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अध्याय 32: समतल पर्वत पर संदेश और कमल गुफा में संकट

देव-दूत चेतावनी देता है, झू बाजिए धोखेबाज राक्षसों के जाल में फँस जाता है

समतल पर्वत कमल गुफा स्वर्ण-श्रृंग महाराज रजत-श्रृंग महाराज झू बाजिए

बाओसियांग राज्य से विदाई लेकर चारों आगे बढ़े। वसंत का मौसम था। रास्ते में फूल खिले थे, पक्षी गा रहे थे।

हल्की हवा में हरियाली लहराती, समुद्र पर जुड़वाँ निगलें मँडराती। रेशमी धागों में बुनी सुबह की किरण, यात्रियों के मन में उमंग की उड़ान।

चलते-चलते एक पहाड़ रास्ते में आ खड़ा हुआ।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — शिष्यो, सावधान! पहाड़ ऊँचे हैं, कहीं कोई बाधा न हो।

वुकोंग ने कहा — गुरु, घबराइए नहीं। "हृदय-स्वतंत्र है, आसमान भी बाधा नहीं।" मेरे रहते कोई डर नहीं।

तांग सान्ज़ांग ने कहा —

"लंबे समय से मैं पश्चिम की ओर चल रहा हूँ, कब पहुँचूँगा बुद्ध के चरणों में? वसंत बीता, गर्मी आई, शरद बीत गई, न जाने कितने पहाड़ और पड़ेंगे राह में।"

वुकोंग ने हँसकर कहा — गुरु, काम पूरा होने पर सारी चिंताएँ दूर होंगी।

पहाड़ पर चढ़ते हुए वे एक लकड़हारे के पास पहुँचे।

"वह पहाड़ की ढलान पर काठ काट रहा था, संतों को आते देखकर वह बाहर आया।"

लकड़हारा जोर से बोला — ओ पश्चिम जाने वाले साधुओ! रुको! यह पहाड़ खतरनाक है। यहाँ एक झुंड है राक्षसों का जो पूर्व और पश्चिम जाने वालों को खाते हैं।

तांग सान्ज़ांग काँप गए। वुकोंग ऊपर चढ़ा और लकड़हारे से बोला — बड़े भाई, नमस्ते। बताओ, वे राक्षस कहाँ हैं? मैं उन्हें भगा दूँगा।

लकड़हारा हँसा — यह कैसा बाबा है! राक्षस भगाने की बात करते हो?

वुकोंग बोला — बस नाम और ठिकाना बताओ।

लकड़हारा बोला — यह पहाड़ समतल पर्वत है। इसमें एक गुफा है — कमल गुफा। दो राक्षस राज करते हैं। एक है स्वर्ण-श्रृंग महाराज, दूसरा रजत-श्रृंग महाराज। उनके पास पाँच जादुई हथियार हैं। वे तांग के तीर्थयात्रियों को खोज रहे हैं। तुम्हारा नाम "तांग" है — तुम बच नहीं सकते।

वुकोंग बोला — कितने भाग्यशाली हैं हम! चलते हैं।

लकड़हारा चला गया। तांग सान्ज़ांग ने देखा कि वह गायब हो गया।

झू बाजिए ने कहा — यह तो दिन का भूत था।

वुकोंग ने आँखें फैलाईं, ऊपर देखा। वह था दिन-देव दूत।

वुकोंग ने उसे पकड़ा — क्यों सीधे नहीं बोलते? इस वेश में क्यों आए?

देव-दूत बोला — वे राक्षस बहुत शक्तिशाली हैं। बहुत सावधान रहना, महासंत।

वुकोंग ने उसे जाने दिया और मन में सोचा — यह बात गुरु को बताई तो वे रो पड़ेंगे। नहीं बताऊँगा। झू बाजिए को पहले भेजता हूँ — वह लड़कर देखे, जीता तो उसकी जय; हारा तो मैं बाद में बचाऊँगा।

वुकोंग की आँखों में आँसू थे — नकली आँसू।

झू बाजिए ने देखा और शा वुजिंग से बोला — भाई, सामान बाँट लेते हैं। तुम अपने रास्ते जाओ, मैं घर जाता हूँ।

तांग सान्ज़ांग ने डाँटा — क्या बकवास है?

झू बाजिए ने कहा — देखो, वुकोंग रो रहा है। वह तो कुल्हाड़ी से, आग से, तेल में तलने से भी नहीं डरता। उसे रोते देखकर मुझे डर लग रहा है।

तांग सान्ज़ांग ने वुकोंग से पूछा — क्या हुआ?

वुकोंग बोला — गुरु, वह लकड़हारा देव-दूत था। उसने कहा — यह राक्षस बहुत खतरनाक हैं। मैं अकेला नहीं कर सकता।

तांग सान्ज़ांग बोले — झू बाजिए और शा वुजिंग तो हैं साथ में।

वुकोंग ने कहा — गुरु, झू बाजिए को एक काम करना होगा।

झू बाजिए बोला — क्या काम?

वुकोंग ने कहा — पहाड़ की टोह लेना।

झू बाजिए ने कहा — यह मैं कर सकता हूँ।

वह चला। वुकोंग ने शरीर हिलाया और एक छोटे कीड़े में बदल गया और झू बाजिए के कान के पास छुप गया।

झू बाजिए सात-आठ ली चला और फिर नाल नीचे फेंक दी। एक हरी घास के मैदान में लेट गया।

बड़बड़ाया — गुरु तो आरामदेह बैठे हैं, उस बंदर के साथ मिलकर मुझे दौड़ाया। मैं यहाँ सोऊँगा। थोड़ी देर बाद झूठ बोलकर वापस जाऊँगा।

वुकोंग मन ही मन हँसा। उसने रूप बदला — एक कठफोड़वा बना और झू बाजिए के होठों पर एक चोंच मारी।

झू बाजिए उछला — राक्षस आए! राक्षस आए! मुझे भाला मारा!

हाथ से छुआ — खून निकल रहा था।

वह ऊपर देखा — एक कठफोड़वा उड़ रहा था।

बड़बड़ाया — उस बंदर ने यही काम किया है — पक्षी बनकर मुझे जगाया।

वह फिर लेट गया। वुकोंग ने फिर चोंच मारी।

झू बाजिए उठा — ठीक है, नहीं सोऊँगा।

आगे गया। एक खुले मैदान में तीन बड़े चौकोर पत्थर देखे।

झू बाजिए ने पत्थरों को प्रणाम किया और उनके सामने प्रश्नोत्तर का अभ्यास करने लगा।

— अगर गुरु पूछें, पहाड़ का नाम क्या है? तो बोलूँगा — पत्थर का पहाड़। — गुफा का नाम? — पत्थर की गुफा। — दरवाजा? — लोहे का दरवाजा। — अंदर कितना? — तीन परतें।

वुकोंग ने यह सब सुना और पहले उड़कर वापस पहुँच गया।

— गुरु, वह झूठ बोलकर लौटेगा।

तांग सान्ज़ांग ने कहा — तुम उस पर हमेशा संदेह करते हो।

झू बाजिए लौटा और मुँह में बात पका रहा था।

वुकोंग ने पूछा — पहाड़ का नाम?

झू बाजिए बोला — पत्थर का पहाड़।

— गुफा का नाम?

— पत्थर की गुफा।

— दरवाजे पर कितने कील?

झू बाजिए चुप। फिर बोला — दिल भटका हुआ था, ध्यान नहीं रहा।

वुकोंग ने कहा — मैं बताता हूँ — "कीलें गिनना भूल गया।"

झू बाजिए घुटनों पर गिर गया।

वुकोंग ने डाँटा — निकम्मे! इतने जरूरी काम पर भेजा था और तू सो गया। फिर पत्थरों के सामने झूठ का अभ्यास किया।

झू बाजिए बोला — माफ करो।

— ठीक है। अब जाओ और सच में टोह लो।

झू बाजिए फिर चला। इस बार वुकोंग उसके पीछे नहीं गया।

लेकिन झू बाजिए को अब हर चीज में वुकोंग दिखने लगा। बाघ को देखा तो बोला — भाई, तुम मेरे पीछे आए? गिरा हुआ पेड़ देखा तो बोला — भाई, पेड़ क्यों बने? कौवे ने बोला तो बोला — भाई, कौआ मत बनो।

असल में वुकोंग गया नहीं था — झू बाजिए खुद ही डरा हुआ था।

इधर, कमल गुफा में दो राक्षस बात कर रहे थे।

बड़े ने कहा — काफी समय हो गया पहाड़ी गश्त में नहीं गए।

छोटे ने कहा — तो आज जाते हैं।

बड़े ने कहा — मैंने सुना है पूर्व के तांग देश से एक तीर्थयात्री आ रहा है। उसे खाओ तो उम्र बढ़ती है।

छोटे ने कहा — अगर उसे खाने से उम्र बढ़ती है तो हम ध्यान क्यों करते हैं? जाओ और उसे पकड़ लाओ।

बड़े ने कहा — भाई, उनके शिष्यों में एक वानर है — सुन वुकोंग। बहुत खतरनाक। पहले उसके बारे में जानकारी लेनी होगी।

उसने छोटे को एक चित्र दिया — तीर्थयात्रियों के रेखाचित्र।

छोटे ने तीस छोटे राक्षसों को साथ लिया और निकल पड़ा।

झू बाजिए सामने पड़ गया।

राक्षसों ने पूछा — तुम कौन हो?

झू बाजिए ने कहा — बस यात्री हूँ।

एक राक्षस बोला — यह चित्र से मेल खाता है। यह झू बाजिए है।

झू बाजिए ने सुना — दिल धड़का। बोला — ऐ नगर देवता, मैंने मंदिर बनाने की मन्नत मानी!

लड़ाई शुरू हुई। झू बाजिए बीस राउंड तक लड़ा। तभी छोटे राक्षसों ने घेर लिया।

झू बाजिए को घास की जड़ से ठोकर लगी — गिरा। एक राक्षस ने पैर पकड़ा — दूसरे ने खींचा।

एक राक्षस की पकड़ में वह आ फँसा, मुक्ति का रास्ता अब था बंद।

झू बाजिए को गुफा में ले जाया गया। वहाँ उसे एक पानी के तालाब में फेंक दिया गया — बाद में नमक लगाकर सुखाया जाएगा।