अध्याय 37: भूत-राजा का संदेश और राजकुमार की खोज
वुजी राज्य के राजा की आत्मा तांग सान्ज़ांग के स्वप्न में आती है, वुकोंग राजकुमार को सच्चाई बताने के लिए उसे खरगोश बनकर लुभाता है
तांग सान्ज़ांग बाओलिन मठ की प्रार्थना-कक्ष में बैठे थे। धर्मग्रंथ पढ़ते-पढ़ते तीसरे पहर हुआ। उन्होंने किताब रख दी और झुककर सो गए।
आँखें आधी बंद थीं, मन जागता था।
खिड़की के बाहर हवा चली।
वह हवा कैसी थी — पत्तियाँ हिलीं, धूल उड़ी, तारे धुँधले हुए, मोमबत्ती लड़खड़ाई। बाहर अजीब सन्नाटा था जो कुछ बोल रहा था।
तांग सान्ज़ांग ने दरवाजे पर कुछ सुना — "गुरु!"
उन्होंने आँखें खोलीं।
बाहर एक आदमी खड़ा था — सिर से पाँव तक भीगा हुआ। आँखों में आँसू थे।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — तुम कौन हो? यहाँ रात को क्यों आए?
वह आदमी बोला — गुरु, मैं भूत नहीं हूँ।
— तो फिर?
— अपनी आँखें खोलकर देखो।
तांग सान्ज़ांग ने ध्यान से देखा। एक सम्राट था वहाँ — मुकुट, पीले रेशम का वस्त्र, हाथ में जेड की छड़ी।
तांग सान्ज़ांग उठे — कौन से राज्य के महाराज हैं आप?
वह बोला — गुरु, मेरा राज्य यहाँ से चालीस ली पश्चिम में है — वुजी राज्य।
तांग सान्ज़ांग ने पूछा — क्या हुआ?
वह बोला — पाँच वर्ष पहले मेरे राज्य में भीषण सूखा पड़ा। लोग मर रहे थे। मैंने तीन साल तक उपवास किया, प्रार्थना की। तभी एक ताओ साधु आया — कहा, मैं बारिश करा सकता हूँ।
तांग सान्ज़ांग ने पूछा — फिर?
— बारिश हुई। मैं उस साधु से बहुत प्रभावित हुआ। हम भाई बन गए। दो साल हम साथ खाए, साथ सोए।
— फिर एक दिन वसंत में, बगीचे में, एक कुएँ के किनारे —
वह रुका।
— उसने मुझे धक्का दिया। कुएँ में।
— मर गया?
— हाँ। तीन साल पहले।
— तो आपकी सेना, रानी, दरबार —
— वह साधु मेरा रूप लेकर राजसिंहासन पर बैठ गया। उसे कोई नहीं पहचान सका।
तांग सान्ज़ांग ने पूछा — यमराज के पास क्यों नहीं गए?
— वह साधु के वहाँ भी संपर्क हैं। नगर-देव, समुद्री अजगर, पूर्व का देव — सब उससे जुड़े हैं।
— तो फिर मेरे पास क्यों?
— रात के देव ने मुझे यहाँ भेजा। उन्होंने कहा — तांग सान्ज़ांग के शिष्य सुन वुकोंग हैं जो राक्षसों को हराते हैं।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — वुकोंग राक्षस हराता जरूर है, पर यह काम आसान नहीं। अगर कोई पहचाने नहीं तो हम क्या करेंगे?
राजा ने कहा — मेरे बेटे हैं — राजकुमार।
— वह तो महल में राक्षस के साथ है।
— वह कल शिकार पर निकलेगा।
राजा ने एक सोने की जेड छड़ी रख दी — यह लो। मेरे बेटे को दिखाना। उसे याद है यह।
— जाओ, वुकोंग से बात करना।
राजा मुड़ा। चला।
तांग सान्ज़ांग ने पाँव उठाया — ठोकर खाई।
आँख खुली — सपना था।
मठ में उन्होंने शिष्यों को जगाया।
झू बाजिए ने बड़बड़ाया — यह कौन सा वक्त है जगाने का? बड़बड़ाते-बड़बड़ाते जागे।
तांग सान्ज़ांग ने सब बताया।
वुकोंग बोला — गुरु, यह सपना सच्चा लगता है। मुझे एक काम मिला।
शा वुजिंग ने कहा — चलो देखते हैं।
दरवाजा खोला — सच में सीढ़ी पर जेड की छड़ी रखी थी।
झू बाजिए ने देखकर कहा — यह असली है। गुरु, काम हो सकता है।
वुकोंग ने कहा — तीन मुसीबतें आएँगी आपको।
झू बाजिए ने कहा — देखो, वह फिर कुछ करेगा।
वुकोंग ने कहा — पहले मैं शहर देखने जाता हूँ। तुम सब मठ में रहो।
सुबह होने से पहले वुकोंग उड़ा।
एक शहर दिखा — पर उसके ऊपर घना काला बादल था।
"जो राजा सच्चा हो उसके ऊपर रंगीन बादल, जो राक्षस हो उसके ऊपर काला धुआँ।"
वुकोंग ने सोचा — यह राक्षस ही है।
तभी शहर के पूर्वी द्वार खुले। राजकुमार शिकार पर निकला — तीन हजार सैनिक, बाज, कुत्ते, घोड़े।
"भोर में शाही शिकार दल निकला, झंडे सूरज में चमके, भाले पंक्ति में तने, राजकुमार का घोड़ा आगे था।"
"वह था राजसी, वह था दिव्य, उसकी चाल में राजत्व था।"
वुकोंग को देखकर मन में हुई — चलो उसे लुभाते हैं।
वुकोंग ने एक सफेद खरगोश का रूप ले लिया।
राजकुमार के घोड़े के सामने दौड़ा। राजकुमार ने तीर छोड़ा — लगा।
वुकोंग ने तीर झेला, पर गिरा नहीं। उसने तीर को अपने हाथ में लेकर आगे दौड़ा।
राजकुमार उत्साहित — खरगोश घायल हुआ पर भागा।
वुकोंग धीरे-धीरे मठ तक ले आया। दरवाजे पर पहुँचकर तीर वहीं छोड़ दिया।
असली रूप में आया। अंदर पहुँचा — गुरु, राजकुमार आ गया।
तांग सान्ज़ांग ने जेड की छड़ी ली। वुकोंग एक छोटे से लाल डिब्बे में बदल गया।
राजकुमार घोड़े से उतरा। मठ में आया। प्रार्थना की।
तांग सान्ज़ांग पर ध्यान पड़ा — वे बैठे थे, हिले नहीं।
राजकुमार ने गुस्से में कहा — इस भिक्षु ने हमारा अभिवादन क्यों नहीं किया?
— पकड़ो।
सैनिक आगे बढ़े। पर किसी को तांग सान्ज़ांग को छू नहीं पाया — जैसे अदृश्य दीवार।
वुकोंग अंदर से बुदबुदाया — देव-सेवक, रक्षा करो।
राजकुमार ने पूछा — आप कहाँ से आए हैं?
तांग सान्ज़ांग ने बताया — पूर्व के तांग राज्य से। पश्चिम में बुद्ध के पास जा रहे हैं।
— आपके पास क्या है?
— तीन रत्न। एक यह वस्त्र। और दो और हैं।
— इस चीथड़े में क्या खास है?
तांग सान्ज़ांग ने कविता सुनाई:
"बुद्ध का वस्त्र एकाकी नहीं, इसमें है ज्ञान की शक्ति। सूई और धागे से बना यह नहीं, इसमें छुपी है संतों की भक्ति। जो यह पहने वह पवित्र होता, तेरे पिता का बदला बाकी है।"
राजकुमार को "पिता" शब्द पर क्रोध आया — तुम मेरे पिता के बारे में क्या जानते हो?
तांग सान्ज़ांग ने कहा — हमारे पास एक और रत्न है जो एक हजार पाँच सौ साल की बातें जानता है।
— दिखाओ।
तांग सान्ज़ांग ने डिब्बा खोला।
वुकोंग निकला — दो इंच का छोटा सा वानर।
राजकुमार ने कहा — यह इतना छोटा क्या जान सकता है?
वुकोंग ने खिंचाई — बढ़ा।
सैनिक डरे।
वुकोंग ने राजकुमार को बताया — पाँच साल पहले बारिश। ताओ साधु। उसका साथ। फिर बगीचे में एक दिन — कुएँ में धक्का।
राजकुमार को याद आया — सब सही है। पर राजा तो दिखते हैं।
वुकोंग ने कहा — जो राजा दिखते हैं वह राक्षस है।
राजकुमार ने कहा — झूठ है। मेरे पिता तो अभी भी —
वुकोंग ने कहा — अपनी माँ से पूछो। उनसे पूछो — तीन साल पहले का और अब का प्रेम कैसा है।
राजकुमार को एक पल के लिए संदेह हुआ।
वुकोंग ने जेड की छड़ी दिखाई।
राजकुमार ने पहचाना — यह तो पिता की छड़ी थी।
— तुम कैसे लाए?
वुकोंग ने कहा — तुम्हारे पिता की आत्मा ने गुरु को सपने में दी।
राजकुमार सोच में डूब गया।
वुकोंग ने कहा — माँ से पूछो।
राजकुमार ने सेना को वापस भेजा और अकेले घोड़े पर महल गया।