अध्याय ४६ — बाहरी धर्म ने बलपूर्वक सच्चे धर्म को दबाया, मन-वानर ने प्रकट होकर सब दुष्टों को नष्ट किया
व्याघ्र-शक्ति, मृग-शक्ति और मेष-शक्ति महासंत सुन वुकोंग को शीर्षच्छेद, पेट-चीरना और उबलते तेल में नहाने की प्रतियोगिता में चुनौती देते हैं — और हारते हैं।
राजा ने नाग-राजाओं का साक्षात दर्शन किया। प्रसन्नता से अनुमति-पत्र मुहर के लिए उठाया। तभी तीनों ताओवादियों ने साष्टाँग दण्डवत किया।
"महाराज! हम बीस साल से राज्य की सेवा में हैं। एक भिक्षु के कारण हमारी प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। हम उसके साथ एक और दाँव लगाना चाहते हैं।"
राजा दोबारा डोल गया।
"क्या प्रतियोगिता?"
"ध्यान-बैठकी — ऊँचे मेज़ों पर चढ़कर घंटों बैठना।"
"ध्यान में यह भिक्षु माहिर है — इससे कैसे जीतोगे?"
"हमारी ध्यान-बैठकी अलग है — 'बादल-सीढ़ी शक्ति-प्रदर्शन'। सौ मेज़ — पचास-पचास ऊँची। बिना सीढ़ी के चढ़ना — बादल पर सवार होकर।"
राजा ने बैठकी की आज्ञा दी।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "मुझे ध्यान नहीं आता।"
"मुझे आता है — पर घड़ी भर से ज़्यादा? बंदर-मन एक पल नहीं रुकता।"
"मैं जानता हूँ — पर मैं छोटे से जोगियों के साथ बैठा हूँ — दो-तीन साल भी बैठ सकता हूँ।"
"ठीक है — आप जाइए — मैं सहायता करता हूँ।"
"मैं ऊपर चढ़ नहीं सकता।"
"मैं चढ़ा दूँगा।"
तांग सान्ज़ांग ने हाँ कहा। राजा ने मंच खड़े करने का आदेश दिया।
व्याघ्र-शक्ति एक बादल पर बैठकर पश्चिमी मंच पर जम गए।
सुन वुकोंग ने एक बाल बदल दिया — और खुद पाँच रंगों के बादल बनकर तांग सान्ज़ांग को उठाया — पूर्वी मंच पर। फिर एक कीड़े के रूप में झू बाजिए के कान में जा बैठे।
"भाई — गुरु को देखते रहो — मेरे बाल से बनी नकली आकृति से बात मत करना।"
दोनों ऊँचे बैठे — घंटे बीतते रहे।
तब मृग-शक्ति ने एक बाल खींचा और ऊपर उछाला। वह तांग सान्ज़ांग के सिर पर एक बड़े खटमल में बदल गया। कटा तो खुजली, फिर दर्द।
ध्यान में बैठे को हाथ नहीं हिलाना था।
झू बाजिए ने कहा — "बुरा हुआ — गुरु को मिर्गी आ गई।"
सुन वुकोंग ने झुककर उड़कर देखा — एक छोटा-सा कीड़ा गुरु को काट रहा था। उन्होंने उसे हटाया, खुजाया — दर्द ग़ायब।
"यह भिक्षु तो सच्चे हैं — कोई दाँव लगाना होगा।"
वे उड़कर व्याघ्र-शक्ति के नाक के छेद में एक सेंटीपीड की तरह घुस गए — और ज़ोर से काटा।
व्याघ्र-शक्ति चौंककर उल्टे गिरे — नीचे गिरे।
कर्मचारी दौड़े। व्याघ्र-शक्ति को उठाया।
सुन वुकोंग ने गुरु को बादल पर उठाया और नीचे लाए।
"गुरु जीते।"
राजा ने अनुमति देने की सोची। मृग-शक्ति बोले — "मेरे गुरु को पुरानी बीमारी थी — ऊपर की ठंडी हवा ने पकड़ लिया। यह जीत नहीं। हम और प्रतियोगिता चाहते हैं — परदे के पीछे चीज़ें भाँपना।"
राजा ने रानी से एक बहुमूल्य वस्तु मँगवाई।
एक लाल संदूक में रखी गई।
"जो पहचान ले — वही जीता।"
तांग सान्ज़ांग घबराए — "मुझे कैसे पता चलेगा?"
सुन वुकोंग कीड़ा बनकर संदूक के पास गए। एक दरार से अंदर घुसे — देखा: एक लाल थाल पर शाही वस्त्र।
उन्होंने वस्त्र को हिलाया, खून थूका, मंत्र पढ़ा — और उसे फटे-पुराने थैले में बदल दिया। फिर उस पर मूत्र भी किया।
बाहर आकर गुरु के कान में बोले — "फटा-पुराना थैला।"
"यह कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं।"
"बस कहो।"
मृग-शक्ति ने पहले कहा — "शाही वस्त्र।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "नहीं — फटा-पुराना थैला।"
राजा ने क्रोध में कहा — "हमारे राज्य में फटे-पुराने की क्या कमी? खुलवाओ।"
संदूक खुला — एक फटा, गंदा, बदबूदार थैला।
रानी ने कहा — "मैंने शाही वस्त्र रखे थे — यह क्या हो गया?"
राजा ने फिर एक वस्तु खुद रखी — एक बड़ा आड़ू।
सुन वुकोंग दरार से अंदर घुसे। आड़ू देखा। मूल रूप धरा — बैठकर खा लिया। गुठली रख दी।
गुरु के कान में — "आड़ू की गुठली।"
राजकुमारी ने कहा — "अमर आड़ू।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "आड़ू की गुठली।"
खोला गया — गुठली थी, खाल और गूदा कुछ न था।
राजा ने कहा — "इन्हें जाने दो।"
व्याघ्र-शक्ति ने फिर रोका — "एक बालक को संदूक में रखो। यह देखें।"
एक बालक रखा गया।
सुन वुकोंग दरार से घुसे। बालक से बोले — "मैं तुम्हारे गुरु का रूप में आया हूँ। चलो — गंजे बनते हैं।"
"जैसे गुरु कहें।"
लाठी से उस्तरा बनाया — बाल मुंडे। कपड़े बदले — धूसर वस्त्र।
"जब 'साधु' पुकारें — तब बाहर आना।"
बाहर आकर — "गुरु के कान में: 'साधु' पुकारेंगे, वह बाहर आएगा।"
व्याघ्र-शक्ति ने कहा — "एक ताओवादी बालक।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "एक साधु।"
"साधु!" — बालक ने संदूक खोला, लकड़ी का ढोलक बजाया, मुँह से 'अमिताभ बुद्ध' कहते हुए बाहर आया।
दोनों पक्ष चौंक गए।
व्याघ्र-शक्ति ने एक और प्रस्ताव रखा — "शीर्षच्छेद, पेट-चीरना, उबलते तेल में नहाना।"
"यह मृत्यु के रास्ते हैं!" राजा ने कहा।
"हमारे पास यह शक्ति है।"
सुन वुकोंग प्रसन्न हुए — "अद्भुत! सौदा घर आया।"
"यह तीनों मृत्यु के काम हैं। कैसे करोगे?"
"काटे सिर से बोल सकता हूँ, बाँह कटी हो तो लड़ सकता हूँ, पेट चिरने पर जुड़ जाता है, तेल — गर्म पानी की तरह।"
सुन वुकोंग ने पहले जाना माँगा।
तांग सान्ज़ांग ने रोका।
"जाने दो — यह खेल है।"
जल्लाद ने गर्दन पर तलवार मारी — सिर लुढ़क गया। पेट से खून न आया।
"सिर लाओ!" — आवाज़ पेट से।
मृग-शक्ति ने जल्दी से भूमि-देवता से प्रार्थना की — "सिर रोको।"
भूमि-देवता ने सिर जड़ दिया।
सुन वुकोंग ने फिर पुकारा — सिर न आया।
झटका दिया — रस्सी तोड़ी — और चिल्लाए — "बढ़ो!"
एक नया सिर उग आया।
जल्लाद काँपे। झू बाजिए ने कहा — "भाई के सात बहत्तर बदलाव — सत्तर-दो सिर भी होंगे।"
"व्याघ्र-शक्ति की बारी।"
सिर काटा। सिर लुढ़का।
सुन वुकोंग ने एक बाल खींचा — पीले कुत्ते में बदला। कुत्ते ने दौड़कर सिर मुँह में दबाया — राजमहल की नहर में फेंक दिया।
व्याघ्र-शक्ति तीन बार चिल्लाया — सिर न आया। धड़ गिरा।
मरा हुआ — एक बिना सिर का पीला बाघ।
मृग-शक्ति ने पेट-चीरना चुना।
सुन वुकोंग ने पहले किया — पेट खोला, आँतें निकाली, साफ़ की, वापस रखी, जोड़ी।
मृग-शक्ति ने किया — सुन वुकोंग ने एक बाल खींचा — भूखे बाज़ में बदला। आँतें उड़ा ले गया।
मृग-शक्ति खाली पेट — खाली आत्मा — एक सफ़ेद हिरण।
मेष-शक्ति के लिए उबलता तेल।
सुन वुकोंग कूदे — खेले — ठंडे पानी की तरह।
"मेरे लिए बचाओ।"
उन्होंने छोटी-सी कील का रूप लिया — तेल में डूब गए।
जल्लाद ने जाल से निकालने की कोशिश — कील छोटी, जाल से निकल जाती।
"और खोजो।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — "बचाओ मेरे शिष्य को।"
"क्षमा करो।"
राजा का मन पसीजा।
तभी — सुन वुकोंग उछले — "मैं यहाँ हूँ!"
झू बाजिए और शा वुजिंग हँसे।
"कड़ाह में मरा दिखाओ — फिर जीवित भूत की तरह आया।"
सुन वुकोंग क्रोध में — जल्लाद को लाठी मारी।
मेष-शक्ति की बारी।
कूदे — खेलने लगे।
सुन वुकोंग ने कड़ाह में हाथ डाला — ठंडा!
"कोई नाग-राजा नीचे से ठंडा कर रहा है।"
ऊपर गए — उत्तरी सागर के नाग-राजा को बुलाया।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
"महासंत — यह जादूगर सच्चा नहीं। वह पाँच-वज्र-विधि सीखा था — बाकी सब दिखावा। उसने एक ठंडा नाग साधा था। मैं उसे ले जाता हूँ — तब उसकी हड्डियाँ जलेंगी।"
"जल्दी करो।"
ठंडा नाग चला गया।
मेष-शक्ति तड़पने लगे। हड्डियाँ जल गईं। एक मेमना।
राजा ने रोया।
सोना ढालना, पारा बनाना — सब बेकार, हवा बुलाना, वर्षा करना — सब खाली।
—यही सत्य है।
अगले अध्याय में सफ़र का अगला पड़ाव।