अध्याय ४९ — तांग सान्ज़ांग जल-महल में बंदी, गुआनयिन ने मछली की टोकरी से संकट हरा
गुआनयिन बोधिसत्त्व बाँस की टोकरी से स्वर्गाभिगामी नदी के दैत्य को पकड़ती हैं और तांग सान्ज़ांग को मुक्त करती हैं।
सुन वुकोंग ने झू बाजिए और शा वुजिंग से कहा — "कौन पहले उतरेगा?"
झू बाजिए ने कहा — "भाई — तुम ही जाओ पहले।"
"तुम दोनों जानते हो — पानी में मेरा हाथ नहीं चलता। वहाँ मुझे मछली या केकड़े का रूप लेना पड़ेगा — और तब लाठी नहीं चलेगी।"
शा वुजिंग ने कहा — "हम दोनों जाते हैं — पहले हालात देखते हैं।"
झू बाजिए ने सोचा — "यह बंदर इतने समय से मुझे परेशान करता रहा है। आज मैं इसे पानी में डुबोऊँगा।"
"भाई — मैं तुम्हें पीठ पर ले जाता हूँ।"
सुन वुकोंग समझ गए। लेकिन उन्होंने भी चाल चली — एक बाल खींचा, उसे पीठ पर छोड़ा। असली शरीर जूँ बना और झू बाजिए के कान में घुस गया।
पानी के अंदर जाते ही झू बाजिए ने एक झटका दिया — सुन वुकोंग को आगे फेंका।
बाल-शरीर उड़ गया — अदृश्य।
शा वुजिंग ने कहा — "दूसरे भाई! ध्यान रखो — भाई को गिरा दिया।"
झू बाजिए ने कहा — "चलो — भाई तो गया। हम गुरु को ढूँढते हैं।"
शा वुजिंग — "नहीं — उनके बिना मैं नहीं जाऊँगा।"
कान से आवाज़ आई — "शा वुजिंग! मैं यहाँ हूँ।"
झू बाजिए घबराया और घुटनों पर गिरा — "भाई! माफ़ करो।"
"ठीक है — पर बाद में। चलो।"
सौ-एक सौ ली और अंदर — एक महल दिखा — "जल-कछुआ-महल।"
शा वुजिंग ने कहा — "यह दैत्य का घर लगता है।"
सुन वुकोंग झींगा-मछली का रूप लेकर अंदर घुसे।
वहाँ दैत्य बैठा था। एक धब्बेदार मछली-बुढ़िया पास थी।
"तांग सान्ज़ांग अभी पिछले कमरे में है — कल तक रहने दो — फिर खाएँगे।"
सुन वुकोंग ने गुरु को ढूँढा। पत्थर के ताबूत में बंद थे।
ऊपर झुककर सुना — तांग सान्ज़ांग रो रहे थे:
"मेरे जन्म से ही जल-आपदाएँ। माँ के गर्भ से निकला — लहरों में बहाया गया। पश्चिम जाने को निकला — काली नदी में फँसा, अब यह।
क्या शिष्य आएँगे? क्या सूत्र मिलेगा?"
सुन वुकोंग ने कहा — "गुरुजी — मत रोओ। मैं आया हूँ।"
"जल्दी बचाओ।"
"थोड़ा और सहो। हम दैत्य को पकड़ते हैं — तब निकलोगे।"
बाहर आकर झू बाजिए को संकेत दिया।
झू बाजिए द्वार पर आया — "दैत्य! गुरु दो।"
दैत्य बाहर निकला — लाल ताँबे का हथौड़ा लेकर।
सोने का शिरस्त्राण चमकता है, सोने का कवच इंद्रधनुष बुनता है। नाक ऊँची — पर्वत-शिखर जैसी, माथा चौड़ा — राजसी। आँखें गोल, चमकती हुईं। छोटे बाल — आग जैसे लाल। हाथ में नौ-खंड ताँबे का हथौड़ा — द्वार खुलने की आवाज़ जैसे वसंत की गरज।
"तुम कौन हो — यहाँ आने की हिम्मत कैसे की?"
"मैं पूर्वी तांग के भिक्षु का शिष्य हूँ। गुरु दो।"
"तुम रात को बालक बनकर आए — अब भिक्षु बनकर। पहले मैं छोड़ दिया था — अब नहीं।"
झू बाजिए ने नव-दंती हल उठाया।
दैत्य ने हथौड़ा उठाया।
शा वुजिंग भी आ गया।
तीनों लड़े — पानी में, दो घंटे — बराबरी।
झू बाजिए ने शा वुजिंग को इशारा किया — भागते हैं। दैत्य पीछा करे — बाहर आए।
दैत्य चिल्लाया — "छोड़ो मत।" पर उसे संदेह था।
दोनों पानी से बाहर निकले। दैत्य भी बाहर आया।
"देखो!"
सुन वुकोंग ने कहा — "लाठी देखो।"
दैत्य ने हथौड़े से रोका — तीन दाँव में हार गया — और पानी में घुस गया।
"भाई — यह बड़ा मज़बूत है। पानी में भी हमसे बेहतर।"
शा वुजिंग ने कहा — "दरवाज़ा बंद करके बैठा है।"
सुन वुकोंग ने कहा — "चलो — मैं दक्षिण सागर जाता हूँ। गुआनयिन बोधिसत्त्व से पूछता हूँ — यह दैत्य कौन है।"
झू बाजिए — "बहुत समय लगेगा।"
"मैं जाकर आता हूँ।"
एक ही पलटी में पोटाला पर्वत पहुँचे।
"महासंत कहाँ जा रहे हो?" — देव-सेवकों ने पूछा।
"बोधिसत्त्व से मिलना है।"
"आज बोधिसत्त्व बाँस के जंगल में हैं। बोल गई हैं — महासंत आएँगे तो रुकाना।"
"प्रतीक्षा नहीं होती — गुरु का जीवन दाँव पर है।"
जंगल में घुसे। देखा — बोधिसत्त्व साड़ी उठाकर, नंगे पैर, बाल बिखरे — बाँस की छड़ियाँ काट रही थीं।
सुन वुकोंग ने आवाज़ दी — "बोधिसत्त्व!"
"बाहर रुको।"
"गुरु संकट में हैं — स्वर्गाभिगामी नदी का दैत्य।"
"बाहर जाओ — मैं आती हूँ।"
बाहर आकर बोधिसत्त्व के हाथ में एक बाँस की टोकरी थी।
"सुन वुकोंग — चलो।"
"कपड़े पहनेंगी नहीं?"
"ज़रूरत नहीं।"
बोधिसत्त्व अपनी साड़ी में, बाल बिखरे, नंगे पैर — उड़ चलीं। सुन वुकोंग पीछे।
झू बाजिए और शा वुजिंग ने देखा — "भाई ने बिना साज-सज्जा की बोधिसत्त्व को खींच लाया।"
नदी किनारे पहुँचीं।
बोधिसत्त्व ने टोकरी में एक धागा बाँधा। आधे बादल पर खड़ी हुई। टोकरी नदी के ऊपरी धारे में डाली।
मुँह से बोलती रहीं:
"मरे चले जाओ, जीवित रहो। मरे चले जाओ, जीवित रहो।"
सात बार।
टोकरी खींची — अंदर एक सुनहरी मछली थी। आँखें झपकाती, शल्क चमकाती।
"सुन वुकोंग! जाओ — गुरु को निकालो।"
"पर दैत्य पकड़ा नहीं।"
"यही दैत्य है।"
झू बाजिए और शा वुजिंग ने अचंभे से पूछा — "यह मछली इतना कर सकती है?"
बोधिसत्त्व ने कहा — "यह मेरे कमल-कुंड की सुनहरी मछली थी। प्रतिदिन सूत्र सुनकर सीखती रही। उसका नौ-खंड ताँबे का हथौड़ा असल में एक कमल की अखुलती कली थी — जिसे उसने साधकर हथियार बनाया।
एक दिन समुद्र का ज्वार आया — और वह बह गई। मैंने आज सुबह पानी में जाँचा — वह यहाँ है।"
"बोधिसत्त्व — थोड़ा रुकिए। गाँव के लोगों को भी दर्शन कराएँ — ताकि उन पर विश्वास हो।"
"ठीक है।"
झू बाजिए और शा वुजिंग दौड़े। "सब आओ — जीवित बोधिसत्त्व दर्शन देती हैं!"
गाँव के लोग नदी किनारे दौड़े — कीचड़ में घुटने भींगे — पर सब झुक गए। जो चित्र बनाना जानते थे, उन्होंने बोधिसत्त्व का चित्र बनाया — यही 'मछली-टोकरी वाली गुआनयिन' की कथा है।
बोधिसत्त्व दक्षिण सागर की ओर चली गईं।
शा वुजिंग और झू बाजिए पानी में उतरे। जल-महल में पहुँचे।
सभी राक्षस-मछलियाँ मर चुकी थीं।
पिछले कमरे में पत्थर का ताबूत। उठाया।
तांग सान्ज़ांग और झू बाजिए — दोनों बाहर निकले।
एक-एक को पीठ पर — ऊपर।
झू बाजिए ने दैत्य को बँधा देखा — हल उठाया।
"तुम अब नहीं खाओगे?"
सुन वुकोंग ने रोका — "छोड़ो।"
किनारे पर चेन परिवार ने स्वागत किया।
"अब नाव की ज़रूरत है। कोई पार कराओ।"
तभी नदी से आवाज़ — "सुन वुकोंग! नाव मत बनवाओ। मैं पार कराऊँगा।"
सुन वुकोंग ने लाठी उठाई।
"मत मारो। मैं कृतज्ञ हूँ।"
पानी से एक विशाल कछुआ निकला — चार हाथ का दायरा।
"महासंत — यह जल-कछुआ-महल मेरा था। वह मछली-दैत्य आया और छीन लिया। मेरे परिजन मारे गए। आपने उसे हटाया — घर वापस मिला। मैं सच्चे मन से पार कराऊँगा।"
"सच में?"
"प्रतिज्ञा करता हूँ।"
कछुए की पीठ पर सवार हुए। घोड़ा भी।
सुन वुकोंग ने कछुए की नाक में एक धागा डाला — लगाम की तरह।
कछुआ चार पाँव फैलाकर चला — जैसे पानी पर ज़मीन हो।
किनारे के लोग अगरबत्ती जलाकर प्रणाम करते रहे।
एक दिन में आठ सौ ली — और पश्चिमी किनारे पर।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "वृद्ध कछुए — आभार। लौटते समय कुछ देंगे।"
"एक बात पूछनी है। मैं यहाँ तेरह सौ साल से साधना कर रहा हूँ। पर खोल नहीं छूटती। क्या तथागत बुद्ध से पूछोगे — मैं कब इंसानी शरीर पाऊँगा?"
"ज़रूर पूछूँगा।"
कछुआ पानी में चला गया।
सत्य-संत प्रतिज्ञा पूरी करते हैं — पानी दूर हो तो भी, पर्वत ऊँचे हों तो भी। भिक्षु का मन अटल — मृत्यु से भी न डरा, सफ़ेद कछुए की पीठ पर — स्वर्गाभिगामी नदी पार की।
अगला अध्याय — नए राक्षस, नई परीक्षा।