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अध्याय २३ — तांग सान्ज़ांग का मूल-स्वभाव और चार बोधिसत्त्वों की परीक्षा

चार बोधिसत्त्व एक धनी विधवा और उसकी तीन सुंदर पुत्रियों के रूप में यात्रियों की परीक्षा लेते हैं। तांग सान्ज़ांग अडिग रहते हैं, पर झू बाजिए प्रलोभन में फँसकर बँध जाते हैं।

चार बोधिसत्त्व परीक्षा तांग सान्ज़ांग झू बाजिए सुन वुकोंग शा वुजिंग वैराग्य

धर्म-मार्ग पर चलते हुए, मूल-स्वभाव को कभी न भूलो।

तीर्थयात्री चौकड़ी प्रवाहमान-बालू नदी के बंधन से मुक्त होकर पश्चिम की ओर बढ़ी। हरे-भरे पहाड़, खिले हुए जंगली फूल। शरद का मौसम आ गया था —

पहाड़ों पर लाल पड़ गए मेपल के पत्ते, पीले फूल शाम की हवा में झूमते हैं। वृद्ध झींगुर का गाना धीमा पड़ गया, उदास झींगुर की आवाज अनंत है। कमल के पत्ते टूट गए हरे पंखे जैसे, नारंगी की सुगंध सोने के गुच्छों से आती है। बेचारी उड़ती हंस-पंक्ति — बिंदुओं की कतार में दूर आकाश में।

शाम होने लगी। झू बाजिए ने कहा — भाई साहब, आप तो हल्के-फुल्के चलते हो, पर मुझे यह बोझ लेकर चलते देखो। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हड्डियाँ चरमरा गईं।

— चुप रहो, — वुकोंग बोला — साधु-जीवन में तकलीफ उठानी पड़ती है।

घोड़ा तेज दौड़ा, गुरु किसी तरह थामते रहे। पहाड़ी ढलान पर एक विशाल भवन दिखा — देवदार और पाइन के पेड़ों के बीच, ऊपर शुभ बादल। वुकोंग ने देखा — यह निश्चित ही किसी बोधिसत्त्व का माया-रूप है। बोला — चलो वहाँ ठहरते हैं।

गुरु नीचे उतरे। एक सुंदर द्वार था, बाहर वसंत-काव्य —

"रेशमी लहरें सीमांत पुल पर शाम को, हिम-बिंदु सुगंधित मेहंदी पर बसंत में।"

मकान के अंदर से आवाज आई — मध्यायु की एक महिला, सुंदर और सुडौल।

— आप लोग कौन हैं?

वुकोंग ने विनम्रता से कहा — हम पूर्व के तांग देश से पश्चिम की यात्रा पर हैं। रात गुजारने के लिए शरण चाहिए।

महिला मुस्कुराई — आइए, आइए।

झू बाजिए ने उसे आँखें भरकर देखा — अच्छी उम्र की महिला, सुंदर कपड़े, नाजुक आभूषण।

चाय और फिर खाना आया।

भोजन के बाद महिला ने कहा — मैं एक विधवा हूँ। पति बीते साल गुजर गए। तीन बेटियाँ हैं — घर-दामाद चाहिए। आप चारों में से एक यहीं रह जाए।

गुरु जैसे बहरे हो गए। आँखें बंद, मन शांत।

महिला ने फिर कहा — हमारे पास तीन सौ एकड़ खेत, एक हजार बैल-भैंस, ढेरों मकान, अनगिनत संपत्ति। बेहतर है यहाँ रहो।

— माता जी, — झू बाजिए खुजलाने लगा — यह प्रस्ताव तो...

— बंद करो! — गुरु ने डाँटा।

महिला ने गुरु को समझाने की कोशिश की —

"वसंत में नए कपड़े पहनो, ग्रीष्म में हरियाली का आनंद, शरद में मीठी शराब, शीत में गर्म कमरे में बैठो। क्या यह पश्चिम की यात्रा से बेहतर नहीं?"

गुरु ने शांत स्वर में जवाब दिया —

"गृहस्थ जीवन छोड़ा है मैंने, पुराने सांसारिक घर का द्वार तोड़ा है। बाहर की बातें मन में उठती नहीं, शरीर में ही स्वयं का आनंद है। पूर्ण होने पर स्वर्ण-द्वार खुलेगा, स्वभाव जानकर मन स्वदेश लौटेगा। घर में रहकर रक्त-आहार लेने से बेहतर, बुढ़ापे में दुर्गंध-पिंड में क्या रखा है?"

महिला क्रोधित हो गई और अंदर चली गई, दरवाजा बंद कर लिया।

वे चारों भूखे-प्यासे बैठे रहे।

रात हुई। झू बाजिए बोला — मैं घोड़े को चराने जा रहा हूँ।

वुकोंग ने सोचा — कुछ गड़बड़ है। उसने मक्खी का रूप लिया और झू के पीछे उड़ा।

झू पीछे के दरवाजे पर गया। महिला वहाँ खड़ी थी।

— माँ, मैं घोड़ा चराने आया हूँ।

— बेटे, रहो यहाँ, दामाद बन जाओ।

— मेरी लंबी थूथन, बड़े कान — क्या आपकी बेटियाँ पसंद करेंगी?

— कोई बात नहीं। मेहनती और काबिल हो तो चलेगा।

झू बाजिए बोला —

"मैं काम में तेज हूँ, बिना बैलों के खेत जोतूँगा। वर्षा चाहो तो वर्षा, हवा चाहो तो हवा। मकान छोटा लगे तो दो-तीन मंजिल और चढ़ा देता हूँ। घर-गृहस्थी की हर बात, आकाश-पृथ्वी तक मैं जानता हूँ।"

महिला ने उसे घर में बुला लिया।

वुकोंग वापस गुरु के पास आया और सारी बात बताई।

झू बाजिए वापस आया — बोला, घास अच्छी नहीं थी।

— घास नहीं, पर लड़की मिली? — वुकोंग ने ताना मारा।

रात को महिला तीनों बेटियों को लेकर दरबार में आई — सच्ची, प्रिय और प्यारी। सुंदरियाँ!

एक-एक की भँवें हरे चाप जैसी, मुख पर वसंत की ललाई। फूलों की तरह लचकती चाल, हर कदम पर कस्तूरी-सुगंध। सिर पर मोती और मणियाँ काँपती हैं, वस्त्रों से मधु-सुगंध बहती है। कहते हैं चुशान की सुंदरी, मानो चंद्रमा से उतरी हों।

गुरु सिर झुकाए रहे। वुकोंग ने परवाह नहीं की। शा वुजिंग ने मुँह फेर लिया।

झू बाजिए की आँखें चिपकी रहीं।

महिला ने कहा — जो भी दामाद बनेगा, मेरी किसी बेटी को चुने।

शा वुजिंग ने हँसते हुए कहा — उस लंबे थूथन वाले को कर दो।

झू ने विरोध किया। वुकोंग बोला — तुमने माँ को मुँह लगाया, अब क्यों नाटक कर रहे हो?

बात तय हो गई। झू को दूल्हा घोषित किया गया। खाना परोसा गया, झू अंदर चला गया।

अंदर गया, पर इतने सारे कमरे — भंडार, रसोई, कोठारी — भूल-भुलैया जैसा।

महिला ने कहा — आज शुभ दिन है। बहुत जल्दी। जाओ, ऊपर की ओर झुककर आठ बार प्रणाम करो — विवाह-संस्कार, धन्यवाद — सब एक में।

झू बाजिए ने प्रणाम किया। फिर बोला — माँ, तीनों में से कौन मेरी होगी?

— यही दिक्कत है — एक को दूँगी तो बाकी दो नाराज होंगी।

— तो तीनों दे दो!

— अरे, एक पत्नी में तीन-तीन पत्नियाँ?

— तो यह करो — एक रूमाल सिर पर रखकर खड़े हो जाओ और तीनों बेटियाँ बारी-बारी सामने से गुजरें, जो मिले वही तुम्हारी।

झू बाजिए मान गया। रूमाल सिर पर, हाथ आगे। पायलों की आवाज, इत्र की खुशबू — जैसे परियाँ आ-जा रही हों। झू बाजिए बाईं ओर झपटा — खम्भा। दाईं ओर — दीवार। अगले-पीछे — फर्श, चौखट।

नाक-मुँह सूज गए, माथा लगा दिया दीवार से। लुढ़क गया।

— माँ, ये लड़कियाँ बड़ी चालाक हैं, एक भी नहीं पकड़ पाया।

महिला ने रूमाल हटाया — बेटे, वे लड़कियाँ नहीं चाहतीं।

— तो माँ, आप ही रह जाओ मेरी!

महिला ने हँसकर कमरे से एक कुर्ता निकाला — अगर यह पहन सको तो मेरी बड़ी बेटी तुम्हारी।

झू बाजिए ने पहना — अभी बाँध भी नहीं पाया था कि शरीर रस्सियों से जकड़ गया!

सब अदृश्य हो गए।

सुबह हुई। गुरु, वुकोंग और शा वुजिंग जागे — पाइन के जंगल में सो रहे थे! न घर, न महिला।

शा वुजिंग घबराया — हम भूतों के चक्कर में फँसे!

वुकोंग मुस्कुराया — जंगल में उस पेड़ पर कुछ लिखा है।

शा वुजिंग ने उतारकर पढ़ा — आठ पंक्तियाँ: "लि-शान की माँ, संसार से परे — दक्षिणी सागर की बोधिसत्त्व ने उन्हें बुलाया। प्रज्ञा-परमिता और मंजुश्री — सब भेस बदलकर यहाँ आए। पवित्र भिक्षु में गुण हैं, संसार नहीं। झू बाजिए में ध्यान नहीं, आसक्ति बहुत। अब से शांत मन से सुधरो — अगर लापरवाही हुई तो रास्ता कठिन होगा।"

जंगल की गहराई से आवाज आई — गुरु जी! बचाइए! हड्डियाँ टूट रही हैं!

गुरु ने कहा — वुकोंग, उसे छोड़ नहीं सकते। वह भोला-भाला है, बस लालची है। जा, उसे मुक्त कर।

वुकोंग और शा वुजिंग जंगल में गए। झू बाजिए पेड़ से लटक रहा था — रस्सियों में जकड़ा, रोता हुआ।

शा वुजिंग ने रस्सियाँ काटीं। झू बाजिए ने सिर झुका लिया — बड़ा अपमान था।

झू बाजिए ने कहा — भाई, शपथ लेता हूँ — आगे से बोझ उठाऊँगा, रास्ता दिखाऊँगा, और यह कभी नहीं करूँगा।

गुरु ने कहा — ठीक है। चलो।

और चारों ने फिर पश्चिम की राह पकड़ी।