Journeypedia
🔍

अध्याय ३० — राक्षस का धर्म पर आक्रमण और श्वेत नाग-अश्व की गुरु को याद

पीत-वस्त्र राक्षस रूप बदलकर दरबार में आता है और तांग सान्ज़ांग को बाघ में बदल देता है। श्वेत नाग-अश्व स्वयं अजगर रूप में युद्ध करता है, और अंत में झू बाजिए को सुन वुकोंग को वापस बुलाने के लिए प्रेरित करता है।

पीत-वस्त्र राक्षस तांग सान्ज़ांग श्वेत नाग-अश्व सुन वुकोंग झू बाजिए बाओसियांग राज्य परिवर्तन-माया

पीत-वस्त्र राक्षस ने शा वुजिंग को बाँधा। उसे मारा नहीं, गाली नहीं दी। बस बाँध दिया।

राक्षस सोच रहा था — तांग सान्ज़ांग सज्जन हैं, जानते हैं कि उन्हें बचाने वाले उनके शिष्य थे। फिर भी शिष्यों ने यहाँ हमला किया। जरूर राजकुमारी ने कोई पत्र भेजा।

राक्षस आया। राजकुमारी श्रृंगार करके सामने आई।

— प्रिय, क्या हुआ? इतने क्रोधित क्यों?

— तुम! — राक्षस चिल्लाया — कितनी बड़ी बेईमान हो! मैंने तुम्हें यहाँ रखा, कभी कमी नहीं की। पर तुम्हारा दिल हमेशा माता-पिता में रहा! उस भिक्षु को मैंने जाने दिया था — तो तुमने उसके हाथ कोई संदेश भेजा? नहीं तो वे शिष्य यहाँ क्यों लड़ने आए?

राजकुमारी काँपते हुए बोली — मैंने कोई पत्र नहीं भेजा।

— झूठ मत बोलो! एक गवाह यहाँ बँधा है!

राजकुमारी ने सोचा — अगर मैंने कहा कि मैंने पत्र नहीं भेजा, तो शा वुजिंग मरेगा। और उसने मेरी भलाई के बदले में मुझे बचाया। यह कृतघ्नता होगी।

— ठीक है। शा वुजिंग से पूछो।

राक्षस ने शा वुजिंग को खींचा — दरवाजे पर लाया। तलवार उठाई।

— बताओ! राजकुमारी ने पत्र भेजा था?

शा वुजिंग ने सोचा — राजकुमारी ने मेरे गुरु को बचाया था। यह उपकार था। अगर मैं सच बोलूँ तो राजकुमारी मारी जाएगी। यह उपकार का बदला नहीं होगा।

उसने कहा — क्या पत्र? कोई पत्र नहीं था। बाओसियांग के राजा ने अपनी बेटी के बारे में जानकारी माँगी, गुरु जी ने उन्हें तुम्हारा नाम बताया। राजा ने हमें भेजा। बस इतनी बात है।

राक्षस शांत हुआ। उसने तलवार रखी।

राजकुमारी को उठाया — माफ करना, मैं गुस्से में था।

राजकुमारी की आँखें भर आईं। राक्षस ने उसके बाल सँवारे, नरमी से बात की।

फिर बोला — मेरे लिए शराब रखो, बच्चों को देखो। मुझे एक काम है।

— कहाँ?

— उस राजा से मिलने। वह मेरा ससुर है, मैं उसका दामाद।

— नहीं जाओ! — राजकुमारी घबराई।

— क्यों?

— तुम्हारा रूप... अजीब है। राजा को देखकर डर लग सकता है।

— तो मैं सुंदर रूप बनाकर जाऊँगा।

— देखो तो।

राक्षस ने रूप बदला — एक सुंदर युवा पुरुष।

सुंदर चेहरा, ऊँचा कद। वाणी शाही, चाल उम्रदराज युवक जैसी। मस्तक पर काले बादलों जैसी टोपी, चौड़ी आस्तीन वाला जेड-रेशम का कुर्ता। कढ़ाई वाले जूते, मोर-पट्टी कमर में। सच में एक सुंदर राजकुमार।

राजकुमारी ने देखकर प्रसन्नता जताई।

— यदि अंदर जाकर शराब मिले तो अच्छा। पर याद रहे — असली रूप मत दिखाना।

राक्षस उड़ा।

बाओसियांग राज्य का महल। दरवाजे पर आकर कहा — तीसरे दामाद महाराज से मिलने आए हैं।

दरबारी ने अंदर खबर दी।

राजा हैरान — तीन दामाद? मेरे तो दो ही हैं!

मंत्री ने कहा — यह जरूर कोई राक्षस है।

राजा ने तांग सान्ज़ांग से पूछा — क्या करें?

— बुला लीजिए। आए तो भी, न बुलाएँ तो भी।

राक्षस को बुलाया। प्रणाम किया। देखने में इतना सुंदर था कि दरबार को शक नहीं हुआ।

राजा ने पूछा — तुम कहाँ से हो?

— कटोरा-पर्वत, लहर-चाँद-गुफा।

— मेरी बेटी तुम तक कैसे पहुँची?

— तेरह वर्ष पहले एक शेर उसे ले जा रहा था। मेरे तीर से शेर गिरा, बेटी बच गई। उसे पूछा — वह बोली "साधारण परिवार की हूँ।" अगर राजकुमारी बताती तो मैं तुरंत यहाँ लाता। दोनों को प्रेम हो गया।

फिर राक्षस ने कहा — और यह जो भिक्षु बैठा है — यह असल में वह शेर है जो राजकुमारी को ले जाता था। उसने तांग सान्ज़ांग का भेस बनाया है। आप देखें।

राजा अचंभित — कैसे जानते हो?

— वह उसी शेर जैसा है। अगर चाहें तो दिखा सकता हूँ।

राजा ने आधा कप पानी मँगवाया।

राक्षस ने पानी हाथ में लिया, उठा, पास आया और एक "काली-दृष्टि शरीर-जड़ाने की विद्या" का मंत्र पढ़कर तांग सान्ज़ांग पर पानी फेंका —

— बदलो!

तांग सान्ज़ांग की जगह — एक धारीदार बाघ!

सफेद माथा, गोल सिर, धारीदार शरीर, बिजली जैसी आँखें। चार पंजे सीधे और कठोर, बीस नाखून — काँटों जैसे तेज। आरे जैसे दाँत, लाल जीभ। यह एक भयंकर और महाशक्तिशाली बाघ था।

राजा घबराया। दरबारी भागे। कुछ साहसी सेनापति तलवारें लेकर आगे आए।

पर रक्षक देवों ने अदृश्य रहकर तांग सान्ज़ांग की रक्षा की — तलवारें लगीं ही नहीं।

शाम तक बाघ को जीवित पकड़ा गया। लोहे की रस्सी, लोहे का पिंजरा। दरबार के कमरे में रखा।

राक्षस ने राजा का आभार लिया। उसके लिए शाही भोज। अठारह नृत्यांगनाएँ।

पर रात होते-होते राक्षस नशे में आया। खुद को रोक न सका।

उछला, हँसा, असली रूप में आ गया — और एक नृत्यांगना को पकड़कर खाने लगा!

बाकी सत्रह — चीखती-भागती।

महल की सुंदरियाँ काँपीं, एक-दूसरे से बिछड़ीं। किसी ने वाद्य-यंत्र फेंके, प्राण बचाने को दौड़ी, किसी ने दरवाजे से निकलकर दिशा भूली। उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम — सब अलग-अलग।

रात गहरी थी। कोई चिल्ला नहीं सकता था।

बाहर खबर फैली — तांग सान्ज़ांग बाघ है!

यह खबर महल के अस्तबल तक पहुँची।

श्वेत नाग-अश्व — पश्चिमी सागर के छोटे नाग-राजा — पाप के कारण घोड़ा बना, पर मन में बोध था।

उसने सोचा — गुरु जी तो अच्छे इंसान हैं! जरूर किसी ने माया से बदला। बड़े भाई वुकोंग वापस नहीं आए, झू बाजिए और शा वुजिंग का कुछ पता नहीं।

रात के दूसरे पहर वह उठा। रस्सी तोड़ी, जीन झाड़ी —

और मूल रूप — अजगर-देव!

अँधेरे बादलों पर उठा, ऊपर से देखा।

महल में एक खिड़की से रोशनी।

नीचे आया। देखा — राक्षस अकेला बैठा, शराब पी रहा था।

अजगर ने सोचा — यह अच्छा नहीं। खुल गया असली चेहरा। मेरे गुरु जी का क्या हाल है — जानता नहीं। अभी चाल चलता हूँ — अगर मिल गए तो ठीक।

श्वेत नाग-अश्व ने रूप बदला — एक सुंदर नृत्यांगना।

अंदर गई — प्रणाम किया।

— दामाद जी, आप अकेले हो। मैं शराब परोसती हूँ।

राक्षस ने शराब माँगी।

नृत्यांगना ने ऊँचा भरा — शराब का सतह बर्तन के किनारे से तीन-चार उँगल ऊपर, पर गिरी नहीं।

यह था "जल-दबाव विद्या।"

राक्षस ने देखा — वाह! तुम्हारे हाथ में यह जादू?

— और ऊँचा भर सकती हूँ।

— कर दिखाओ।

श्वेत नाग-अश्व ने एक-एक करके ऊँचा भरती गई — तेरह मंजिल मीनार जैसा ऊँचा, गिरा नहीं।

राक्षस ने झुककर पिया।

— गाना जानती हो?

— थोड़ा।

सुंदर गाना। एक और प्याला।

— नाचती हो?

— बिना तलवार के अच्छा नहीं लगेगा।

राक्षस ने कमर से तलवार निकालकर दे दी।

श्वेत नाग-अश्व ने तलवार ली। नाचने लगी — ऊपर-नीचे, चारों ओर —

और अचानक राक्षस के सिर पर जोरदार वार!

राक्षस ने झुककर बचाया। एक मोमबत्ती उठाई — रोका।

मोमबत्ती लोहे की थी — सत्तर-अस्सी कट्टी की!

दोनों बाहर निकले। श्वेत नाग-अश्व असली रूप में —

एक था पर्वत-जनित राक्षस, दूसरा था पश्चिमी सागर का दंडित अजगर। एक की रोशनी सफेद बिजली जैसी, दूसरे की शक्ति लाल बादल जैसी। एक चाँदी का नाग उड़ता हुआ, दूसरा पीत राक्षस घूमता हुआ।

आठ-नौ दौर।

श्वेत नाग-अश्व का हाथ थकने लगा। राक्षस मजबूत था।

श्वेत नाग-अश्व ने तलवार फेंकी — राक्षस की ओर।

राक्षस ने एक हाथ से तलवार पकड़ी, दूसरे से मोमबत्ती फेंकी — श्वेत नाग-अश्व के पिछले पैर पर लगी!

दर्द से तड़पा। महल की नहर में कूदा — बच गया।

राक्षस ने ढूँढा — नहीं मिला।

तलवार और मोमबत्ती लेकर वापस महल में आया।


श्वेत नाग-अश्व नहर में आधा घंटे रहा। तब बाहर निकला।

दाँत पीसकर दर्द सहा। पैर पर चोट का नील।

अस्तबल में लौटा — फिर घोड़ा बन गया।

मन-घोड़ा और विचार-बंदर — दोनों बिछड़ गए। सोने और लकड़ी की माँ — दोनों कमजोर पड़ गए। पीली माँ घायल है, अलगाव है। धर्म-मार्ग पर यह रोक — कैसे आगे बढ़ेंगे?


रात के बाद — झू बाजिए घास में जागा।

अँधेरा था। न कुत्ते भौंकते, न मुर्गे बोलते।

सोचा — शा वुजिंग की मदद करनी चाहिए। पर अकेले नहीं कर सकता। राजा के यहाँ जाकर खबर दूँगा।

झू बाजिए उड़ा, राजमहल पहुँचा।

अस्तबल में घोड़े को देखा — भीगा हुआ, पिछले पैर पर नीली चोट।

झू बाजिए ने पूछा — यह क्या हुआ?

घोड़े ने — मुँह खोला।

— भाई!

झू बाजिए डरकर पीछे हटा।

— मत भागो! मैं हूँ।

— तुम... बोलते हो? अशुभ!

— सुनो। गुरु जी संकट में हैं।

झू बाजिए ने सारी बात सुनी।

— मुझे क्या करना है?

— पुष्प-फल पर्वत जाओ। बड़े भाई सुन वुकोंग को बुलाओ। वही इस राक्षस को हरा सकते हैं।

— वह... मुझसे नाराज है। मैंने ही गुरु जी से उसे निकलवाया था।

— वह मजबूत इंसान है। बस इतना कहो — "गुरु जी आपको याद कर रहे हैं।"

— अगर आए तो अच्छा। न आए तो मैं भी नहीं आऊँगा।

— तुम जाओ। वह जरूर आएँगे।

झू बाजिए ने नव-दंती हल सँभाला, कपड़े सीधे किए, उड़ा — दोनों कानों को पाल की तरह फैलाया —

तेज हवा पर। पूर्वी सागर पार किया।

सूरज निकला।

वुकोंग पर्वत की एक चट्टान पर बैठा था। सामने बारह-सौ से ज्यादा बंदर — पंक्ति में खड़े।

— महाराज जय हो! — सब एक साथ।

झू बाजिए ने देखा — यह तो बड़े ठाट में जी रहे हैं! इसीलिए वापस नहीं आता!

झू बाजिए धीरे-धीरे बंदरों की भीड़ में घुस गया और उन्हीं के साथ झुककर प्रणाम करने लगा।

वुकोंग की नजर तेज थी — इस भीड़ में यह कौन अजीब चेहरा है?

— इसे पकड़ो!

बंदरों ने झू बाजिए को पकड़ लिया।

— तुम कौन हो? यहाँ क्यों आए?

— मैं... मैं तुम्हें जानता हूँ। कई साल साथ रहा।

— सिर उठाओ।

झू बाजिए ने नाक उठाई।

— पहचानते हो?

वुकोंग हँसा — झू बाजिए!

— हाँ हाँ, मैं ही हूँ।

— गुरु जी ने निकाला तो तुम यहाँ क्यों आए? बेदखल हुए?

— नहीं। गुरु जी ने भेजा है — वे आपको याद कर रहे हैं।

वुकोंग की आँखें बदलीं — नहीं। उन्होंने मुझे निकाल दिया। शपथ ली। वे मुझे याद नहीं करेंगे।

झू बाजिए ने झूठ बोला — गुरु जी घोड़े पर जा रहे थे और आपको याद किया — "वुकोंग होता तो सब ठीक रहता।" इसीलिए मुझे भेजा।

वुकोंग उठा — चलो, थोड़ा पर्वत घूमते हैं।

झू बाजिए ने कहा — रास्ता लंबा है, गुरु जी इंतजार में हैं।

वुकोंग ने जोर दिया — एक बार आए हो, पर्वत तो देखो।

झू बाजिए पर्वत की चोटी तक गया।

पर्वत अब हरा-भरा था —

नीला-कटा-पन्ना, ऊँचाई आकाश छूती। चारों ओर बाघ-साँप की गूँज, बंदरों की चीखें। सुबह बादल शिखर पर, शाम को सूरज जंगल में। धारा कल-कल बोलती — माणिक्य के गहने, पर्वत-झरना बजता — जेड की वीणा।

झू बाजिए मन ही मन खुश हुआ — कितना सुंदर! अगर यहाँ रहता तो मैं भी संन्यास न लेता।

वुकोंग ने पूछा — भाई, यहाँ कुछ दिन रहोगे?

— नहीं, गुरु जी इंतजार में हैं।

— तो अलविदा।

झू बाजिए चौंका — तुम नहीं आओगे?

— मैं क्यों आऊँ? यहाँ कोई बाधा नहीं। मुझे संन्यास की क्या जरूरत?

झू ने आखिरी कोशिश की — ठीक है, गुरु जी की याद दे देता हूँ।

वुकोंग ने नहीं माना।

झू बाजिए उतरने लगा। थोड़ी दूर जाकर वुकोंग की ओर इशारा करके बड़बड़ाया —

— यह बंदर! मैंने अच्छे मन से बुलाने आया था। नहीं आता तो ठीक है।

दो छोटे बंदरों ने देखा — भागकर खबर दी।

— महाराज! वह जाते हुए गालियाँ दे रहा है।

वुकोंग ने कहा — पकड़ लाओ।

बंदरों ने झू बाजिए को पकड़ लिया — फिर सामने लाया।

— तुमने गाली दी?

— नहीं, बस बड़बड़ाया।

— सच बताओ — गुरु जी के साथ क्या हुआ?

झू बाजिए ने आँखें नीचे कीं। फिर सब कुछ बताया।

वुकोंग का चेहरा बदला। फिर भी बाहर से शांत रहा।

— ठीक है। चलो।

झू बाजिए की साँस में साँस आई।

वुकोंग ने छोटे बंदरों को कुछ आदेश दिए।

और दोनों पूर्व की ओर — बाओसियांग राज्य की ओर उड़ चले।

इच्छा-घोड़ा और मन-बंदर — दोनों एक-दूसरे को याद आए। सोने और लकड़ी का रिश्ता — टूटा था, जुड़ने वाला था। पीली माँ घायल है — पर देखभाल होगी। धर्म-मार्ग अब साफ होगा।