Journeypedia
🔍

अध्याय ५२ — सुन वुकोंग का स्वर्ण-मृग गुफा में उत्पात, तथागत बुद्ध ने मुख्य पात्र को संकेत दिया

सुन वुकोंग स्वर्णदंड वापस पाता है; तथागत बुद्ध से सहायता माँगी जाती है; राक्षस का रहस्य प्रकट होता है; परम वृद्ध देव अपने नीले बैल को वापस ले जाते हैं।

पश्चिम यात्रा अध्याय 52 सुन वुकोंग परम वृद्ध देव नीला बैल स्वर्णदंड

स्वर्ग-तुल्य महासंत ने स्वर्णदंड पाया और पर्वत की चोटी पर उछलकर सबको मुस्कुराते हुए दिखाया। स्वर्ग-राजा ली बोले—

—तुम्हारा रत्न मिला, हमारे अस्त्र कब मिलेंगे?

—अब मेरे पास दंड है। किसी तरह उसे हराकर सब अस्त्र वापस लूँगा।

तभी पर्वत की तलहटी में ढोल-नगाड़े बजे और राक्षस अपनी सेना के साथ आ गया। सुन वुकोंग बोला—

—बढ़िया! ठीक समय पर आये। बैठिए, मैं जाता हूँ।

वह आगे बढ़ा—

—दुष्ट! देखो इस दंड को!

राक्षस ने भाले से रोका—

—बेशरम बन्दर! दिन-दहाड़े मेरा सामान चुरा लिया?

—तू ही बेशरम है! दिन में मेरा दंड लेने की हिम्मत की? अब चखो एक और प्रहार!

दोनों में भीषण युद्ध हुआ:

महासंत प्रहार करता है, राक्षस रोकता है। दंड जैसे ड्रैगन की पूँछ, भाला जैसे अजगर का सिर। दंड के साथ हवा गरजती है, भाले की नोक पर धाराएँ बहती हैं। रंगीन कोहरे में पर्वत डूबता है, बादलों में वृक्ष घुटते हैं।

तीन पहर बीत गये, कोई जीत-हार नहीं। शाम होने लगी।

—सुन वुकोंग, अन्धेरे में लड़ना ठीक नहीं। कल फिर मिलते हैं।

—बेकार की बातें! मैं थका नहीं हूँ।

राक्षस ने झूठा प्रहार किया और गुफा में लौट गया।

सुन वुकोंग के पास आकर स्वर्ग-राजा ने बधाई दी।

—आज का दिन तो बहुत बढ़िया रहा।

—लेकिन उस पाश का क्या? मुझे आज रात चोरी करनी होगी। यह काम रात में ही होता है।

वज्र-देवताओं ने कहा— महासंत को रोको मत। रात का अँधेरा सबसे अच्छा समय है।

सुन वुकोंग पर्वत से उतरा और एक झींगुर बन गया। वह द्वार की दरार से अन्दर घुसा। राक्षस और उसके साथी खा-पी रहे थे। रात गहरी होने पर सब सो गये।

रात के पहले पहर में सुन वुकोंग पीछे के कक्ष में पहुँचा। राक्षस की बाईं बाँह पर वह सफेद पाश कड़े की तरह चढ़ा हुआ था। राक्षस ने उसे और कस लिया और सो गया।

सुन वुकोंग एक पिस्सू बन गया और बाँह पर चढ़ा। एक ज़ोरदार काट लगाई।

—कौन काट रहा है? बिस्तर ठीक से नहीं बिछाया गया!

राक्षस ने पाश और कस लिया। फिर एक और काट।

—बड़ी परेशानी है।

पाश नहीं हटाया जा सकता। सुन वुकोंग एक झींगुर बनकर पिछले कमरे तक पहुँचा जहाँ आग के घोड़े और अजगर बन्द थे। उसने ताले खोले, बालों से बने तीन दर्जन बन्दरों को सभी हथियार उठाने को कहा — तलवारें, भाले, आग के उपकरण — और आग लगाने को कहा।

धमाकों और चीखों के साथ गुफा जल उठी। जले हुए राक्षस कहीं भागें कहाँ? आधे नष्ट हो गये।

सुन वुकोंग बाहर निकला और बोला—

—हथियार लो, हथियार लो!

नेझा ने अपने छह अस्त्र लिये, अग्नि-देव ने अपने उपकरण। सब प्रसन्न।

राक्षस ने अपना पाश निकाला और आग बुझाई — पूर्व की आग बुझाई, पश्चिम की बुझाई। पर गुफा में तांग सान्ज़ांग, झू बाजिए और शा वुजिंग अभी भी क़ैद थे। छोटे राक्षसों की गिनती सौ से नीचे आ गयी।

राक्षस को समझ आया— यह वह बन्दर था। मुझसे मेरे हथियार चुराये, आग लगाई — लेकिन पाश छोड़ूँगा नहीं।

सुबह नेझा बोले— अभी राक्षस थका हुआ है। एक बार और आक्रमण करें।

फिर युद्ध हुआ। इस बार नेझा ने अस्त्र फेंके, अग्नि-देव ने आग लगाई, वज्र-देवताओं ने वज्र-प्रहार किये — सब एक साथ। राक्षस ने शान से अपना पाश निकाला और एक ही बार में सब कुछ — दंड, तलवारें, अस्त्र, वज्र — सब खींच लिये।

राक्षस विजयी होकर लौट गया—

—शहीद हुए इन्हें, उन्हें बधाई दो! तांग सान्ज़ांग को मारकर उत्सव मनाएँगे।

सुन वुकोंग ने स्वर्ग-राजा से कहा— इस पाश को समझना होगा।

—तुम जाकर बुद्ध से पूछो।

—बिल्कुल ठीक। मैं पश्चिम जाता हूँ।

एक पलटी-बादल में वह लिंग-पर्वत पहुँच गया। बिक्षु-नी उससे मिली—

—भिक्षु! पर्वत देखते रहो या भगवान से मिलना है?

—पहली बार आया हूँ, इसलिए देख रहा था।

—मेरे साथ आओ।

वज्रपाणियों ने द्वार पर रोका लेकिन बिक्षु-नी ने अनुनय किया। सुन वुकोंग को प्रवेश मिला।

तथागत बुद्ध ने पूछा— सुन वुकोंग, तुम यहाँ क्यों आये?

—भगवान! मैं तांग सान्ज़ांग की रक्षा करते हुए स्वर्ण पर्वत पर पहुँचा। वहाँ एक सींग वाले राक्षस ने गुरुजी को पकड़ लिया। उसके पास एक सफेद पाश है जो सब कुछ खींच लेता है। स्वर्ग-राजा, नेझा, अग्नि-देव, जल-देव — सबके हथियार उसने खींच लिये। तथागत बुद्ध के सोलह अरहन्तों द्वारा दी गई सोने की रेत भी खींच ली। मुझे बताएँ — यह राक्षस कहाँ से आया?

तथागत बुद्ध ने अपनी दूरदर्शिता से देखा और जान लिया। किन्तु बोले—

—मुझे पता है, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा। तुम्हारा मुँह बड़ा है। यदि मैंने कहा वह कहाँ का है, वह मुझ पर आक्रमण कर देगा। मैं तुम्हारी सहायता करूँगा — सोलह अरहन्तों के पास सोने की रेत है। उससे उसे फँसा देंगे।

अठारह अरहन्तों के साथ सुन वुकोंग लौटा — लेकिन गिनती में केवल सोलह थे। सुन वुकोंग चिल्लाया—

—दो कहाँ गये?

—हम पीछे थे — भगवान से निर्देश ले रहे थे।

शमन-ड्रैगन और शमन-बाघ अरहन्त आगे बढ़े और बोले— फिर से शोर मचाओ।

—पहले होता तो बेहतर था।

राक्षस बाहर निकला। सुन वुकोंग उसे खींचते हुए दूर ले गया। अरहन्तों ने सोने की रेत फेंकी:

जैसे धुन्ध, जैसे कोहरा, आसमान से गिरती है। सफेद, अन्धा, हर आँख में भर जाती है। भारी-हल्की, जौ के आटे जैसी या तिल के दाने जैसी।

राक्षस का पाँव तीन हाथ धँस गया। ऊपर उठा तो और दो हाथ धँस गया। उसने जल्दी से पाश निकाला और ऊपर फेंका—

—पकड़ो!

सोने की अठारह गोलियाँ उसमें समा गयीं। अरहन्त खाली हाथ रह गये।

अब दोनों पाताल-शमन-अरहन्त सुन वुकोंग के पास आये—

—तथागत बुद्ध ने कहा था — यदि रेत भी जाये, तो परम वृद्ध देव के तुशीत महल में जाओ और उस राक्षस की असलियत ढूँढो।

—बुद्ध ने मुझसे यह पहले क्यों नहीं कहा!

स्वर्ग-राजा ली बोले— तो जल्दी जाओ।

सुन वुकोंग एक पलटी-बादल में तैंतीसवें स्वर्ग में स्थित घृणा-त्याग महल पहुँचा। वहाँ दो बालक-शिष्य द्वार पर थे।

—रुको, सूचना दो।

—मैं सूचना का इन्तज़ार नहीं करता।

वह भीतर घुसा। परम वृद्ध देव स्वयं बाहर आ गये—

—बन्दर! धर्मग्रन्थ लेने नहीं जा रहे? यहाँ क्यों?

—धर्मग्रन्थ तो जा रहा हूँ, पर रास्ते में बाधा आई।

परम वृद्ध देव ने मुस्कुराते हुए पूछा— पश्चिम की बाधा से मेरा क्या सम्बन्ध?

—तुम्हारी चीज़ मुझे परेशान कर रही है।

सुन वुकोंग ने भीतर जाकर देखा — बैल का बाड़ा खाली था। एक नींद में सोया हुआ बालक-शिष्य था।

—परम वृद्ध देव! बैल भाग गया!

बालक ने आँखें खोलीं—

—मैंने एक गोली खाई और सो गया।

—यह मेरी सात-वापसी अग्नि-गोली थी। एक गोली सात दिन की नींद देती है। बैल सात दिन पहले भाग गया होगा।

परम वृद्ध देव ने जाँच की — सब ठीक था, सिवाय एक चीज़ के — वज्र-चाप नहीं था।

—उस राक्षस ने मेरा वज्र-चाप चुरा लिया!

—तो यही वह रत्न था जिसने मेरा दंड खींचा था! वह नीचे बड़ा उत्पात मचा रहा है — मेरे दंड से, नेझा के अस्त्रों से, अग्नि-उपकरणों से, सोने की रेत से — सब उसी चाप में।

—मैं स्वयं चलता हूँ।

परम वृद्ध देव ने केले-पत्र पंखा लिया और साथ उड़े। स्वर्ग-राजा ली, अरहन्तों और वज्र-देवताओं ने स्वागत किया।

—सुन वुकोंग! उस बैल को फिर बुलाओ।

सुन वुकोंग फिर नीचे पहुँचा—

—दुष्ट पशु! बाहर आओ!

राक्षस बाहर आया। सुन वुकोंग ने झूठा पलायन किया और राक्षस पीछे भागा। तभी ऊँची चोटी से आवाज़ आई—

—ओ बैल! घर वापस आने का समय नहीं हुआ?

राक्षस ने ऊपर देखा — परम वृद्ध देव! वह भय से काँप उठा।

—वह बन्दर तो सच में पृथ्वी का भूत है! मेरे स्वामी को कैसे खोज लिया?

परम वृद्ध देव ने एक मन्त्र पढ़ा और पंखे से एक बार फूँका। राक्षस का पाश ऊपर उठा — परम वृद्ध देव ने उसे पकड़ लिया। एक और फूँक — राक्षस की शक्ति जाती रही। असली रूप प्रकट हुआ — एक नीला बैल। परम वृद्ध देव ने वज्र-चाप को उसकी नाक में डाला, रस्सी बाँधी और उसकी पीठ पर बैठ गये।

तब से यही रिवाज़ है — बैल की नाक में नकेल डाली जाती है।

परम वृद्ध देव आकाश में विदा हुए।

सुन वुकोंग ने स्वर्ग-राजा ली और नेझा का धन्यवाद किया। सभी स्वर्ग को लौटे। फिर गुफा में घुसकर सारे छोटे राक्षसों को समाप्त किया। तांग सान्ज़ांग, झू बाजिए और शा वुजिंग को मुक्त किया। सफेद घोड़ा और सामान सुरक्षित था।

तीनों ने सुन वुकोंग का आभार माना। सामान बाँधा, घोड़े पर चढ़े, पश्चिम की राह चले।

रास्ते में एक आवाज़ सुनाई दी—

—तांग संत! पहले भोजन करो।

किसका था यह स्वर? अगले अध्याय में जानें।