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अध्याय २६ — सुन वुकोंग का तीन द्वीपों पर उपाय-खोज और गुआनयिन बोधिसत्त्व का पवित्र-जल से वृक्ष को जीवित करना

वुकोंग उजड़े अमृत-वृक्ष को ठीक करने के उपाय के लिए तीन द्वीपों पर जाता है। सभी देव असमर्थ हैं। अंत में गुआनयिन बोधिसत्त्व अपने पवित्र-जल-कलश से वृक्ष को पुनर्जीवित करती हैं।

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संसार में जीते हुए मन में तलवार रखो, आत्म-साधना में एक पल को भी न भूलो। शब्द "धार" जीवन-ऊर्जा है — पर तीन बार सोचो, क्रोध और छल से बचो। उत्तम पुरुष कभी विवाद नहीं करता, ऋषि का गुण काल के साथ चलता है। कठोरता के ऊपर भी कठोरता होती है — अंत में सब खोखला और मिथ्या।

जगत-समसमयी देव ने वुकोंग का हाथ थामा — मैं जानता हूँ तुम्हारी शक्ति। मैंने तुम्हारे बारे में सुना है। पर इस बार तुमने सीमा लाँघी। अगर बुद्ध तक भी बात पहुँची तो भी पेड़ का हिसाब देना होगा।

— ठीक है। पेड़ जीवित करूँगा। पहले गुरु को छोड़ो।

— पेड़ जीवित कर सकते हो? — देव ने अचरज से पूछा।

— हाँ।

— अगर सच में ऐसा किया तो मैं तुमसे आठ बार प्रणाम करके भाई का रिश्ता जोडूँगा।

गुरु, झू, शा को मुक्त किया।

शा वुजिंग चुपचाप झू से बोला — पता नहीं भाई साहब क्या करेंगे।

झू ने आँखें घुमाईं — यह कहते हैं "जीवित करूँगा" — पर असल में यहाँ से निकलने का बहाना है।

गुरु ने वुकोंग को पुकारा — कहाँ जाओगे उपाय ढूँढने?

— पुराने समय से कहा जाता है — "उपाय समुद्र के पार से आता है।" मैं पूर्वी सागर के तीन द्वीपों पर जाऊँगा, वहाँ महासंतों से पूछूँगा।

— कितने दिन लगेंगे?

— तीन दिन।

— ठीक है, तीन दिन में नहीं आए तो...

— जानता हूँ — कसने वाला मंत्र। — वुकोंग मुस्कुराया — मैं आऊँगा। पर इस बीच गुरु जी को अच्छा खाना देना — तीन बार चाय, छह बार भोजन। कपड़ा मैला हो तो धुलवाना। और उनका चेहरा पीला पड़े तो मुझे खबर करना, नहीं तो मैं लौटकर तुम्हारी कड़ाही तोड़ूँगा।

देव हँसे — जाओ।

वुकोंग पलटी-बादल पर उड़ा — बिजली की तरह — और पुष्प-द्वीप पर पहुँचा।

वहाँ तीन वृद्ध संत बैठे — आयु-देव, सौभाग्य-देव, धन-देव — शतरंज खेल रहे थे।

— भाई साहबों, नमस्कार!

तीनों चौंके — महासंत, यहाँ कैसे?

— एक काम है। दस-हजार-आयु पर्वत की पाँच-मंडल वेधशाला में अमृत-वृक्ष उजड़ा — कोई उपाय है?

तीनों घबराए — तुमने अमृत-वृक्ष उखाड़ा? उसकी एक सुगंध से तीन सौ वर्ष की आयु, एक फल से सैंतालीस हजार वर्ष! हमारे पास कोई उपाय नहीं।

आयु-देव ने कहा — यहाँ उपाय नहीं। दूसरी जगह हो सकती है। पर तीन दिन की सीमा है — हम खुद चलते हैं।

— सच में?

— हम तीनों मिलकर जगत-समसमयी से मिलने जाएँगे। समय निकलवाएँगे।

वुकोंग आगे चला — फिर उड़ा — चतुर्भुज-द्वीप पहुँचा। वहाँ एक महासंत मिले।

— महासंत, मेरे पास एक नौ-मोड़ वाला सूत्र-दंड है। संसार के जीवित प्राणियों को पुनर्जीवित कर सकता है, लेकिन पेड़ नहीं। पेड़ तो भूमि और आकाश की शक्ति से उगता है। यह साधारण पेड़ होता तो ठीक करना संभव था। पर यह तो प्रलय से पहले का बीज है।

— तो कोई उपाय नहीं?

— नहीं। माफ करो।

वुकोंग वहाँ से उड़ा — वारिधि-द्वीप। वहाँ नौ वृद्ध संत थे — आनंद में मग्न, संगीत और शराब।

वुकोंग ने पुकारा — मुझे भी शामिल करो!

नौ संत हँसे — महासंत, स्वर्ग छोड़कर भिक्षु बन गए? यहाँ कैसे?

— पाँच-मंडल वेधशाला में एक संकट है। अमृत-वृक्ष को जीवित करने का उपाय चाहिए।

— तुमने यह किया? — सब चौंके।

— बाद में कहानी। उपाय है?

— नहीं है। हमारे पास।

— तो मैं चला।

एक कटोरा जादुई रस पिया, एक टुकड़ा कमल खाया। फिर उड़ा — पूर्वी सागर को पार करके सीधे लोक-पर्वत पर।

गुआनयिन बोधिसत्त्व! बैंगनी बाँस के जंगल में।

बोधिसत्त्व ने उसे आते देखा और रक्षक देव को भेजा — जाओ, पूछो क्या काम है।

वुकोंग ने सिर झुकाकर प्रणाम किया।

— वुकोंग, तांग सान्ज़ांग कहाँ हैं?

— दस-हजार-आयु पर्वत पर अटके हैं। मैंने वहाँ अमृत-वृक्ष उखाड़ दिया। तीनों द्वीपों पर उपाय ढूँढा — कहीं नहीं मिला। आपसे प्रार्थना है।

बोधिसत्त्व ने शांत भाव से कहा — तुमने यह क्यों किया? जगत-समसमयी भूमि-देवों के पूर्वज हैं, मैं भी उन्हें सम्मान देती हूँ। और तुमने उनका अमृत-वृक्ष उखाड़ा?

— गलती हो गई। क्षमा।

— मेरे कलश में जो पवित्र जल है, वह पेड़ को जीवित कर सकता है।

वुकोंग की आँखें चमकीं — सच में?

— हाँ। एक बार परम वृद्ध देव ने मुझसे शर्त लगाई — मेरी विलो-शाखा उखाड़कर अपनी दान-भट्टी में जलाई। मैंने उसे कलश में रखा — एक रात और एक दिन में वह फिर हरी हो गई।

— अगर जली हुई डाल ठीक हो सकती है तो उखड़ा पेड़ क्यों नहीं? — वुकोंग खुशी से बोला।

बोधिसत्त्व ने सबको बताया — मैं जा रही हूँ। तुम लोग यहाँ रहो।

सफेद तोते को आगे किया, कलश हाथ में लेकर उड़ीं। वुकोंग पीछे।

पाँच-मंडल वेधशाला। सब बाहर आए — तीन द्वीपों के संत, जगत-समसमयी, गुरु के शिष्य।

बोधिसत्त्व ने पहले जगत-समसमयी से क्षमाचाहना की — मेरा शिष्य सुन वुकोंग अनुचित था। मैं आपसे माफी माँगती हूँ।

सब बगीचे में गए। पेड़ गिरा हुआ था।

बोधिसत्त्व ने कहा — वुकोंग, हाथ फैलाओ।

वुकोंग का बायाँ हाथ आगे किया। बोधिसत्त्व ने विलो-शाखा से पवित्र जल छिड़का, हथेली पर एक मंत्र-चिह्न बनाया।

— इसे पेड़ की जड़ के नीचे रखो। जब पानी उठे तो रोको।

वुकोंग ने मुट्ठी बंद की, जड़ के नीचे रखी। थोड़ी देर में — एक स्वच्छ जल-स्रोत!

बोधिसत्त्व बोलीं — पानी उठाने के लिए पाँच-तत्त्व का पात्र नहीं चलेगा। जेड का पात्र चाहिए।

जेड की चाय-प्याली और शराब के प्याले लाए गए।

वुकोंग, झू, शा ने पेड़ उठाया — सीधा किया, मिट्टी दबाई।

प्याले भरे — बोधिसत्त्व ने विलो-शाखा से एक-एक करके जल छिड़का।

धीरे-धीरे — पत्ते निकले, डालें हरी हुईं, फल आए। तेईस फल।

चिंग-फेंग ने गिने — पहले बाईस थे, अब तेईस?

वुकोंग बोला — मैंने तीन चुराए थे। एक जमीन पर गिरा था जो भूमि-देवता ने कहा था कि मिट्टी में घुस गया। वही तेईसवाँ है।

बोधिसत्त्व ने कहा — इसीलिए मैंने पाँच-तत्त्व के पात्र से पानी नहीं लिया — इस फल और पाँच-तत्त्व में विरोध है।

जगत-समसमयी बहुत प्रसन्न हुए। दस फल तोड़े। सबको बुलाया —

बोधिसत्त्व को ऊपर बिठाया, तीनों संतों को बाईं ओर, तांग सान्ज़ांग को दाईं ओर, जगत-समसमयी सामने।

सबने एक-एक फल खाया।

कविता —

दस-हजार-आयु पर्वत की प्राचीन कंदरा, मानव-फल नौ हजार वर्षों में एक बार पकता है। जीवंत हुई जड़ें और टूटी शाखाएँ, पवित्र जल से हरे पत्ते और फल लहराए। तीन संत प्रसन्न — पुरानी मुलाकात, चार भिक्षु सौभाग्यशाली — पूर्व-जीवन का नाता। अब जो भी मानव-फल खाएगा, वह दीर्घजीवी अमर-संत बन जाएगा।

बोधिसत्त्व और तीनों संत विदा हुए।

जगत-समसमयी ने शाकाहारी भोज तैयार किया। वुकोंग से भाई का रिश्ता जोड़ा।

जो बिना मार-पीट के मिलते नहीं, वे ही सच्चे दोस्त बनते हैं। दोनों दिल मिले।

रात को सब विश्राम करने गए।

सौभाग्यशाली थे — अमृत-फल मिला, दीर्घ पथ पर राक्षसों की परीक्षा अभी बाकी है।