का संकट; सुन वुकोंग लोह-पंखा राजकुमारी से पंखा माँगने जाता है; राजकुमारी उसे उड़ा देती है; लिंगजी बोधिसत्त्व से सहायता मिलती है।
यदि सब स्वभाव मूलतः एक हैं, तो सागर असीम है। सहस्र विचार अन्त में माया हैं। जब कार्य पूर्ण हो और पूर्णता आये, धर्म-स्वभाव उच्च हो।
मन की विविधताएँ पूर्व-पश्चिम मत भटकाएँ। मन और घोड़े को मजबूती से बाँधो। अन्दर आग जलाओ, सुनहरा सूर्य-पक्षी निकले। उज्जवल, दीप्तिमान — ड्रैगन पर सवार होकर मुक्त।
बोधिसत्त्व की आज्ञा मानकर तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग को वापस लिया। झू बाजिए और शा वुजिंग के साथ, चारों मिलकर पश्चिम की ओर चले।
ग्रीष्म बीता, शरद आई। रास्ते में अचानक गर्मी महसूस हुई। तांग सान्ज़ांग ने घोड़ा रोका—
—अभी शरद है, गर्मी क्यों?
झू बाजिए ने कहा— पश्चिम में एक राज्य है जहाँ सूर्य अस्त होता है। शाम को राजा शहर की दीवारों पर ढोल बजवाता है ताकि उसकी आवाज़ से बच्चे न डरें।
सुन वुकोंग हँसा—
—उस राज्य तक तो हम अभी बहुत दूर हैं। चलते-चलते गुरुजी बूढ़े भी हो जाएँगे।
शा वुजिंग ने कहा— शायद मौसम उलटा है — शरद में गर्मी।
तभी रास्ते के किनारे एक घर दिखा — लाल खपरैल, लाल ईंटें, लाल दरवाज़ा, लाल चौपाई — सब लाल।
तांग सान्ज़ांग ने कहा— सुन वुकोंग, वहाँ जाकर पता लगाओ।
सुन वुकोंग ने स्वयं को एक भद्र युवक की भाँति संवारा और दरवाज़े तक गया। एक बूढ़ा बाहर आया:
पीले-लाल रंग का सूती लम्बा कुर्ता, काले-हरे बाँस की टोपी, झुकी छड़ी। ताँबे जैसा चेहरा, सफेद मूँछें।
बूढ़े ने चौंककर पूछा— तुम कहाँ से आये अजीब व्यक्ति?
—हम पूर्वी तांग के भिक्षु हैं, पश्चिम की ओर जा रहे हैं। यहाँ इतनी गर्मी क्यों है?
बूढ़े ने हँसकर कहा— यह अग्नि पर्वत का क्षेत्र है। यहाँ न वसन्त, न शरद — चारों मौसम गर्म।
—क्या पश्चिम का मार्ग इसी पर्वत से होकर जाता है?
—हाँ। आठ सौ ली तक आग जलती है। यदि पार करने गये तो ताँबे का सिर, लोहे का धड़ — सब पिघल जाए।
तांग सान्ज़ांग का चेहरा पीला पड़ गया।
तभी एक नौजवान "गरम केक" बेचता हुआ आया। सुन वुकोंग ने एक बाल खींचकर ताँबे का सिक्का बनाया और एक केक लिया। हाथ में लेते ही—
—गर्म है! बहुत गर्म!
नौजवान ने कहा— गर्मी से डरते हो तो यहाँ क्यों आये?
—तुम यह आटा कहाँ से लाते हो? यहाँ तो सब जला होगा।
—जानते हो? लोह-पंखा राजकुमारी के पास केले-पत्र पंखा है। एक बार हवा करे — आग ठण्डी। दो बार — हवा आये। तीन बार — बारिश हो। इसीलिए हम खेती-किसानी कर सकते हैं।
सुन वुकोंग ने यह सुनकर केक गुरुजी को दिया—
—गुरुजी! एक काम की बात पता चली। बूढ़े से चाय नहीं माँगनी। बस यह पता करना है — लोह-पंखा राजकुमारी कहाँ रहती है?
बूढ़े ने बताया— दक्षिण-पश्चिम में पन्ना-बादल पर्वत है, वहाँ केले-पत्र गुफा है। यहाँ से चौदह-पन्द्रह सौ ली होगी। लोग महीने-भर में वहाँ पहुँचते हैं।
सुन वुकोंग ने कहा— मैं अभी जाता हूँ और अभी लौटता हूँ।
एक पलटी-बादल में पन्ना-बादल पर्वत। वहाँ एक लकड़हारा पेड़ काट रहा था — गुनगुनाते हुए।
—लकड़हारे भाई! यह पन्ना-बादल पर्वत है?
—हाँ।
—यहाँ लोह-पंखा राजकुमारी की केले-पत्र गुफा कहाँ है?
—लोह-पंखा राजकुमारी नहीं, वह लोह-पंखा राजकुमारी नाम से जानी जाती है — असल में उसका नाम राक्षसी है। और वह वृषभ-राक्षस राजा की पत्नी है।
सुन वुकोंग एक पल के लिए चुप हो गया। मन में सोचा — यह फिर पुराना बैर! जब अग्नि-बालक को गुआनयिन बोधिसत्त्व के पास भिजवाया था, और उसके चाचा से भी झगड़ा हुआ था। अब उसके माँ-बाप से माँगूँ तो कैसे?
लकड़हारे ने कहा— साहस रखो, बस पंखे का काम करो।
—शुक्रिया।
गुफा के बाहर दोनों पत्थर के द्वार बन्द थे। चारों ओर सुन्दर दृश्य:
पत्थर जैसी चट्टानें पर्वत की हड्डियाँ हैं। कोहरे में रात-भर नमी, काई नयी हरियाली। चीड़ की शाखाओं पर सारस, विलो पर पीली चिड़िया। दो वन-पंक्तियों की बाँस-छाँव, एक पतली राह फूलों से ढकी।
सुन वुकोंग ने आवाज़ दी—
—बड़े भाई! दरवाज़ा खोलो!
एक बालिका बाहर आई — बाँस की टोकरी, कंधे पर कुदाल।
—और भिक्षु! कहाँ से आये?
—मैं पूर्वी तांग का भिक्षु सुन वुकोंग हूँ। राजकुमारी से मिलना है — केले-पत्र पंखे के लिए।
बालिका भीतर गई।
—राजकुमारी! बाहर एक पूर्वी भिक्षु है — सुन वुकोंग। केले-पत्र पंखा माँगने आया है।
राजकुमारी ने "सुन वुकोंग" नाम सुना — और आग की लपट उठ गई। उन्होंने दो तेज़ तलवारें उठाईं और बाहर निकलीं:
सिर पर फूलों का रूमाल, देह पर सुनहरा वस्त्र। कमर पर बाघ की रस्सी, पाँव में ओस-नुपूर। हाथ में तलवार, मुख पर क्रोध।
—सुन वुकोंग! तुम?
—भाभी! मैं यहाँ हूँ।
—तू मेरी भाभी किसलिए कहता है? और मेरे बेटे का क्या किया?
—वृषभ-राक्षस राजा कभी मेरे मित्र थे, सात भाइयों की तरह। आपका बेटा अग्नि-बालक अब गुआनयिन बोधिसत्त्व का सुवर्ण-बालक है — अमर, शाश्वत, सुखी।
—मैं उसे देख नहीं सकती!
—उसे देखना हो तो पहले पंखा दो। मैं दक्षिण सागर जाकर उसे आपसे मिलवाऊँगा।
—बात मत करो! झेलो तलवार!
—जितना काटना हो काटो। पर पंखा ज़रूर दो।
राजकुमारी ने दस से अधिक तलवार चलाई — सुन वुकोंग अडिग। वह घबराई। सुन वुकोंग ने कहा—
—अब मेरी बारी।
उसने स्वर्णदंड निकाला और पकड़ लिया। राजकुमारी ने केले-पत्र पंखा निकाला — और एक बार हवा दी। सुन वुकोंग उड़ गया — हवा में, रात-भर।
जैसे टूटे पत्ते पर आँधी, जैसे थका फूल धारा में।
अगली सुबह एक छोटे पर्वत पर उतरा। वह लघु-सुमेरु पर्वत था — यहाँ पहले पीली हवा के राक्षस को हराने में लिंगजी बोधिसत्त्व की सहायता ली थी।
लिंगजी बोधिसत्त्व के आश्रम में द्वारपाल ने पहचाना—
—महासंत फिर आये!
लिंगजी बोधिसत्त्व ने स्वागत किया—
—बधाई! धर्मग्रन्थ ले लिया?
—अभी नहीं। अग्नि पर्वत आया, और इस राजकुमारी ने एक बार हवा मारी — यहाँ तक आ गया।
—वह राजकुमारी का पंखा ताल-वृक्ष के पत्ते का है। वह ज़हर-मुक्त करने वाली पत्ती है। इसीलिए आग बुझा सकती है। यदि किसी मनुष्य पर हवा लगे तो चौरासी हज़ार ली दूर जाता है। तुम यहाँ से केवल पचास हज़ार ली दूर आये — क्योंकि तुम बादल-सवार हो।
—तो गुरुजी कैसे पार जाएँगे?
—यह भी तांग सान्ज़ांग का नियत भाग्य है। मैंने तथागत बुद्ध से एक स्थिरता-रत्न और उड़ने वाला दंड पाया था। दंड से पहले पवन-राक्षस को हराया। रत्न अभी उपयोग नहीं हुआ। तुम्हें देता हूँ — यह रत्न वस्त्र के अन्दर रखो। फिर उस पंखे से हवा नहीं लगेगी।
सुन वुकोंग ने रत्न वस्त्र के अन्दर सिल दिया।
—शुक्रिया, बोधिसत्त्व।
एक पलटी-बादल में वापस पन्ना-बादल पर्वत। गुफा का दरवाज़ा खटखटाया—
—पंखा माँगने आया हूँ।
—फिर आया!
राजकुमारी ने दो तलवारें उठाईं। पाँच-सात दौरों में राजकुमारी थकी। उसने पंखे से फिर एक बार हवा दी। सुन वुकोंग अडिग। दो बार, तीन बार — नहीं हिला।
—यह तुम किसकी शक्ति से अडिग हो?
राजकुमारी घबराई। भीतर दौड़ी और द्वार बन्द।
सुन वुकोंग ने वस्त्र खोलकर रत्न मुँह में रखा। एक कीड़े का रूप धरा और द्वार की दरार से घुसा।
—पानी, पानी। जल्दी चाय लाओ।
एक परिचारिका ने चाय का कटोरा दिया। सुन वुकोंग चाय की झाग में छुप गया। राजकुमारी ने तीन घूँट में चाय पी।
सुन वुकोंग पेट में पहुँचा। असली रूप धारण किया—
—भाभी! पंखा दो।
राजकुमारी ने आवाज़ सुनी — भीतर से! भयभीत हुई।
—दरवाज़ा बन्द है ना?
परिचारिकाओं ने कहा— हाँ।
—तो यह पेट से क्यों बोल रहा है?
—भाभी! मैं पेट में खेल रहा हूँ।
सुन वुकोंग ने पाँव से ठोकर मारी। राजकुमारी पेट दर्द से ज़मीन पर गिरी।
—चाचा! माफ करो।
—पहले पंखा दो।
—लाओ, परिचारिका।
एक छोटा पत्ता — आम के पत्ते जितना।
—यह इतना छोटा? इससे आठ सौ ली की आग कैसे बुझेगी?
—बाहर निकलो, दिखाती हूँ।
सुन वुकोंग गले तक पहुँचा—
—अब मुँह तीन बार खोलो।
राजकुमारी ने खोला। सुन वुकोंग मधुमक्खी बनकर पत्ते पर बैठ गया। राजकुमारी को पता नहीं चला।
—निकल गये?
बाहर द्वार खोला। सुन वुकोंग ने असली रूप धारण किया—
—शुक्रिया, भाभी! वापस करूँगा।
वह उड़ गया।
जल्दी से उस बूढ़े किसान के घर आया। गुरुजी को पंखा दिखाया—
—यही है।
सुन वुकोंग ने आग के पास जाकर पंखा फेंका — आग बढ़ गई! दूसरी बार — और बढ़ी! तीसरी बार — हज़ार हाथ ऊँची लपट उठी। सुन वुकोंग भागा — दो कुंडल बाल जले।
—जल्दी वापस! आग आ रही है!
—यह पंखा झूठा है। धोखा खाया।
भूमि-देवता प्रकट हुए, खाना लाये—
—महासंत! पहले खाओ, फिर बात करते हैं।
—खाना बाद में। यह आग कब बुझेगी?
—सच्चा पंखा चाहिए।
—वह कहाँ मिलेगा?
भूमि-देवता मुस्कुराये—
यदि सच्चा केले-पत्र पंखा चाहिए, तो महाशक्तिशाली राजा को खोजना होगा।
वह कौन है? अगले अध्याय में जानें।