अध्याय 36: चन्द्रमा की गहरी रात और बाओलिन मठ
तीर्थयात्री बाओलिन मठ में शरण माँगते हैं, तांग सान्ज़ांग चाँदनी रात में दार्शनिक विचार करते हैं
वुकोंग ने गुरु को सब बताया — परम वृद्ध देव के रत्न, बोधिसत्त्व की परीक्षा।
तांग सान्ज़ांग ने शुक्रिया अदा किया। फिर घोड़े पर सवार हुए। झू बाजिए ने बोझ उठाया। शा वुजिंग ने घोड़े की लगाम थामी। वुकोंग आगे लोहदंड थामे चला।
चलते-चलते एक और पहाड़ आ गया।
तांग सान्ज़ांग — शिष्यो, पश्चिम में इतनी कठिनाइयाँ क्यों हैं? मैं लंबे समय से चल रहा हूँ। वसंत गया, गर्मी आई, शरद बीता, जाड़ा आया — चार-पाँच साल हो गए।
वुकोंग ने हँसकर कहा — गुरु, हम अभी घर के अंदर ही हैं।
झू बाजिए ने कहा — घर? इतना बड़ा घर?
वुकोंग ने कहा — आकाश छत है, सूरज-चाँद खिड़कियाँ, पहाड़ खंभे। धरती एक विशाल कक्ष है।
झू बाजिए ने कहा — तो घूमकर वापस जाते हैं।
वुकोंग ने कहा — बात मत करो। बस चलते रहो।
पहाड़ की सुंदरता:
पहाड़ उठे जैसे स्वर्ग छूना चाहते हों, नालों में पानी गाते-गाते गिर रहा था। चट्टानों पर बाघ, जंगल में हिरन, धुंध में लिपटी ऊँचाइयाँ दूर से बुला रही थीं।
शाम होने लगी।
आकाश में तारे उगे, सभी घाट और बंदरगाह सो गए, नगर और गाँव रात में डूबे, एक पूर्ण चाँद आकाश में चमका।
घाटी में एक मठ दिखा। मीनारें, आँगन, मंदिर।
वुकोंग ने ऊपर से देखा।
"लाल ईंटों की दीवारें, सोने की कीलें दरवाजों पर, बुद्ध-मंदिर और आनंद-कक्ष, धूप की खुशबू हर कोने में।"
वुकोंग ने गुरु को बताया — एक बड़ा मठ है। रात यहाँ रुक सकते हैं।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — तुम नहीं जाओ। तुम्हारा चेहरा डरावना लगता है।
तांग सान्ज़ांग अंदर गए। द्वारपाल ने उन्हें देखा।
एक भिक्षु अधिकारी बाहर आया। तांग सान्ज़ांग को देखकर बोला — इस घुमक्कड़ भिक्षु को बाहरी बरामदे में बैठने दो।
तांग सान्ज़ांग उदास हुए। आँखें भरीं।
उन्होंने सोचा — परदेस में आदमी की कोई कीमत नहीं।
वे अंदर गए। अधिकारी से बोले — गुरु, मैं पूर्व से आया हूँ। बुद्ध के पास जा रहा हूँ। रात के लिए शरण चाहिए।
अधिकारी ने पूछा — तुम वही तांग त्रिपिटक हो?
तांग सान्ज़ांग — हाँ।
अधिकारी ने कहा — तुम पाँच मील आगे तीस-मील की दुकान पर जाओ। वहाँ ठहरो। यहाँ जगह नहीं।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — हर मठ यात्री के लिए खुला होता है।
अधिकारी ने कहा — एक बार कुछ भटकते भिक्षु आए थे। मैंने उन्हें रखा — कई साल बाद भी नहीं गए। सब कुछ नष्ट करने लगे।
तांग सान्ज़ांग ने जो सुना — दुखी हुए।
वे बाहर आए। वुकोंग ने देखा — गुरु का चेहरा भारी है।
वुकोंग ने कहा — मैं अंदर देखता हूँ।
वह अंदर गया। बुद्ध की मूर्ति के सामने खड़ा होकर बोला — तुम मिट्टी की मूर्ति हो। पर क्या मेरे गुरु को सुनते हो? हम पश्चिम जा रहे हैं। आज रात रुकना है। अगर जगह नहीं दी तो यह दंड तोड़ दूँगा।
एक अगरबत्ती जलाने वाला दूत देखकर डर गया।
दौड़कर अधिकारी के पास गया — एक और भिक्षु है। बड़ा डरावना।
अधिकारी बाहर आया।
वुकोंग को देखा — सात ऊँचे-नीचे गाल, दो पीली आँखें, एक उभरी माथा, बाहर निकले दाँत। मानो केकड़ा — हड्डियाँ बाहर, माँस अंदर।
अधिकारी ने दरवाजा बंद कर लिया।
वुकोंग ने दरवाजा तोड़ा — एक हजार कमरे चाहिए।
अधिकारी डर गया — हमारे तो तीन सौ भी नहीं।
वुकोंग ने कहा — फिर एक निकलो पिटाई के लिए।
देवदूत ने कहा — कहीं मत जाना।
अधिकारी ने कहा — हम पाँच सौ भिक्षु हैं। कहाँ जाएँ?
वुकोंग ने आँगन में रखे पत्थर के शेर को दंड से तोड़ दिया — चूर।
अधिकारी घबराकर पलंग के नीचे छुप गया।
देवदूत ने कहा — माफी माँगो।
अधिकारी ने चिल्लाया — ठीक है, ठीक है! हम स्वागत करते हैं।
अधिकारी ने घंटा-नगाड़ा बजाया।
पाँच सौ भिक्षु पंक्ति में खड़े हो गए।
तांग सान्ज़ांग अंदर आए — वुकोंग की करामात देखकर हँसी भी आई, संकोच भी।
भिक्षुओं ने हाथ जोड़े — "वुकोंग का आदेश हो तो एक महीने भी घुटने टेके रहेंगे।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — उठो।
सबने भोजन का प्रबंध किया। घोड़े को घास मिली। सबने खाया।
रात को तांग सान्ज़ांग ने कमरे में बैठकर धर्मग्रंथ पढ़े। पढ़ते-पढ़ते बाहर निकले।
पूरा चाँद आसमान में था।
तांग सान्ज़ांग ने एक लंबी कविता बोली:
"आकाश में शीशे-सा चमकता चाँद, धरती पर उसकी छाया फैली। संगमरमर महल, बर्फीली हवा, हर जगह एक जैसी चाँदनी। दूर के घर, पास के घर — सब पर एक ही चाँद का आसमान। मैं आज इस मठ में चाँद देखता हूँ, पर जब घर लौटूँगा?"
वुकोंग ने सुनकर कहा — गुरु, आप चाँद का मर्म जानते हो। पर सुनो, चाँद का अर्थ गहरा है।
— तीस दिन पर चाँद का अंधेरा — "अमावस।" वह सूरज से मिलता है, गर्भ धारण करता है।
— तीन दिन पर एक कला — "प्रतिपदा।"
— आठ दिन पर आधा — "अष्टमी।"
— पंद्रह दिन पर पूर्ण — "पूर्णिमा।"
— फिर घटना शुरू।
— अगर हम भी इस तरह पकते रहें — ज्ञान का एक-एक अंश जोड़ते रहें — तो बुद्ध के दर्शन होंगे, और घर लौटना भी आसान होगा।
"शुक्ल-पक्ष और कृष्ण-पक्ष, दोनों में संतुलन का सार। वह जो जोड़े ज्ञान-रस, पश्चिम का द्वार खुले उसपार।"
शा वुजिंग ने कहा — भाई का कहना सही है। पर एक बात और है — जल और अग्नि का समन्वय चाहिए। मिट्टी का सहयोग चाहिए।
"जल, अग्नि और मिट्टी — तीनों बिना झगड़े मिलें। नदी में चाँद की परछाईं — यही है ज्ञान का मेल।"
झू बाजिए ने सबके हाथ खींचे — गुरु, यह चाँद तो उगता-डूबता रहता है। हमें सोना चाहिए।
"कम भी होता है, पूरा भी होता है, मेरी तरह — कभी भूखा, कभी खाया। बड़े खाते और तारीफ पाते, मैं खाऊँ तो वे नाक-भौं चढ़ाते। फिर भी मेरा भाग्य अपना है — यह यात्रा और यह सपना।"
तांग सान्ज़ांग ने कहा — तुम लोग सो जाओ। मैं थोड़ा और पढ़ता हूँ।
वुकोंग ने कहा — गुरु, आपने बचपन से ग्रंथ पढ़े हैं। अब नए ग्रंथ लेने जा रहे हैं। यही उद्देश्य है।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — सही कहते हो। भूल जाने का डर था।
वुकोंग ने कहा — हम भी सोते हैं।
तीनों शिष्य अपने-अपने पलंग पर लेट गए।
तांग सान्ज़ांग ने एकांत में धर्मग्रंथ खोला और मौन में पढ़ते रहे।
रात गहरी होती गई।