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अध्याय २७ — श्वेत-अस्थि आत्मा का तीन छलावा और गुरु का वुकोंग को निष्कासन

श्वेत-अस्थि आत्मा तीन बार रूप बदलकर यात्रियों को धोखा देती है। सुन वुकोंग हर बार उसे पहचानता है और मारता है, पर झू बाजिए के उकसावे पर तांग सान्ज़ांग क्रोधित होकर उसे निष्कासित कर देते हैं।

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जगत-समसमयी और वुकोंग में भाई-बंधुत्व हो गया। पाँच-छह दिन रुके। गुरु का मन पश्चिम की ओर था — चले।

अगली सुबह एक विशाल पर्वत मिला। शिखरों पर धुंध, गहरी घाटियों में भालू-भेड़िए।

वुकोंग आगे था — दंड तिरछा थामे, शेरों और बाघों को भगाता।

गुरु भूख से व्याकुल थे। वुकोंग से कहा — जाओ, कहीं से खाना माँगकर लाओ।

— गुरु जी, यह घने जंगल हैं। कोई गाँव नहीं, कोई दुकान नहीं।

— तुमने मुझे बचाया था, पर अब भोजन नहीं ला सकते? — गुरु चिढ़े।

— आप रुकिए, मैं दक्षिण के पहाड़ पर लाल-लाल आड़ू देख रहा हूँ — वहाँ से कुछ लाता हूँ।

वुकोंग कटोरा लेकर दक्षिण की ओर उड़ा।

उस पर्वत पर एक राक्षसी रहती थी — वर्षों से वहाँ। जब वुकोंग उड़ा तो वह राक्षसी जाग गई।

नीचे देखा — तांग सान्ज़ांग! अकेले बैठे हैं। उसके मन में लालच जागा — यह बुद्ध का पूर्व-जन्म, दस जन्मों का तपस्वी। इनका एक टुकड़ा खाने से अनंत आयु।

पर झू बाजिए और शा वुजिंग के थे। राक्षसी रुकी। फिर सोचा — पहले खेलती हूँ।

उसने रूप बदला — एक सुंदर युवती। बाईं ओर हरे बर्तन में सुगंधित चावल, दाईं ओर हरी बोतल में तली हुई रोटियाँ।

पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हुई गुरु के सामने आई।

झू बाजिए ने देखा — हाय! कोई खाना लेकर आ रही है! दौड़कर सामने आया।

युवती ने कहा — भिक्षु महाराज, मेरे माता-पिता धर्मशील हैं, भिक्षुओं को भोजन कराना शुभ मानते हैं। आज यह भोजन आप लोगों के लिए।

झू खुशी से उछला — गुरु जी, आज बहुत शुभ दिन है!

गुरु ने विश्वास नहीं किया — यह बेसिरपैर की बात है। इतनी जनशून्य जगह खाना देने वाला कैसे?

झू बाजिए खाने की ओर झपटने वाला था कि वुकोंग वापस आया।

वुकोंग ने आँखें चमकाईं — राक्षसी! उसने तुरंत दंड उठाई।

गुरु ने हाथ पकड़ा — यह स्त्री है, मारते हो?

— गुरु जी, यह छल है। मैं जानता हूँ — मैंने खुद ऐसे ही सोने, घर और सुंदर स्त्रियों का रूप लेकर लोगों को फँसाया था।

गुरु ने नहीं माना। वुकोंग ने दंड मारी —

राक्षसी "मृत-देह छोड़ने की विद्या" जानती थी। दंड आते ही वह असली शरीर से निकल गई, एक नकली लाश छोड़ गई।

नकली लाश गिरी।

गुरु घबराए — इसने एक बेगुनाह को मार दिया!

वुकोंग ने कहा — गुरु जी, उस हरे बर्तन में देखिए।

शा वुजिंग ने देखा — चावल नहीं, लंबे कीड़े! रोटियाँ नहीं, मेंढक और कुरूप ठेठर!

गुरु को थोड़ा यकीन आया।

पर झू बाजिए ने टीका-टिप्पणी की — दादा ने मार दिया, फिर झूठ बोल रहे हैं।

गुरु ने कसने वाला मंत्र पढ़ा।

— सिर दर्द! — वुकोंग तड़पा — मत पढ़िए, गुरु जी।

गुरु ने कहा — हमेशा दया रखनी चाहिए। तुमने एक स्त्री को मारा।

— वह राक्षसी थी।

— एक और गलती हुई तो तुम्हें जाना होगा।

वुकोंग ने माफी माँगी।

राक्षसी ऊपर उड़ रही थी — दो बार वुकोंग मुझे धोखा दे चुका। अगर यह दल यहाँ से निकल गया तो दूसरे राक्षस पकड़ लेंगे। एक बार और कोशिश करती हूँ।

राक्षसी नीचे उतरी। एक वृद्ध महिला बनी — झुकी कमर, बाँस की लाठी, रो-रोकर चलती।

झू बाजिए ने कहा — गुरु जी, वह माँ है, बेटी को ढूँढने आ रही है।

— यह भी झूठ है, — वुकोंग बोला — वह अठारह साल की थी, यह अस्सी की। साठ साल बाद कोई बच्चा पैदा नहीं करता।

वुकोंग दंड लेकर दौड़ा —

राक्षसी ने फिर नकली लाश छोड़ी, असली शरीर से निकल गई।

गुरु फिर गिर पड़े और बीस बार कसने वाला मंत्र पढ़ा!

वुकोंग सिर पकड़कर गिर पड़ा — मत पढ़िए, मत पढ़िए!

— मैंने तुम्हें एक बार माफ किया। अब दो लोग मारे। जाओ।

— गुरु जी, वह राक्षसी है। मैं नहीं जाऊँगा।

झू बाजिए ने और भड़काया।

— तुम जाओ। — गुरु ने दृढ़ता से कहा।

राक्षसी ने फिर रूप बदला — एक वृद्ध बाबा। सफेद दाढ़ी, हाथ में गोल-मोल चोटी वाली छड़ी, माला फेरते हुए मंत्र पढ़ते।

गुरु ने खुशी से कहा — पश्चिम की भूमि में बुजुर्ग भी मंत्र पढ़ते हैं!

झू बाजिए ने कहा — नहीं गुरु जी, यह उसी परिवार का बाबा है जिसकी लड़की और बुढ़िया को दादा ने मारा।

वुकोंग ने बुदबुदाया — अगर मैंने मारा तो यह जाता। अगर नहीं मारा तो इस खाली जगह से कोई उठाकर ले जाएगा।

उसने भूमि-देवता और पर्वत-देवताओं को बुलाया — इस बार गवाह बनो। यह राक्षसी तीसरी बार आई है। इसे मुझे मारना ही होगा।

वुकोंग ने दंड उठाई — एक जोरदार वार।

राक्षसी जमीन पर गिरी।

अब असली रूप — एक हड्डियों का ढेर।

पीठ पर एक पट्टी — "श्वेत-अस्थि राजकुमारी।"

गुरु ने देखा — चौंके।

झू बाजिए ने कहा — यह माया है, असल में इंसान थी।

गुरु ने फिर मंत्र पढ़ा।

वुकोंग ने मनाने की कोशिश की — गुरु जी, वह स्वयं ने कहा था कि भूत है!

गुरु ने कहा — नहीं। इस यात्रा में तुमने तीन निर्दोष लोग मारे। अगर मैं तुम्हें रखूँ तो पापी बनूँगा। जाओ।

वुकोंग ने आखिरी कोशिश की — गुरु जी, आपको किसने बचाया था?

गुरु की आँखें नम हुईं — हाँ, याद है।

— बिना मुझे साथ लिए पश्चिम की यात्रा कठिन है।

— मेरे पास झू बाजिए और शा वुजिंग हैं।

वुकोंग घुटने टेककर बोला — गुरु जी, कम से कम एक बार प्रणाम करने दीजिए।

गुरु ने मना किया, पर वुकोंग ने अपने तीन बाल उखाड़े — तीन नकली वुकोंग बने, चारों ओर से गुरु को घेरकर झुके।

गुरु को झुकना पड़ा।

वुकोंग ने शा वुजिंग से कहा — तुम अच्छे इंसान हो। झू बाजिए की बातों पर ध्यान मत देना। रास्ते में राक्षस पकड़े तो कहना — "सुन वुकोंग हमारा बड़ा भाई है, पश्चिम के राक्षस उसका नाम सुनकर डरते हैं।"

गुरु ने कहा — मैं तुम्हारा नाम नहीं लूँगा।

वुकोंग की आँखें भर आईं।

रोते हुए गुरु को प्रणाम किया, दुखी मन से शा वुजिंग को समझाया। आँसू से ढलान की घास भीगी, पैरों ने जमीन की बेल उखाड़ी। आकाश-पृथ्वी में चक्र की तरह घूमता, समुद्र पार करना, पर्वत उड़ाना — यह पहली योग्यता है। पल भर में — अदृश्य। पलटी-बादल पर — पुष्प-फल पर्वत की ओर।

वुकोंग अकेला पुष्प-फल पर्वत की ओर उड़ा। पानी की आवाज —

पूर्वी सागर की लहरें! उसे फिर गुरु की याद आई। उसकी आँखें भर आईं।

लंबे समय तक बादल पर रुका। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।