अध्याय २२ — झू बाजिए का बालू-नदी में संग्राम और मु-चा का शा वुजिंग को वश में करना
तीर्थयात्री दल आठ सौ योजन लंबी प्रवाहमान-बालू नदी पर पहुँचता है जहाँ एक भयावह राक्षस रास्ता रोकता है। गुआनयिन बोधिसत्त्व के शिष्य मु-चा की सहायता से वह राक्षस शा वुजिंग के रूप में दल में सम्मिलित होता है।
तांग सान्ज़ांग और उनके शिष्य पीत-पवन पर्वत का संकट पार कर आगे बढ़े। ग्रीष्म बीती, शरद आई। एक दिन सामने एक विशाल नदी दिखी — लहरें पहाड़ जितनी ऊँची, पानी का रंग भूरा और गहरा।
— शिष्यों, सामने कितनी चौड़ी है यह नदी? — गुरु ने घोड़े पर रुककर पूछा।
वुकोंग आकाश में उछला और देखा — आठ सौ योजन।
नदी के किनारे एक पत्थर की पट्टिका थी जिस पर लिखा था: "प्रवाहमान-बालू — आठ सौ योजन का विस्तार, तीन हजार योजन गहराई। मोर का पंख भी डूब जाए, सरकंडे का फूल भी तल तक जाए।"
वे पट्टिका पढ़ ही रहे थे कि लहरों में से एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ —
लाल लौ जैसे उलझे बाल, दो गोल चमकती आँखें — दीपक जैसी। नीला नहीं, काला नहीं — गहरे नील का मुखड़ा, गला — गड़गड़ाते बादल की तरह। गले में नौ खोपड़ियों की माला, हाथ में भारी राक्षस-दंड।
वह तूफान की तरह किनारे पर आया और सीधे गुरु की ओर लपका। वुकोंग ने गुरु को उठाकर ऊँचे किनारे पर पहुँचाया। झू बाजिए ने नव-दंती हल निकाला और राक्षस पर झपटा।
किनारे पर शुरू हुआ एक भीषण संग्राम —
नव-दंती हल और राक्षस-दंड आपस में टकराए। एक था स्वर्ग का पूर्व-सेनापति महाआकाश-नौसेनाध्यक्ष, दूसरा था पर्दा-लपेटने वाला अवतरित सेनापति। दोनों नदी के किनारे जोर लगा रहे थे। बीस दौर तक कोई नहीं जीता।
वुकोंग से रहा नहीं गया। दंड निकाला और कूद पड़ा। राक्षस ने वुकोंग को देखा और नदी में वापस डुबकी लगाई।
झू बाजिए चिड़चिड़ाया — दादा, तुम फिर आ गए! वह मेरी पकड़ में आ ही रहा था।
— माफ करना भाई, — वुकोंग हँसा — इतने दिन बाद दंड घुमाया तो हाथ खुजलाए, मन न माना।
दोनों गुरु के पास लौटे।
— क्या राक्षस पकड़ा? — गुरु ने पूछा।
— नहीं, पानी में भाग गया। और यह पानी — गुरु जी, इसे पार करना असंभव है। राक्षस को पकड़कर उससे ही नदी पार करानी होगी।
— यह पानी का काम पुराना है, — वुकोंग ने कहा — पानी में जाने में मुझे दिक्कत है। झू बाजिए, तुम पानी में जाकर उसे लड़ाई के लिए ललकारो, और हारने का नाटक करके उसे किनारे पर खींच लाओ।
झू बाजिए पानी में कूदा। तल तक पहुँचा।
राक्षस बाहर आया — तुम फिर आए?
दोनों जल में भिड़े। झू बाजिए ने फिर हारने का नाटक किया, किनारे की ओर भागा। राक्षस पीछे-पीछे आया — लेकिन वुकोंग को देखकर फिर नदी में कूद गया।
अब वुकोंग ने फैसला किया — दक्षिणी सागर पर जाना होगा, गुआनयिन बोधिसत्त्व को बुलाना होगा।
झू बाजिए ने कहा — जाओ दादा, और जाते समय मेरा नमस्कार कहना।
पलटी-बादल पर — आधे प्रहर में भी नहीं — वुकोंग पुष्पद्वीप पर पहुँचा। बैंगनी बाँस के वन में बोधिसत्त्व थीं।
— अरे, तुम फिर क्यों आए? तांग सान्ज़ांग को क्या हुआ? — बोधिसत्त्व ने पूछा।
वुकोंग ने सारी स्थिति बताई — प्रवाहमान-बालू नदी में एक राक्षस रास्ता रोक रहा है, पानी बहुत गहरा है, गुरु पार नहीं कर सकते।
बोधिसत्त्व मुस्कुराईं — वह राक्षस... वह पर्दा-लपेटने वाला महासेनापति है जो स्वर्ग से दंडित होकर यहाँ आया। मैंने उसे पहले ही मार्गदर्शन दिया था कि वह तांग सान्ज़ांग की रक्षा करे। समस्या यह है — तुमने उसे नहीं बताया कि तुम पश्चिम की यात्रा पर हो।
— अगर वह पश्चिम-यात्रियों की बात सुने तो?
— वह तुरंत शांत हो जाएगा।
बोधिसत्त्व ने अपने शिष्य हुई-आन को बुलाया, उसे एक लाल लौकी दी और बताया — इसे लेकर नदी पर जाओ, उस राक्षस का असली नाम "वुजिंग" पुकारो। वह बाहर आ जाएगा। उसके गले की नौ खोपड़ियों को लौकी से जोड़कर एक धर्म-नाव बनाओ।
हुई-आन और वुकोंग नदी पर पहुँचे।
— वुजिंग! वुजिंग! — हुई-आन ने पुकारा — तांग सान्ज़ांग यहाँ बहुत देर से प्रतीक्षा कर रहे हैं! तुम अभी तक क्यों नहीं आए?
नदी के तल से एक सिर उठा। राक्षस ने हुई-आन को देखा — बोधिसत्त्व के शिष्य! उसे राहत मिली। वह ऊपर आया।
झू बाजिए को देखकर बोला — यह लंबे थूथन वाला! इसने मेरे साथ दो-दो हाथ किया, तांग सान्ज़ांग का नाम एक बार भी नहीं लिया!
— वह झू बाजिए है, और यह सुन वुकोंग — दोनों तांग सान्ज़ांग के शिष्य हैं, दोनों बोधिसत्त्व ने भेजे हैं। डरो मत।
राक्षस किनारे आया, तांग सान्ज़ांग के सामने घुटने टेके —
— गुरु जी, मुझे माफ करें। मैं नहीं जानता था।
— क्या तुम सच में हमारे साथ पश्चिम चलना चाहते हो?
— बोधिसत्त्व ने मुझे वर्षों पहले यही निर्देश दिया था। हाँ, मैं चलूँगा।
— तुम्हारा नाम क्या है?
— बोधिसत्त्व ने मुझे शा वुजिंग नाम दिया। मैं रेत का पुत्र हूँ।
— बहुत अच्छा। — गुरु ने वुकोंग से कहा — उसे मुंडन कर दो।
वुकोंग ने उसके बाल काटे। शा वुजिंग ने गुरु को, फिर वुकोंग को, फिर झू बाजिए को प्रणाम किया।
हुई-आन ने बोधिसत्त्व की दी लौकी बाहर निकाली।
शा वुजिंग ने गले की नौ खोपड़ियाँ उतारीं, रस्सियों से जोड़कर नव-कोण बनाया, बीच में लाल लौकी रखी — एक धर्म-नाव तैयार!
गुरु नाव पर बैठे। बाईं ओर झू बाजिए, दाईं ओर शा वुजिंग। वुकोंग बादल पर, श्वेत नाग-अश्व को साथ लेकर। हुई-आन ऊपर से रक्षा करते रहे।
नाव लहरों पर हल्के पंख की तरह तैरी।
थोड़ी देर में दूसरा किनारा — पैर जमीन पर, कपड़े सूखे।
नौ खोपड़ियाँ नव-कोण से अलग हुईं और धुएँ की तरह विलीन हो गईं।
गुरु ने हुई-आन को धन्यवाद दिया।
हुई-आन पूर्वी सागर की ओर लौट गए, तांग सान्ज़ांग घोड़े पर सवार होकर पश्चिम की ओर बढ़े।