अध्याय २५ — जगत-समसमयी देव का पीछा और सुन वुकोंग का पाँच-मंडल वेधशाला में उपद्रव
जगत-समसमयी देव लौटकर पाते हैं कि उनका अमृत-वृक्ष उजड़ा है। वे यात्रियों का पीछा करके उन्हें पकड़ते हैं। वुकोंग पत्थर-सिंह और लकड़ी-तनों की माया से बार-बार भागता है।
दोनों बालकों ने दरबार में पहुँचकर वुकोंग को सच्चाई उगलवाई।
— हाँ, — वुकोंग ने कहा — तीन फल मैंने चुराए, हम सबने खाए। अब क्या करोगे?
बालकों ने गालियाँ देना शुरू किया। वुकोंग का धैर्य टूटा। उसने एक बाल फूँककर नकली वुकोंग बना दिया। असली वुकोंग उड़कर बगीचे में गया और दंड उठाकर उस अमृत-वृक्ष पर एक जोरदार वार किया —
पर्वत-हटाने की शक्ति लगाकर पेड़ उखाड़ दिया!
पत्ते झड़े, डालियाँ टूटीं, जड़ें उखड़ीं। ऊपर एक भी फल नहीं।
वह वापस आया, बाल वापस खींची।
बालक फिर बगीचे में गए — देखा, पेड़ गिरा। वे बेहोश हो गए।
जब उठे तो समझे — यह माया-रूप बदलने वाला बंदर! हम दो — वे चार! सीधे मुकाबला नहीं कर सकते।
उन्होंने चाल सोची — खाना परोसेंगे, खाते समय दरवाजा बंद करके ताला लगा देंगे।
सो हुआ। सबने कटोरे उठाए और दोनों बालकों ने ताले लगा दिए।
— चोरों! — चिंग-फेंग चिल्लाया — भागे कहाँ? अमृत-वृक्ष उखाड़ दिया, हमारी पाँच-मंडल वेधशाला की जड़ काट दी! गुरु आएँगे तब देखते हैं।
रात भर खड़े-खड़े गालियाँ दीं।
अगले दिन वुकोंग के संकेत पर सब रात को निकले। रास्ते में झू बाजिए ने कहा — दादा, तुम तो कीड़ा बनकर निकल जाओगे, पर हम?
— चिंता मत। मेरे पास ताला-खोलने का मंत्र है।
वुकोंग ने दंड से इशारा किया — सब ताले खुले। चारों बाहर।
वुकोंग ने दोनों सोते बालकों के चेहरे पर नींद-कीड़े फेंके। गहरी नींद।
रात भर घोड़ा दौड़ता रहा।
उधर जगत-समसमयी देव आकाश से उतरे। बगीचे में पेड़ गिरा देखा।
बालकों को जगाया — पानी मुँह पर छिड़का, मंत्र पढ़ा — वे उठे।
सारी कथा सुनी। देव मुस्कुराए — मत रोओ। वह सुन वुकोंग बड़ा मशहूर है, स्वर्ग को भी हिला चुका है। लेकिन जो किया सो किया। क्या तुम उन साधुओं को पहचान सकते हो?
— हाँ।
— तो आओ पीछा करें।
देव ने योगी-वेश बदला। नीचे देखा — यात्री कहाँ? बहुत आगे नहीं निकले, रात में एक सौ बीस योजन ही चले।
देव ने जमीन पर उतरकर वेश बदला — एक पैदल तीर्थयात्री बना।
तांग सान्ज़ांग पेड़ की जड़ पर बैठे थे, झू बाजिए और शा वुजिंग झपकी ले रहे थे।
वह अजनबी सामने आया —
— तांग सान्ज़ांग से मिलने की इच्छा है। मैं दस-हजार-आयु पर्वत की पाँच-मंडल वेधशाला का निवासी हूँ।
वुकोंग ने तुरंत जवाब दिया — हम वहाँ कभी नहीं गए!
देव ने हँसकर कहा — बंदर, तुम किसे धोखा देते हो? मेरे अमृत-वृक्ष को तुमने उखाड़ा और रात को भाग आए। रुको, पहले मेरा पेड़ ठीक करो।
वुकोंग का धैर्य टूटा — दंड उठाया, जोर से मारने दौड़ा।
देव आकाश में उठे, असली रूप में आए — बैंगनी मुकुट, सफेद योगी-वस्त्र, तीन मूँछें, काले बाल। हाथ में केवल एक झाड़ू-पंख।
वुकोंग ने अंधाधुंध मारा। देव ने झाड़ू-पंख से रोका। दो-तीन दौर।
फिर देव ने आस्तीन फैलाई —
एक ही झटके में — सभी चार साधु, घोड़ा, सामान — सब समा गए!
झू बाजिए बोला — भाई साहब, हम थैले में बंद हो गए!
— थैले में नहीं, उनकी आस्तीन में।
वुकोंग ने दंड से मारने की कोशिश की — कपड़ा बाहर से नरम, अंदर से लोहे से भी कठोर।
देव वापस वेधशाला आए। शिष्यों ने यात्रियों को खम्भों से बाँध दिया।
— पहले किसे मारें? — देव ने पूछा।
— तांग सान्ज़ांग को — क्योंकि वे गुरु हैं, शिष्य को ठीक से नहीं रोका।
वुकोंग बोला — गलत! फल चुराना, खाना, पेड़ उखाड़ना — सब मैंने किया। पहले मुझे मारो।
देव मुस्कुराए — ठीक है। फल की संख्या के बराबर — तीस बार।
एक बलशाली शिष्य ने चमड़े का कोड़ा उठाया। पैरों पर मारना शुरू किया।
वुकोंग ने कमर मरोड़ी, मन में बोला — बदलो! पाँव लोहे के हो गए — चमकते, ठोस।
तीस कोड़े पड़े। फर्क — कुछ नहीं।
देव ने कहा — गुरु को भी मारो, शिक्षा-भ्रष्टता के लिए।
वुकोंग बोला — गुरु दोषी नहीं। मैं ही दोषी। मुझे फिर मारो।
तीस और कोड़े। वुकोंग के पाँव दर्पण जैसे चमकने लगे। देव को अचरज हुआ।
रात आई। देव ने कहा — कोड़े पानी में भिगोकर रखो, कल फिर मारेंगे।
सब सो गए।
गुरु ने आँसू बहाए — वुकोंग, तुमने लाखों मुसीबतें ढाईं।
वुकोंग बोला — गुरु जी, रोइए मत। मैं भागने का रास्ता निकालूँगा।
तब रात के अंधेरे में वुकोंग ने अपना शरीर छोटा किया — रस्सियाँ ढीली हो गईं। वह बाहर निकला।
चुपचाप गुरु, झू और शा को मुक्त किया। सामान, घोड़ा — सब लिया।
झू बाजिए से बोला — चार विलो-पेड़ काट लाओ।
झू ने काटे।
वुकोंग ने मंत्र बोला, खून को पेड़ों पर छिड़का — बदलो! एक पेड़ गुरु बना, एक वुकोंग, दो झू और शा।
सभी ने नाम पुकारने पर जवाब दिया।
दल फिर रात को निकल गया।
अगली सुबह देव ने कहा — पहले तांग सान्ज़ांग को मारो।
— तांग सान्ज़ांग, मार खाने को तैयार? — शिष्य ने पुकारा।
— मारो। — विलो-पेड़ ने जवाब दिया।
तीस कोड़े पड़े।
— झू बाजिए, मार खाने को तैयार?
— मारो।
— शा वुजिंग?
— मारो।
— सुन वुकोंग?
उस पल वुकोंग — असली वाला — रास्ते पर चल रहा था और उसे अचानक ठंड लगी।
— भाई साहब, क्या हुआ? — गुरु ने पूछा।
— मेरे नकली रूप पर मार पड़ रही है। कोड़ा लग रहा है। माया वापस लेनी होगी।
मंत्र वापस लिया। विलो-पेड़ प्रकट। शिष्य घबराए —
— गुरु जी! तांग सान्ज़ांग की जगह विलो की जड़ें थीं!
देव हँसे — सुन वुकोंग! सच में महावानर राजा! स्वर्ग ने जाल बिछाया पर पकड़ नहीं सका। ठीक है — अगर पेड़ ठीक करवा दो तो माफ करूँगा।
देव ने आकाश में उड़कर पश्चिम देखा — यात्री दिख गए।
वे उतरे। रूप बदला।
वुकोंग ने पहचाना — तुम फिर!
— भागे नहीं चलेगा। पेड़ वापस ठीक करो।
वुकोंग ने दंड उठाया। देव ने झाड़ू-पंख निकाला। फिर संग्राम।
तीनों शिष्यों ने एक साथ हमला किया — देव ने फिर आस्तीन फैलाई।
फिर कैद।
देव वेधशाला लौटे। इस बार उन्होंने गुरु को जमीन पर बाँधा, झू और शा को अलग-अलग पेड़ से, वुकोंग को उलटा।
फिर दस थान कपड़ा मँगवाया। तीनों — गुरु, झू, शा — को कपड़े में लपेटकर लाख से सीला।
— अब वुकोंग को तेल-कड़ाही में डालो।
बड़ी कड़ाही में तेल खौलाया।
वुकोंग मन में खुश हुआ — चलो, थोड़ा स्नान मिलेगा, पसीने से शरीर जलन कर रहा था।
लेकिन उसने चारों तरफ नजर घुमाई — देखा: पूर्व की ओर एक दिन-घड़ी, पश्चिम की ओर एक पत्थर-सिंह।
वुकोंग ने शरीर मरोड़ा — पत्थर-सिंह के पास गया, मुँह में थूका — बदलो! पत्थर-सिंह वुकोंग बन गया। असली वुकोंग बादलों में उड़ गया।
शिष्यों ने कड़ाही के पास पहुँचकर कहा — तेल खौल रहा है गुरु जी।
— वुकोंग को डालो।
बीस शिष्यों ने उठाने की कोशिश की — हिला नहीं। बीस और आए — नहीं हिला। बीस और — तब कहीं जाकर उठाकर कड़ाही में डाला।
तेल उछला — शिष्यों के चेहरे पर जले के दाग!
— कड़ाही में छेद हो गया!
देखा तो तेल बह गया था — कड़ाही में एक पत्थर-सिंह।
देव को गुस्सा आया। पर मुस्कुराए भी — यह बंदर! ठीक है, गुरु को डालो।
ऊपर से वुकोंग ने सुना — गुरु जी को? नहीं!
वह नीचे उतरा — रोको! गुरु को मत डालो, मैं आया।
देव ने उसका हाथ पकड़ा — बंदर! मेरे घर में यह करामात! चलो, बात करते हैं।
वुकोंग ने कहा — पेड़ ठीक करना हो तो कर सकता हूँ। पर पहले गुरु को छोड़ो।
देव ने गहरी साँस ली — देखते हैं।