अध्याय २४ — दस-हजार-आयु पर्वत पर महासंत की मेजबानी और पाँच-मंडल वेधशाला में सुन वुकोंग की चोरी
यात्री दल दस-हजार-आयु पर्वत की पाँच-मंडल वेधशाला पहुँचता है जहाँ जगत-समसमयी देव के शिष्य मानव-फल से यात्रा-अतिथि का स्वागत करते हैं। झू बाजिए की चापलूसी पर वुकोंग चुपके से बगीचे में घुसकर तीन फल चुरा लेता है।
झू बाजिए को लिंग-जी बोधिसत्त्व की परीक्षा से मुक्त कराकर दल फिर रास्ते पर आया। चलते-चलते एक ऊँचा पर्वत दिखा —
उस पर्वत की शोभा — हजारों लाल-धारियों में सूरज की रोशनी, दस हजार रंगीन बादल। सफेद बगुले देवदारु पर बैठे, काले बंदर बेल पर झूलते। जल-धारा कल-कल बहती — सब कुछ अलौकिक।
गुरु ने कहा — इस पर्वत पर जरूर कोई पवित्र आत्मा रहती होगी।
— हाँ, — वुकोंग बोला — यहाँ कोई बुराई नहीं, जरूर कोई महासंत है।
थोड़ी देर में एक द्वार मिला। पत्थर की पट्टिका पर लिखा था: "दस-हजार-आयु पर्वत शुभ-भूमि — पाँच-मंडल वेधशाला स्वर्ग-कंदरा।"
दूसरे द्वार पर वसंत-काव्य — "दीर्घजीवी निर्भय देव-भवन — स्वर्ग के समान आयु वाले योगी का घर।"
वुकोंग हँसा — यह तो बड़ी बात कह रहे हैं! मैंने तो परम वृद्ध देव के दरवाजे पर भी ऐसा नहीं देखा।
अंदर से दो बालक निकले — साफ नयन, ताजे चेहरे, योगी-वेश में।
— स्वामी, आपका स्वागत है। पधारिए।
वे भीतर गए। मुख्य दरबार — पाँच कमरों वाला, ऊपर से नीचे तक नक्काशी। दीवार पर "स्वर्ग-पृथ्वी" — दो बड़े अक्षर।
गुरु ने पूछा — यहाँ त्रि-देव, चार-सम्राट, नव-ग्रह की पूजा क्यों नहीं? केवल "स्वर्ग-पृथ्वी" के अक्षर?
बालक ने मुस्कुराकर कहा — स्वर्ग-तत्त्व गुरु के मित्र हैं, पृथ्वी-तत्त्व गुरु के परिचित। बाकी देव — सब उनके छोटे भाई या शिष्य हैं।
वुकोंग हँसते-हँसते गिर पड़ा — ये बालक भूत की तरह बात करते हैं!
— आपके गुरु कहाँ हैं? — गुरु ने पूछा।
— परम सत्ता ने उन्हें ऊपरी आकाश में शुद्ध-मूल-धर्मफल का उपदेश सुनने बुलाया है। जाने से पहले गुरु ने हमें आदेश दिया — पश्चिम से आने वाले तांग सान्ज़ांग उनके पुराने मित्र हैं, उनका आदर करना। उन्हें दो मानव-फल देना।
बालक कानाफूसी करने लगे — पहले यह जाँच लें, यही तांग सान्ज़ांग हैं या नहीं।
उन्होंने पूछा — क्या आप तांग देश से पश्चिम जाने वाले तांग सान्ज़ांग हैं?
— हाँ।
— हमारे गुरु ने आपकी प्रतीक्षा की थी।
एक बालक चाय लाया। दूसरा बगीचे में गया — सुनहरी डंडी, लाल थाल, हरे कपड़े से ढका। पेड़ पर चढ़ा, एक बार ठकठकाया — दो फल गिरे।
बालक थाल लेकर आए —
— गुरु जी, हमारा पर्वत दूरदराज और सामान्य है। यह साधारण फल भेंट के रूप में स्वीकार करें।
गुरु ने देखा — दोनों फल बिल्कुल नवजात शिशु जैसे! हाथ-पैर, आँख-नाक सब!
गुरु घबराए — यह क्या? आप लोग यहाँ नवजात शिशुओं को खाते हैं?
— नहीं गुरु जी! यह पेड़ से उगा फल है!
— पेड़ से इंसान उगते हैं? — गुरु ने अविश्वास से कहा — नहीं, यह लो वापस।
बालकों ने अपने कमरे में जाकर एक-एक फल खाया।
यह उनके कमरे और रसोई की दीवार एक ही थी। रसोई में झू बाजिए खाना बना रहा था। उसने सुना — सुनहरी डंडी, मानव-फल — उसके मन में लालच जागा। उसने वुकोंग को बुलाया।
— दादा, यहाँ एक खजाना है — मानव-फल! तुम जाकर चुरा सकते हो?
— आसान काम है।
वुकोंग ने खुद को अदृश्य किया। बालकों के कमरे में देखा — वे ऊपरी मंजिल में गए थे। सुनहरी डंडी कमरे में लटकी थी — दो हाथ लंबी, अंगुली जितनी मोटी, ऊपर आँख में हरी रस्सी।
वुकोंग ने वह डंडी ली, बगीचे में गया। एक विशाल पेड़ —
— पत्ते केले जैसे, ऊँचाई हजार हाथ! जड़ की परिधि साठ-सत्तर हाथ।
पेड़ पर एक फल लटकता था — नवजात शिशु जैसा, डाल पर जकड़ा हुआ।
वुकोंग ने डंडी से ठकठकाया — फल गिरा, पर जमीन पर पहुँचते ही मिट्टी में समा गया।
— अरे! — वुकोंग बोला — यह तो भाग गया!
उसने बगीचे के भूमि-देवता को बुलाया।
देवता आए — महासंत, क्या आज्ञा?
— इस बगीचे में एक फल तोड़ा, जमीन पर गिरते ही गायब! तुमने उड़ाया?
— महासंत, मैं तो भूत-देव हूँ, मुझे इस फल को छूने की भी अनुमति नहीं। यह फल और पाँच तत्त्वों का रिश्ता अजीब है।
— कैसा रिश्ता?
— यह फल सोने से गिरता है, लकड़ी से मुरझाता है, पानी से घुल जाता है, आग से जलता है, और मिट्टी से धरती में समा जाता है। इसीलिए सोने की डंडी से ठकठकाना जरूरी है। और जब गिरे तो रेशमी कपड़े से पकड़ना — वरना यह मिट्टी में घुस जाता है। इस मिट्टी में लगभग सैंतालीस हजार साल की शक्ति है — लोहे का ड्रिल भी नहीं चुभेगा।
वुकोंग ने दंड से जमीन को ठोका — दंड उछल गया, मिट्टी पर खरोंच भी नहीं।
— ठीक कहा। मैं गलती से तुम पर शक कर बैठा। जाओ।
देवता चले गए।
वुकोंग ऊपर चढ़ा। एक हाथ से डंडी, दूसरे हाथ से अपना अंगरखा फैलाया। धीरे-धीरे खट-खट करते तीन फल तोड़े, अंगरखे में समेट लिए।
रसोई में आया — झू, तीन फल लाया!
— शा वुजिंग को भी बुलाओ।
तीनों ने एक-एक फल खाया।
झू बाजिए का मुँह बड़ा था — उसने पूरा फल एक ही निगल लिया। फिर बोला — क्या खाया? मुझे तो स्वाद ही पता नहीं चला।
— अरे, इतनी जल्दी! सैंतालीस हजार साल में तीस फल उगते हैं। हमने तीन खाए, यह कम नहीं है।
उधर बालकों के कमरे में — उन्होंने चाय लेने के लिए कदम बढ़ाए और झू बाजिए की आवाज सुनी — "और एक फल खाना था"।
चिंग-फेंग ने कहा — शिष्य, जाओ बगीचे में गिनो।
बगीचे में — पत्ते झड़े हुए, फल खाली। वे देखते-देखते रह गए। बाईस फल! पहले अट्ठाईस थे।
— छह गए! दो मैंने, दो तुमने — तो चार चुराए।
वे क्रोध में दरबार में आए और तांग सान्ज़ांग को गालियाँ देने लगे —
— चोर! भिखारी! बदमाश!
गुरु ने शांत स्वर में कहा — यदि मेरे शिष्यों ने गलती की हो तो बताओ।
— हाँ, उन्होंने ही चुराया! वह लंबे मुँह वाला अभी चिल्ला रहा था।
वुकोंग ने सुना — अब कबूल करना ही ठीक रहेगा।
— गुरु जी, मैंने तीन फल चुराए। हम सब ने खाए।
— चार चुराए! — बालक बोले।
झू बाजिए ने कहा — यह पहले से एक अलग रख लिया होगा!
वुकोंग ने गुस्से में दाँत पीसे। उसने एक बाल उखाड़ी, बदल दी — नकली वुकोंग खड़ा रहा। असली वुकोंग बगीचे में गया। उड़न-दंड उठाया और उस महाकाय पेड़ पर एक जोरदार वार किया —
पेड़ गिरा। जड़ें उखड़ीं। पत्ते बिखर गए। फल — सब खत्म।
वह वापस आया और नकली वुकोंग को वापस बुला लिया।
बालकों को कुछ शक हुआ — फिर से गिनते हैं।
बगीचे में गए — पेड़ गिरा हुआ। जड़ें उघड़ी। पत्ते झड़े। फल — एक भी नहीं।
बालक मूर्छित हो गए।
वे उठे, घबराए हुए अंदर गए। बोले — तांग सान्ज़ांग को खाना खाने दो, हमने गिनती गलत की थी।
इस बीच उन्होंने दरवाजा बंद करने की चाल सोची।
सब ने खाना खाने के लिए कटोरे उठाए — बालकों ने एक तरफ खड़े होकर दरवाजे बंद कर ताले लगाए!
झू बाजिए ने कहा — अजीब जगह — बंद दरवाजे के अंदर खाना?
बालकों ने चिल्लाना शुरू किया — चोर! तुमने हमारा अमृत-वृक्ष उजाड़ा! अब भाग नहीं सकते!
सूरज ढल गया। रात होने पर वुकोंग ने कहा — गुरु जी, जब सब सो जाएँ तब निकलेंगे।
— ये दरवाजे बंद हैं। — शा वुजिंग बोला।
— मेरे पास ताला-खोलने का मंत्र है।
वुकोंग ने दंड उठाई, मंत्र बोला, दरवाजे पर इशारा किया — झनक! ताले खुले, किवाड़ खुले।
चारों निकले। वुकोंग ने कहा — पहले उन बालकों को एक महीने की नींद दे देता हूँ।
वुकोंग ने अपनी कमर से दो नींद-कीड़े निकाले — एक बार इंद्र के द्वार-रक्षकों के साथ पासे खेलते जीते थे। उन्हें खिड़की से अंदर फेंका। वे सीधे बालकों के मुँह पर जा बैठे।
खर्राटे शुरू।
चारों तेजी से पश्चिम की ओर चल पड़े।