अध्याय 35: राक्षसों का अंत और परम वृद्ध देव का रहस्य
वुकोंग ने दोनों राक्षसों को कलश में बंद किया और परम वृद्ध देव ने सच्चाई बताई
स्वभाव जब स्वच्छ हो तो ज्ञान खुद आता है, जो जाल बिछाए वह खुद उसमें फँस जाता है। कठिन है यह परिवर्तन, कठिन है यह यात्रा, पर जो दृढ़ हो मन में, वह पाता है पात्रा।
वुकोंग के पास अब असली कलश था।
वह गुफा से बाहर निकला। असली रूप में आया और गरजा — गुफा खोलो!
छोटे राक्षस ने पूछा — कौन है?
वुकोंग ने कहा — "यात्री-सुन।"
राक्षस ने जाकर बताया। स्वर्ण-श्रृंग डरा — पहले वाले "सुन-यात्री," फिर "यात्री-सुन," और अब यह? यह तो एक ही वानर है।
रजत-श्रृंग ने कहा — मेरे पास कलश है। इसे भी उसमें डाल देता हूँ।
उसने नकला कलश लेकर बाहर आया और उसे ऊपर उठाया — यात्री-सुन!
वुकोंग ने आवाज दी:
"मेरा घर फूलों का पहाड़, मेरी पहचान जल-गुफा। स्वर्ग को हिलाया तब, शान्ति मिली धर्म से। तांग सान्ज़ांग को आया बचाने, पश्चिम का रास्ता दिखाने। दोनों पक्ष शांति से रहें, वरना वानर-दंड सहें।"
राक्षस बोला — पहले मैं बुलाता हूँ। तुम जवाब दोगे?
वुकोंग ने हँसकर कहा — हजार बार बुलाओ, हजार बार जवाब दूँगा।
राक्षस ने कलश उठाया — यात्री-सुन!
वुकोंग ने जवाब न दिया।
राक्षस परेशान — जवाब क्यों नहीं? मेरा कलश नहीं काम कर रहा।
वुकोंग ने अपना असली कलश निकाला।
— तुम्हारा कलश कहाँ से आया?
राक्षस ने सोचा — यह तो अपना ही है। और बोला — मेरा कलश जब सृष्टि के आरंभ में आकाश और धरती अलग हुए, परम वृद्ध देव ने स्त्री देवी की साधना में एक जादुई लता पर इसे उगाया।
वुकोंग ने मुस्कुराते हुए कहा — मेरा भी वहीं से है।
राक्षस ने पूछा — क्या मतलब?
वुकोंग ने कहा — उसी लता पर दो फल थे। एक नर, एक मादा। तुम्हारा मादा है।
राक्षस ने कहा — ठीक है। अब बुलाता हूँ।
उसने कलश उठाया — यात्री-सुन!
जवाब नहीं। कलश नहीं भरा।
वुकोंग ने कहा — तुम्हारी मादा ने नर को देखकर काम करना बंद किया।
राक्षस पैर पटकने लगा — ओह नहीं!
— ठीक है। मेरी बारी है।
वुकोंग ने कलश उठाया, नीचे की तरफ मुँह किया।
— रजत-श्रृंग महाराज!
राक्षस को पता ही नहीं था — जवाब दिया।
सर्र— कलश में खिंच गया।
वुकोंग ने ढक्कन लगाया — मुहर लगाई।
कलश हिलाया — आवाज आई।
वुकोंग ने कहा — बेटे, कैसा लग रहा है? ये तुम्हारा ही बना खेल है।
वह गुफा वापस गया।
अब स्वर्ण-श्रृंग और उसकी तीन सौ सेना थी।
स्वर्ण-श्रृंग बाहर आया।
सिर पर शिखर-शिरस्त्राण दमका, देह पर लाल रेशम चमका। आँखें बिजली-सी चमकीं, पीठ पर पंखा, हाथ तलवार।
दोनों लड़े। बीस राउंड।
स्वर्ण-श्रृंग ने कहा — सेना, घेरो!
वुकोंग घिरा। पर उसने बाल उखाड़े और "शरीर-का-शरीर" की विद्या प्रयोग की — सैकड़ों वुकोंग प्रकट हो गए।
सेना तितर-बितर।
स्वर्ण-श्रृंग अकेला पड़ा। उसने केले-पत्र पंखे से हवा मारी।
आग! पाँच तत्वों की असली आग।
न आकाश की आग, न भट्टी की आग, यह जादुई पंखे की सत्य-आग थी। एक पल में पहाड़ जल उठे, हरे पेड़ मशालें बन गए।
वुकोंग ने अपने नकली शरीर जला दिए। "अग्नि-प्रतिरोध" मंत्र पढ़ा और ऊपर उड़ गया।
— अब गुफा में जाकर गुरु को बचाऊँगा।
गुफा के बाहर — घायल राक्षस लड़खड़ा रहे थे।
वुकोंग ने उन्हें देखा — क्रोध उबला।
दंड से उन पर टूट पड़ा। सब खत्म।
गुफा में घुसा। आग की रोशनी दिखी।
— बड़ी मुश्किल से यहाँ पहुँचा। गुरु इसी आग में होंगे?
पास जाकर देखा — अरे, यह आग नहीं है! यह "हरित जेड बोतल" की रोशनी है।
उसने बोतल उठाई।
— यह तो पहले भी दो राक्षसों के पास थी। अब मेरी।
बाहर निकला। स्वर्ण-श्रृंग आ गया।
— तूने मेरी बोतल चुराई!
वुकोंग ने दौड़ लगाई। दोनों लड़े। चालीस राउंड।
स्वर्ण-श्रृंग थका। पश्चिम की ओर भागा — दबाव-पर्वत की अपनी गुफा की तरफ।
वुकोंग ने गुफा में जाकर तांग सान्ज़ांग, झू बाजिए, शा वुजिंग और घोड़े को मुक्त किया।
तांग सान्ज़ांग ने कहा — शिष्य, बहुत कष्ट उठाया।
वुकोंग ने कहा — आप लोग बस लटके रहे। मैं बार-बार दौड़ता रहा।
झू बाजिए ने कहा — भाई, वह छोटा राक्षस अब तक पिघला?
वुकोंग ने रत्न निकाले — मत खोलो। कहीं वह भी उसी तरह निकल न जाए।
सबने मिलकर गुफा का चूल्हा जलाया। खाना पकाया। शाकाहारी भोजन खाया। रात वहीं बिताई।
अगली सुबह।
स्वर्ण-श्रृंग ने अपनी गुफा की सेना को बताया — सब हो गया। माँ मारी, भाई बंद हुआ।
सब रोए।
तभी स्वर्ण-श्रृंग का मामा — लोमड़ी का महाराज — दो सौ सेना लेकर आया।
उसने कहा — मेरी बहन को मारा? मैं लड़ूँगा।
दोनों सेनाएँ आईं।
वुकोंग और झू बाजिए मैदान में उतरे।
झू बाजिए ने लोमड़ी-मामा को पकड़ लिया। शा वुजिंग ने भी मदद की।
स्वर्ण-श्रृंग ने झू बाजिए को रोका। झू बाजिए घबराया।
वुकोंग बोतल ऊपर से नीचे किया और पुकारा — स्वर्ण-श्रृंग महाराज!
राक्षस ने समझा — मेरे जख्मी राक्षस बुला रहे होंगे। जवाब दिया।
सर्र — बोतल में।
ढक्कन लगाया।
झू बाजिए आया — भाई, राक्षस कहाँ?
वुकोंग ने हँसकर कहा — इस बोतल में।
शा वुजिंग भी खुश।
सब सामान उठाया। घोड़े पर सवार हुए। पश्चिम की ओर चले।
फिर रास्ते में एक अँधे बूढ़े ने रोका।
— संत, मेरे रत्न वापस करो।
वुकोंग ने उसे पहचाना — परम वृद्ध देव!
परम वृद्ध देव ऊपर गए और बोले — वुकोंग, मेरे रत्न वापस करो।
वुकोंग बोला — आपके घर के नौकर इधर-उधर घूम रहे थे। आपने उन्हें नहीं रोका। अब आओ लेने।
परम वृद्ध देव ने कहा — यह मेरी गलती नहीं। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने मुझसे तीन बार रत्न उधार लिए। उन्होंने ही इन्हें यहाँ भेजा — तुम्हारी परीक्षा के लिए।
वुकोंग ने कहा — आपने अगर यह पहले बताया होता तो आसानी से मिल जाते। लीजिए।
परम वृद्ध देव ने पाँचों रत्न वापस लिए। ढक्कन खोले — दोनों राक्षसों से दिव्य आत्माएँ निकलीं। वे फिर से सोने और चाँदी के बाल-सेवक बन गए।
सात हजार रंगों की रोशनी उठी, परम वृद्ध देव आकाश में विलीन हुए।