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अध्याय ४८ — राक्षस ने शीत-हवा चलाई और बड़ी बर्फ़ गिराई, भिक्षु ने बुद्ध की ओर जाने की ललक से जमी बर्फ़ पार की

स्वर्गाभिगामी नदी का दैत्य बर्फ़ और ठंड से नदी जमा देता है और तांग सान्ज़ांग को पकड़ लेता है।

स्वर्गाभिगामी नदी जमा हुआ पानी ठंड का राक्षस तांग सान्ज़ांग सुन वुकोंग

चेन-परिवार के लोग मंदिर में पहुँचे। थाल, बलि-वस्तुएँ, दीपक, धूप — सब रखे। बच्चों को ऊपर रखा गया।

सभी ने माथा टेका — "दैत्य महाराज! इस साल चेन परिवार के अनुसार — एक बाल-वर चेन-गुआन-बाओ, एक बाल-वधू चेन एक-तराजू-सोना। पाँच पशु-बलि। हमें आशीर्वाद दो।"

कागज़ जलाए। सब घर चले गए।

झू बाजिए ने कहा — "चलें?"

"कहाँ?"

"चेन परिवार सोने जाएँ।"

"बेवकूफ! हमने वचन दिया है — पूरा करो।"

तभी हवा गरजी।

मंदिर के द्वार पर एक दैत्य खड़ा था:

सोने का शिरस्त्राण, सोने का कवच, रत्न-जड़ित कमरबंद, हल्की धुंध उसके चारों ओर। आँखें तारे जैसी — रात को चमकती हैं, दाँत आरी जैसे — दो पंक्तियाँ। बाल छोटे, खड़े — आग जैसे, दाढ़ी लंबी — सोने की कीलें। मुँह में एक हरी सिवार की टहनी, हाथ में नौ-खंड वाला लाल ताँबे का हथौड़ा। द्वार खुलने की आवाज़ वसंत की गरज जैसी।

दैत्य ने पूछा — "इस साल कौन परिवार?"

सुन वुकोंग मुस्कुराए — "चेन परिवार।"

दैत्य को शक हुआ। "पहले कभी बच्चे बोलते नहीं थे — यह बोल रहा है।"

"बालक — तुम्हें खाऊँगा।"

"खाइए।"

दैत्य घबराया।

"तुम्हारा नाम?"

"चेन-गुआन-बाओ।"

"पहले बाल-वर खाते हैं — आज बाल-वधू पहले।"

झू बाजिए घबराया — "पहले वाली विधि रहने दो!"

दैत्य ने हाथ बढ़ाया। झू बाजिए ने छलाँग लगाई — असली रूप में आया — हल से मारा।

दैत्य हाथ खींचकर भागा। ठनकाहट — दो मछली की शल्काएँ गिरीं।

"पीछा करो!"

दोनों उड़े। दैत्य रिक्तहस्त था — हथियार नहीं।

"तुम पूर्वी तांग के भिक्षु हो?" उसने पूछा।

"हाँ — और तुम एक नदी का राक्षस — बच्चे खाते हो!"

दैत्य बोला — "तुम्हारे गुरु को पकड़ूँगा।"

झू बाजिए ने फिर मारा — दैत्य पानी में घुस गया।

सुन वुकोंग ने कहा — "पीछा करने की ज़रूरत नहीं। यह नदी का प्राणी है — कल व्यवस्था करेंगे।"

मंदिर में वापस आए — सब बलि-भोजन, टेबल समेत — चेन परिवार के घर ले गए।

तांग सान्ज़ांग प्रतीक्षारत थे। सारी बात सुनी। दोनों बूढ़े खुश हुए।


रात भर दैत्य अपने जल-महल में चुपचाप बैठा रहा।

"महाराज — हर साल भोज से खुश आते थे — आज उदास क्यों?"

"आज एक बड़े विरोधी से मुलाक़ात हुई। मैंने वर्षों से सुना था — तांग के भिक्षु का माँस खाने से अमरत्व मिलता है।"

एक धब्बेदार मछली-बुढ़िया आगे आई — "महाराज — उसे पकड़ना मुश्किल नहीं।"

"मेरी बात मानो — पूरी नदी बर्फ़ में जमाओ। रात के तीसरे पहर, हवा चलाओ, बर्फ़ गिराओ। हम लोग इंसानों का रूप लेंगे — बर्फ़ पर चलेंगे। तांग के भिक्षु जल्दी में हैं — वे देखेंगे और उस पर चलने लगेंगे। तुम पानी के नीचे बैठो — बर्फ़ फोड़ो — सब गिर जाएँगे।"

दैत्य प्रसन्न हुआ। रात में निकला — हवा चलाई, बर्फ़ गिराई।


चेन परिवार में रात को ठंड बढ़ती रही।

झू बाजिए कँपते हुए उठे — "भाई! बड़ी ठंड है।"

तांग सान्ज़ांग ने बाहर देखा:

आकाश में घने लाल बादल, धरती पर मोटी बर्फ़। देवदार पर बर्फ़-फूल खिले, पुरानी बेल पर चाँदी लटकी। बाहर पानी बर्फ़ बना, ऊँचे पहाड़ का दिल भी सफ़ेद।

बर्फ़ के फाहे उड़ते हैं — हंस के पंखों जैसे। तूफ़ान रुका, धरती पर चाँदनी। दिशाएँ धुँधली, रास्ते सफ़ेद।

चेन परिवार ने गर्म पानी, चाय, कोयले की अँगीठी लाई।

दोपहर तक बर्फ़ और बढ़ी — दो हाथ ऊँची।

तांग सान्ज़ांग व्याकुल थे — "इतने साल बीत गए। तांग सम्राट ने तीन साल का वादा माँगा था।"

बूढ़े ने कहा — "यहाँ रहिए — जब बर्फ़ पिघले, हम नाव की व्यवस्था करेंगे।"

शा वुजिंग ने कहा — "गुरु — रुकना भी ठीक नहीं, जाना भी ठीक नहीं। कम से कम नदी देखने चलते हैं।"

बूढ़े ने छह घोड़े निकाले।

नदी के पास आए —

बर्फ़ पहाड़ जितनी, बादल हटे — सुबह साफ़। उत्तर का पाला — हड्डियाँ कँपाता है। जमे हुए तट पर बगुले डरते हैं। ठंड से चींटियाँ जम गईं, उत्तर-भूमि में चूहों को बिल मिले। नदी का रास्ता दर्पण-चिकना, कोई लहर नहीं — जैसे पत्थर की धरती।

सुन वुकोंग ने किनारे पर देखा — लोग बर्फ़ पर चल रहे थे!

तांग सान्ज़ांग ने पूछा — "वे कहाँ जा रहे हैं?"

"वे व्यापारी हैं — नदी पार करके पश्चिम जाते हैं।"

"धन के लिए लोग जीवन दाँव पर लगाते हैं। हम भी नाम और धर्म के लिए जाते हैं — क्या फ़र्क़ है?"

"सुन वुकोंग — चलो।"

झू बाजिए ने नव-दंती हल से बर्फ़ ठोकी — एक ज़ोरदार ठोकर — हाथ झनझनाया।

"जाओ — एकदम जमी है।"

चेन परिवार ने सूखी घास दी — घोड़े के खुर लपेटे।

बर्फ़ पर चले।

झू बाजिए ने कहा — "लाठी आड़ी रखो — बर्फ़ में छेद हो तो आड़ी लाठी सहारा देगी।"

सबने अपनी-अपनी लाठी आड़ी की — और रात भर चले।


अगले दिन सुबह — बर्फ़ के नीचे से एक ज़ोर की आवाज़। घोड़ा लड़खड़ाया।

तांग सान्ज़ांग — "क्या हुआ?"

झू बाजिए — "इतनी जमी बर्फ़ — नीचे तक ज़म गई होगी।"

तांग सान्ज़ांग आश्वस्त हुए। आगे बढ़े।

अचानक — एक और गर्जना — बर्फ़ टूटी।

सुन वुकोंग ऊपर उड़ गए।

श्वेत नाग-अश्व पानी में गिरा। तांग सान्ज़ांग, झू बाजिए, शा वुजिंग — सब नीचे।

दैत्य ने तांग सान्ज़ांग को पकड़ा और पानी के महल में ले गया।

"मछली-बहन! हमारा समझौता पूरा। आओ — भोज होगा।"

"महाराज — रुकिए। उनके शिष्य खोजेंगे। दो दिन रहने दो — फिर शांति से खाओ।"

दैत्य ने माना। तांग सान्ज़ांग को एक पत्थर के ताबूत में बंद कर दिया।


झू बाजिए और शा वुजिंग ने तैरकर सामान उठाया। श्वेत नाग-अश्व को बाहर लाए।

सुन वुकोंग ऊपर से देख रहे थे।

"गुरु कहाँ?"

"गुरु नीचे चले गए।"

"बर्फ़ पर चलो — किनारे पर।"

पूर्वी किनारे पर आए। कपड़े सुखाए।

चेन परिवार के पास खबर आई — "चार में से एक नहीं बचा।"

दोनों बूढ़े दरवाज़े तक आए — सुन वुकोंग ने कहा — "रोओ मत। यह उसी दैत्य का काम है। मैं खोजूँगा।"


तीनों ने खाया। हथियार उठाए।

नदी किनारे पहुँचे।

"भाई — कौन पहले उतरेगा?"

"पानी में मैं नहीं जा सकता — वहाँ मेरी शक्ति काम नहीं करती।"

शा वुजिंग ने कहा — "मैं जाता हूँ।"

"तुम जाओ — पर हालत देखकर बाहर आओ।"

तांग सान्ज़ांग को बचाने का रास्ता — अगले अध्याय में।