अध्याय ५५ — कामुक राक्षसी ने तांग सान्ज़ांग को छला, सच्चे स्वभाव ने देह को अखंड रखा
बिच्छू-राक्षसी तांग सान्ज़ांग को पकड़ लेती है; सुन वुकोंग और झू बाजिए घायल होते हैं; गुआनयिन बोधिसत्त्व का निर्देश; माओ-रात्रि-नक्षत्र द्वारा राक्षसी का नाश।
स्वर्ग-तुल्य महासंत और झू बाजिए उन महिलाओं पर स्थिरता-मंत्र डालने की तैयारी में थे कि उन्होंने शा वुजिंग का शोर सुना और देखा — तांग सान्ज़ांग गायब।
—उन्हें कौन ले गया?
—एक स्त्री। एक बवंडर में उठाकर ले गई।
सुन वुकोंग तुरन्त बादलों में उड़ा और उत्तर-पश्चिम की ओर उड़ती धूल देखी। उसने चिल्लाया—
—भाइयो! आओ, गुरुजी को ढूँढना है।
झू बाजिए और शा वुजिंग सामान घोड़े पर लादकर उड़े। एक ऊँचे पर्वत की तलहटी में धूल बैठ गई। नीचे उतरकर देखा — एक चमकदार पत्थर की दीवार, और उसके पीछे दो पत्थर के द्वार। ऊपर लिखा था — "विष-शत्रु पर्वत, वीणा-गुफा।"
झू बाजिए ने कुदाल उठाया — सुन वुकोंग ने रोका—
—रुको। हम सीधे यहाँ आये हैं, लेकिन भीतर की स्थिति नहीं जानते। तुम दोनों पत्थर की दीवार के उस पार घोड़ा लेकर खड़े रहो, मैं जाकर देखता हूँ।
सुन वुकोंग एक मधुमक्खी बन गया:
पंख पतले बाँस की झिल्ली जैसे, देह फूल के केन्द्र जितनी छोटी। सुगन्ध की ओर उड़ती, हवा पर तेज़।
वह द्वार की दरार से घुसा। मुख्य हॉल में एक स्त्री राक्षसी बैठी थी — उसके आसपास सुन्दर परिचारिकाएँ। दो लड़कियाँ गरम भाप उठाती मंचूरियन बन लिये आईं:
—एक मनुष्य-माँस वाली, एक लाल-दाल वाली।
राक्षसी बोली— तांग दूत को बाहर लाओ।
तांग सान्ज़ांग बाहर आया — चेहरा पीला, आँखें लाल।
सुन वुकोंग ने छिपकर सोचा — गुरुजी को ज़हर हो गया है।
राक्षसी ने तांग सान्ज़ांग का हाथ पकड़ा—
—दूत! यहाँ भी शान्ति से बुद्ध-भजन कर सकते हो। मैं तुम्हारी साथी बनूँगी।
तांग सान्ज़ांग चुप। राक्षसी ने कहा— भूखे होगे। खाओ।
तांग सान्ज़ांग ने मन में सोचा — बोलूँ नहीं तो वह मार देगी, बोलूँ तो फँस जाऊँगा। बोले—
—माँसाहारी में क्या है?
—मनुष्य का माँस।
—तो शाकाहारी लाओ।
राक्षसी ने एक दाल की बन तोड़कर दी। तांग सान्ज़ांग ने माँस वाली बन राक्षसी की ओर बढ़ाई। राक्षसी ने हँसकर कहा— यह क्यों नहीं तोड़ते?
—संन्यासी माँस को हाथ नहीं लगाते।
—पर नदी का जल तो पिया था, और दाल की बन खा रहे हो।
—जल से नाव तेज़ जाती है, रेत से घोड़ा धँसता है।
सुन वुकोंग ने सुना और डरा — गुरुजी का मन न बदल जाए! वह प्रकट हुआ और दंड निकालकर चिल्लाया—
—दुष्ट! रुको!
राक्षसी ने धुआँ छोड़ा और चिल्लाई—
—दूत को अन्दर रखो।
वह तीन-नोकीले भाले के साथ बाहर निकली और सुन वुकोंग को ललकारा।
झू बाजिए ने दूर से देखा और दौड़ा — दंड से कुदाल तक दोनों राक्षसी पर टूट पड़े। राक्षसी ने कहा—
—सुन वुकोंग! तुम बुद्ध को भी नहीं जानते। बुद्ध भी मुझसे डरते हैं।
दोनों ने जमकर हमला किया। फिर राक्षसी ने एक अनजाने हथियार से सुन वुकोंग के सिर पर वार किया।
—आह! दर्द!
सुन वुकोंग भाग गया।
झू बाजिए ने पूछा— आप लड़ते-लड़ते क्यों भागे?
—अनजाने हथियार से मेरे सिर पर लगा। बहुत दर्द है।
झू बाजिए हँसा— तुम तो कहते थे तुम्हारा सिर पत्थर जैसा कठोर है।
—मेरा सिर तो कठोर ही था। कड़ाई में जला, अठारह दिन जला, तलवारों से काटा — कुछ नहीं हुआ। पर यह किस चीज़ से लगा?
शा वुजिंग ने कहा— ज़रा देखते हैं।
सुन वुकोंग ने हाथ हटाया — घाव नहीं था पर ज़हर का असर था।
झू बाजिए बोला— पश्चिम स्त्री-राज्य जाकर मरहम लाऊँ?
—मरहम इस पर काम नहीं करेगा।
शाम हो गई। तीनों एक पर्वत की ढलान पर बैठे रहे।
भीतर राक्षसी ने तांग सान्ज़ांग को प्रेम से पुकारा। एक मोमबत्ती जलाई, सुगन्ध फैलाई—
—चलो, मेरे साथ रात बिताओ।
तांग सान्ज़ांग चुप रहे — न आँख उठाई, न बिस्तर देखा। राक्षसी ने अनगिनत प्रेमभरी बातें कहीं। यह संत था:
न आँखें पाप देखें, न कान काम सुनें। सुन्दरता धूल जैसी, रूप राख जैसा। जीवन भर केवल ध्यान, एक पल भी बुद्ध-स्थल से दूर नहीं।
राक्षसी ने कपड़े उतारे — संत ने आँखें नहीं उठाईं। आधी रात तक राक्षसी थक गई और तांग सान्ज़ांग को रस्सी से बाँधकर बरामदे में छोड़ दिया।
सुबह सुन वुकोंग ने कहा— मेरे सिर का दर्द कम हो गया। किन्तु पहले जाकर देख लूँ।
वह मधुमक्खी बनकर भीतर गया। सभी सो रहे थे। तांग सान्ज़ांग बरामदे में बँधे थे।
—गुरुजी।
—सुन वुकोंग! मुझे बचाओ।
—रात में क्या हुआ?
—मैंने कपड़े नहीं उतारे, बिस्तर पर नहीं लेटा। वह मुझे बहलाती रही, मैं नहीं माना।
—तब उसने यहाँ क्यों बाँधा?
—मेरे न मानने पर क्रोध में बाँध दिया।
तांग सान्ज़ांग की आवाज़ ने राक्षसी जगा दी।
—अच्छा पति नहीं बनोगे तो धर्मग्रन्थ लेने क्यों जाओगे?
सुन वुकोंग उड़कर बाहर आया।
—आठवें भाई!
झू बाजिए ने पूछा— काम हुआ?
—नहीं हुआ। गुरुजी कपड़े भी नहीं उतारे। वे साँची के संत हैं।
झू बाजिए बोला— बढ़िया! उन्हें बचाने चलो।
दोनों ने द्वार तोड़ा। राक्षसी बाहर निकली, तीन-नोकीले भाले के साथ। युद्ध हुआ। राक्षसी ने फिर अपने ज़हरीले हथियार से झू बाजिए के होंठ पर वार किया। झू बाजिए कराहता हुआ भागा।
तीनों पर्वत की ढलान पर बैठे। तभी एक बूढ़ी महिला बाँस की टोकरी लेकर आई।
शा वुजिंग बोला— वहाँ उस महिला से पूछते हैं।
सुन वुकोंग ने ध्यान से देखा — उनके सिर के ऊपर शुभ बादल था, दाएँ-बाएँ धूप की धुन्ध। वह पहचान गया।
—भाइयो! प्रणाम करो! वह गुआनयिन बोधिसत्त्व हैं!
झू बाजिए दर्द भूलकर झुका। सुन वुकोंग ने हाथ जोड़े।
—गुआनयिन बोधिसत्त्व की जय!
बोधिसत्त्व मछली-टोकरी के रूप में प्रकट हुईं। सुन वुकोंग आसमान में पहुँचकर प्रणाम किया—
—बोधिसत्त्वे! इस राक्षसी को हम नहीं जीत पा रहे। कृपया बताइये कौन सहायता कर सकता है?
—यह राक्षसी अत्यन्त शक्तिशाली है। उसका तीन-नोकीला भाला उसकी दो पकड़-पाँव हैं। दंड जो ज़हर फैलाता है वह उसकी पूँछ का काँटा है — इसे "उलटा घोड़ा-ज़हर" कहते हैं। यह वास्तव में एक बिच्छू-राक्षसी है। जब मैं बुद्ध के सामने बैठी थी, बुद्ध ने इसे दूर करने की कोशिश में अपना अँगूठा इसके काँटे से छिदवा लिया था। बुद्ध को भी दर्द हुआ था। इसे एक ही व्यक्ति हरा सकता है — पूर्वी स्वर्ग-द्वार के प्रकाश-महल में माओ-रात्रि-नक्षत्र।
बोधिसत्त्व चली गईं।
सुन वुकोंग नीचे आया—
—भाइयो! गुरुजी बच जाएँगे।
झू बाजिए — कौन है वह?
—माओ-नक्षत्र। मैं जाता हूँ।
झू बाजिए ने कहा— जाते समय दर्द-निवारक दवा भी लेते आना।
—दवा की ज़रूरत नहीं, एक रात में ठीक हो जाएगा।
सुन वुकोंग पूर्वी स्वर्ग-द्वार पहुँचा। वृद्धि-स्वर्ग-राजा मिले।
—मुझे प्रकाश-महल जाना है।
—नक्षत्र आज जेड सम्राट की आज्ञा से नक्षत्र-मंच पर निरीक्षण के लिए गये हैं।
सुन वुकोंग प्रकाश-महल पहुँचा — खाली था। वापस आते हुए देखा — नक्षत्र वापस आ रहे थे:
पाँच पर्वतों की चमकीली टोपी, हाथ में जेड जैसी राजदंड। वस्त्र पर सात नक्षत्र, कमर पर आठ दिशाओं का रत्न। चलने में छनछनाती धुन।
नक्षत्र के सेवक ने कहा— महाराज! सुन वुकोंग वहाँ खड़े हैं।
नक्षत्र ने पूछा— महासंत! क्यों आये?
—एक बिच्छू-राक्षसी से गुरुजी को बचाना है। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने आपका नाम बताया।
—यदि बोधिसत्त्व ने भेजा है, तो चलता हूँ।
दोनों पर्वत के पास पहुँचे। शा वुजिंग ने कहा—
—दूसरे भाई! उठो, महासंत नक्षत्र ले आये!
झू बाजिए ने होंठ पर हाथ रखे मुँह हिलाकर कहा— क्षमा करना।
नक्षत्र ने कहा— तुम संत हो, रोग कहाँ?
—सुबह राक्षसी ने होंठ पर काटा, दर्द है।
—आओ, मैं ठीक कर देता हूँ।
नक्षत्र ने हाथ से रगड़ा, फूँका — ज़हर खत्म।
झू बाजिए आनन्दित हो गया।
—सुन वुकोंग, मेरा सिर भी ठीक करो।
—तुम्हें तो कल रात हुआ था, अब खत्म हो चुका।
—थोड़ी-सी सुन्नाहट है, ठीक करो।
नक्षत्र ने सुन वुकोंग के सिर पर भी हाथ फेरा।
झू बाजिए बोला— चलो, उस दुष्ट को मारते हैं।
पत्थर की दीवार के पीछे पहुँचकर सुन वुकोंग ने कहा— तुम राक्षसी को बाहर लाओ। मैं उसे दूर खींचूँगा, तब नक्षत्र को मौका मिलेगा।
झू बाजिए ने दरवाज़ा तोड़ा और चिल्लाया। राक्षसी भाले के साथ निकली। झू बाजिए ने पाँव नहीं जमाया — तुरन्त भागा। राक्षसी पत्थर की दीवार के उस पार आ गई।
सुन वुकोंग ने पुकारा— माओ-नक्षत्र! आ जाओ!
पर्वत की ढलान पर खड़े नक्षत्र अपने असली रूप में आये — एक दोहरे कलगी वाला बड़ा मुर्गा। उन्होंने गर्दन उठाकर एक बाँग दी। राक्षसी तुरन्त असली रूप में आ गई — एक वीणा जितनी बड़ी बिच्छू। नक्षत्र ने एक और बाँग दी। बिच्छू की सारी शक्ति जाती रही — वह ढलान पर मृत पड़ी।
फूलों की कलगी, कढ़ाई की गर्दन। पाँच सद्गुण, तीन उद्घोष। ज़हरीली बिच्छू ने मनुष्य-रूप धारण किया था, पर असली रूप में लौट आई और मर गई।
झू बाजिए ने बिच्छू को पाँव से दबाया और कुदाल से पीस दिया।
नक्षत्र आकाश की ओर उड़ गये। तीनों ने प्रणाम किया—
—कभी महल में आकर धन्यवाद करेंगे।
भीतर जाकर उन्होंने तांग सान्ज़ांग को बन्धन-मुक्त किया। वहाँ की कुछ परिचारिकाएँ स्त्री-राज्य से उठाई गई स्त्रियाँ थीं। उन्हें घर का रास्ता दिखाया। गुफा को आग लगाई। घोड़े पर बैठकर पश्चिम की ओर चले।
काम-विकार से मुक्ति, ध्यान का मार्ग खुला। अगले पड़ाव पर क्या होगा? अगले अध्याय में जानें।