अध्याय ४७ — पवित्र भिक्षु ने रात में स्वर्गाभिगामी नदी को रोका, स्वर्ण और काष्ठ ने करुणा से बच्चों को बचाया
स्वर्गाभिगामी नदी के पास चेन परिवार के घर में रात बिताते हुए सुन वुकोंग और झू बाजिए बच्चों की बलि रोकते हैं।
राजा देर रात तक रोता रहा। सुन वुकोंग आगे आए।
"महाराज — रोना बंद करो। उन तीन राक्षसों की लाशें देखो — एक बाघ, एक हिरण, एक मेमना। ये जानवर थे जो यहाँ आकर तुम्हें धोखा दे रहे थे। तुम्हारा साम्राज्य अगर दो साल और चलता, तो वे तुम्हारी जान ले लेते। हमने समय रहते इन्हें नष्ट किया। अब अनुमति-पत्र दो।"
राजा सँभला।
सभी मंत्री बोले — "तीनों की मृत देह सचमुच बाघ, हिरण और मेमने की है। भिक्षु का कहना सच है।"
राजा ने अगले दिन भोज का आदेश दिया।
शिष्यों ने रात में आराम किया। सुबह बुद्धि-सागर मंदिर में राजा स्वयं आया, भोज किया, अनुमति-पत्र पर मुहर लगाई।
भिक्षु जो छुपे थे, वे सब 'भिक्षु-बुलावे का राज-आदेश' सुनकर लौट आए। सुन वुकोंग ने बाल वापस लिए।
दरबार में राजा के सामने खड़े होकर सुन वुकोंग ने कहा — "यहाँ के भिक्षुओं ने कोई गलती नहीं की। मैंने दो पुजारियों को मारा। पाँच सौ भिक्षुओं को मुक्त किया। गाड़ियाँ तोड़ीं। मंदिर में प्रसाद खाया। तुम्हारे तीन 'राष्ट्रीय गुरु' — मैंने मारे। आज से तीनों धर्मों को एक जानो — बुद्ध का भी सम्मान, ताओ का भी, और प्रजा को शिक्षित भी करो। तब राज्य सुरक्षित रहेगा।"
राजा ने सिर झुकाया।
वे चले। बसंत बीता, गर्मी आई, शरद आई।
एक शाम तांग सान्ज़ांग ने रुककर पूछा — "आज रात कहाँ?"
"गुरुजी — साधु को यह नहीं सोचना। चाँद की रोशनी में आगे चलते हैं।"
थोड़ी देर में पानी की गर्जना — एक और नदी।
झू बाजिए ने एक पत्थर फेंका — "गहरी है।"
सुन वुकोंग ऊपर उड़कर देखा:
विशाल जल, चंद्रमा की परछाईं, तट पर मछुआरे सोते हैं, नलकूलों में बगुले सपने देखते हैं। तेज़ धार, अनंत विस्तार — कोई किनारा नहीं।
"गुरुजी — एक पत्थर पर लिखा है — 'स्वर्गाभिगामी नदी' — आठ सौ ली चौड़ी।"
तांग सान्ज़ांग के आँसू निकले।
तभी कहीं से ढोल-मंजीरे की आवाज़ — बौद्ध वाद्य।
झू बाजिए — "पास ही कोई स्तूप-पूजा कर रहा है।"
सुन वुकोंग ने कहा — "चलो।"
एक गाँव — चार-पाँच सौ घर। किनारे पर एक घर के द्वार पर पताका।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "मैं पहले जाता हूँ।"
एक बूढ़ा बाहर आया — हाथ में माला, मुँह में 'अमिताभ बुद्ध'।
"स्वामी — आप देर से आए। भोज हो चुका।"
"मैं भोज के लिए नहीं आया। रात रुकना है।"
"कहाँ से आए?"
"पूर्वी तांग से।"
"इतनी दूर — पचपन हज़ार ली — आप अकेले?"
"मेरे तीन शिष्य हैं।"
"तो बुलाइए।"
तांग सान्ज़ांग ने पुकारा। तीनों दौड़ते हुए आए।
बूढ़ा भय से पीछे हट गया — "राक्षस! राक्षस!"
"डरो मत — मेरे शिष्य हैं।"
रात में दोनों बूढ़े बात कर रहे थे — बड़ा "चेन अचेंग", छोटा "चेन छिंग"।
"यह भोज किसलिए था?"
झू बाजिए ने कहा — "लगता है पिंडदान के लिए।"
बड़े ने कहा — "हाँ — 'पूर्व-मृत्यु पिंडदान'।"
"कोई मरा नहीं, तो यह क्यों?"
बड़े बूढ़े की आँखें भर आईं। उन्होंने बताया:
इस नदी में एक "संवेदनशील महाराजा" रहता है। वह हर साल एक बाल-वर और एक बाल-वधू माँगता है। अगर नहीं दिया तो आपदा आती है। इस साल क्रम इस परिवार — चेन परिवार — पर है।
बड़े के पास एक लड़की "एक-तराजू सोना" — आठ साल। छोटे के पास एक लड़का "चेन-गुआन-बाओ" — सात साल।
दोनों बच्चे — एकमात्र संतानें।
तांग सान्ज़ांग के आँसू बह निकले।
सुन वुकोंग ने पूछा — "दैत्य कैसा दिखता है?"
"हम नहीं देखते — बस खुशबू की हवा आती है, हम झुक जाते हैं।"
"तुम्हारी संपत्ति?"
"धान-खेत पचास मु, बाग सत्तर मु, नब्बे जगहें चरागाह, दो-तीन सौ भैंस-बैल।"
"इतनी संपत्ति है — तो दो-तीन सौ रुपए देकर दूसरे बच्चे क्यों नहीं खरीदे?"
"उसे असली संतान चाहिए।"
सुन वुकोंग ने सोचा। "लड़के को लाओ।"
बालक आया — फल खाते हुए नाचता हुआ।
सुन वुकोंग ने मंत्र पढ़ा और उसी बालक का रूप ले लिया।
दोनों बालक एक साथ नाचने लगे।
बूढ़ा डर गया — "जादूगर!"
"असली रूप देखना है?"
असली रूप लिया।
"हाँ — बिलकुल वैसा ही।"
"तो मैं इस बालक की जगह जाऊँगा।"
छोटे बूढ़े ने माना नहीं। आँसू बह रहे थे।
"तुम्हारी बेटी को भी बचाऊँगा। झू बाजिए — तुम बेटी का रूप लो।"
झू बाजिए — "मैं! छोटी लड़की बनूँ?"
"खाना खाया है ना — कुछ तो करो।"
"पर भाई — मैं उससे कितना अलग हूँ।"
लड़की को लाया गया। लाल वस्त्र, गहने, जूते।
"जल्दी से बनो।"
झू बाजिए ने मंत्र पढ़ा — सिर लड़की का, पेट गोल।
"और बदलो।"
एक बार और प्रयास — बिलकुल वैसी।
दोनों थाल में बैठे। चार जवानों ने दोनों मेज़ उठाई।
गाँव के लोग ढोल बजाते हुए मंदिर की ओर चल पड़े।
लड़की बचाई जाएगी या नहीं — अगले अध्याय में।