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अध्याय 40: नकली-असली संत और मंजुश्री बोधिसत्त्व का हस्तक्षेप

राक्षस तांग सान्ज़ांग का रूप धरता है, वुकोंग भ्रमित होता है, अंत में मंजुश्री बोधिसत्त्व राक्षस को पहचानते हैं

वुजी राज्य नकला राजा मंजुश्री वुकोंग सिंह-राक्षस तांग सान्ज़ांग

वुकोंग ने आसमान में राक्षस को देखा। वह पूर्वोत्तर दिशा में भाग रहा था।

वुकोंग ने पुकारा — राक्षस, कहाँ भागे? मैं आ गया।

राक्षस ने पीछे मुड़कर तलवार खींची।

— सुन वुकोंग, मैंने किसी और का सिंहासन लिया। इसमें तुम्हारा क्या?

वुकोंग बोला — दुनिया में इंसाफ एक जैसा होता है। तुमने राजा को मारा।

— तुम मेरे गुरु के साथ बुरा व्यवहार किया।

राक्षस ने तलवार से हमला किया। वुकोंग ने दंड से रोका।

सुन वुकोंग क्रोधित था, राक्षस की तलवार चमकी। बादलों में लड़ाई हुई, धरती पर आवाज गूँजी।

कुछ राउंड के बाद राक्षस कमजोर पड़ा।

वह वापस भागा। नीचे उतरा। सीधे दरबार में घुसा।

वहाँ तांग सान्ज़ांग के पास खड़ा हो गया।

दोनों बिल्कुल एक जैसे — वही चेहरा, वही वस्त्र।

वुकोंग नीचे उतरा। दंड उठाया।

पर दोनों में से एक बोला — शिष्य, मत मारो। मैं तुम्हारा गुरु हूँ।

दूसरा भी बोला — शिष्य, मत मारो। यह नकला है।

वुकोंग रुक गया।

— झू बाजिए, शा वुजिंग — कौन असली है?

झू बाजिए ने कहा — मैंने एक पल में दो गुरु देखे। मुझे नहीं पता।

वुकोंग ने मन में सोचा — मेरी "अग्नि-आँखें" सब पहचान सकती हैं। पर यह राक्षस इतना कुशल है कि मैं भी नहीं पहचान सका।

वुकोंग ने देव-सेवकों को बुलाया — मेरे गुरु को सुरक्षित रखो। मुझे राक्षस को पकड़ने दो।

राक्षस ने यह सुना। ऊपर उड़ गया।

वुकोंग दंड लेकर उसके पीछे गया।

राक्षस नीचे उतरा। फिर तांग सान्ज़ांग के पास खड़ा हो गया।

लोग भ्रमित थे।

वुकोंग को क्रोध आया।

झू बाजिए हँसा।

वुकोंग ने झू बाजिए को डाँटा — हँस क्यों रहे हो?

झू बाजिए ने कहा — भाई, एक तरकीब है। जो "कसने वाला मंत्र" नहीं जानता — वही राक्षस है।

वुकोंग ने कहा — सही!

— गुरु, मंत्र पढ़ो।

तांग सान्ज़ांग ने मंत्र पढ़ा।

राक्षस को पता नहीं था — बेतुकी आवाज निकाली।

झू बाजिए ने कहा — वही राक्षस है।

झू बाजिए ने नाल उठाई।

राक्षस उछला।

तांग सान्ज़ांग ने मंत्र रोका।

शा वुजिंग और झू बाजिए ने राक्षस को आसमान तक खदेड़ा।

वुकोंग ने ऊपर जाकर घेरा।

तीनों ने मिलकर राक्षस को घेर लिया।

राक्षस थका। फँसा।

वुकोंग ने सोचा — अब एक ऊपर से प्रहार करता हूँ।

वह ऊपर उठा।

तभी पूर्वोत्तर दिशा से एक आवाज — "सुन वुकोंग, रुको!"

वुकोंग ने देखा — मंजुश्री बोधिसत्त्व।

वुकोंग ने दंड रोका। प्रणाम किया।

— बोधिसत्त्व, कहाँ से?

— इस राक्षस को लेने।

वुकोंग ने कहा — धन्यवाद।

मंजुश्री ने एक दर्पण निकाला। राक्षस पर प्रकाश डाला।

दर्पण में दिखा — नीला-सा जानवर। आँखें काँच की तरह। नाखून तेज। बड़े कान। लंबी पूँछ।

वुकोंग ने पूछा — यह क्या है?

मंजुश्री ने कहा — यह मेरा नीला शेर है।

वुकोंग ने कहा — बोधिसत्त्व, आपका शेर यहाँ राज कर रहा था और आपको पता नहीं?

मंजुश्री ने कहा — वुकोंग, यह बुद्ध की आज्ञा से यहाँ आया था।

— क्यों?

— बहुत साल पहले, वुजी राज्य के राजा ने एक संत की भावनाओं का अपमान किया। उस संत को तीन दिन पानी में बाँधा। मैं ही वह संत था। तथागत बुद्ध को पता चला तो उन्होंने यह शेर भेजा — तीन साल राजा को कुएँ में रखे। बदले का बदला।

"एक पल की प्यास, एक पल की भूख — सब पूर्वनिर्धारित है।"

आज तुम आए — काम पूरा हुआ।

वुकोंग ने कहा — ठीक है, पर इस राक्षस ने तीन साल में कितनों को नुकसान पहुँचाया होगा।

मंजुश्री ने कहा — नहीं। तीन साल में यहाँ अन्न, वर्षा, शांति रही। किसी को नुकसान नहीं।

वुकोंग ने कहा — पर रानी के साथ एक बिस्तर पर सोया।

मंजुश्री ने कहा — वह बधिया शेर था।

झू बाजिए हँसते हुए आगे बढ़ा — सच में?

— मैं जाँच करता हूँ।

उसने हाथ लगाया — हाँ। सच में।

झू बाजिए ने कहा — नाम का राक्षस था।

वुकोंग ने कहा — ठीक है बोधिसत्त्व, ले जाइए। आपके बिना मैं उसे नहीं छोड़ता।

मंजुश्री ने एक कमल-आसन बनाया। शेर को उसमें बाँधा। खुद पीठ पर सवार हो गए।

"पाँच-ताल पर्वत की ओर उड़े, वुकोंग ने हाथ जोड़कर विदा दी। बोधिसत्त्व धर्म की राह पर, राक्षस बँधा, बुराई चली गई।"

वुकोंग वापस दरबार में उतरा।

— शिष्यों, अब राक्षस गया।

राजकुमार ने असली पिता को गले लगाया।

रानी ने पति को पहचाना।

दरबारियों ने असली राजा को प्रणाम किया।

राजा ने अपना राजसी वस्त्र पहना। सिंहासन पर बैठे।

शाकाहारी भोज दिया गया। तीर्थयात्रियों का सम्मान हुआ।

तांग सान्ज़ांग के यात्रा-दस्तावेजों पर मुहर लगाई।

अगले दिन सुबह विदाई।

"राजा अपने सिंहासन पर लौटा, संत आगे चले — पश्चिम की ओर। एक देश की बुराई मिटाकर, और एक राज्य में शांति छोड़कर।"

तांग सान्ज़ांग, वुकोंग, झू बाजिए और शा वुजिंग — चारों पश्चिम की ओर बढ़ चले।