अध्याय 39: स्वर्गीय औषधि और मृत राजा का पुनर्जीवन
वुकोंग परम वृद्ध देव से जीवन-दायक गोली लाया और वुजी राज्य के मृत राजा को जीवित किया
वुकोंग का सिर दर्द से फट रहा था।
— गुरु, मंत्र मत पढ़ो! मैं करता हूँ।
— कैसे?
— मुझे यमराज के पास जाना होगा।
झू बाजिए ने कहा — नहीं! तुमने कहा था — यमराज के बिना भी हो सकता है।
तांग सान्ज़ांग ने फिर मंत्र पढ़ा।
वुकोंग चिल्लाया — माफ करो! ठीक है, बिना यमराज के।
— कैसे?
— परम वृद्ध देव के पास जाऊँगा। उनके पास "नौ-परिवर्तन अमृत-गोली" है। एक गोली मिल जाए तो राजा जीवित होगा।
तांग सान्ज़ांग खुश हुए — जाओ!
वुकोंग ने कहा — अभी आधी रात है। सुबह होते-होते वापस आ जाऊँगा। पर कोई रोने वाला चाहिए।
झू बाजिए ने कहा — तुम जाओ, मैं रोऊँगा।
वुकोंग ने कहा — रोने के भी तरीके हैं। बस आवाज निकालना "चिल्लाना" है। आँसू निकालना "रोना" है। दोनों साथ — असली शोक।
झू बाजिए ने कागज की एक बत्ती नाक में लगाई — छींक मारी। आँखें भर गईं।
फिर खूब रोया — ऐसे जैसे सच में घर में मातम हो।
तांग सान्ज़ांग भी भावुक हो गए।
वुकोंग ने कहा — बिल्कुल ऐसे रोते रहना। रुके तो पिंडली पर बीस लात।
शा वुजिंग ने धूप-बत्ती जलाई।
वुकोंग ने कहा — सब ठीक है। अब जाता हूँ।
आधी रात — पलटी-बादल पर सवार होकर ऊपर उठा।
दक्षिण स्वर्ग-द्वार से घुसा। सीधे तैंतीसवें आसमान पर। परम वृद्ध देव के महल में।
परम वृद्ध देव भट्टी के पास बैठे थे। छात्र केले-पत्र पंखे से हवा दे रहे थे।
परम वृद्ध देव ने वुकोंग को देखा — मेरे रत्न चोर फिर आए।
वुकोंग ने हाथ जोड़े — वह बात पुरानी हो गई। अब आया हूँ एक काम से।
— क्या?
— वुजी राज्य के राजा को एक राक्षस ने कुएँ में धकेला। तीन साल हो गए। गुरु ने कहा — बिना यमराज के जीवित करो। इसलिए आपसे —
परम वृद्ध देव ने कहा — बेशर्म! एक हजार गोलियाँ माँगता है! वहाँ पत्थर से बनती हैं? जाओ, जाओ।
वुकोंग — सौ दे दो।
— नहीं।
— दस।
— नहीं।
वुकोंग ने कहा — तो मैं दूसरे के पास जाता हूँ।
परम वृद्ध देव ने सोचा — यह बंदर गया तो यहाँ घुसकर सब चुरा लेगा।
— रुको।
— एक गोली।
वुकोंग ने गोली ली। मुँह में डाल ली।
परम वृद्ध देव दौड़े — वापस करो!
वुकोंग ने हँसते हुए गर्दन के पास थैली में रख ली — देखो, यहाँ है।
परम वृद्ध देव ने गोली वापस दी — जाओ!
वुकोंग ने प्रणाम किया।
सुबह होने से पहले लौटा।
बाहर से सुना — झू बाजिए अभी भी रो रहा था।
अंदर गया।
— गुरु, गोली मिली।
झू बाजिए ने कहा — अच्छा हुआ। इस बंदर ने चुराई होगी।
वुकोंग ने कहा — भाई, अब तुम्हारी जरूरत नहीं। आँसू पोंछो।
शा वुजिंग ने पानी दिया। वुकोंग ने गोली को मुँह में रखकर पानी के साथ राजा के मुँह में डाली।
आधे घड़ी बाद पेट में आवाज हुई — पर शरीर नहीं हिला।
वुकोंग ने कहा — गोली काम नहीं किया?
तांग सान्ज़ांग ने कहा — गोली ने काम किया। देखो — पेट में आवाज — खून चल पड़ा। पर साँस रुकी है। तीन साल कुएँ में बंद था — लोहा भी जंग खा जाता।
— किसी को एक साँस देनी होगी।
झू बाजिए आगे बढ़ा।
तांग सान्ज़ांग ने रोका — नहीं। यह काम वुकोंग का है।
— क्यों?
— झू बाजिए जन्म से हिंसा करता रहा — उसकी साँस गंदी है। वुकोंग बचपन से वन में रहा — चीड़ और कपूर के फल खाए, साफ साँस।
वुकोंग आगे आया। अपने नुकीले मुँह से राजा के होठों से होठ लगाए।
एक लंबी साँस — अंदर।
साँस गहरी उतरी। फेफड़ों से दिल तक। पेट से रीढ़ तक। पाँव से सिर तक।
एक गहरी आवाज।
राजा ने मुट्ठी भींची। पैर हिले।
— "गुरु!"
वह बोला।
घुटनों पर बैठ गया — "कल रात आत्मा में था, आज सूर्योदय में वापस।"
तांग सान्ज़ांग ने उठाया — शुक्रिया मेरे शिष्य को।
वुकोंग ने कहा — गुरु का परिवार है — शिष्य उनका सम्मान स्वीकार करें।
मठ के भिक्षु खाना ले आए। राजा ने जल से मुँह धोया। नए कपड़े पहने — राजसी वस्त्र उतारे, सफेद साधु-वस्त्र पहने।
सब ने नाश्ता किया।
वुकोंग ने राजा से कहा — झू बाजिए, अपना आधा बोझ राजा को दो।
झू बाजिए खुश हुआ — पहले इसे उठाकर थक गया था, अब यह खुद उठाएगा।
राजा ने कहा — गुरु, मैं आपके साथ पश्चिम तक जाने को तैयार हूँ।
वुकोंग ने कहा — चालीस ली ही साथ चलना है। राक्षस को खत्म करके तुम वापस राजा बनोगे।
राजा ने बोझ उठाया।
सब मठ से निकले। पाँच सौ भिक्षु बजाते-गाते विदा देने आए।
वुकोंग ने उन्हें रोका — वापस जाओ। राजा की शाही पोशाक सँभालकर रखो — शाम तक पहुँचा दूँगा।
"जल, अग्नि, और ज्ञान — तीनों का समन्वय हो जब, तो मृत भी जीवित होते हैं, पथ खुलता है पश्चिम का तब।"
चालीस ली में शहर आ गया।
शहर में प्रवेश।
"महलों में ध्वनि थी, रंग थे, बाजार में जीवन उमड़ रहा था, ऊपर ध्वजाएँ, नीचे सड़कें, मानो शांति का राज था।"
— तांग सान्ज़ांग ने कहा — सीधे दरबार में चलते हैं।
वुकोंग — राजा के दरबार में।
द्वारपाल ने कहा — रुको।
वुकोंग ने कहा — बताओ — पूर्व के तांग राज्य से तीर्थयात्री हैं।
राक्षस-राजा दरबार में था। उसने आज्ञा दी — आने दो।
दरबार में प्रवेश।
तांग सान्ज़ांग के पीछे असली राजा चला — आँखें भरी।
राक्षस ने पूछा — कहाँ से आए?
वुकोंग बोला — पूर्व के तांग राज्य से। बुद्ध के पास जा रहे हैं।
— क्यों नहीं झुके?
वुकोंग ने कहा — तांग राज्य के ऊपर — छोटे राज्य नीचे।
राक्षस क्रोधित — पकड़ो!
वुकोंग ने उँगली उठाई — "स्थिर-देह विद्या।"
पूरा दरबार पत्थर की मूर्तियाँ बन गया।
राक्षस कूदा।
वुकोंग खुश — अब सामने आ।
तभी राजकुमार आया — "पिता, रुको।"
राजकुमार ने कहा — तांग के तीर्थयात्रियों पर गुस्सा न करो। उन्हें पहले पूछताछ करो।
राक्षस रुका।
उसने पूछा — तुम कब निकले?
वुकोंग ने कहा — तेरह साल पहले। गुरु का नाम तांग सान्ज़ांग।
— वह बूढ़ा सेवक कौन है?
वुकोंग ने कहा — वह बूढ़ा, बहरा और गूँगा है। पर वह वुजी राज्य का रास्ता जानता है।
वुकोंग ने एक कविता सुनाई:
"वह सेवक बूढ़ा और थका हुआ, घर-बार सब छूट गया था। पाँच साल सूखा पड़ा राज्य में, सब ने उपवास किया था। तभी आया एक ताओ साधु, बारिश लाया, भाई बना। फिर बगीचे में एक दिन, कुएँ में धकेला — जीवन छिना। हम आए हैं सत्य बताने, राजकुमार का बदला दिलाने।"
राक्षस काँप गया।
वह भागा — पर हथियार नहीं था।
एक पहरेदार की तलवार छीनी। बादल पर सवार हुआ।
शा वुजिंग और झू बाजिए गुस्से में — भाई ने जल्दी बताया।
वुकोंग ने कहा — चिंता न करो। पहले असली राजा को दिखाओ।
"स्थिर-देह" मंत्र हटाया।
— राजकुमार नीचे आओ। अपने पिता को पहचानो।
राजकुमार ने असली राजा को देखा।
रानी-माँ ने देखा।
दरबारियों ने देखा।
सब ने प्रणाम किया।
वुकोंग कूदा — अब राक्षस को पकड़ता हूँ।