अध्याय ४२ — महासंत दक्षिण सागर में श्रद्धा से झुके, गुआनयिन की कृपा से अग्नि-बालक बंधा
सुन वुकोंग गुआनयिन बोधिसत्त्व से सहायता माँगते हैं और बोधिसत्त्व अपनी अद्भुत शक्ति से अग्नि-बालक को पकड़ लेती हैं।
वे छह राक्षस पश्चिम-दक्षिण की ओर चल पड़े। सुन वुकोंग उनके पीछे उड़ते रहे। मन ही मन सोचा — "वे वृषभ-राक्षस राजा को बुलाने जा रहे हैं। वह मेरे पुराने भाई हैं — पर वे अब भी अँधेरे के रास्ते पर हैं। मैं उनका रूप धारण करके भीतर घुसता हूँ।"
महासंत ने एक छलाँग लगाई, राक्षसों से आगे निकले, और वृषभ-राक्षस राजा का रूप ले लिया।
राक्षस दौड़ते-दौड़ते अचानक रुक गए — उन्होंने अपने स्वामी के पिता को देखा!
"महाराज! आप यहाँ? पहाड़ पर?"
"हाँ, मैं यहाँ था — शिकार पर। चलो, मेरे साथ।"
राक्षस प्रसन्न होकर साथ हो लिए। गुफा पहुँचते ही उन्होंने खबर दी — "महाराज के पिता आ गए!"
अग्नि-बालक ने आदर के साथ स्वागत किया। सुन वुकोंग ने बीच में आसन ग्रहण किया।
"पिताजी! आपका स्वागत है। मैंने तांग सान्ज़ांग को पकड़ा है — आपके जन्मदिन पर उन्हें पकाकर परोसूँगा।"
सुन वुकोंग ने चौंककर कहा — "वह तांग सान्ज़ांग? सुन वुकोंग के गुरु?"
"हाँ।"
"बेटे, उन्हें मत छुओ। सुन वुकोंग बड़ा खतरनाक है। उसने स्वर्ग में उत्पात मचाया था — दस हज़ार देवसैनिक भी उसे नहीं पकड़ सके। जल्दी से उनके गुरु को छोड़ दो।"
"पिताजी! आप दूसरों की बात करके मेरी हिम्मत तोड़ रहे हैं। मैंने उससे लड़ाई की — मैंने उसे आग से भगाया। उसने नाग-राजाओं को बुलाया — पर वे भी नाकाम रहे। फिर वह झू बाजिए को भेजा — मैंने उसे भी थैले में बंद कर दिया। यह तांग सान्ज़ांग मेरी मेज़ की शोभा बढ़ाएगा।"
सुन वुकोंग ने सोचा — "मुझे और कुछ करना होगा।" बोले — "बेटे, ठीक है — आज मैं उपवास रखता हूँ। भोज कल होगा।"
अग्नि-बालक चौंका। "पिताजी उपवास? कब से? किस दिन?"
"तीन उपवास के दिन होते हैं — आज उनमें से एक है।"
अग्नि-बालक अंदर से संदिग्ध हुआ। द्वार के बाहर जाकर छह राक्षसों से पूछा — "मेरे पिता को घर से बुलाने गए थे?"
"नहीं — वे रास्ते में मिले।"
अग्नि-बालक की भवें तन गईं — "यह नकली है।" वह वापस आया और चालाकी से एक प्रश्न किया — "पिताजी, मेरे जन्म की तारीख बताइए।"
सुन वुकोंग को पता नहीं था। हँसते हुए बोले — "भूल गया। कल तुम्हारी माँ से पूछूँगा।"
अग्नि-बालक ने चीखा — "यह नकली है!" सब राक्षस टूट पड़े।
सुन वुकोंग स्वर्णिम प्रकाश बनकर उड़ गए।
शा वुजिंग ने उन्हें हँसते-हँसते आते देखा। "भाई! गुरु को बचाया?"
"नहीं — लेकिन एक मज़ेदार काम हुआ।"
उन्होंने सारी बात सुनाई।
शा वुजिंग ने कहा — "यह तो मामूली ऊपरी फ़ायदा है। गुरु की जान खतरे में है।"
सुन वुकोंग बोले — "चिंता मत करो। अब मैं स्वयं गुआनयिन बोधिसत्त्व के पास जाता हूँ।"
महासंत एक ही पलटी में दक्षिणी सागर पहुँचे। पोटाला पर्वत के शिखर पर, महासंत ने झुककर प्रणाम किया।
"तुम यहाँ क्यों आए?" बोधिसत्त्व ने पूछा।
"गुरु को अग्नि-बालक ने पकड़ लिया है। उसकी त्रि-ध्यान सत्य-अग्नि बुझाई नहीं जा सकती। झू बाजिए को भी थैले में बंद कर दिया। नाग-राजाओं की वर्षा भी व्यर्थ रही।"
बोधिसत्त्व शांत थीं — फिर एक बात सुनकर उनके भाव बदल गए।
"उस दैत्य ने मेरा रूप धारण किया?"
एक क्षण का क्रोध — और उन्होंने अपना कमंडल समुद्र में फेंक दिया।
सुन वुकोंग डर गए।
पानी से एक विशाल कछुआ कमंडल उठाए बाहर आया।
बोधिसत्त्व ने उठाने को कहा। सुन वुकोंग ने कोशिश की — ज़रा भी न हिला।
"यह खाली कमंडल नहीं है। मैंने तीन नदियाँ, पाँच झीलें, आठ समुद्र और चार नालों का पानी समेट लिया है। तुम इसे उठा नहीं सकते।"
फिर बोधिसत्त्व ने कमंडल उठाया — एक हाथ से। उनके कदम आकाश में थे।
"तुम्हारे पास कोई बंधक नहीं है — फिर भी मेरी शिष्या को तुम पर भरोसा नहीं। तुम किसी को भी धोखा दे सकते हो।"
सुन वुकोंग हँसे — "मैं बदल गया हूँ।"
"ठीक है। मैं चलती हूँ।"
बोधिसत्त्व कमल-आसन पर बैठ गईं। सुन वुकोंग के लिए एक कमल की पंखुड़ी काटी — और उन पर फूँक मारी। पंखुड़ी समुद्र पार करने के लिए बड़ी हो गई।
थोड़ी ही देर में वे हाओ-पर्वत के ऊपर थे।
बोधिसत्त्व ने एक मंत्र पढ़ा। पास-पास की सभी भूमि-देवताएँ आकर झुक गईं।
"सभी जीव-जंतुओं को तीन सौ ली तक हटाओ। पक्षियों के बच्चे और जानवरों के शावक — सबको शिखर पर भेजो।"
सब ने आज्ञा पालन की।
बोधिसत्त्व ने कमंडल उलट दिया —
लहरें पत्थर तोड़ती हैं, पर्वत-शिखर डूब जाते हैं। काला कोहरा आकाश भरता है, ठंडी लहरें चमकती हैं। चट्टानें जादुई लहरों में तैरती हैं, कमल और जलकुंभी उगते हैं। बैंगनी बाँस और हरी देवदार — पक्षियों का घर। हज़ार-हज़ार लहरें चारों दिशाओं में — हवा गरजती है, पानी आकाश छूता है।
सुन वुकोंग ने मन ही मन कहा — "सचमुच महान बोधिसत्त्व! अगर मेरे पास यह शक्ति होती, तो मैं किसी की परवाह न करता।"
"सुन वुकोंग, अपना बायाँ हाथ दो।"
बोधिसत्त्व ने यांग-लिउ की शाखा से उनकी हथेली पर एक अक्षर लिखा — "मोह।"
"जाओ — उससे लड़ो। हारते रहना। उसे मेरे पास तक खींच लाओ।"
सुन वुकोंग समझ गए। वे दौड़कर गुफा के द्वार पर आए।
"दरवाज़ा खोलो!"
अग्नि-बालक बाहर आया। दोनों लड़े — चार-पाँच दाँव के बाद सुन वुकोंग मुट्ठी बंद करके पीछे हट गए।
"पिताजी की याद आ रही है — डर लग रहा है।"
"डरते हो तो ऊपर आओ — मैं आग नहीं जलाऊँगा।"
अग्नि-बालक पीछा करता रहा। सुन वुकोंग आगे-आगे भागते रहे।
तभी उन्हें बोधिसत्त्व दिखीं।
"वह देखो — गुआनयिन बोधिसत्त्व! तुम वहाँ तक पहुँच गए हो — अब भी नहीं लौटते?"
अग्नि-बालक ने विश्वास नहीं किया। बर्छा उठाकर बोधिसत्त्व पर वार किया।
बोधिसत्त्व स्वर्णिम प्रकाश बनकर ऊपर चली गईं।
अग्नि-बालक ने नीचे देखा — एक हज़ार पंखुड़ियों का कमल आसन था। उसने सोचा — "बोधिसत्त्व डर गईं।" वह खुद उस पर जाकर बैठ गया।
सुन वुकोंग ने ऊपर से देखकर कहा — "वाह! आसन का दान हो गया।"
बोधिसत्त्व ने यांग-लिउ की शाखा नीचे इंगित की — "हट!"
कमल-आसन की पंखुड़ियाँ विलीन हुईं — और उनकी जगह अनगिनत तेज़ धार वाली कटारें थीं!
अग्नि-बालक दर्द से चिल्लाया — दोनों जाँघों में कटारें घुस चुकी थीं।
"लकड़ी के हथौड़े से कटार के दस्ते ठोको!" बोधिसत्त्व ने आदेश दिया।
हुइआन ने मारा — एक बार, दो बार, तीन बार — सौ से ज़्यादा।
खून बह रहा था। अग्नि-बालक दाँत भींचे हुए कटारें खींचने की कोशिश कर रहा था।
बोधिसत्त्व ने एक मंत्र पढ़ा। सभी कटारें उलटी काँटेदार हो गईं — खींचने पर और घुसती थीं।
अग्नि-बालक टूट गया। "बोधिसत्त्व! मुझे माफ़ करो। मैं अपनी गलती मानता हूँ।"
बोधिसत्त्व नीचे उतरीं। "क्या तुम धर्म में आना चाहते हो?"
"हाँ — बस जीवन बचाओ।"
बोधिसत्त्व ने एक सोने का उस्तरा निकाला। अग्नि-बालक के बाल तीन गुच्छों में काटे। एक ऊपर, दो किनारों पर।
सुन वुकोंग हँसे — "अब यह न नर है न नारी — कुछ भी नहीं।"
"मैं तुम्हें 'शुभ-धन-बालक' कहूँगी।"
दैत्य मान गया। बोधिसत्त्व ने एक इशारे से कटारें गिरा दीं — और शरीर पर एक खरोंच तक न थी।
फिर बोधिसत्त्व ने कहा — "हुइआन — कटारें स्वर्ग में वापस करो।"
हुइआन चला गया।
लेकिन अग्नि-बालक का जंगली स्वभाव अभी ज़िंदा था। दर्द ग़ायब होते देख उसने बर्छा उठाया और बोधिसत्त्व पर वार किया।
सुन वुकोंग दौड़े — "मैं मारता हूँ!"
"रुको!" बोधिसत्त्व ने कहा।
उन्होंने एक और पिटारी से तीन स्वर्ण-कड़े निकाले।
"तथागत बुद्ध ने तीन कड़े दिए थे — तंग करने वाला, बंधन का, और स्वर्ण का। तंग करने वाला तुम्हें दिया। बंधन का पर्वत के द्वारपाल को। यह स्वर्ण वाला — अब इस दैत्य के लिए।"
बोधिसत्त्व ने कड़े को हवा में उछाला — "परिवर्तन हो!"
पाँच कड़े बन गए। एक सिर पर, दो दोनों हाथों पर, दो दोनों पैरों पर।
"सुन वुकोंग! दूर हटो। मैं मंत्र पढ़ूँगी।"
सुन वुकोंग डर गए — "मुझे मत पढ़ो!"
"यह तुम्हारे लिए नहीं — इसके लिए है।"
बोधिसत्त्व ने कई बार मंत्र पढ़ा। अग्नि-बालक कानों को मलने और पलटने लगा — पाँचों कड़े कस गए थे।
एक ही वाक्य में असंख्य ब्रह्माण्ड बदलते हैं — महान, असीम, शक्ति गहरी।
आगे क्या हुआ — अगले अध्याय में।