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अध्याय २९ — गुरु का कैद से छुटकारा और बाओसियांग राज्य में झू बाजिए का नया अभियान

बाओसियांग राज्य की राजकुमारी बाई-हुआ-शिउ गुरु को गुफा से बाहर भेजती है, और उन्हें परिवार को पत्र देने की विनती करती है। राजा के दरबार में झू बाजिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके राक्षस को पकड़ने जाता है।

बाओसियांग राज्य बाई-हुआ-शिउ पीत-वस्त्र राक्षस तांग सान्ज़ांग झू बाजिए शा वुजिंग राजकुमारी

व्यर्थ विचारों को जबरन मिटाने की कोशिश मत करो, सत्य-स्वभाव के लिए क्यों विशेष इच्छा रखो? मूल स्वभाव ही बुद्धत्व की साधना का पहला आधार, भ्रम और बोध — दोनों पहले और बाद नहीं। क्षण भर में ही बोध होता है, भ्रम में हजारों जन्म बह जाते हैं। एक क्षण का सच्चा साधना-मेल, अनगिनत पापों को नष्ट कर देता है।

झू बाजिए और शा वुजिंग ने पीत-वस्त्र राक्षस से तीस दौर लड़े। फिर भी जीत नहीं मिली।

क्यों? राक्षस शक्तिशाली था। लेकिन जब तांग सान्ज़ांग उसकी गुफा में थे, उस वक्त छह-दिशाओं के देव, चार-काल-कर्मी, पाँच-दिशाओं के दूत — सब अदृश्य रूप से झू बाजिए और शा वुजिंग की मदद कर रहे थे। इसीलिए बराबरी रही।

उधर गुफा के अंदर — तांग सान्ज़ांग रोते हुए अपने शिष्यों को याद कर रहे थे।

तब एक स्त्री आई — भीतर से।

— आप कहाँ से आए हैं? इस खम्भे से क्यों बँधे हैं?

— मैं पूर्व से आया एक भिक्षु हूँ। यहाँ आकर गलती हो गई।

— मैं बाओसियांग राज्य की तीसरी राजकुमारी हूँ — नाम बाई-हुआ-शिउ। तेरह वर्ष पहले इस राक्षस ने मुझे उठाकर यहाँ कैद किया। यहाँ उसकी पत्नी के रूप में रहती हूँ। आप पश्चिम की यात्रा पर हैं?

गुरु ने हाँ में सिर हिलाया।

— तो एक काम करेंगे? मैं अपने माता-पिता को एक पत्र लिखती हूँ। बाओसियांग राज्य आपके पश्चिम मार्ग में ही पड़ता है। अगर आप पत्र पहुँचाएँगे तो मैं आपको छुड़वाऊँगी।

गुरु ने हाँ कहा।

राजकुमारी ने पत्र लिखा। गुरु को बंधनमुक्त किया।

— सामने के दरवाजे से मत जाइए — वहाँ राक्षसों की सेना है। पिछले दरवाजे से जाइए।

गुरु ने झुककर प्रणाम किया।

राजकुमारी आगे गई — पीत-वस्त्र राक्षस से मिली।

— प्रिय, एक सपना आया। एक देव ने कहा — मैंने कसम खाई थी कि भिक्षुओं को भोजन कराऊँगी। अगर उस भिक्षु को छोड़ दो तो मेरी कसम पूरी होगी।

राक्षस हँसा — एक भिक्षु की क्या कमी है? ले जाओ उसे।

— पिछले दरवाजे से छोड़ दो।

— ठीक है।

झू बाजिए और शा वुजिंग ने पीछे के दरवाजे पर — गुरु की आवाज!

घास की झाड़ियों में से — तांग सान्ज़ांग!

शा वुजिंग ने हाथ थामा। घोड़े पर बैठाया।

भयंकर संकट में, भाग्यशाली कि बाई-हुआ-शिउ थी। मछली जाल से निकली — पानी में लौटी।

तीनों चले। रात को आश्रय, सुबह फिर आगे।

दो सौ निन्यानबे योजन — एक भव्य नगर!

बाओसियांग राज्य।

बादल-ओझल पर्वत-मार्ग, रास्ता लंबा। दूर होकर भी दृश्य एक जैसे। शुभ-धुंध और सुगंधित धुआँ छाया, स्वच्छ वायु, उज्ज्वल चंद्रमा।

गुरु महल के दरवाजे पर आए।

— मैं तांग देश का भिक्षु हूँ, पश्चिम की यात्रा पर। यात्रा-दस्तावेज पर मुहर चाहिए।

राजा ने बुलाया। गुरु ने झुककर प्रणाम किया।

दोनों ओर के दरबारी बोले — पूर्व के महान देश का व्यक्ति — कितना विनम्र और गरिमामय।

राजा ने दस्तावेज देखा। मुहर लगाई।

— महाराज, — गुरु बोले — एक और काम है। आपकी तीसरी राजकुमारी बाई-हुआ-शिउ — उनका एक पत्र लाया हूँ।

राजा की आँखें भर आईं। पत्र खोला —

"अभागी पुत्री बाई-हुआ-शिउ का सौ बार प्रणाम, महाराज पिता के चरणों में —

तेरह वर्ष पहले, सोलहवें अगस्त की शाम, चंद्रमा देखते समय, एक नीले मुख वाले राक्षस ने मुझे उठाकर कटोरा-पर्वत की लहर-चाँद-गुफा में ले गया। वहाँ उसकी पत्नी के रूप में रहती हूँ, दो बच्चे हैं — दोनों राक्षस के।

यह लज्जाजनक है। पर जीवित हूँ, इसीलिए यह पत्र लिखा।

तांग देश के महान भिक्षु ने मुझ पर दया की। उन्हीं से यह पत्र भेज रही हूँ।

पिता जी, कृपया किसी वीर सैनिक को भेजें — पीत-वस्त्र राक्षस को पकड़ें, मुझे वापस लाएँ।

आपकी अभागी पुत्री।"

पत्र पढ़ा गया। राजा रोया। तीन रानियाँ रोईं। दरबारी दुखी हुए।

राजा ने पूछा — कौन वीर राक्षस को पकड़ेगा?

सन्नाटा।

एक मंत्री ने कहा — महाराज, पूर्व के भिक्षु के साथ उनके शक्तिशाली शिष्य हैं।

राजा ने गुरु से कहा — अगर आपके शिष्य राक्षस को पकड़ लें तो मैं उन्हें बड़ा पुरस्कार दूँगा। आप यहीं ठहरें।

गुरु ने कहा — मेरे दो शिष्य हैं। दिखने में बहुत अजीब, पर बड़े वीर।

— बुलाइए।

झू बाजिए और शा वुजिंग दरबार में आए। दरबारी घबरा गए।

झू बाजिए ने कहा — क्या हो गया? मैं बुरा दिखता हूँ, पर धीरे-धीरे देखोगे तो पसंद आऊँगा।

राजा डर से सिंहासन से गिरने लगा — शुक्र था दरबारियों ने पकड़ लिया।

— माफ कीजिए महाराज — गुरु ने कहा — पहले से बता दिया था।

— हाँ, — राजा ने साँस ली — अगर पहले से न बताते तो डर से मर जाता।

— कौन राक्षस से लड़ सकता है? — राजा ने पूछा।

झू बाजिए ने हाथ उठाया — मैं!

— तुम कैसे लड़ोगे?

— मैं स्वर्ग का पूर्व-नौसेनापति हूँ। पाप के कारण यहाँ जन्मा। पर शक्ति अभी भी है।

— तुम बदल सकते हो?

— थोड़ा-बहुत।

— कुछ दिखाओ।

झू बाजिए ने मंत्र पढ़ा — "बढ़ो!" — आठ-नौ हाथ ऊँचा हो गया, राह-खोलने वाले देव जैसा।

दरबारी काँपे। एक सेनापति ने पूछा — कितना बढ़ सकते हो?

— पूर्वी हवा हो तो ठीक। पश्चिमी हवा भी चलेगी। पर दक्षिण की हवा चले तो आकाश में एक बड़ा छेद कर दूँ।

राजा ने कहा — बस बस! पर्याप्त।

झू बाजिए सामान्य आकार में आ गया।

राजा ने शाही शराब मँगवाई — एक प्याला झू बाजिए को।

झू ने गुरु की ओर देखा, फिर पिया।

शा वुजिंग को भी दिया।

झू बाजिए उड़ गया।

शा वुजिंग ने कहा — गुरु जी, वह अकेला जाएगा, मैं भी जाता हूँ।

गुरु ने मान लिया।

शा वुजिंग भी उड़ा।

दोनों कटोरा-पर्वत पर पहुँचे।

झू बाजिए ने दरवाजे पर नव-दंती हल मारी — एक बड़ा छेद।

छोटे राक्षस घबराए, अंदर खबर दी।

पीत-वस्त्र राक्षस ने कवच पहना, बाहर आया।

— तुम्हें छोड़ा था। फिर आए?

झू बाजिए बोला — बाओसियांग की राजकुमारी को वापस करो। मैं राजा का आदेश लेकर आया हूँ।

राक्षस ने तलवार उठाई। संग्राम शुरू —

आठ-नौ दौर। लड़ते रहे।

पर इस बार रक्षक-देव नहीं थे — वे सब राजमहल में गुरु के साथ थे। इसलिए दो शिष्य अकेले थे।

झू बाजिए थकने लगा।

— शा वुजिंग, तुम सँभालो — मुझे जरूरी काम है।

झू एक ओर झाड़ियों में घुस गया — भाला जमीन पर रखा, सिर डाला और सो गया।

शा वुजिंग अकेला — राक्षस आगे बढ़ा।

शा वुजिंग के पास समय नहीं था — राक्षस ने एक हाथ से उसे पकड़ लिया, गुफा में ले गया।

चार हाथ-पैर बाँध दिए।

पीत-वस्त्र राक्षस की शक्ति अजेय थी, झू बाजिए की नींद ने साथ छोड़ा। एक अकेला सत्य के लिए लड़ता रहा, और बंधन में जा पड़ा।