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अध्याय ५३ — ध्यान-गुरु ने जल पिया और गर्भ धारण किया, पीली माता ने जल लाकर दुष्ट गर्भ नष्ट किया

तांग सान्ज़ांग और झू बाजिए माता-पुत्र नदी का जल पीकर गर्भ धारण करते हैं; सुन वुकोंग संघर्षपूर्वक गर्भ-भेदन झरने का जल लाता है।

पश्चिम यात्रा अध्याय 53 माता-पुत्र नदी पश्चिम स्त्री-राज्य गर्भ सुन वुकोंग

धर्म-आचरण में आठ सौ वर्ष, पुण्य में तीन हज़ार वर्ष। अपने और पराये में समता — तभी पश्चिम की मंज़िल मिलेगी।

नीले बैल राक्षस से तलवार और तीर न डिगा सके। आग-पानी व्यर्थ रहे — परम वृद्ध देव ने उतरकर सब सँभाला। हँसते हुए नीले बैल को नाक में नकेल डाल कर वापस ले गये।

जो आवाज़ आई थी, वह स्वर्ण-मृग पर्वत के भूमि-देवता और भूमि-संरक्षक की थी। वे बैंगनी सोने का पात्र लिये पुकार रहे थे—

—संत महाराज! यह भोजन महासंत सुन वुकोंग ने पहले ही भिक्षा में माँगकर रखा था। आपकी रक्षा में बड़ा कष्ट उठाया उन्होंने। पहले खाइये, फिर मार्ग पर चलिए।

तांग सान्ज़ांग बोले— शिष्य! तुम्हारे बिना मैं क्या करता? अफसोस कि मैंने तुम्हारी सीमा-रेखा नहीं मानी।

—गुरुजी, आपने मेरी सीमा नहीं मानी, इसलिए दूसरे की सीमा में फँस गये।

झू बाजिए बोला— कौन-सी और सीमा?

—यह तुम्हारे ही कारण हुआ। गुरुजी ने बड़ी मुसीबत झेली। मुझे आकाश-पाताल एक करना पड़ा, जेड सम्राट और तथागत बुद्ध तक जाना पड़ा। और वह नीले बैल का पाश — सब कुछ खींच लेता था। तथागत बुद्ध ने परम वृद्ध देव को बुलाया, तब जाकर उस पाश को हटाया।

तांग सान्ज़ांग ने कहा— इस बार से मैं हमेशा तुम्हारी बात मानूँगा।

चारों ने भोजन किया। भोजन गरम था।

—इतनी देर से भी गरम? भूमि-देव!

—महासंत का कार्य पूरा होते ही मैंने गरम किया।

भूमि-देव और पर्वत-देव को प्रणाम करके वे आगे चले। वसन्त का मौसम था:

बैंगनी अबाबील कूजती, पीली कोयल गाती। जमीन पर गिरे फूल जैसे रंगीन गलीचा। खिले हुए आड़ू, पहाड़ी चीड़ के वृक्षों की छाँव।

चलते-चलते अचानक एक छोटी नदी मिली। पानी बिल्कुल साफ और ठण्डा था। दूसरी ओर विलो के पेड़ों की छाँव में कुछ घर दिखे। सुन वुकोंग बोला—

—वहाँ नाव वाले होंगे।

तांग सान्ज़ांग ने झू बाजिए से आवाज़ लगाने को कहा। विलो की छाँव से एक छोटी नाव आई। नाव चलाने वाली एक बूढ़ी स्त्री थी। उसने नाव इस किनारे लगाई। सब सवार हुए और पलक झपकते ही दूसरे किनारे पहुँच गये। उस स्त्री ने धन नहीं लिया, बस मुस्कुराती हुई घर चली गई।

तांग सान्ज़ांग को प्यास लगी। उन्होंने झू बाजिए से नदी का पानी लाने को कहा। झू बाजिए ने पात्र भरकर लाया। गुरु ने कुछ पिया, बाकी झू बाजिए ने पी लिया।

आधे घण्टे भी नहीं बीते थे कि तांग सान्ज़ांग ने कहा— पेट में दर्द है।

झू बाजिए बोला— मेरे पेट में भी दर्द है।

और क्रमशः दोनों का पेट फूलने लगा। पेट में कुछ हिल रहा था जैसे कुछ जीवित हो।

रास्ते में एक गाँव दिखा जहाँ तिनके के गट्ठर बाँस की छड़ी पर लटके थे — यह शराब की दुकान का संकेत था।

—गुरुजी, वहाँ गरम पेय मिलेगा और दवाई का पता भी चलेगा।

उस घर के बाहर एक बूढ़ी महिला बैठी थी। सुन वुकोंग आगे बढ़ा—

—दादी माँ! मेरे गुरु ने नदी का पानी पिया और पेट में दर्द है।

—उस पूर्व की नदी का पानी पिया?

वह हँसकर बोली— भीतर आइये, बताती हूँ।

तांग सान्ज़ांग और झू बाजिए कराहते हुए अन्दर गये। वह बूढ़ी महिला अन्दर से कुछ और स्त्रियों को बुला लाई। वे तांग सान्ज़ांग को देखकर हँसने लगीं। सुन वुकोंग ने ज़ोर से डाँटा। सब भाग गयीं।

बूढ़ी महिला को पकड़ कर सुन वुकोंग बोला— जल्दी से गरम पेय लाओ।

वह डरते हुए बोली— गरम पानी से कुछ नहीं होगा। यह स्थान पश्चिम का स्त्री-राज्य है। यहाँ केवल स्त्रियाँ हैं। यह नदी माता-पुत्र नदी कहलाती है। यहाँ की स्त्रियाँ बीस वर्ष की आयु के बाद इस नदी का जल पीकर गर्भ धारण करती हैं। तीन दिन बाद पास के प्रसव-दर्पण झरने में छाया देखती हैं — यदि दो परछाइयाँ दिखें तो बच्चा जन्म लेता है। तुम्हारे गुरु ने इसी नदी का जल पिया।

तांग सान्ज़ांग के होश उड़ गये—

—शिष्य! यह क्या होगा?

झू बाजिए कराहा— हम पुरुष हैं, प्रसव द्वार कहाँ से खुलेगा?

सुन वुकोंग हँसा— जब फल पकता है तो अपने आप गिरता है। पसली के नीचे से छेद करके निकलेगा।

झू बाजिए थर-थर काँपने लगा — दाई को बुलाओ!

शा वुजिंग ने समझाया— इतना मत घबराओ।

तांग सान्ज़ांग बोले— क्या कोई गर्भपात की दवा है?

—दवा से कुछ नहीं होगा। दक्षिण में विरेचन पर्वत है, वहाँ टूटे-बच्चे की गुफा है। उस गुफा में एक गर्भ-नाशक झरना है। एक घूँट से सब ठीक हो जाता है। लेकिन जो झरने की रखवाली करता है — इच्छानुसार सत्य-देव — वह बिना पूजा-पाठ और भेंट के एक बूँद भी नहीं देता।

सुन वुकोंग प्रसन्न हो गया—

—गुरुजी चिन्ता मत करो। मैं जल ले आता हूँ।

उसने शा वुजिंग को सँभालने के लिए कहा, बूढ़ी महिला से एक मिट्टी का कलश लिया और उड़ चला।

जल्दी ही एक पर्वत दिखा। वहाँ पर्वत के पीछे एक आश्रम था। सुन वुकोंग ने रोककर एक बूढ़े तपस्वी को देखा जो हरे घास पर ध्यान लगाये बैठे थे।

—आप इच्छानुसार सत्य-देव के बड़े शिष्य हैं?

—हाँ। तुम क्या चाहते हो?

—मैं पूर्व के महान तांग का भिक्षु हूँ। मेरे गुरु ने माता-पुत्र नदी का जल पी लिया और गर्भ-पीड़ा हो रही है। गर्भ-नाशक झरने का एक घूँट चाहिए।

तपस्वी ने भीतर जाकर सूचना दी। सत्य-देव वाद्य यंत्र बजा रहे थे। उन्होंने सुना — "सुन वुकोंग" — और उनके मन में तत्काल क्रोध उमड़ा।

—यह बन्दर यहाँ आया है!

वे तुरन्त हथियार लेकर बाहर निकले। उन्होंने देखा:

सिर पर नक्षत्रों जड़ित मुकुट, देह पर सुनहरा वस्त्र। हाथ में इच्छानुसार कड़ा, पैरों में बादल की जूतियाँ। दाढ़ी आग जैसी लाल, बाल जटिल और उग्र। रूप जैसे वेन युआनसुआई, पर पोशाक भिन्न है।

—तुम सुन वुकोंग हो?

—हाँ।

—मेरा भतीजा कहाँ है?

सुन वुकोंग ने समझा — यह सन्त गलती कर रहे हैं।

—भतीजा? वह कौन?

—मेरा भतीजा अग्नि-बालक है! तुमने उसे नष्ट किया!

—आप गलत समझ रहे हैं। मेरे बड़े भाई वृषभ-राक्षस राजा के साथ पुराना मित्रभाव था। आपका भतीजा अब गुआनयिन बोधिसत्त्व के पास है — वह सुवर्ण-बालक बन गया। अमरता पाई उसने।

—झूठ! मैं उसे देख नहीं सकता। तुमने उसकी ज़िन्दगी बर्बाद की। अब जल नहीं दूँगा। खड़े रहो!

—ठीक है, लेकिन पहले पानी दो।

—तीन युद्ध जीतो तो दूँगा।

दोनों में भयंकर युद्ध हुआ:

गोल्डन हूप दंड और इच्छानुसार कड़े की टक्कर। रेत उड़ती है, पत्थर बिखरते हैं। एक ने गुरु को बचाने जल माँगा, दूसरे ने भतीजे की खातिर मना किया। आगे-पीछे, बार-बार, न जीत न हार।

कड़ा दस दौरों में हारा। सुन वुकोंग ने दंड और तेज़ किया। सत्य-देव थक गये और पर्वत पर भाग गये।

सुन वुकोंग आश्रम में घुसा। द्वार बन्द था। उसने लात मारी और अन्दर घुसा। तपस्वी कुएँ के पास था।

—हट!

तपस्वी डरकर भागा। सुन वुकोंग ने बाल्टी उठाई — तभी सत्य-देव ने वापस आकर अपने कड़े से उसकी टाँग खींची। वह गिर गया।

—देखो, अब जल ले जा सकते हो?

दोनों फिर लड़े। सुन वुकोंग दोनों हाथों से दंड और बाल्टी एक साथ नहीं सँभाल पाया। फिर गिरा।

—यह बड़ा बेकार आदमी है। मुझे सहायक बुलाना होगा।

वह शा वुजिंग को बुलाने लौटा।

शा वुजिंग के साथ वह वापस आश्रम पहुँचा। शा वुजिंग को कहा— मैं युद्ध करता हूँ, तुम उस अवसर पर जल भरो।

फिर सुन वुकोंग ने दरवाज़ा खटखटाया। तपस्वी अन्दर गया, सत्य-देव बाहर निकला।

—फिर आये?

—जल चाहिए।

भयंकर लड़ाई फिर शुरू हुई। इस बार दोनों पहाड़ी ढलान पर उतर गये।

शा वुजिंग आश्रम में घुसा। तपस्वी ने रोका—

—तुम कौन हो?

शा वुजिंग ने रोज़ाना की तरह अपना दंड निकाला और उसकी बायीं बाँह तोड़ दी।

—मैं तुम्हें मारना चाहता था, पर तुम मनुष्य हो। जाओ।

शा वुजिंग ने कुएँ से पूरी बाल्टी भरी और बाहर आकर चिल्लाया—

—भाई! जल मिल गया! अब छोड़ दो उन्हें!

सुन वुकोंग ने अपना दंड सत्य-देव के कड़े से अलग किया—

—मैं तुम्हें जीवित छोड़ता हूँ — वृषभ-राक्षस राजा के साथ पुराने सम्बन्ध का सम्मान करते हुए। यदि आगे भी किसी ने जल माँगा, तो उसे मत रोकना।

सत्य-देव ने चाल चली और कड़े से पाँव खींचा। सुन वुकोंग ने कड़ा तोड़ दिया — चार टुकड़े।

—अब फिर करोगे?

सत्य-देव थर-थर काँपता रहा।

सुन वुकोंग शा वुजिंग के पास पहुँचा। दोनों प्रसन्नता से वापस आये।

झू बाजिए दरवाज़े से टिककर कराह रहा था।

—कितने बजे से यहाँ खड़े हो?

—भाई, जल आया?

बूढ़ी महिला ने एक फूलों वाला चीनी मिट्टी का प्याला लेकर आधा भरा और तांग सान्ज़ांग को दिया—

—बस एक घूँट पीजिये, गर्भ नष्ट हो जाएगा।

झू बाजिए बोला— मुझे पूरी बाल्टी चाहिए।

—एक बाल्टी पीओगे तो आँतें गल जाएँगी!

झू बाजिए ने भी आधा प्याला पिया।

थोड़ी देर में दोनों के पेट में मरोड़ उठे। झू बाजिए से रहा नहीं, शौच हो गया। तांग सान्ज़ांग भी बाहर गये।

—गुरुजी, हवा में मत जाइये — प्रसव के बाद बीमारी हो सकती है।

बूढ़ी महिला ने पात्र दिये। कुछ देर में दर्द गया, सूजन कम हुई, रक्त-पिंड घुल गया।

बूढ़ी महिला ने सफेद चावल की दलिया बनाई। झू बाजिए ने दस कटोरे खाये और और माँगा।

—कम खाओ। नहीं तो पेट एक थैले जैसा हो जाएगा।

—मैं सुअर हूँ, डरने की क्या बात!

बूढ़ी महिला के परिवार ने बिना गिनाये खाना परोसा।

—यह बचा हुआ जल मुझे दे दो।

—मुझे मत दो।

बाकी जल एक मिट्टी के घड़े में रखकर ज़मीन में दबाया।

—यह बुढ़ापे में काम आएगा।

सभी ने रात वहीं गुज़ारी। अगले दिन प्रातःकाल सब बोले, धन्यवाद किया और पश्चिम की ओर चले।

शुद्ध हुई देह, शुद्ध हुआ मन — अब मार्ग पर फिर मिलेगा क्या? अगले अध्याय में जानें।