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अध्याय ५० — भावना से मन भटका, माया-जाल में फँसा — महासंत दैत्य के सामने पड़े

सुन वुकोंग का खाना माँगने जाना — झू बाजिए की चालाकी से तांग सान्ज़ांग सुरक्षा-घेरा छोड़ता है — एक सींग वाले गैंडे-दैत्य का जादुई छल्ला सब कुछ निगल जाता है।

एक-सींग गैंडा दैत्य जादुई छल्ला स्वर्ण-पर्वत सुन वुकोंग तांग सान्ज़ांग

कछुए की पीठ से उतरते ही तांग सान्ज़ांग ने कहा — "वुकोंग — आगे पहाड़ दिखता है।"

"हाँ — और दूरी है।"

झू बाजिए ने आकाश देखा — "शाम हो रही है। खाना कहाँ से आएगा?"

सुन वुकोंग ने कहा — "गुरुजी — आप यहाँ रुकिए। मैं दक्षिण में कहीं खाना माँगकर लाता हूँ।"

"ठीक है।"

"पर एक काम — यहाँ से मत हिलिए।"

सुन वुकोंग ने अपनी लाठी निकाली। ज़मीन पर एक गोल रेखा खींची — पूरब से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर, उत्तर वापस पूरब।

"यह घेरा लोहे की दीवार जैसा है। अंदर रहो — कोई दैत्य नहीं आएगा। बाहर मत निकलना — चाहे कुछ भी हो।"

तांग सान्ज़ांग ने कहा — "समझ गया।"

"और तुम दोनों — भाइयो — गुरु की रक्षा करो।"

"जाओ — जल्दी आना।"


सुन वुकोंग उड़ चले।

घेरे के अंदर तांग सान्ज़ांग बैठे — माला जपते हुए।

झू बाजिए भूखा था।

"गुरुजी — भाई को गए बहुत देर हो गई।"

"अभी-अभी गए हैं।"

"पर यहाँ बैठे-बैठे पैर सुन्न हो गए।"

"जपो — मन लगाओ।"

थोड़ी देर बाद — पश्चिम की ओर से आवाज़ आई।

एक बुढ़िया — झुकी हुई — एक बच्चे का हाथ थामे। वह रो रही थी।

"हाय — मेरा बच्चा! मेरा बच्चा!"

तांग सान्ज़ांग उठे।

झू बाजिए ने कहा — "गुरुजी — घेरे से बाहर मत जाइए।"

"पर वह रो रही है — बच्चा खो गया है।"

"भाई ने कहा था — चाहे कुछ भी हो।"

"पर दया का धर्म है।"

झू बाजिए ने कहा — "ठीक है — पर हम साथ चलते हैं।"


तीनों घेरे से बाहर निकले।

बुढ़िया ने पलटकर देखा — आँखें चमकीं।

झू बाजिए ने महसूस किया — कुछ गड़बड़ है।

"गुरुजी — रुको।"

पर तब तक — तेज़ हवा का झोंका। धुआँ। एक भव्य महल प्रकट हुआ।

महल के द्वार खुले। अंदर से सैकड़ों राक्षस निकले।

बुढ़िया ने रूप बदला — एक राक्षसी।

"पकड़ो।"

झू बाजिए ने हल उठाया। शा वुजिंग ने दंड उठाया।

पर राक्षस बहुत थे।


बड़े राक्षस ने तीन सिलाई-पैड मेज़ पर रखे।

लाल रेशम का बाहरी आवरण, बीच में भरी हुई रूई। देखने में गर्म, छूने में नरम — पर यह सुंदरता एक जाल है।

"महाराज — हम तीन बंदर को छोड़कर तीन को लाए। इनके शिष्यों को क्या करें?"

"उन्हें पहले सिलाई-पैड दो।"

झू बाजिए ने कहा — "अरे — ठंड में गर्म जैकेट मिल रही है! शुक्रिया।"

"डालो।"

झू बाजिए ने एक जैकेट पहनी।

शा वुजिंग ने दूसरी।

एक राक्षस ने तीसरी — तांग सान्ज़ांग को।


अगले ही पल — जैकेटें कसने लगीं।

जैसे साँप शिकार को लपेटे, जैसे बेड़ियाँ पाँव जकड़ें। रेशमी धागा लोहे की तरह — तीनों बंद हो गए — हाथ, पाँव, छाती।

झू बाजिए चिल्लाया — "यह जादू है!"

शा वुजिंग ने कहा — "भाई को बुलाओ — भाई!"

तांग सान्ज़ांग ने कहा — "हाय — सुन वुकोंग — जल्दी आओ।"

पर आवाज़ महल की दीवारों में गुम हो गई।


दैत्य-राजा अपने सिंहासन पर बैठा। तीनों बंदियों को सामने लाया गया।

वह बड़ा था — एक सींग। माथे पर सोने का मुकुट।

एक ही सींग — आसमान को छूता, आँखें — दो जलते सितारे। मुँह — जैसे खाई, नाक — जैसे पहाड़ की चोटी। हाथ में भाला — बादलों में चमकता। देह — पत्थर की दीवार।

"तांग का भिक्षु — यहाँ कैसे आया?"

तांग सान्ज़ांग बोल नहीं पाए।

"पिछले कमरे में बंद करो। जब वानर आए — तब देखेंगे।"


सुन वुकोंग खाना लेकर लौटे।

घेरे के पास आए — खाली।

लाठी जमीन पर टेकी। आसमान से देखा — घेरे के बाहर एक रेखा — पाँव के निशान — पश्चिम की ओर।

"क्या हुआ?"

नीचे आए। पाँव के निशान ढूँढे। सब पश्चिम की ओर जाते थे।

पर एक जगह — घोड़े की नाल और पहिए का निशान भी था।

"लगता है — सामान भी गया।"

एक बूढ़ा किसान रास्ते पर मिला।

"बाबा — इस रास्ते पर क्या है?"

बूढ़े ने पलटकर देखा — "महासंत — यह स्वर्ण-पर्वत है। पश्चिमी ढलान पर स्वर्ण-गुफा है।"

"वहाँ कौन रहता है?"

"एक सींग वाला गैंडा-दैत्य — 'एक-सींग-महाराजा'। बड़ा शक्तिशाली।"

सुन वुकोंग ने आँखें सिकोड़ीं। "तुम कौन हो?"

बूढ़ा हँसा। "महासंत — हम पर्वत-देवता हैं। भूमि-देवता के साथ यहाँ आए थे — आपको सूचना देने।"

"जाओ।"

देवता अदृश्य हो गए।


सुन वुकोंग सीधे पर्वत-गुफा की ओर उड़े।

"दैत्य! दरवाज़ा खोलो।"

भीतर से शोर — फिर एक राक्षस बाहर आया।

"तुम कौन हो?"

"पूर्वी तांग के भिक्षु का शिष्य — सुन वुकोंग। मेरे गुरु और भाइयों को छोड़ो।"

"ठहरो।"

भीतर जाकर सूचना दी।

दैत्य-राजा बाहर निकला — भाले को कंधे पर रखकर।

"तुम वह वानर हो — जिसने पाँच-तत्त्व पर्वत से छुटकारा पाया?"

"हाँ।"

"तो आज देखते हैं।"


भाला और लाठी टकराए।

जैसे दो पर्वत आपस में भिड़ें, जैसे समुद्र और आकाश में बिजली गिरे। भाला — लहर जैसा, लाठी — अजगर जैसी। दोनों में कोई कम नहीं।

तीस दाँव — बराबरी।

पैंतीस — फिर बराबरी।

सुन वुकोंग ने लाठी घुमाई — तेज़।

दैत्य ने पीछे हटकर इशारा किया — सैकड़ों छोटे राक्षस चारों ओर से आ गए।

सुन वुकोंग ने एक बाल खींचा — मुँह में डाला — चबाया — "बदलो!"

हज़ार नकली सुन वुकोंग।

हर हाथ में एक लाठी।

चारों ओर घूमते हुए — हर राक्षस पर।


तभी दैत्य-राजा ने आस्तीन से एक वस्तु निकाली।

सफ़ेद। गोल। एक छल्ला — जैसे हाथी-दाँत।

आसमान में उठाया।

"पकड़!"

एक आवाज़ — जैसे गड़गड़ाहट।

छल्ले ने आकार लिया — एक विशाल घेरा।

हज़ार लाठियाँ — सब खिंचती चली गईं।

जैसे चुम्बक लोहे को खींचे, जैसे भँवर पत्तों को निगले। एक-एक लाठी — एक-एक छाया — सब उस सफ़ेद छल्ले में समा गईं।

दैत्य ने छल्ला बंद किया।

सुन वुकोंग के हाथ खाली हो गए।

"मेरी लाठी!"

दैत्य हँसा — "आज का हिसाब बाद में।" और गुफा में घुस गया। दरवाज़ा बंद।


सुन वुकोंग वहीं खड़े रहे।

हाथ खाली।

गुरु — भीतर। भाई — भीतर। लाठी — भीतर।

आसमान पर काले बादल छा रहे थे।

पर सुन वुकोंग का मन नहीं टूटा।

"जो जाता है — वह वापस आता है।"

उन्होंने मुट्ठी बंद की और आकाश की ओर उड़ चले।

अगले अध्याय में — आकाश की मदद और धरती की चुनौती।