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अध्याय ४४ — धर्म-शरीर को चेची राज्य में परीक्षा, सच्चे हृदय से राक्षसी शक्ति पार

चेची राज्य में तीन ताओवादी महासंत बौद्ध भिक्षुओं पर अत्याचार करते हैं। सुन वुकोंग भिक्षुओं को बचाते हुए उनकी चालाकी उजागर करते हैं।

चेची राज्य व्याघ्र-शक्ति महासंत मृग-शक्ति महासंत मेष-शक्ति महासंत बौद्ध-उत्पीड़न

पश्चिम की ओर बाधाएँ पार करते हुए, अनगिनत पर्वतों पर अभी सफ़र ख़त्म नहीं। खरगोश दौड़ता है, कौआ उड़ता है — दिन-रात बीतते हैं, पक्षी बोलता है, फूल गिरता है — ऋतुएँ बदलती हैं। धूल में तीन हज़ार लोक समाए हैं, लाठी के सिरे पर चार सौ राज्य। पानी पीते, हवा खाते, बैंगनी पथ पर चलते — न जाने कब घर वापसी होगी।

तांग सान्ज़ांग राजकुमार मोआंग की सहायता और नदी-देवता के मार्ग-दर्शन से कृष्ण-जल नदी पार कर गए। पश्चिम की ओर चलना जारी रहा। सर्दी गई, बसंत आया।

तीनों सूर्य घूमते हैं, सब कुछ दीप्त होता है — आकाश में सुंदर चित्र खुलते हैं। धरती पर फूलों की बिछात बिछती है। मेहँदी झड़ती है, गेहूँ बादल जैसा उगता है। बर्फ़ पिघलती है, पहाड़ी झरना बहता है। अंकुर फूटते हैं — पुरानी जलन के निशान मिटते हैं।

चारों जने धीरे-धीरे चल रहे थे, दृश्य देख रहे थे — तभी एक ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दी। लाखों लोगों की चीख जैसी।

तांग सान्ज़ांग काँपे। "यह क्या है?"

झू बाजिए बोला — "पहाड़ फट रहा है।"

शा वुजिंग ने कहा — "बिजली गिरी।"

तांग सान्ज़ांग — "लगता है आदमियों और घोड़ों की चिल्लाहट है।"

सुन वुकोंग ने कहा — "रुको — मैं देखता हूँ।"

ऊपर उड़कर देखा — एक नगर था। सुंदर, शुभ। पर शोर नगर के बाहर एक रेतीले मैदान से आ रहा था। वहाँ बहुत सारे भिक्षु एक गाड़ी खींच रहे थे — सब "महा-शक्ति राजा!" की दुहाई देते हुए।

गाड़ियाँ भारी थीं — ईंटें, लकड़ियाँ, मिट्टी। एक खड़ी चढ़ाई थी।

तभी नगर के द्वार से दो युवा ताओवादी पुजारी निकले — चमकदार वस्त्र, सुंदर रूप। भिक्षुओं ने उन्हें देखते ही और ज़ोर लगाना शुरू कर दिया।

सुन वुकोंग समझ गए — "यहाँ भिक्षु पीड़ित हैं। पर मुझे ठीक से जानना होगा।"

वे नीचे उतरे। एक यात्री ताओवादी पुजारी का रूप बनाया — बाईं बाँह पर एक टोकरी, हाथ में मछली पकड़ने का ढोल, मुँह से ताओवादी गीत गाते हुए — और नगर के द्वार की ओर चले।

दोनों पुजारियों के सामने झुककर पूछा — "भाइयो, यह नगर कौन सा है?"

एक ने कहा — "यह चेची राज्य है। राज-दरबार से हमारा ख़ास रिश्ता है।"

"वे भिक्षु क्या कर रहे हैं?"

"हमारे गुरुओं ने बीस साल पहले अकाल में वर्षा करवाई थी। तब से राजा हमारे गुरुओं का सम्मान करता है। उन भिक्षुओं ने उस समय बुद्ध-प्रार्थना की थी, पर पानी नहीं आया। हमारे गुरु आए — और पल भर में वर्षा हुई। इसलिए भिक्षुओं को दास बना दिया गया। वे हमारे लिए काम करते हैं।"

"तीन गुरु कौन हैं?"

"व्याघ्र-शक्ति महासंत, मृग-शक्ति महासंत, और मेष-शक्ति महासंत।"

"उनकी शक्ति?"

"हवा बुलाना, वर्षा करना, हथेली पलटते ही। पत्थर को सोना बनाना, पानी को तेल बनाना — पल भर का काम। इसीलिए राजा उन्हें 'राष्ट्रीय गुरु-भाई' कहता है।"

सुन वुकोंग ने सोचा — "मैं भी इन गुरुओं से मिलना चाहता हूँ।"

"तुम बस मेरे साथ आओ — मेरे गुरु नए साधकों का स्वागत करते हैं।"

"ठीक है — पहले मुझे वहाँ जाने दो।"

पुजारियों ने कहा — "हम काम का देखभाल करके आते हैं।"

सुन वुकोंग ने मछली-ढोल बजाते हुए रेत के मैदान में भिक्षुओं के पास गए।

भिक्षु नीचे झुक गए — "पुजारी जी! हम आलस नहीं कर रहे।"

सुन वुकोंग ने मन में सोचा — "ये भिक्षु पुजारियों से इतना डरते हैं। पर मैंने एक यात्री-पुजारी का रूप बनाया है — मुझे सच पता करना है।"

"उठो! मैं काम-देखभाल करने नहीं आया — रिश्तेदार ढूँढने आया हूँ।"

सब भिक्षु उठकर चारों ओर से आ गए — शायद कोई इनमें से मेरा परिजन हो।

सुन वुकोंग देखते रहे। फिर हँसे।

"आप हँसते क्यों हैं?"

"इसलिए हँस रहा हूँ कि तुम बहुत बेवकूफ हो। तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हें साधु बनाया — ताकि तुम बुद्ध की सेवा करो। यहाँ क्या कर रहे हो?"

भिक्षुओं की आँखें भर आईं। "आप बाहर से आए हैं — नहीं जानते कितना ख़तरा है।"

एक-एक करके उन्होंने बताया — राजा ने पुजारियों की बात मानकर उनके मंदिर तुड़वा दिए, धर्मग्रंथ छीन लिए। जो भागे उनके चित्र हर जगह लगाए गए — किसी को पकड़ने पर इनाम।

"हम मर नहीं सकते — रस्सी टूट जाती है, पानी में उतरते हैं तो डूबते नहीं, ज़हर खाते हैं तो कुछ नहीं होता।"

"यह कैसे?"

"हर रात स्वप्न में देवता आते हैं — छह दिशाओं के देव, धर्म-रक्षक। वे कहते हैं — पूर्वी तांग के महान भिक्षु आएँगे। उनका एक शिष्य स्वर्ग-तुल्य महासंत है — वह अन्याय दूर करेगा, धर्म की रक्षा करेगा।"

सुन वुकोंग के मन में गुदगुदी हुई — "देखो! मेरा नाम पहले से पहुँच गया।"

उन्होंने खड़े होकर कहा — "मैं वही तांग के गुरु का शिष्य हूँ।"

"नहीं-नहीं — हमने सपने में उन्हें देखा है।"

"कैसा रूप था?"

"ताई-बाई-जिन-शिंग ने कहा था — चमकती आँखें, बंदर-सा मुँह, आकाश में उड़ने वाला, लोहे की लाठी वाला।"

सुन वुकोंग ने एक हाथ से पूर्व दिशा की ओर इशारा किया — "वह देखो!" जब सब पलटे, तो उनका असली रूप दिख गया।

सब एक साथ झुक पड़े — "महासंत! आप आ गए।"

"सुनो — मैं तुम्हें एक रक्षा-मंत्र देता हूँ।"

उन्होंने अपने बालों का एक गुच्छा खींचा, सबको एक-एक टुकड़ा दिया।

"अनामिका के नाखून में रखो, मुट्ठी बंद करो। जब भी कोई पकड़े — 'स्वर्ग-तुल्य महासंत' पुकारो। मैं आ जाऊँगा।"

एक हिम्मती भिक्षु ने पुकारा — सामने सुन वुकोंग खड़े थे — लोहे की लाठी हाथ में।

"वापस बुलाने के लिए 'शांत' कहो।" फिर भी बाल बाल ही रहे।

भिक्षु प्रसन्न होकर चारों दिशाओं में बिखर गए।


तांग सान्ज़ांग राह पर इंतज़ार कर रहे थे। कुछ भिक्षु दिखे। फिर सुन वुकोंग आए और सारी बात बताई।

"हम यहाँ कैसे रहेंगे?"

बचे हुए भिक्षुओं ने कहा — "हमारे मंदिर 'बुद्धि-सागर मंदिर' में पहले के राजा की मूर्ति है — वह अब भी सुरक्षित है। वहाँ रहो। कल महासंत दरबार जाकर रास्ते की अनुमति लेंगे।"

शहर में घुसे — सूरज ढल रहा था। सड़क पर लोग भिक्षुओं को देखकर हट गए।

मंदिर में पहुँचे। द्वार पर सोने की तख्ती — "राजकीय बुद्धि-सागर मंदिर।"

भिक्षुओं ने बुज़ुर्ग पुजारी को बुलाया। बुज़ुर्ग बाहर आए — सुन वुकोंग को देखा और झुक पड़े।

"महासंत! आप आ गए? हम तो सपने में आपका इंतज़ार करते थे।"


रात के दूसरे पहर में सुन वुकोंग सो नहीं पाए। दक्षिण की ओर एक रोशनी थी — बड़े ताओवादी मंदिर में रात भर पूजा चल रही थी।

तीन बड़े ताओवादी पुजारी — व्याघ्र-शक्ति, मृग-शक्ति, मेष-शक्ति — वहाँ थे।

दीपक, धूप, नमस्कार — सब था। आकाश और राजा के लिए प्रार्थना — देवताओं का आह्वान, पवित्र लेखन।

सुन वुकोंग ने झू बाजिए और शा वुजिंग को जगाया।

"प्रसाद है वहाँ — चलो!"

झू बाजिए — "खाना? मुझे नींद नहीं आएगी।"

"बड़े-बड़े पाव रोटी, भारी-भारी फल, चावल — सब है।"

झू बाजिए की नींद उड़ गई।

तीनों बादल पर आए। झू बाजिए पहुँचते ही हाथ बढ़ाने लगा।

सुन वुकोंग ने रोका — "पहले रुको। जब वे जाएँ तो खाते हैं।"

"वे अभी जाएँगे नहीं।"

"मैं एक तरीका करता हूँ।"

सुन वुकोंग ने मंत्र पढ़ा और उत्तर-पश्चिम से एक झोंका फूँका — मंदिर में सभी दीपक बुझ गए, फूल-दान और ध्वज गिर पड़े।

व्याघ्र-शक्ति ने कहा — "यह पवित्र हवा है। कल और पढ़ेंगे।"

सब चले गए।

तीनों नीचे उतरे।

झू बाजिए ने पका-कच्चा कुछ न देखा — मुँह में ठूँसने लगा।

"अरे! पहले बैठो। आदर से खाओ।"

"चोरी का खाना खाते हुए भी शिष्टाचार?"

सुन वुकोंग ने देखा — तीन मूर्तियाँ बैठी थीं। "इन तीनों जैसे दिखना होगा — तभी चैन से खाया जाएगा।"

झू बाजिए दौड़ा — बुज़ुर्ग लाओ-जुन की मूर्ति को धकेल दिया।

"बूढ़े, काफी बैठ चुके — मुझे बैठने दो।"

झू बाजिए ने लाओ-जुन का रूप ले लिया। सुन वुकोंग युआन-शी तियान-जुन बने। शा वुजिंग लिंग-बाओ बने।

सब मूर्तियाँ हटा दी गईं।

सुन वुकोंग ने झू बाजिए से कहा — "उन्हें ठीक जगह रखना।"

झू बाजिए तीनों मूर्तियाँ कंधे पर उठाकर ले गया। एक बड़ा शौचालय था। उसने हँसते हुए मूर्तियों से बात की:

"त्रि-देवो! आप पवित्र हो — पर आज थोड़ी गंदगी झेलनी होगी। आपसे पूजनीय बातें तो बहुत हुईं — आज थोड़ी बदबू भी सहो।"

और धड़ाम! तीनों अंदर।

झू बाजिए वापस आए — कपड़ों पर छींटे।

"अच्छी जगह मिली — बस थोड़ा पानी उड़ा।"

तीनों बैठे और खाने लगे। सुन वुकोंग ने कुछ नहीं खाया — बस फल चखे। झू बाजिए और शा वुजिंग ने खाया।


एक छोटा पुजारी रात को उठा। उसकी छोटी घंटी मंदिर में भूल गई थी।

वह दौड़ा आया — घंटी मिल गई। लेकिन जाते समय एक लीची की गुठली पर पैर पड़ा — धड़ाम!

झू बाजिए हँस पड़े — ठहाका।

पुजारी भागा। तीन बड़े गुरुओं के पास दौड़ा।

"जीवित देव उतर आए हैं! वहाँ कोई बड़ा हँस रहा है!"

तीनों गुरु उठे — दीपक लेकर मंदिर आए।

देखा — तीन देवता वहाँ बैठे हैं।

आगे क्या हुआ — अगले अध्याय में।