अध्याय 34: राक्षस का जाल और महासंत की चतुर चालें
स्वर्ण-श्रृंग महाराज ने वुकोंग को रस्सी से जकड़ा, पर वुकोंग चालाकी से कलश चुराने में सफल रहा
दो छोटे राक्षसों ने नकले कलश को ऊपर फेंका — धड़ाम से नीचे आ गिरा।
होशियार कीड़ा ने कहा — यह नकला है! सुन वुकोंग बाहर नहीं था, यह उसी ने धोखा दिया।
वे घबराकर गुफा लौटे। वुकोंग मक्खी बनकर उनके पीछे उड़ा। गुफा के दरवाजे पर बैठ गया।
राक्षसों ने घुटनों के बल बैठकर सब बताया।
स्वर्ण-श्रृंग ने गुस्से में कहा — यह तो वुकोंग ने धोखा दिया!
रजत-श्रृंग ने कहा — भाई, चिंता न करो। हमारे पास पाँच रत्न थे — दो गए, तीन बचे। तलवार, पंखा और रस्सी। रस्सी माँ के पास है। दो विश्वासपात्र छोटे दूत भेजते हैं।
— बड़े वाले बर्बाद हो गए। भेजो "पहाड़ी बाघ" और "समुद्री अजगर" को।
दोनों को आदेश दिया — माँ के पास जाओ। उन्हें भोजन पर बुलाओ। और रस्सी माँगकर लाओ।
वुकोंग ने सब सुना। उड़ा, आगे निकला, खुद छोटे राक्षस का रूप धारण किया।
वुकोंग उन दोनों दूतों के पास पहुँचा — भाई-भाई, राजा ने मुझे भी भेजा है। तुम धीमे चलते हो, इसलिए।
राक्षस बोले — ठीक है, साथ चलो।
वे जंगल में पहुँचे। वुकोंग ने सोचा — यहीं मार देता हूँ।
फिर सोचा — नहीं। पहले पता लगाऊँ कि माँ कहाँ रहती है।
वे काले जंगल के किनारे पहुँचे। दो पत्थर के दरवाजे थे।
— माँ यहाँ रहती है।
वुकोंग ने दोनों को पीछे से एक ही झटके में मार दिया। फिर दो बाल उखाड़े — दोनों का रूप बनाया।
एक दरवाजे पर दस्तक दी। एक महिला राक्षस ने खोला।
— हम स्वर्ण-श्रृंग और रजत-श्रृंग की माँ से मिलने आए हैं।
वुकोंग अंदर गया। बड़े कमरे में एक बूढ़ी राक्षसी बैठी थी। सफेद बाल, झुर्रियाँ, पर आँखें तेज।
वुकोंग मन में बोला — मुझे इसे प्रणाम करना होगा। पर मैंने तो केवल तीन लोगों को प्रणाम किया है — बुद्ध को, गुआनयिन को, और गुरु को। इस राक्षसी को? लेकिन शिष्य के लिए गुरु प्रणाम करते हैं — यही काम है।
वुकोंग घुटनों पर बैठा — माँ, प्रणाम।
बूढ़ी राक्षसी बोली — बेटा, उठो।
वुकोंग मन में हँसा — अच्छा बोली।
वुकोंग ने कहा — बड़े राजा ने बुलाया है — तांग सान्ज़ांग के माँस का भोज है। साथ में रस्सी भी लाएँ।
बूढ़ी खुश हुई — मेरे बेटे कितने अच्छे हैं।
पालकी मँगाई।
वुकोंग ने उसे पालकी में बिठाया। रास्ते में थोड़ी देर रुके। वुकोंग ने खाने का बहाना किया।
पालकी वाले राक्षसों ने कहा — क्या खा रहे हो?
— लंबे रास्ते की थकान। ये लाया था।
— हमें भी दो।
वुकोंग ने लोहदंड निकाला। एक को चूर किया, दूसरे को घायल।
बूढ़ी राक्षसी ने चीख सुनी — सिर बाहर निकाला।
वुकोंग ने एक घातक प्रहार किया।
बूढ़ी राक्षसी गिरी — असल में नौ पूँछ वाली लोमड़ी थी।
वुकोंग ने कहा — अच्छी माँ थी! रस्सी कहाँ है?
उसने तलाशी ली। "चमकती रस्सी" मिली।
वुकोंग खुश हुआ — तीन रत्न मेरे हो गए।
फिर उसने बालों से नए राक्षस बनाए और खुद बूढ़ी माँ का रूप धरा।
गुफा के बाहर पहुँचा — दरवाजा खुला।
अंदर पहुँचकर बैठ गया। दोनों बड़े राक्षस आए और घुटने टेके — माँ, आई!
वुकोंग बोला — बेटो, उठो।
झू बाजिए ऊपर से हँसा — भाई आ गए।
शा वुजिंग ने पूछा — तुम्हें कैसे पता?
झू बाजिए ने कहा — जब "बेटे उठो" कहा तो पीछे से बंदर की पूँछ दिखी। मैं ऊपर था इसलिए देखा।
शा वुजिंग ने कहा — चुप रहो। सुनते हैं।
राक्षस ने पूछा — माँ, झू बाजिए का कान लाओ। मैं उसे चाखना चाहती हूँ।
झू बाजिए घबरा गया — मेरा कान काटेंगे?
तभी बाहर छोटे राक्षसों ने आकर बताया — बड़े राजा! पुरानी माँ को मारकर उनका भेष धरा है वुकोंग!
रजत-श्रृंग ने तलवार निकाली। वुकोंग ने एक झटके में बाहर निकला — गुफा में लाल रोशनी भर गई।
स्वर्ण-श्रृंग काँप गया — भाई, तांग सान्ज़ांग और सबको वापस कर दो।
रजत-श्रृंग ने कहा — नहीं! मेरे तीन रत्न अभी भी हैं। मैं उससे लड़ूँगा।
वह सजकर बाहर आया।
सिर पर शिखर-शिरस्त्राण चमका, देह पर लोहे का कवच दमका। रजत-श्रृंग का रूप था दिव्य, हाथ में तलवार, ओज अभिव्य।
लड़ाई शुरू हुई। तीस राउंड बाद भी बराबरी।
वुकोंग ने सोचा — रस्सी से बाँध दूँ।
उसने चमकती रस्सी फेंकी।
राक्षस ने नाम पहचाना — यह मेरी रस्सी है। उसने "ढीली रस्सी" का मंत्र पढ़ा और निकल आया।
फिर उलटा फेंका — वुकोंग को जकड़ लिया।
वुकोंग ने "पतले शरीर" का प्रयोग किया — पर "कसी रस्सी" का मंत्र पढ़ा राक्षस ने — छूटना नामुमकिन।
गले तक रस्सी खिंची। सात-आठ तलवारें सिर पर मारीं — वुकोंग का बाल भी नहीं टेढ़ा हुआ।
राक्षस ने कहा — इस बंदर का सिर पत्थर है। इसे गुफा में ले चलते हैं।
गुफा में खंभे से बाँध दिया।
झू बाजिए ने ऊपर से कहा — हा हा, अब कान नहीं कटेगा!
वुकोंग ने चुपचाप दंड निकाला। उससे एक "छेनी" बनाई। रस्सी के छल्ले को काटा। एक बाल से नकली वुकोंग बनाया।
अपने असली शरीर को एक छोटे राक्षस में बदल लिया।
झू बाजिए चिल्लाया — भाई छूट गए! नकले को बाँधा है!
स्वर्ण-श्रृंग ने पूछा — झू बाजिए क्या बोल रहा है?
वुकोंग ने कहा — वुकोंग बोल रहा है कि भाग जाए।
रजत-श्रृंग ने कहा — इस झू बाजिए को मुँह पर बीस मारो।
वुकोंग छड़ी लेने गया। झू बाजिए ने धीरे से कहा — हल्के मारना।
वुकोंग ने कहा — मैंने तुम्हारे लिए यह किया, और तुम राज खोल रहे हो!
झू बाजिए ने कहा — तुम्हारा सिर तो बदला, पर उठाकर — अरे, पीछे से पूँछ दिखती है।
वुकोंग ने रसोई में जाकर नीचे बैठकर अपनी पूँछ काली कर ली।
झू बाजिए ने देखा — काली पूँछ?
वुकोंग ने एक और योजना बनाई। राक्षस के पास गया — महाराज, वह रस्सी पुरानी है। एक मजबूत रस्सी से बाँधना होगा।
राक्षस ने कमरबंद उतारी।
वुकोंग ने असली चमकती रस्सी निकाल ली, एक नकली दे दी।
रस्सी अब वुकोंग के पास।
वुकोंग बाहर निकला।
— "महिष-राक्षस, तुम्हारे पास आया।"
राक्षस ने कलश निकाला — इसे अंदर करते हैं।
वुकोंग ने कहा — मेरा नाम "यात्री-सुन" है, "सुन-यात्री" नहीं।
राक्षस ने पुकारा — यात्री-सुन!
वुकोंग ने सोचा — अगर जवाब दिया तो अंदर जाऊँगा। अगर नहीं दिया तो राज खुलेगा।
— जरा कान नहीं है। जोर से पुकारो।
— यात्री-सुन!
वुकोंग ने उँगलियों पर गिनकर सोचा — असली नाम से पुकारा तो जाऊँगा। उल्टे नाम से पुकारा तो नहीं।
— जाने दो।
लेकिन रत्न ने तो बस साँस पकड़नी थी। वुकोंग ने एक अनजाने में साँस ली — फट से अंदर।
अँधेरा। ऊपर जाने की कोशिश — नहीं हुई। घुटन।
वुकोंग ने सोचा — एक घड़ी में गलने की बात की थी। पर मुझे तो परम वृद्ध देव ने अड़तालीस दिन भट्टी में जलाया था। मेरी हड्डियाँ सोने जैसी हैं। मैं नहीं पिघलूँगा।
बाहर राक्षस हिला रहे थे — क्या आवाज आई?
वुकोंग ने एक बाल से अपना आधा शरीर बनाया — नीचे रख दिया। असली शरीर से एक कीड़ा बना और कलश के मुँह पर बैठ गया।
राक्षस ने ढक्कन खोला — वुकोंग उड़ा।
एक छोटे राक्षस का रूप ले लिया।
राक्षस बोला — बंद करो, अभी नहीं गला।
वुकोंग ने सुना और मन ही मन हँसा।
स्वर्ण-श्रृंग ने कलश भरकर शराब रजत-श्रृंग को दी।
रजत-श्रृंग ने वुकोंग-छोटे-राक्षस को कलश दे दिया।
वुकोंग ने कलश कोट में छुपाया। एक बाल से नकला कलश बनाया। वापस राक्षस को दे दिया।
— वुकोंग ने कहा — अब असली कलश मेरे पास है।