अध्याय ४५ — तीन स्वच्छ देवों के मंदिर में महासंत ने नाम छोड़ा, चेची राज्य में वानर-राजा ने शक्ति दिखाई
सुन वुकोंग और शिष्य देव-मूर्तियों का रूप धरकर प्रसाद खाते हैं, फिर राजा के दरबार में ताओवादियों को वर्षा प्रतियोगिता में परास्त करते हैं।
सुन वुकोंग ने शा वुजिंग की कलाई दबाई — और झू बाजिए की। दोनों सतर्क हो गए। ऊँचे आसन पर बैठे, चेहरे अकड़े, जैसे मिट्टी की मूर्तियाँ।
पुजारी दीपक लेकर आए — आगे-पीछे देखा — कोई दुर्जन नहीं। पर प्रसाद सब खाया गया था। छिलके, बीज — पर मूर्तियाँ वहीं बैठी थीं।
व्याघ्र-शक्ति महासंत बोले — "यह देव-प्रसाद हुआ। तीन स्वच्छ देव आए हैं — और हम उनसे अमृत-जल माँग सकते हैं।"
मृग-शक्ति महासंत बोले — "हाँ — यह अवसर हाथ से न जाए।"
मेष-शक्ति महासंत ने सुझाया — "राजा के लिए अमर-जल माँगेंगे — हमारी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।"
ढोल-मंजीरा बजा। फिर व्याघ्र-शक्ति महासंत ने साष्टाँग प्रणाम किया:
"हे देव! हमने धर्म फैलाया, भिक्षुओं को हटाया, राजा का सम्मान पाया। आज आपके दर्शन हुए — अमृत-जल दीजिए, राजा की आयु बढ़ाइए।"
झू बाजिए घबराए — मन में बोले — "हम क्या करें?"
सुन वुकोंग ने उन्हें चिकोटी काटी। फिर बोले — "छोटे साधकों, हम ज़रूर देते। पर इतनी आसानी से नहीं।"
मृग-शक्ति ने फिर माथा टेका:
"हे देव! दया करो — अमृत-जल दे दो।"
"बर्तन लाओ।"
व्याघ्र-शक्ति ने एक बड़ा मटका मँगवाया, मृग-शक्ति ने एक मिट्टी का कटोरा, मेष-शक्ति ने एक फूलदान।
"सब बाहर जाओ — द्वार बंद करो — देव-रहस्य मत देखो।"
सब बाहर गए। द्वार बंद हुए।
सुन वुकोंग खड़े हुए — धोती उठाई — और फूलदान में मूत्र कर दिया।
झू बाजिए ने देखा — "भाई! यह तो पहले कभी नहीं किया। मैं भी करूँगा।"
कपड़ा उठाया — और मटके में। शा वुजिंग ने आधा मटका भरा।
"छोटे साधक — अमृत-जल लो।"
पुजारी आए — प्रणाम किया — बर्तन उठाए।
व्याघ्र-शक्ति ने चम्मच निकाली और चखा। होंठ चाटे।
मृग-शक्ति ने पूछा — "अच्छा है?"
"हाँ — पर थोड़ा खट्टा-सा है।"
मेष-शक्ति ने चखा — "सुअर के मूत्र जैसी बदबू।"
सुन वुकोंग ने ऊपर से सुना। अब रहस्य खुल गया।
चिल्लाए:
"धर्म-संत कहाँ! तुम्हें क्या पता तीन स्वच्छ देव यहाँ उतरेंगे? हम पूर्वी तांग के भिक्षु हैं — रात में आए — प्रसाद खाया — और तुम्हें अमृत समझकर यह चीज़ दे दी।"
पुजारी दौड़े — "पकड़ो पकड़ो!"
सुन वुकोंग ने शा वुजिंग को एक बाजू से, झू बाजिए को दूसरी से — और बाहर कूद गए।
तीनों बुद्धि-सागर मंदिर लौट आए।
अगले दिन भोर में राजा दरबार में बैठा। तांग सान्ज़ांग ने वस्त्र पहने, शिष्यों को लेकर दरबार में पहुँचे।
"पूर्वी तांग के भिक्षु — पश्चिम जाने की अनुमति-पत्र बदलवाने आए हैं।"
राजा ने कहा — "मार डालो।"
एक मंत्री बोला — "पूर्वी तांग बड़ा राज्य है। इन्हें अनुमति दो।"
राजा ने उन्हें बुलाया।
उसी क्षण तीन ताओवादी आ गए।
राजा उठकर उनका स्वागत करने लगा।
व्याघ्र-शक्ति ने पूछा — "ये भिक्षु कहाँ से आए?"
"पूर्वी तांग से।"
"यह वही हैं जो मेरे मंदिर में घुसे।"
सारी बात राजा को बताई — मूर्तियाँ उखाड़ना, प्रसाद खाना, नकली अमृत।
राजा क्रोधित हुआ।
सुन वुकोंग ने हाथ जोड़कर कहा — "महाराज! उनका कोई सबूत नहीं। हम तो रात में शहर के बाहर थे। रात को हमें ताओवादी मंदिर का रास्ता भी न पता था।"
राजा उलझा।
तभी खबर आई — बारिश नहीं हुई। किसान चाहते हैं कि ताओवादी गुरु वर्षा कराएँ।
राजा ने व्याघ्र-शक्ति से कहा — "वर्षा कराओ।"
व्याघ्र-शक्ति ने सुन वुकोंग से कहा — "भिक्षु — तुम भी प्रयास करो। जो वर्षा ला सके — वही सच्चा। जो न ला सके — मृत्यु-दंड।"
सुन वुकोंग हँसे — "ठीक है।"
मंच तैयार हुई। राजा पाँच मोर के महल पर बैठा।
व्याघ्र-शक्ति मंच पर चढ़े। एक मंत्र पढ़ा, एक कागज़ जलाया — और पहली गरज सुनाई दी।
हल्की हवा आई।
झू बाजिए बोला — "भाई, यह तो काम आता है।"
सुन वुकोंग ने कहा — "चुप। मैं काम पर जा रहा हूँ।"
उन्होंने एक बाल खींचा — उसे अपनी जगह पर छोड़ा — और खुद वायु-देवी के पास पहुँचे।
"हवा बंद करो — नहीं तो दंड।"
वायु-देवी ने थैला बंद किया।
झू बाजिए ने चिल्लाया — "पहली गरज पर हवा नहीं आई!"
दूसरी गरज — बादल छाने थे।
सुन वुकोंग ने बादल-बालकों को रोका — "बादल मत छाओ।"
बादल हट गए। धूप निकल आई।
तीसरी — बिजली। सुन वुकोंग ने बिजली-देवताओं को रोका।
"चुप रहो — या मेरी लाठी से दंड।"
व्याघ्र-शक्ति घबराया — चौथी गरज — समुद्र के नाग-राजा आए।
"अओगुआंग! कहाँ जा रहे हो?"
"उसने मंत्र भेजा था — जेड सम्राट का आदेश आया।"
"ठहरो — मेरे इशारे पर चलो।"
नाग-राजाओं ने आज्ञा मानी।
"मैं लाठी उठाऊँगा — वही संकेत। पहला संकेत — हवा। दूसरा — बादल। तीसरा — गरज। चौथा — वर्षा। पाँचवाँ — धूप।"
सब ने माना।
"गुरुजी — मंच पर चलिए।"
"पर मुझे वर्षा नहीं आती।"
"आप बस हृदय-सूत्र पढ़ो — मैं करता हूँ।"
तांग सान्ज़ांग मंच पर बैठ गए। शांत होकर सूत्र पढ़ने लगे।
एक अधिकारी आया — "मंत्र क्यों नहीं जला रहे? कागज़ क्यों नहीं?"
सुन वुकोंग ने कहा — "हमारी विधि शांत-तप है।"
जब गुरु का पाठ पूरा हुआ — सुन वुकोंग ने लाठी निकाली, हवा में घुमाई — और ऊपर इशारा किया।
हवा आई। बादल आए। गर्जना हुई। वर्षा हुई।
लहरें आकाश से गिरती हैं, गलियाँ नदी बन जाती हैं। पत्थर चमकते हैं, कीचड़ बहता है, व्यापारी भागते हैं, किसान ख़ुश होते हैं।
दोपहर तक काफी पानी गिरा।
राजा ने कहा — "पर्याप्त है।"
सुन वुकोंग ने लाठी का पाँचवाँ इशारा किया — सूरज निकल आया।
"अद्भुत! हमारे गुरु वर्षा तो करा लेते हैं — पर धूप निकालने में घंटे लग जाते हैं। यह भिक्षु तो पल में कर देता है।"
राजा ने कहा — "अनुमति-पत्र दो और जाने दो।"
तभी ताओवादियों ने रोका — "हम नहीं मानते।"
"यह वर्षा हमारे मंत्र से आई — यह बस हमारे बाद पहुँचा।"
"तो ठीक है — नाग-राजाओं को बुलाओ। जो बुला सके — वही जीता।"
व्याघ्र-शक्ति बुला नहीं सका।
सुन वुकोंग ने ऊँची आवाज़ में कहा — "अओगुआंग! भाइयों सहित असली रूप में आओ।"
चार नाग-राजा बादलों में प्रकट हुए — विशाल, भव्य, दिव्य।
राजा ने अगरबत्ती जलाई।
"आभार। अब वापस जाओ।"
नाग-राजा चले गए।
महान, असीम सत्य-धर्म — यह दिखावटी ताओ को काट देता है।
अगले अध्याय में बाकी यात्रा।