अध्याय ५४ — धर्म-स्वभाव पश्चिम से आया और स्त्री-राज्य मिला, मन-वानर ने योजना बनाकर प्रेम-जाल से मुक्ति पाई
पश्चिम स्त्री-राज्य में तांग सान्ज़ांग से विवाह का प्रस्ताव; सुन वुकोंग की 'झूठी विवाह' की चालाकी; एक राक्षसी तांग सान्ज़ांग को उठा ले जाती है।
चारों शिष्य गाँव छोड़कर पश्चिम की ओर चले। तीस-चालीस ली जाते-जाते पश्चिम स्त्री-राज्य की सीमा आ गई। तांग सान्ज़ांग ने घोड़े पर बैठे-बैठे कहा—
—सुन वुकोंग! सामने नगर दिखता है। यह पश्चिम स्त्री-राज्य होगा। बहुत सँभल कर चलना।
पूर्वी द्वार पर पहुँचते ही सड़क के दोनों ओर स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ थीं — बूढ़ी, जवान, सब। वे ताली बजाकर हँसने लगीं—
—मर्द आये! मर्द आये!
तांग सान्ज़ांग घोड़े पर जम न सका। झू बाजिए ने अपना मुँह हिलाया, कान खड़े किये — स्त्रियाँ डरकर भाग गयीं।
स्त्री-राज्य में पुरुष नहीं, खेत से बाज़ार तक केवल स्त्रियाँ। नाजुक पुकार सुनकर आईं, मर्दों की खोज में उत्सुक। यदि झू बाजिए डरावना मुँह न बनाता, तो फूलों की भीड़ में फँस जाते।
आगे जाकर एक महिला-अधिकारी ने रास्ता रोका—
—आने वाले दूत! यहाँ रुकिए। यह प्रतीक्षा-भवन है, यहाँ नाम दर्ज कराइये।
वहाँ "स्वागत-भवन" लिखा था। महिला-दूत ने उनके बारे में सब जानकर नोट किया और राजमहल को सूचना देने गई।
रानी ने सुना — पूर्वी महान तांग का शाही भाई! प्रसन्नता से बोली—
—मुझे कल रात सपना आया था कि सोने की दीवार पर रंग खिल रहे हैं। यह उसी का शुभ संकेत है। मैं उनसे विवाह करूँगी और स्त्री-राज्य को सन्तान देंगे!
दूत बोली— महारानी, वह संत बहुत सुन्दर हैं पर उनके तीन शिष्य बहुत भयंकर हैं।
—तीनों को भेंट और दस्तावेज़ देकर भेज दो, और संत को यहाँ रखो।
दरबार ने इत्तफाक जताया — बिना मध्यस्थ के विवाह उचित नहीं। महामंत्री और भवन-अधिकारी को मध्यस्थ बनाकर भेजा गया।
इधर तांग सान्ज़ांग भोजन कर रहे थे जब सूचना आई—
—महामंत्री और हमारी अधिकारी आ रही हैं।
तांग सान्ज़ांग ने पूछा— क्यों आ रही हैं?
झू बाजिए बोला— शायद भोजन पर बुलाया है।
सुन वुकोंग बोला— नहीं — यह विवाह का प्रस्ताव है।
—सुन वुकोंग! यदि वे बलपूर्वक विवाह करने पर आमादा हों, तो क्या करें?
—गुरुजी, आप हाँ कह दीजिये। मैं रास्ता निकालूँगा।
दोनों महिला-अधिकारी आईं, झुककर अभिवादन किया—
—आदरणीय दूत! हज़ारों शुभकामनाएँ!
—मुझ संन्यासी को शुभकामना किस बात की?
—यह राज्य हमेशा से केवल स्त्रियों का रहा है। आज भाग्य से एक सुन्दर पुरुष आये हैं। हमारी महारानी आपसे विवाह करना चाहती हैं।
तांग सान्ज़ांग बोले— अरे! मैं तो अकेला हूँ, बच्चे-परिवार नहीं। तीन शिष्य हैं — कौन किससे विवाह?
—महारानी ने आपको चुना है। तीनों शिष्यों को भेंट देकर पश्चिम भेजेंगे।
तांग सान्ज़ांग चुप हो गये।
झू बाजिए आगे आया— जाकर रानी से कहिये — मेरे गुरु को छोड़ दो और मुझे यहाँ रख लो!
अधिकारी डर गई।
सुन वुकोंग ने कहा— गुरुजी! आप यहाँ रह सकते हैं। हज़ार मील दूर का नाता होता है धागे से बँधा। यह तो सीधे मिले!
तांग सान्ज़ांग बोले— क्या हम यहाँ रहकर पश्चिम का धर्मग्रन्थ लेने नहीं जाएँगे? तांग सम्राट की सेवा नहीं करेंगे?
महामंत्री ने कहा— महारानी का प्रस्ताव है कि तीनों शिष्यों को पश्चिम भेजें, धर्मग्रन्थ लेकर आएँ, फिर यहाँ वापस आएँ।
सुन वुकोंग बोला— महामंत्री जी, हम राजी हैं! गुरुजी को यहाँ रखिये, हमें जाने दीजिये। धर्मग्रन्थ लाकर फिर आएँगे।
महामंत्री प्रसन्न होकर रानी को सूचना देने गई।
तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग को पकड़कर डाँटा— यह क्या बात कही?
—गुरुजी, धैर्य रखिये। यदि हाँ नहीं करते तो वे दस्तावेज़ पर मुहर नहीं लगाती। और यदि कोई जादू-टोना करें तो हमें उन्हें मारना पड़ेगा — ये मनुष्य हैं, राक्षस नहीं। आप तो हमेशा अहिंसा की बात करते हैं।
—लेकिन मैं यहाँ रुककर विवाह नहीं करूँगा!
—एक चाल है। रानी जब विदाई के लिए आयें, आप उनसे दस्तावेज़ पर मुहर लगवाइये। फिर मैं एक स्थिरता-मंत्र पढूँगा और सब जम जाएँगे। हम आराम से निकल जाएँगे। एक दिन-रात चलने के बाद मंत्र खोल दूँगा। यह "झूठी विवाह" की चाल है — न कोई मरेगा, न कोई घायल होगा।
तांग सान्ज़ांग प्रसन्न हुए।
रानी ने कहा— मेरा सपना सच हुआ! भोज तैयार करो!
भव्य शाही सवारी निकली। स्वर्ण-पालकी, दोहरे फीनिक्स, मोर-पंख के पंखे। रानी ने नीचे उतरकर तांग सान्ज़ांग को देखा — और मन मोह लिया उनका रूप ने:
भरा-पूरा सुन्दर मुख, धवल दाँत, लाल होंठ। विशाल माथा, शान्त आँखें, राजसी व्यक्तित्व। ऐसे पुरुष को चाहिए नाजुक रानी।
रानी ने पुकारा— तांग दूत! पालकी में बैठिये!
तांग सान्ज़ांग लाल हो गये। झू बाजिए ने रानी को देखा:
भौंह जैसे पन्ना पंख, त्वचा जैसे भेड़ की ऊन। शरद की लहर जैसी आँखें, वसन्त के अंकुर जैसी उँगलियाँ। सुन्दरता में चाँद की परी से भी आगे।
सुन वुकोंग ने कहा— गुरुजी, गाड़ी में बैठिये। जल्दी दस्तावेज़ पर मुहर लगवाइये।
रानी तांग सान्ज़ांग का हाथ थामकर पालकी में बैठी। दोनों की भावनाएँ अलग-अलग थीं:
रानी सच में प्रेम में थी, संत मन में बस बुद्ध थे। एक फूलों की रात चाहती थी, दूसरा मुक्ति की राह चाहता था। स्त्री का सच्चा प्रेम, संत का बनावटी मुस्कान।
महल में भव्य भोज हुआ। दो प्रकार के खाने — शाकाहारी और माँसाहारी।
रानी ने पूछा— दूत! शाकाहारी या माँसाहारी?
—शाकाहारी।
झू बाजिए ने बिना पूछे दोनों प्रकार के भोजन चट कर लिये।
भोज के बाद तांग सान्ज़ांग ने कहा— महारानी! अब दस्तावेज़ पर मुहर लगाइये और इन तीनों को पश्चिम जाने दीजिये।
दस्तावेज़ आया — तांग सम्राट की नौ मुहरें लगी थीं और अन्य राज्यों की मुहरें भी।
रानी ने नाजुक स्वर में पूछा— दूत का उपनाम भी चेन है?
—घर का नाम चेन है, धर्म-नाम ज़ुआनज़ांग है।
शिष्यों के नाम भी जोड़े गये — सुन वुकोंग, झू वुनेंग, शा वुजिंग। मुहर लगाई।
रानी ने सोने-चाँदी की एक थाल दी—
—रास्ते के खर्च के लिए।
—हम संन्यासी सोना-चाँदी नहीं लेते।
—तो रेशम का कपड़ा?
—हम साधु हैं, रेशम नहीं पहनते।
—तो राजकीय चावल — रास्ते के लिए।
झू बाजिए ने "चावल" सुनते ही तुरन्त थैले में भर लिया।
तांग सान्ज़ांग बोले— महारानी, हमारे साथ पश्चिम द्वार तक चलिये। मैं शिष्यों को कुछ निर्देश देना चाहता हूँ।
रानी रास्ता नहीं पहचानती थी, साथ हो ली।
पश्चिम द्वार पर पहुँचते ही सुन वुकोंग, झू बाजिए और शा वुजिंग आगे आये—
—महारानी! अधिक दूर मत आइये। हम यहीं से विदा लेते हैं।
तांग सान्ज़ांग ने रानी से कहा— महारानी! धर्मग्रन्थ लेने जाने दीजिये।
रानी ने हाथ थाम लिया—
—दूत! मैंने राज्य का धन और अपना प्रेम दिया — अब बदल गये?
झू बाजिए आगे आया, मुँह हिलाया, कान खड़े किये — रानी पालकी में गिरी।
शा वुजिंग ने तांग सान्ज़ांग को भीड़ से निकाला और घोड़े पर बिठाया।
तभी एक स्त्री ने पुकारा—
—तांग दूत! मेरे साथ चलो!
एक घूर्णी हवा चली और तांग सान्ज़ांग के साथ उड़ गई। वे गायब हो गये।
शा वुजिंग ने डाँटा— दुष्ट!
किन्तु तांग सान्ज़ांग लापता हो चुके थे।
फूलों के जाल से निकले, पर फिर एक नई विपदा आई। वह स्त्री मनुष्य थी या राक्षस? गुरु की जान बचेगी या नहीं? अगले अध्याय में जानें।