अध्याय २८ — पुष्प-फल पर्वत पर राक्षस-सभा और काले वन में तांग सान्ज़ांग का राक्षस से सामना
वुकोंग पुष्प-फल पर्वत लौटता है और शिकारियों को हराकर बंदरों को मुक्त करता है। उधर तांग सान्ज़ांग जंगल में भटककर पीत-वस्त्र राक्षस के हाथ पकड़े जाते हैं।
वुकोंग को गुरु ने निकाला था। पर मन था कि जाता नहीं था।
पूर्वी सागर की लहरें नीचे थीं। वुकोंग ने ऊपर से देखा — लहरों की गड़गड़ाहट सुनी, आँखें भीगीं।
फिर मन को मजबूत किया और पुष्प-फल पर्वत पर उतरा।
पर नीचे आते ही देखा — यह तो अलग ही जगह लगती है। फूल नहीं, हरियाली नहीं। जले हुए पेड़, टूटे पत्थर, उजड़ी जमीन।
एक कविता — उजड़े पर्वत का शोक-गीत —
पीछे मुड़कर देखी अपनी पहाड़ी, आँसू गिरे, पर्वत को देखकर दुख और बढ़ा। तब सोचा था पर्वत को कुछ नहीं होगा, आज देखा — जमीन भी घायल है। नफरत है उस दूसरे देव पर जिसने जलाया, वह छोटा देव — आदमी को कैसे कष्ट दे सकता है?
पूर्व की ढलान से बाघ नहीं दहाड़ता, पश्चिम के पर्वत से सफेद बंदर नहीं चिल्लाता। उत्तर की नदी में लोमड़ी के पैर नहीं, दक्षिण की घाटी में हिरन की परछाईं नहीं। नीले पत्थर जले हुए, हजार टुकड़ों में, हरी रेत राख हो गई। गुफा के बाहर देवदारु सब झुक गए, चट्टान के सामने देवदार कम हो गए।
पहले के पक्षी अब कहाँ गए? पहले के जानवर किस पर्वत पर गए? तेंदुए और अजगर ने यह बर्बाद जगह छोड़ी, बगुले और साँपों ने टूटी-फूटी जगह छोड़ी। मेरे पुराने बुरे कर्मों का यह फल है, आज यह तकलीफ भोग रहा हूँ।
वुकोंग दुखी था। तभी घास-पहाड़ी की दरार से सात-आठ छोटे बंदर निकले।
— महाराज! आप आ गए!
— तुम सब छिपे थे? मैं कई देर से खड़ा हूँ, आए क्यों नहीं?
बंदरों ने रोते हुए बताया — महाराज, जब से आप स्वर्ग-युद्ध में पकड़े गए, शिकारी आने लगे। धनुष-बाण, बाज-कुत्ते। हम जाल और फंदों में फँस गए। जो मरे, उनकी खाल उतारी, माँस खाया। जो जिंदा पकड़े गए, उन्हें नाचते-गाते बाजारों में दिखाया गया। हम हजार-बारह सौ ही बचे हैं।
वुकोंग और दुखी हुआ।
— आज वे शिकारी कहाँ हैं?
— रोज आते हैं।
— तो आज भी आएँगे?
— शायद।
— ठीक है। तुम सब अंदर जाओ। मुझे बाहर काम है।
वुकोंग ने पहाड़ के दक्षिण ओर देखा — एक हजार से ज्यादा शिकारी, घोड़े, कुत्ते, बाज।
— ये लोग आए। अब देखो मेरे करतब।
उसने मंत्र पढ़ा, दक्षिण-पूर्व की दिशा में एक बड़ी साँस ली — एक तूफान उठाया।
धूल, पत्थर, रेत — सब हवा में उड़े। शिकारियों पर पत्थर बरसे —
हड्डियाँ टूटीं, माथे फटे, घोड़े भागे। एक हजार शिकारी खाक हो गए।
वुकोंग नीचे उतरा और हँसा — अच्छा! जब से गुरु के साथ हूँ, कहते हैं — "राक्षसों को मारना पाप है।" आज घर आया तो इन शिकारियों को मारा।
— सब बाहर निकलो!
छोटे बंदर दौड़ते आए।
वुकोंग ने कहा — शिकारियों के कपड़े उतारकर पहनो। घोड़ों की खाल से जूते बनाओ। माँस नमकीन करके रखो। मैले झंडे-बैनर इकट्ठे करो।
बंदरों ने किया।
वुकोंग ने उन झंडों को मिलाकर एक रंग-बिरंगा झंडा बनाया — उस पर लिखा: "पुनर्निर्मित पुष्प-फल पर्वत, पुनर्स्थापित जल-पर्दा गुफा — स्वर्ग-तुल्य महासंत।"
झंडा गुफा के बाहर फहराया।
वुकोंग ने पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी सागर के नाग-राजाओं से पावस-जल माँगा और पूरा पर्वत धो दिया। आगे-पीछे पेड़ लगाए — आड़ू, आलूबुखारा, खजूर, बेर — सब। स्वतंत्र, प्रसन्न।
उधर तांग सान्ज़ांग — वुकोंग को निकालकर वे आगे बढ़े।
झू बाजिए आगे रास्ता बनाता, शा वुजिंग पीछे घोड़ा सँभालता।
एक काले देवदार के जंगल में पहुँचे — घना, अँधेरा।
गुरु ने कहा — भूख लग रही है। झू, जाओ भोजन माँगकर आओ।
झू बाजिए गया। दस योजन चला — कोई गाँव नहीं। थक गया।
सोचा — अगर खाली हाथ लौटा तो गुरु यकीन नहीं करेंगे कि इतनी दूर चला। थोड़ी देर और घूमता हूँ। उसने घास में घुसकर सिर डाला और सो गया।
गुरु अकेले बैठे थे। शा वुजिंग ने कहा — शायद वह किसी के घर बैठकर खा रहा है।
गुरु व्याकुल हो गए — रात हो रही है, यह जंगल में रहना ठीक नहीं। कोई आश्रय ढूँढना होगा।
शा वुजिंग गया — झू को खोजने।
गुरु अकेले — मन बेचैन, पैर सुन्न। उठकर जंगल में थोड़ा टहलने लगे।
भटक गए।
जंगल से बाहर निकले। एक मीनार की सोने की छत चमक रही थी — सूर्य की रोशनी में।
गुरु ने सोचा — मेरे शिष्य नहीं मिले, पर यहाँ शायद आश्रय मिले। जाकर देखते हैं।
उस मीनार के पास पहुँचे। अंदर झाँका।
एक विशाल पत्थर की चौकी पर एक राक्षस सो रहा था —
नीली दाढ़ी, सफेद नुकीले दाँत, खुला मुँह। दोनों तरफ उलझे बाल — लाल रंग से रँगे। तीन-चार गहरी मूँछें — लाल बेर के फूल जैसी। चोंच जैसी नाक, आँखें भोर के तारे जैसी। दो मुट्ठियाँ — भिक्षु के कटोरे जैसी। दोनों पैर — चट्टान पर टँगी लकड़ी। हल्के पीले वस्त्र — रेशम की काषाय से बेहतर। हाथ में एक चमकदार तलवार।
गुरु डर गए। पीछे मुड़ने लगे —
राक्षस की आँखें खुलीं।
— छोटे राक्षसों! बाहर देखो, कोई है क्या?
एक छोटे राक्षस ने झाँका — एक गोरा, मुँडा, मोटा भिक्षु।
राक्षस ने कहा — यह तो सर्प के सिर पर मक्खी है — खुद चला आया। पकड़ो!
छोटे राक्षस दौड़े। गुरु भागने की कोशिश करते रहे — पर जंगल के रास्ते अँधेरे थे, पैर काँपते थे।
पकड़ लिया गया।
— तुम कहाँ से आए हो, भिक्षु? — राक्षस ने पूछा।
— मैं तांग देश का भिक्षु हूँ, पश्चिम की यात्रा पर। इस पर्वत से गुजरते हुए आपकी मीनार देखी।
— अच्छा! तुम वही तांग सान्ज़ांग हो जिसे मैं खाना चाहता था। खुद ही आ गए।
— राक्षस मुस्कुराया — छोटे राक्षसों! रस्सी लाओ।
गुरु बाँध दिए गए।
राक्षस ने पूछा — तुम्हारे साथ और कोई है?
— दो शिष्य हैं। भोजन माँगने गए हैं।
— बढ़िया। तुम तीनों मिलकर एक भोजन होगा। — राक्षस ने आँखें चमकाईं — दरवाजा बंद करो। वे आएँगे तो खुद खोजते हुए आ जाएँगे।
उधर शा वुजिंग ने घास में सोते झू बाजिए को खींचकर उठाया।
— हाय! — झू बाजिए ने आँखें मलीं — कितना बज गया?
— गुरु जी नहीं मिले! तुम यहाँ सो रहे थे!
झू बाजिए हड़बड़ाकर उठा। दोनों जंगल में लौटे।
— यहाँ जंगल साफ है, राक्षस नहीं। शायद टहलने गए हों।
दोनों जंगल से बाहर निकले — दक्षिण की ओर सोने की चमक।
झू बाजिए बोला — शायद वहाँ कोई मंदिर है, गुरु जी गए होंगे। चलो।
पास आए — "कटोरा-पर्वत, लहर-चाँद-गुफा" — पट्टिका पर छह अक्षर।
शा वुजिंग ने कहा — यह कोई मंदिर नहीं, यह तो एक राक्षस की गुफा है! गुरु जी यहाँ फँस गए होंगे।
झू बाजिए ने दरवाजा ठोका।
छोटे राक्षस ने अंदर खबर दी — वे दोनों आ गए!
राक्षस ने कवच पहना, तलवार उठाई और बाहर आया।
झू बाजिए ने देखा —
नीला चेहरा, लाल मूँछें, उड़ते बाल, सोने का कवच चमकदार। पत्थर की पेटी, चमड़े का कमरबंद, नीले इंद्र-हाथ, जीवन-नाशक तलवार। यह नाम है — पीत-वस्त्र राक्षस।
— ओ भिक्षुओ! तुम कौन हो?
— हम तांग सान्ज़ांग के शिष्य हैं। हमारे गुरु को छोड़ो।
— तुम्हारे गुरु यहाँ हैं — मेहमान की तरह। तुम भी अंदर आओ, साथ खाना खाते हैं।
झू ने माना लिया। शा वुजिंग ने खींचा — मूर्ख! तुम्हें खाएगा वह!
झू चौंका — ठीक कहा। उसने हल उठाया।
युद्ध शुरू —
नव-दंती हल और तलवार, उसके बाद शा वुजिंग का दंड। तीनों आकाश में उठे।
दस दौर — बराबरी। बीस दौर — भी बराबरी।
राक्षस की तलवार तेज थी, हाथ मजबूत था।
झू और शा ने उसे घेरा। रात तक लड़ते रहे।
एक के लिए बुरे थे, दो के लिए अजेय। पर वे भिक्षु जो थे, देवों की रक्षा में। पर्वत के पत्थर काँपे, आकाश हिला, पर पीत-वस्त्र का बाल भी बाँका न हुआ।